Natural health care, औषधि का दास- मृत्यु का ग्रास(Natural health care, the slave of medicine- the prey of death)
शरीर स्वयं समर्थ है (The body is self-sufficient);
स्वाभाविक स्वास्थ्य आज दुर्लभ हो रहा है .आरोग्य का ही दूसरा नाम दीर्घ जीवन ,स्फूर्ति ,बलिष्ठता, सौंदर्य ,साहस पुरुषार्थ आदि है. आज के गिरे हुए स्वास्थ्य वालों को यह स्वाभाविक आरोग्य प्राप्त हो जाए तो उसे कायाकल्प ही समझना चाहिए और स्वास्थ्य का निवारण और स्वाभाविक स्वास्थ्य की प्रति यही कायाकल्प है .इस कायाकल्प के लिए औषधीय कि नहीं प्राकृतिक नियमों के अनुकूल आचरण करने की आवश्यकता है.
मानव का या प्रकृति की सर्वोत्तम रचना है इतना सामर्थ और अद्भुत ऑटोमेटिक यंत्र संसार में कोई दूसरा नहीं हो सकता अनावश्यक छेड़छाड़ न की जाए स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आहार बिहार के नियमों का ठीक प्रकार पालन भर कर लिया जाए तो इतनी मात्रा से शरीर को जीवन पर्यंत स्वस्थ और निरोग रखा जा सकता है मौसम में होने वाले हेयर फिर से कभी-कभी शरीर संस्थान में भी व्यक्ति कम दिखाई पड़ता है परिवर्तित परिस्थितियों से समायोजन स्थापित करने के लिए शरीर सचेत होता है समाजिक शारीरक संतुलन इसीलिए परीक्षित होता है शरीर संस्थान में प्रविष्ट हुए विजातीय तत्वों के निष्कासन एवं परिशोधन के लिए भीतर की जीवन शक्ति निरंतर प्रयत्नशील रहती है इस शोध प्रक्रिया में कभी-कभी विभिन्न प्रकार के रोग भी भरते हैं ऐसे समय में हड़बड़ा कर तेज दावों की शरण में जाने की अपेक्षा थोड़ा धैर्य रखा जा सके. खान-पान में संयम बढ़ता जा सके और प्रकृति को अपना काम स्वतंत्रता से करने दिया जाए तो कुछ ही समय में रुकता से छुटकारा मिल जाता है .आपातकालीन परिस्थितियों की बात और है .जरूरी हो तो ही हल्की-फुल्की दवाएं समय राहत के लिए ली जा सकती है. बट जीवन अस्थाई उपचार की बात सोचनी हो तथा स्वस्थ एवं निरोग जीवन अभीष्ट हो तो प्रकृति के नियमों का ही परिपालन करना होगा.
एलोपैथी का तात्कालिक प्रभाव:
कृत्रिम जीवन क्रम का एक और अभिशाप है आरोग्य प्राप्ति के लिए दावों की गुलामी स्वीकार कर लेना एलोपैथी अपनी बाल्यावस्था में तेज प्रभाव के कारण अत्यंत लोकप्रिय हुई थी बीमारियों के लिए उसे रामबाण समझ गया और सर्वत अपनाया गया आज वह प्रभाव अवस्था में है अब यह अनुभव किया जा रहा है कि तत्कालीन राहत के लिए एलोपैथिक दवाई जितनी लाभकारी सिद्ध होती है दुर्गा में परिणाम की दृष्टि से उतनी ही हानिकारक है तेज मार्ग दवाई रोगों के कीटाणुओं को ही नहीं माने शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को भी बिना एक दूसरे के विवेक के लिए मार डालती है तथा जीवन शक्ति को कमजोर बना देती है इन दावों के अंधाधुंध सेवन से कितनी ही गंभीर प्रतिक्रिया सामने आई है दावों का दुष्प्रभाव oytrojensity के रूप में चिकित्सा जगत में एक नवीन संकट की तरह प्रस्तुत हुआ है.
निस्संदेश चिकित्सा विज्ञान के विकास में मानव जाति की विशेष सेवा की है कितनी असाध्याय बीमारियों के उपचार ढूंढ निकाले गए हैं और कितनी के लिए चिकित्सा गडहभागी थी श्रम कर रहे हैं इसके लिए उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है संकट तब उत्पन्न होता है जब दावों के उपयोग में और दूरदर्शिता का परिचय दिया जाता है और हर छोटी-छोटी बीमारी में एलोपैथिक दावों का अंधाधुंध सेवन किया जाता है ऐसे व्यक्तियों को इस तथ्य से भली-भांति परिचित होना चाहिए की औषधियां आपत्ति कालीन परिस्थितियों के लिए सामाजिक राहत हेतु एक अस्थाई व्यवस्था भर होती है ना कि स्वास्थ्य और पोषण का साधन प्रयोग के अतिरिक्त द्वारा शरीर संस्थान की विभिन्न गतिविधियों की प्राकृतिक व्यवस्था में व्यवधान पढ़ना स्वाभाविक है रोगों को दबाने के लिए ली जाने वाली दवाई अंततः शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक दावों की गुलामी स्वीकार करने की तुलना में आहार बिहार के नियमों की परिपालन को अधिक महत्व दिया जाए यह 179 तथ्य की इन प्राकृतिक नियमों की अपेक्षा करने से ही शरीर संस्थान में संतुलन पैदा होता है और लोगों को आक्रमण करने का असर मिलता है यह समझा और समझाया जा सके तो आमंत्रित कितने ही रोगों से बचाव हो सकता है सिद्ध होती है.
प्रकृति को भी अवसर दिया जाए:
विशिष्ट आपत्ती कालीन परिस्थितियों को छोड़कर अधिक अच्छा यह है की प्रकृति को शारीरिक परिशोधन एवं स्वास्थ्य संतुलन के लिए आवश्यक किया जाए.
हमारी आहार बिहार संबंधी भूलों से दंड स्वरूप बीमारियां आती है उनका उद्देश्य देख में भीतर भरे हुए विश्व को निकाल बाहर करना होता है रूकता के क्षणों में हमें पेट मानसिक तथा दूसरे बीमारियों को विश्राम देना चाहिए और धैर्य पूर्व ऐसी परिचर्चा करनी चाहिए ताकि रोग निवारक के लिए प्रकृति द्वारा जो भीतर ही भीतर प्रबल प्राप्त किया जा सके उनको सहायता मिल सके.
दवाएं विशेषता एलोपैथिक दवाई रोगों को भरकर बाहर निकलने से रोकते हैं उन्हें भीतर ही भीतर दबाने का प्रयास करती है इससे दूसरी बीमारियों का उत्पन्न हो जाता है दबाया वह 20 किसी अन्य रोग के नाम से फुटकर फिर बाहर निकलता है इस प्रकार एक रोग दूर नहीं हो पता तब तक दूसरा नया आकर खड़ा हो जाता है दूसरी हानियां है कि यह दबाने वाली दवाई स्वयं ऐसे रसायनों से बनी होती है जो स्वयं भी साथ होते हैं जहर से जहर को करने के प्रयास में पिछला जहर तो निकल नहीं पता उल्टा उपचार की विषाक्त मिलकर उसे धुंआ कर देती है.
यह दवाई तत्काली चमत्कार दिखाकर पीड़ित को चकित तो जरूर कर देती है पर उसके मूल कारण का समाधान करने में तनिक भी सहायता नहीं करती वरुण उसे व्यथा की जड़े और भी अधिक गहरी कर देती है इस प्रकार तीव्र औषधीय के प्रयोग का वर्तमान प्रचलन रोग निवारण में सहायक ना होकर अंततः वृद्धि करने वाला ही सिद्ध होता है.
बीमार पढ़ते ही हम दवा दरी की खोज में दौड़ पड़ते हैं और एक के बाद दूसरे डॉक्टर के पास इस तरह बेतहाशा दौड़ते हैं मानव दावों के न मिलने पर ही बीमारियां पैदा हुई हो और डॉक्टर के हाथ में उन्हें दूर करने का जादू भरा है.
थोड़े से कष्ट से घबराकर तत्काल जादुई परिणाम देखने के लिए उतावले लोग ऐसी दवाई खोजने के लिए दौड़ पढ़ते हैं जो क्षण भर में चमत्कार उपस्थित करें डॉक्टर बीमा की इस कमजोरी को समझता है और वह वैसे ही दवाई देता है इन दावों में शरीर की रोग निवारक क्षमता की कष्ट अनुभूति की ज्ञान तंत्र प्रणाली को दुर्बल करने भर की क्षमता होती है रोग के कीटाणुओं को मारकर वह उग्र लक्षणों का भी सामान करती है पर छोड़ता जीवन रक्षक तत्वों को भी नहीं वे मित्र शत्रु का भेद किए बिना शत्रु वध और आत्महत्या के दोनों प्रयोग साथ-साथ चलती हैं अस्तु तत्काल थोड़ी राहत मिलने पर भी अंततः रोगियों को इतनी अधिक चिरस्थाई हानि उठानी पड़ती है कि वह जादू चिकित्सा उन्हें बहुत महंगी पड़ती है.
तत्कालीन लाभ कितना ही क्यों ना हो मनुष्य की समझदारी यह कहती है कि पीछे के परिणाम को भी ध्यान में रखा जाए हो सकता है कि जो कार्य तुरंत लाभप्रद दिखता है बाद में हानिकारक प्रतिफल उत्पन्न करें हो सकता है जिसमें तुरंत हनी प्रतीत होती है वह कुछ समय उपरांत उत्तम प्रतिक्रिया उत्पन्न करें यह बात औषधीय के संबंध में लागू होती है
रोगों के साथ कष्ट जुड़ा हुआ है.प्रकृति संचित जहर को निकालने के लिए अंतर क्षेत्र में जो क्रांतिकारी उपाय अपनाती है .उसे उथल-पुथल के भीतरी भी जाती है .तत्वों को खदेड़ना प्रमुख उद्देश्य है. इस निकालने के प्रतिक्रिया में प्रसाद भेजना जैसा कष्ट होता है ताप, दाह सूजन .दर्द जैसे लक्ष्ण उभरते हैं होना यह चाहिए की प्रकृति की कामों में हाथ बांटना या जाए उसके काम को बिगाड़ा न जाए. इन सारी प्रक्रियाओं के निकलने के चलने के क्रम का सहयोग न बन पड़े तो काम बिगाड़ने जैसा उपक्रम न किया जाए. मार्ग औषधीय के प्रचलित तरीकों में किया किया जाता है की सफाई में लगे घटकों को भी जहर के साथ-साथ ही मार दिया जाता है. युद्ध तभी होता है जब दोनों ओर से योद्धा हो प्रहरियों का सफाई करके चोरी की खुली छूट दी जा सकती है. खदेड़ने के उपक्रम में जो हो-हल्ला मच रहा था उसे शांत किया जा सकता है.मारक और दवा यही करती हैं. उनकी आंधी मे मार्केट में मित्र और शत्रु प्रहरी और कर समान रूप से मरते हैं. इतना ही नहीं इस निमित्त बिखरे गए जहर का प्रभाव बाद में भी देर तक बना रहता है.
जादुई दवाई जब निकलती है .तब उनके गुणगान विज्ञापन से प्रभावित अनेक लोग उन्हें अपने में आतुरता बढ़ाते हैं .देखते-देखते उनका भारी प्रचलन होता है और निर्माता की तिजोरिया विपुल धन से भी भरी जाती रहती है .यह चमत्कार प्रदर्शन अंततः बहुत महंगा पड़ता है .रोगों के कारण जितनी जीवन शक्ति नष्ट होती है .उससे कहीं अधिक स्मरण मोहन के प्रयुक्त तंत्र द्वारा समाप्त हो जाती .इसी प्रकार जितनी भी साथ रोग के समय थी उससे भी अधिक किन औषधीय के कारण बढ़ जाती है पहले होता है. कि एक व्याधि से छुटकारा मिलते देर नहीं लगती की नई किसको के नए आकार प्रकार के नए रोग उठ खड़े होते हैं.
एकमात्र हल दवाई नहीं हो सकती;-
बीमारियों का एकमात्र हल दवाई ही नहीं है स्वास्थ्य की थोड़ी सी भी चिंता है वह संयम भरते हैं आहार बिहार में संतुलन बनाए रखते हैं और दावों से विशेष कर एलोपैथिक दावों से परहेज बनाते हैं जो प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं दिनचर्या नियमित रखते हैं वह बीमार कम पड़ते हैं और पढ़ते भी हैं तो उनकी रोक निरोधक क्षमता इतनी अधिक होती है कि वह सिगरेट ठीक हो जाते हैं आजकल एलोपैथिक दावों के प्रचलन से रोग ठीक करने का सर्वत्र प्रचलन है किंतु रोगी की रोग निरोधी क्षमता कितनी कम होती जा रही है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक रूप छोड़ता है दूसरा आक्रमण कर देता है अब डॉक्टर भी इस बात को मानते हैं की एलोपैथिक दवाई अपने पीछे लंबे समय तक चलने वाला घातक प्रभाव छोड़कर चली जाती है एलोपैथिक दवाएं तब और अपना घातक प्रभाव छोड़ती है जब रोग का कारण लक्षण जाने बिना उन्हें प्रयोग किया जाता है.
आज के व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में स्वास्थ्य बनाए रखना आवश्यक है। हमारी आधुनिक जीवनशैली, खाने-पीने की बुरी आदतें और प्रदूषण जैसे अनेक कारकों के कारण, हमारे शरीर और मन को बीमारियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में, प्राकृतिक चिकित्सा एक प्रमुख विकल्प है जो हमें स्वस्थ रहने के लिए एक स्वास्थ्यपूर्ण जीवनशैली की ओर प्रेरित करती है। यह चिकित्सा पद्धति भारतीय वैद्यकीय पद्धतियों पर आधारित है और आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक उपचार को शामिल करती है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि प्राकृतिक चिकित्सा क्या है और इसके उपचारों का महत्व क्या है।
प्राकृतिक चिकित्सा का दृष्टिकोण बीमारियों को ठीक करने के लिए "प्रकृति की चिकित्सा शक्ति" पर आधारित है। प्राकृतिक चिकित्सा मूल रूप से पोषण, वनस्पति चिकित्सा, भौतिक चिकित्सा, हाइड्रोपेथी और होम्योपैथी जैसे तौर-तरीकों के माध्यम से शरीर को मजबूत करके महत्वपूर्ण शक्ति या जीवन शक्ति का समर्थन करने पर केंद्रित है। नेचुरोपैथी का उद्देश्य आपात स्थिति को छोड़कर सिंथेटिक प्रिस्क्रिप्शन दवाओं और सर्जरी से परहेज करते हुए ऊर्जावान और जैविक रासायनिक संतुलन को स्थापित करना है।
दूसरी तरफ, आयुर्वेद
एक समग्र दृष्टिकोण और एक प्राचीन औषधि विज्ञान है जो संतुलन पर केंद्रित है। आयुर्वेद का मुख्य लक्ष्य आंतरिक स्तर पर ऊर्जावान बनाने पर अधिक है। आयुर्वेद का मानना है कि शरीर, मन और आत्मा के बीच सामंजस्य होना चाहिए। आयुर्वेद में तीन तात्विक पदार्थों का नाम दिया गया है जिन्हें दोषों के रूप में जाना जाता है: कफ, पित्त और वात। यदि इनमें से कोई भी दोष असंतुलित हो जाए तो इसका परिणाम रोग होता है। आयुर्वेद में रोगों का उपचार मंत्र, प्राणायाम, आसन, योग, ध्यान और उचित आयुर्वेदिक चिकित्सा के सेवन जैसी विधियों से होता है । इसके अलावा, ऐसे पदार्थों या व्यवहारों से बचना महत्वपूर्ण है जो दोष को असंतुलित कर सकते हैं।
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