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जीवन मे भगवत गीता का महत्व

जीवन मे भगवत गीता का महत्व।

जीवन के अध्याय को समझना है तो हमें कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। हमारे अपने सभी के घरों में हमारा पवित्र ग्रंथ गीता के रूप में उपस्थित रहता है।जिसमें जीवन से जुड़ी हर समस्याओं का निदान करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने इतनी सुंदर और अनोखी अनोखी बातें की है कि जिसको पढ़ने के बाद आपको दुनिया की सारी परेशानियों का हाल आसानी से मिल जाएगा। क्योंकि गीता से बड़ा कोई मोटिवेशनल किताब हो ही नहीं सकती क्योंकि गीता हमारा एक ऐसा ज्ञान ग्रंथ है जो हमारे नेत्र को खोलकर अंधेरे से हमें बाहर निकलता है। 
   गीता में हमें अपने अधिक स्वार्थी होने और अपने जीवन के प्रति अत्यधिक मोह करने के बारे में आगे किया गया है ।कि हमें हमारे जीवन में जो निश्चित है वह तो मिलकर भी रहेगी साथ ही हम अपने कर्म के आधार पर अपने भाग्य का निर्माण करते हैं इसलिए कर्म करते रहना चाहिए फल की चिंता का मंथन हमें नहीं करना चाहिए क्योंकि अगर फल की चिंता का मंथन हम करेंगे तो फिर हमारा ध्यान हमारे कर्म करने से भटक जाएगा इसलिए हमें अपने कर्म को पूरे ईमानदारी से करना चाहिए फल की चिंता करने के लिए स्वयं परमात्मा बैठे हुए हैं।
 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।


मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

(द्वितीय अध्याय, श्लोक 47)

अर्थात:- कर्म करते रहना चाहिए हमें अपने फल की चिंता हमें कदापि नहीं करनी चाहिए क्योंकि जिस पर अधिकार होता है वही करना चाहिए और कम पर हमारा अधिकार है फल पर हमारा अधिकार नहीं है।

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।


स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

(द्वितीय अध्याय, श्लोक 63)

अर्थात:- क्रोध में मनुष्य की माति मारी जाती है और जब मनुष्य की माति मारी जाती है तो फिर वह किसी काम का नहीं रह जाता और सारे काम उल्टे-पुल्टे करता है।


यहां गीता के दो श्लोको का उल्लेख हमने कहा किया अब इसमें देखिए मनुष्य को कहा गया है या कहिए कि मनुष्य से अपेक्षा की गई है कि वह अपने कर्म पर ध्यान दें मतलब है कि हम अपनी दिनचर्या पर जो काम हमारे सामने है और हमारे जीवन के लिए जरूरी है हम उसको निपटाएं और उसे पर पूरे विश्वास के साथ लग जाए अब उसे पर हमें सफलता कब मिलेगी इसकी चिंता करना हमारा काम नहीं है हमें बस अपने काम को करते रहना।
जब कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध होने वाला था और अर्जुन युद्ध करने के लिए तैयार नहीं थे, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें बहुत समझाया। इस उपदेश को हम आज भगवद गीता श्लोक के नाम से जानते हैं। भगवान कृष्ण ने गीता के 18 अध्यायों में 700 श्लोकों के माध्यम से अर्जुन को मार्गदर्शन दिया। महात्मा गांधी, अल्बर्ट आइंस्टीन, और स्वामी विवेकानंद जैसी महान हस्तियों ने गीता श्लोक का बहुत सम्मान किया है।


यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।


स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

(तृतीय अध्याय, श्लोक 21)

अर्थ:–> श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करते हैं, दूसरे मनुष्य भी वैसा ही आचरण, वैसा ही काम करते हैं। वह जो प्रमाण या उदाहरण प्रस्तुत करता है, समस्त मानव-समुदाय उसी का अनुसरण करने लग जाते हैं।


श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 39)

अर्थ:–> श्रद्धा रखने वाले मनुष्य, अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले मनुष्य, साधन पारायण हो अपनी तत्परता से ज्ञान प्राप्त करते हैं, फिर ज्ञान मिल जाने पर जल्द ही परम-शान्ति को प्राप्त होते हैं।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:॥

(नवम अध्याय, श्लोक 26)

अर्थ:–> जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्ती, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्ती-पुष्पादि मैं सद्गुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ।


भगवद गीता हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथों में से एक है जो मन, शरीर और आत्मा की जीवन शैली के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। भगवत गीता मात्र एक कहानी नहीं है, आज के सामाजिक प्रवेश से इसे कई तरीके से जोड़ा जा सकता है। 

अर्जुन जिनके पास सब कुछ था सुख, समृद्धि और एक खुशहाल परिवार, देखते ही देखते सब कुछ खो बैठे और उन्हीं सब वस्तुओं को वापस पाने के लिए उन्हें अपनों से ही युद्ध करना पड़ा। वह उस स्थिति में थे जहां उन्हें सब कुछ खोने के गम में जीते हुए अपनों के सामने खुद को विजेता साबित करना था। इतना ही नहीं, उन्हें अपने मन में कई शंकाओं और भय से जूझना पड़ा कि क्या करना सही था और निकट भविष्य में वह क्या खो देंगे।
यही सब भय और शंका जो उस समय उनके मन में चल रही थी, आज कहीं ना कहीं हम सब के अंदर मौजूद है। हम सभी बीती बातों का दुख और आने वाले कल का डर रखते हैं। जैसे एक व्यापारी जिसने अपना व्यवसाय खो दिया है, वह सब कुछ खोने के बारे में दुखी होगा। वहीं, एक उद्यमी जो कुछ नया करने की कोशिश कर रहा है उसे असफलता का डर रहेगा। इसका मूल कारण हमारे अपने लोग या हम जिस समाज में रहते हैं वह हो सकता है। सामाजिक क्षेत्र में हम अपने आप को विजेता साबित करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, जिसका परिणाम मानसिक रूप से टूटना हो सकता है।



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