google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical Women's health,खुद को रखे फिट और स्वस्थ तभी रहेगा परिवार निरोग और पुष्ट।

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Women's health,खुद को रखे फिट और स्वस्थ तभी रहेगा परिवार निरोग और पुष्ट।

  Women's health,खुद को रखे फिट और स्वस्थ तभी रहेगा परिवार निरोग और पुष्ट।

 आखिर क्यों भारत में बहुतायत में महिलाएं अस्वस्थ रहती हैं जबकि उनकी जीवन शैली और सुविधाएं पहले से बेहतर हुई हैं?

मेरा नज़रिया प्रश्न से भिन्न है, मैं नही मानती हुं कि सुविधाये या जीवन शैली बेहतर हुई है। अब प्रश्न के पहले भाग की बात करते हैं -

मनुष्य के जन्म से पूर्व यानी गर्भावस्था से ही उसकी जरूरते या ऐषणा पनपने लगती है, जन्म से मृत्यु लेकर अनेक लालसाओं से बंध जाता हैं। सब के लिए रोटी की अपनी एक कीमत होती है। और कहा भी जाता है कि मानव जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकताएं होती हैं – भोजन, वस्त्र और आवास। यहाँ 'मैं' भोजन में 'सम्यक और हितकर' भोजन का समर्थक हूँ, वही वस्त्र और आवास के अलावा 'स्वास्थ्य - शारिरिक के साथ मानसिक' को जीवन का चौथा स्तंभ मानता हूँ। यहाँ स्वास्थ्य मूलभूत व्यक्ति की मानसिक,शारीरिक और सामाजिक रुप में सम रहने की अवस्था है।

अब हमारा समाज के अपने तीन स्तर है, उच्च - मध्य और निम्न।उच्च वर्ग को आपके प्रश्न का दूसरा भाग प्रतिउत्तर दे देता है लेकिन मध्य और निम्न वर्ग में इसका औचित्य नहीं रहता। उच्च वर्ग चारों पर काबिज है, मध्य वर्ग तीन मूलभूत आवश्यकताओं के लिए दिन - रात गुज़ार देता है, निम्न वर्ग मुर्झाये चेहरे, चिपके गाल , उभरती हड्डियाँ, फाटे गंदे कपड़े से नज़र आते है। इन्हें नही पता कि अस्पतालों से जिंदा भी लौटा जा सकता है, लौट भी गए तो आगे कब - क्या - कैसे रहना ? सवाल खड़े होकर ये भी अपनी जगह बेसुध हो जाते है, इनकी बदनसीबी ये भी है कि ये कभी अखबारों का हिस्सा नही बन पाते।
मध्य वर्ग सब जानता है अस्पताल - बीमारी - डॉक्टर। लेकिन जब भारीभरकम बिल पास होते है तब सब खत्म हो जाता है।अखबार भी इनकी पीड़ा दिखाते नही है बस फर्क इतना है कि ये खुद से पैसा देकर अखबार में शोक छपवा सकते है निम्न नही कर सकते।

उच्च वर्ग के पास सबकुछ है अखबार - नए कानून - एम्बुलेंस छोड़िए एयर एंबुलेंस।

सुविधाएं पहले से बेहतर हुई हैं ?

कहा हुई है ? देश में सविधान ८५ साल बीत गए, क्या आज़तक स्वास्थ्य और स्वस्थ रखने का अधिकार मिला ?
शिक्षा का अधिकार 
अच्छे स्वास्थ्य का अधिकार

जिस दिन ये अगर असेम्बली में भी चर्चा का विषय बन गए तो बड़े बड़े हेल्थ सेक्टर के माफिया सड़को पर आ जायेंगे। पूरा हेल्थ सेक्टर ठप कर दिया जाएगा। फिर क्या करेगी सरकार या जनता ? रोने के अलावा।

जितने सरकार है अलग अलग राज्यो में हेल्थ स्कीम लेकर लेकिन जमीनी हकीकत से रूबरू कौन होगा ? मैं राजस्थान से हूं राजस्थान की ही बात करूंगा… राज्य के ७० फीसदी प्राइवेट अस्पताल इन हेल्थ स्कीम को या तो मानते नही है या मानते है तो तगड़ा झोल करते हैं। खुद ये सरकार का डेटा है - खुद ये तथ्य कांग्रेस के ही विधायक गहलोत से कहते हैं।
आप गांवों में जाइये देश के ९० फिसदी गांवों में डॉक्टर नही है। जिन डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई जाती है वे अनुपस्थिति रहते है या कुछ समय बाद शहरों की और भाग जाते हैं। यदि सरकारी अस्पताल में इमेरजेंसी या क्रिटिकल केस आ जाये तो उसे रेफेर कर दिया जाता है। क्योंकि सुविधाएं ही नही है। सरकारी अस्पतालों में सर्जन नाम मात्र के मिलेंगे। ऐसी हालत एम्बुलेंस की है।
औद्योगिक क्रांति ने हमे बहुत कुछ दिया है लेकिन बदले में बहुत कुछ लिया भी है। आज न पीने के लिए शुद्ध पानी है, न ही जीने के लिए शुद्ध हवा। आज मानसिक तनाव + GIT + रेस्पिरेटरी डिसीज़ में बड़ा रिस्क फैक्टर ये दो चीज़े ही है। शुद्ध अन्न को जोड़ने पर ७० फीसदी का आंकड़ा हो जाता है।

पहले घर पर ही आटा हाथों से पिसा जाता था, घर पर दही - घी बनाया जाता , छाछ - घी - दूध एक जरूरत थी, दूध के लिए गाँव गाँव घर-घर गाय - बकरी पाली जाती थी, फसलों की जुताई के लिए बैलो क़ी अपनी शान थी। मोटे अनाज का हरी सब्जियों के भरपूर आनंद लिया जाता था। वो सम्पूर्ण आहार था तब लोग प्रोटीन विटामिन क्या होते है नही जानते थे आज जिसे देखो वो ही प्रोटीन विटामिन की खुराक ले रहा है।

गायों बेलों को पालना अपने आप मे एक सम्पूर्ण व्यायाम था। तब gym की आवश्यकता नहीं थी। बड़े बुजुर्ग बच्चों से हमेशा शरीर के शक्ति अनुरूप ही कसरत करने के लिए कहा करते थे। आज अधिक मात्रा में कसरत करते हुए लोग पृथिवी से गमन कर लेते है। हमारे यहाँ कहा भी गया है - अर्ध शक्त्या निषेव्यस्तु बलिभि : अर्थातः जितनी तुम्हारी बल शक्ति है उससे आधा ही तुम्हे व्यायाम करना है। अन्यथा क्षय प्रतमको रक्तपित्त श्रम क्लम जायते। कहने का मतलब समीक्ष्य कुर्यात् व्यायामं अन्यथा रोगमाप्नुयात्।

अंत मे इतना ही मात्र महिलाएं ही अस्वस्थ नही है पूरा परिवार अस्वस्थ है। स्वास्थ्य को आप उपचार से मत जुड़िए और न ही जीवनशैली में बदलाव आया है। जो लोग अपने जड़ो को भूल गए है एक दिन उनके अपने भी उन्हें भुल जाएंगे।

कुछ साल पूर्व महिलाओं में जीरो फिगर आम बात थी, लडकिया कमजोर हो जाती थी जीरो फिगर के चक्कर में लेकिन एकाएक सब बदल गया - खेल शुरू हुआ कॉस्मेटिक इंडस्ट्री का।

आजकल महिलाएं खुद को खुद से ही सिक्योर नही मानती, उदाहरण के लिए कुछ दिया एक केस पढा कि देश में किसी भाग में हिप् इम्प्लांट सर्जरी करवाई कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गयी।

महिलाओ में ब्रैस्ट सर्जरी के साथ साथ हिप् इम्प्लांट का भी ट्रेंड चल पड़ा। कोई होठो की सर्जरी करवाती है तो कोई नाक।
सरलतम जीवन शैली विकल्प एक महिला के शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के सुखों में काफी सुधार कर सकते हैं। यहाँ तक कि मामूली बुरी आदतों और नकारात्मक विचार अनजाने में एक महिला के स्वास्थ्य में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। महिलाओं को स्वस्थ और फिट होना चाहिए, क्योंकि उनके पास बहुत सी दिन-प्रतिदिन की गतिविधियाँ होती हैं जिन्हें करने के लिए उनका स्वस्थ रहना आवश्यक होता है।

इसलिए, महिलाओं को स्वस्थ रहने के लिए अपनी दिनचर्या में कुछ स्वस्थ आदतों को शामिल करना चाहिए।

1. नाश्ता करना न छोड़ें


नाश्ता दिन का सबसे महत्वपूर्ण भोजन है जो की शरीर को स्वस्थ रखता है। एक ठोस नाश्ता खाने से आपके पचाने की क्षमता बढ़ेगी, लेकिन आप अपने दैनिक लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए भी पर्याप्त मात्रा में ईंधन इकठ्ठा कर सकती हैं। आप अंडे के साथ पालक बना सकती हैं या नाश्ते के लिए एक ग्रीन स्मूथी बना सकती हैं।


2. नाश्ते में प्रोटीन स्नैक्स लें


दोपहर के भोजन और रात्रिभोज के दौरान,महिलाओं को अच्छी तरह से खाना चाहिए। महिलाओं को अपने भोजन को प्रतिबंधित नहीं करना चाहिए और भूख से मरने के बजाय उन्हें खाना चाहिए। प्रोटीन-आधारित स्नैक्स का अधिक से अधिक सेवन करें जिससे आप पूरे दिन तरोताज़ा महसूस करें।


3 सक्रिय रहने के लिए क्रिएटिव तरीके खोजें


महिलाओं को सक्रिय रहने के लिए लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों से जाना चाहिए। सुबह या शाम को तेज चलने के लिए स्वयं को स्वस्थ रखना चाहिए। इसके अलावा, जब आप किराने की खरीदारी कर रही हैं तब अपनी खुद की किराने की थैली ले जानी चाहिए, जो की आपके बाइसेप्स टोन करने में मदद करेगा।


4. नींद महत्वपूर्ण है


केवल पौष्टिक खाद्य पदार्थों को खाने से स्वास्थ नहीं बनता बल्कि पूरी नींद लेना भी आवश्यक है। यदि आप सोने से वंचित हैं, तो आपको गुस्सा आता है और इस वजह से केवल आप ही नहीं बल्कि आपके आस-पास के लोग आपके गुस्से की वजह से परेशान हो जाते हैं।


5 कॉफ़ी और चाय का कम से कम सेवन करें


महिलाओं को पूरे दिन पीने के पानी से स्वयं को फिट रखना चाहिए। इसके बजाय, कई ऐसे लोग हैं जो कॉफ़ी और चाय के कप का सेवन कम कर देते हैं, इसका शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे निर्जलीकरण होता है। पानी या ताज़े फलों का रस नियमित रूप से पीना चाहिए।


6 मिठाई खाकर स्वयं का उपचार करें


अनुसंधान से पता चलता है कि जो महिलाएँ मिठाई के साथ खुद का इलाज करती हैं उनकी खाने के ऊपर नियंत्रण की संभावना बढ़ जाती है। मिठाई खाने से आपको ख़ुशी का एहसास होगा लेकिन मिठाई का सेवन ज़्यादा न करें क्योंकि इससे आपका वज़न बढ़ सकता है।


7. ज़ोर से हँसना


हँसी आपको तनाव से राहत दे सकती है, जो वजन और अस्वस्थ आदतों को जन्म लेने से रोक सकती है। जब आप तनाव में होती हैं, तब शरीर ग्लूकोज की रिहाई को ट्रिगर करता है और अतिरिक्त ग्लूकोज इंसुलिन में परिवर्तित हो जाता है। यह बदले में वसा के रूप में संग्रहित हो जाता है।


8. अन्य गतिविधियों का प्रयास करें।


महिलाओं को केवल जिम में नहीं जाना चाहिए, उन्हें अन्य गतिविधियों का भी प्रयास करना चाहिए। पुराने दोस्तों से मिलना, तैराकी, तेज़ चलना, बागवानी, खेल और योग भी शामिल किए जाने चाहिए, क्योंकि इससे हृदय रोग का खतरा कम हो जाता है।


9. अपनी लाइफ को बैलेंस करें


जो महिलाएँ अपने आप को फिट रखती हैं वह यह जानती हैं कि अत्यधिक आहार, अत्यधिक काम करने और एक कठोर कार्य करना सेहत के लिए ठीक नहीं है। इसलिए, अपने आप को फिट और स्वस्थ रखने के लिए, यह आवश्यक है कि आप अच्छी जीवन शैली के लिए चुन कर अपने जीवन को संतुलित करें।


10. लोगों से घुलना-मिलना।


एक विख्यात अध्ययन के अनुसार, सामाजिककरण प्रभावी है बौद्धिक प्रदर्शन को बढ़ावा देने में एक मानसिक व्यायाम के रूप में कार्य करता है। यदि आप लोगों से ज़्यादा घुलती-मिलती रहोगी, तो आप मानसिक रूप से फिट रह सकोगी।
  • 49 बातें आपको हमेशा स्वस्थ्य रखेंगी।
    • बाहरी विचार और बाहरी खानपान के कारण बड़े से बड़े खानदान खत्म हो गए। हमारे भारत में सब कुछ सरलता से उपलब्ध हैं।
  1. यहां बुजुर्गों से मार्गदर्शन मुफ्त मिलता है। हजारों पुराने ग्रन्थों का अखण्ड भंडार है। भारत में ज्ञान-ध्यान निशुल्क मिलता है।
  2. आपके अंदर बस कुछ पाने की लालसा भर हो, बस लोग दुःख को दूर करने आ जाएंगे।
  3. स्वस्थ्य रहने का सार यही है की हम बाहर की हर चीज से बचें।
  4. आयुर्वेद के आचार्यों को भी इस बात का पता था कि बाहर के प्रभाव किस प्रकार हमारे स्वभाव और आचरण को प्रभावित करते हैं । वे कहते हैं—पित्तोदयात्चं चंचलत्वं- …!
  5. अर्थात-पित्त के प्रकोप से मन की चंचलता बढ़ती है । पित्त जब दूषित होता है, तब मन विक्षिप्त हो जाता है और वह निरंतर घूमता रहता है।
  6. मन भी तेज हो जाता है और श्वास भी तेज हो जाती है। मन की गति जितनी तीव्र होती है, श्वास की गति भी उतनी ही तीव्र हो जाती है।
  7. "वातोदयाद् भवेच्चिते, जडताऽस्थिरता भयम्
  8. शून्यत्वं विस्मृतिः प्रान्तिररतिचित्तविभ्रमः
  9. अर्थात-व्यक्ति में जब वायु का प्रकोप होता है, तब अस्थिरता आती है। व्यक्ति निर्णय या निश्चय नहीं कर पाता! हर पल उसका निर्णय बदलता रहता है।वायु तीव्रता होने पर ऐसा होता जाता है।
  10. कफ का प्रकोप….जब व्यक्ति में कफ का प्रकोप बढ़ता है तब उसमें हास्य, शोक, मूढ़ता, रति, तृष्णा जागती है।
  11. उसमें लोभ बढ़ जैसे-जैसे आदमी बूढ़ा होता है, वैसे-वैसे उसमें कफ की वृद्धि होती है और जैसे-जैसे कफ बढ़ता है, वैसे-वैसे उसका लोभ भी बढ़ता चला जाता है । युवक इतना लोभी नहीं होता, जितना लोभी होता है एक बूढ़ा व्यक्ति।
  12. बूढ़ा व्यक्ति ये देखता है कि कहीं कुछ छूट न जाए। वह सब कुछ पाने के लिए ललचा जाता है। ऐसे लोग कम होते हैं जो यह कहते हैं कि अब कुछ नहीं चाहिए।
  13. स्वामी विवेकानंद ने मृत्यु से कुछ क्षण पूर्व कहा - "मैं जा रहा हूं। मेरे मन में कोई बात बाकी नहीं है, कुछ भी शेष नहीं है।
  14. अधूरापन अभिशाप है…बताते तो यह है कि काल करे सो असज और आज करे सो अब…
  15. स्मरण रखें कि-उस व्यक्ति का काम पूरा होता है, जो प्रतिदिन काम प्रारंभ करता है और उसे उसी दिन संपन्न कर देता है।
  16. वह यह मानता है कि जितना मेरे से हो सका, मैंने किया, अब कल प्रातः पुनः नये ढंग से नया काम प्रारंभ करूंगा और उसे पूरा करूंगा!
  17. काम करने का यही सही तरीका है। जो कार्य का भार ढोता है, उसका काम भी पूरा नहीं होता । उसकी शक्ति उस कार्य के भार को ढोने में ही समाप्त हो जाती है।
  18. आज-अभी में जीना अतीत के पापों की चादर को साफ करने का सबसे अच्छा उपाय है -वर्तमान में जीना, जो आदमी वर्तमान में जीता है, वर्तमान में जीना जानता है, अतीत का और भविष्य का ज्यादा भार नहीं ढोता, वह आदमी अतीत की चादर की धुलाई कर सकता है और अतीत के भार से मुक्त हो सकता है।
  19. चादर पर जो मनुष्य नये-नये धब्बे लगाता रहता है, वह उसे कैसे साफ करेंगा वर्तमान में जीने का अर्थ -मन की चंचलता को कम करना, स्थिरता को बढाना, कफ, वायु और प्रकोप को कम करना।
  20. स्वयं को देखो, अपना आंकलन करो…आदमी में अपने प्रति, अपने दोषों के प्रति, अपने शारीरिक दोषों से होने वाले विचारों के प्रति जागरूकता का कोई भाव नहीं है।
  21. वह नहीं जानता कि क्या खाने से क्या परिणाम होता है, क्या असर होता है -शरीर पर, मन पर, भावों पर? फिर वर्तमान में जीने की बात कहां से आये?
  22. वर्तमान में वही व्यक्ति जी सकता है, जो अपने दोषों के प्रति जागरूक होता है!
  23. जागरूकता की सबसे बडी बाधा है… मूर्छा। कर्मशास्त्र की भाषा में मूर्छा और गीता की भाषा में इसे आसक्ति कहते हैं।
  24. मूर्छा क्यों आती है ? उपाध्याय मेघविजय ने इसका शरीरशास्त्रीय कारण बतलाते हुए लिखा है
  25. 'रक्ताधिक्येन फ्तेिन मोहप्रकृतयोऽखिलाः दर्शनावरणं रक्त कफसांकर्यसंभवम्
  26. यानी जब रक्त में दोष आता है, रक्त की अधिकता और पित्त दोनों मिल जाते हैं, तब मोह की सारी प्रकृतियां प्रकट होने लगती हैं।
  27. ये मूर्छाएं तब सामने आती हैं, तब पित्त का प्रकोप और रक्त की अधिकता होती है। मोह की जितनी प्रकृतियां हैं, उतनी ही मूर्छाएं हैं। जितनी वृत्तियां हैं, उतनी ही संज्ञाएं और आवेग हैं।
  28. मनोविज्ञान में चौदह मौलिक वृत्तियां मानी गयी है। मोह-कर्म की २८ प्रकृतियां हैं।
  29. पंतजलि ने पांच वृत्तियां बतलायी हैं।
  30. दस संज्ञाएं हैं। नामों में भेद हो सकता है पर मूल प्रकृति सबकी एक है -
  31. आदमी को मूर्च्छित कर देना, विवेक को लुप्त कर देना और संज्ञा को सुप्त कर देना। जिससे कि सचाई हाथ न आये, जो जैसा है उसे वैसा न जान सके, दूसरे रूप में ही जाने । -
  32. प्रवचन का प्रभाव….धनलोलुप भटके हुए कथावाचक, प्रवचन ज्ञानी सबको भ्रमित कर लूट रहे हैं। जगह-जगह भगवत अर्थात भाग-मत यानी निकम्मा बनाने की कथा चल रही हैं ओर बेचारी लता नाचकर दुःख नितने की कोशिश कर रही हैं।
  33. सिखधर्म से सीखो…
  34. सिखों के पांचवें गुरु अर्जुनदेव अपने चौथे गुरु के पास आये और उनकी सेवा में रहने लगे। गुरु ने उनको परख लिया।
  35. अर्जुनदेव पूर्ण समर्पित और विनम्र थे। गुरु अन्यान्य शिष्यों से बड़े-बड़े महत्त्व के काम करवाते और अर्जुन देव से थालियां मंजवाते।
  36. वह काम अन्य कामों की अपेक्षा छोटा समझा जाता है। शिष्यों ने सोच लिया कि गुरु की दृष्टि में अर्जुन देव निकम्मे हैं, किसी काम के नहीं हैं।
  37. इसलिए उन्हें सदा तुच्छ कामों में लगाये रखते हैं ! शिष्य अपने-आपको बड़ा मानने लग गये। अहंकार छा पया । कुछ दिन बीते । गुरु ने अपना उत्तराधिकार पत्र लिखा ! उसे एक पेटी में रखकर शिष्यों से कहा मैंने उत्तराधिकार पत्र दिया है ।
  38. लिखकर इस पेटी में रख मेरी मृत्यु के बाद इसे खोलना। गुरु दिवंगत हो गये। पेटी खोली। पत्र पढ़ा। सब अवाक रह गये, गुरु ने अपना अधिकार अर्जुनदेव को सौंपा था। अर्जुन देव गुरु बन गये। शिष्य सब देखते ही रह गये।
  39. सचमुच व्यक्ति में महानता आती है मूर्छा के टूटने पर, जो इस चक्कर में रहता है कि मेरा मूल्यांकन नहीं हुआ, मुझे कुछ नहीं बनाया, वह सचमुच कुछ नहीं बनता।
  40. जिसके मन में पद-प्राप्ति की भावना जाग जाती है, उसमें बनने की योग्यता ही समाप्त हो जाती है। जब तक मूर्छा नहीं टूटती तब तक विकास के सारे द्वार बंद रहते हैं।
  41. बुद्ध के पास एक व्यक्ति ने आकर कहा -'भगवन ! मैं इतने दिनों से आपका प्रक्चन सुन रहा हूं, पर उसका कोई असर नहीं हुआ। बुद्ध बोले –'यहां से श्रावस्ती कितनी दूर है?' उसने कहा- 'पच्चीस योजन। ' बुद्ध ने कहा'-'क्या यह तुम जानते हो?
  42. 'हां मैं जानता हूं।' फिर बुद्ध बोले - 'क्या जानने मात्र से तुम वहां पहुंच गये ?' उसने कहा __- 'भंते! जाऊंगा तो पहुंचूंगा, धर्म की भी यही बात है।' प्रवचन अन्यथा नहीं।' बुद्ध बोले, 'अरे, सुना, 'तुम जान गये। पर जब तक तुम उसे अपनाओगे नहीं तब तक उसका असर कैसे होगा ?'
  43. पर करते हमारी सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि हम जानते हैं, कुछ भी नहीं। प्रयोग नहीं करते, अभ्यास नहीं करते। अभ्यास पहली आवश्यकता है।
  44. दूसरी बात है -दृढ़ निश्चय। परमहंस रामकृष्ण ने कहा है -'मैंने मां काली का तप करने शुरू किया और भटकता रहा। यह सोचकर कि मैं अपना जीवन खराब कर रहा हूँ।
  45. मुझे कोई कर्म करना चाहिए। मेने साधना आरम्भ की मेरा निश्चय था कि मैं परमहंस बनूंगा। पर मेरा सबने मनोबल तोड़ा। पण्डितों ने परेशान किया।
  46. मैंने नौ वर्षों में केवल एक समय 2 रोटी कहकर गुजारे। पर अपने निश्चय पर दृढ़ रहा। महाकाली की उपासना करता रहा और एक दिन मेरा नाम भक्तों की सूची में आ गया।'
  47. अभ्यास और दृढ़ निश्चय होता है तो मूळ टूट जाती है और जागरूकता बढ़ जाती है। इससे ही वर्तमान में जीने का सूत्र उपलब्ध हो जाता है।
  48. जो वर्तमान में जीना प्रारंभ कर देता है, वह अतीत के पाप की चादर की धुलाई कर देता है और 'ज्यों की त्यों घर दीन्हीं चदरिया'-कबीर की इस उक्ति को सार्थक कर देता है।


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