google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical कैंसर जैसी घातक बीमारी के लक्षण इसके बढ़ने से पहले ही पता लगाए जा सकते हैं? आईए जानते हैं कारण और निवारण

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कैंसर जैसी घातक बीमारी के लक्षण इसके बढ़ने से पहले ही पता लगाए जा सकते हैं? आईए जानते हैं कारण और निवारण

   कैंसर जैसी घातक बीमारी के लक्षण इसके बढ़ने से पहले ही पता लगाए जा सकते हैं? आईए जानते हैं कारण और निवारण 

बीमारी कोई भी हो वो पहले ही जटिल नहीं होती वो पहले संकेत देती‌ है फिर वह जीर्ण रोग का रुप लेती है जैसे कैंसर, पर लोग इसके शुरुवाती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते है। वैसे शुरू में लक्षण आसानी से नहीं दिखते है। इसलिए गौर करना आवश्यक है। लक्षण इस पर भी निर्भर करते है कि किस प्रकार का कैंसर है। लेकिन फिर कुछ प्रारंभिक लक्षण होते है जो कैंसर होने पर दिखते है-



कैंसर के शुरुआती लक्षण:-


वजन घटना, लिवर कैंसर का संकेत हो सकता हैं किसी भी प्रकार का कैंसर होने पर अधिक थकान होती है।शरीर के किसी जगह पर गांठ महसूस होना, स्किन कैंसर का संकेत हो सकता है।कमजोरी, आराम करने के बाद भी पीरियड्स में अधिक दर्द होना, या अधिक ब्लड आना, वेजाइनल का कैंसर हो सकता है।
स्तन में बदलाव, ब्रेस्ट कैंसर हो सकता है।पेट मे दर्द, उल्टी, बेचैनी गर्भाशय का कैंसर हो सकता है।छाती और बाहों में अधिक समय तक दर्द फेफड़ो का कैंसर हो सकता है।पूरा मुह न खुलना और अंदर ढेरो छाले दिखना मुह का कैंसर हो सकता है।आवश्यक नही की यह लक्षण जिसको हो उसे कैंसर ही हो। लेकिन यदि है तो यह कैंसर हो सकते है। डॉक्टर का परामर्श लें।

विषाणुओ के संक्रमण और सूर्य के प्रभाव से शरीर की कोशिकाओं का कैंसर का रूप धारण कर लेती है। सभी प्रकार के कैंसर रोगों के लक्षणों की स्थितियां भिन्न-भिन्न होती है।

  1. कैंसर के रोगी को 6 महीने तक आग पर पका हुआ किसी भी प्रकार का भोजन नहीं करना चाहिए।
  2. प्रारंभिक 2 महीने तक रोगी को केवल अंगूर ही खाने चाहिए।
  3. अंगूर के साथ अन्य फलों का आहार भी लिया जा सकता है टमाटर संतरा मौसमी काजू और बादाम भी खाए जा सकते हैं।
  4. दही का प्रयोग करते रहने से कैंसर की संभावना समाप्त हो जाती है दही का 80% से अधिक भाग शरीर में कब जाता है।
  5. गेहूं के पौधे का रस कैंसर के रोगियों के लिए अत्यंत उपयोगी पाया जाता है गेहूं के पौधे का रस विषाणु के प्रभाव को रोकता है।
  6. गेहूं के पौधे का रस कैंसर के रोगियों के लिए अत्यंत उपयोगी है गेहूं के दानों को 10:00 12 घंटे भिगोकर वह पानी पीने से कैंसर में लाभ होता है।
  7. कुछ खाद्य पदार्थ ऐसे हैं जो कैंसर को नष्ट करते हैं जैसे साबूत दाले, पत्ता गोभी ,फूल गोभी, गाजर ,नींबू, मौसमी तथा इसी प्रजाति की अन्य सब्जियों तथा फलों में भी कैंसर नष्ट करने के गुण हैं इसीलिए इन सब्जियों का प्रयोग काफी मात्रा में करना चाहिए।

नोट✓

कैंसर के रोगी को चटपटा ताला हुआ मसालेदार भोजन कभी नहीं करना चाहिए। सब्जियों को भूनकर, तलकर भी नहीं खाना चाहिए। कैंसर रोग के लिए डॉक्टरी चिकित्सा का सहारा लेना परामर्श के अनुसार ही अपने खानपान और स्वास्थ्य का देखभाल करें।

गर्भाशय का कैंसर (uterine cancer):-

गर्भाशय को योनि से जोड़ने वाली तंग न लीवर साड़ियों के कारण संक्रमित होकर कैंसर ग्रस्त हो जाती है इस रोग में गर्भाशय में अधिक पानी अथवा रक्त मिश्रित बदबूदार द्रव्य निकलने लगता है। मासिक धर्म बंद हो जाने के बाद रजोनिवृत्ति काल में भी रक्तस्राव होने लगता है।
  मुत्राशय में रोग विषाणु का संक्रमण होने से मूत्राशय प्रदाह रोग उत्पन्न होता है। मूत्र पथ के अन्य अंगों किडनी, यूरेटर और प्रोस्टेट ग्रंथि और योनी में भी संक्रमण का असर देखने में आता है। इस रोग में कई कष्ट जाए लक्षण होते हैं जैसे तीव्र गंध वाला पेसाब होना, पेशाब का रंग बदल जाना, मूत्र त्यागने में जलन और दर्द का अनुभव होना, कमजोरी महसूस होना, पेट में पीड़ा और शरीर में बुखार की हरारत रहना, हर समय मूत्र त्यागने की इच्छा बनी रहना, मूत्र पथ में जलन बनी रहती है मुत्राशय  में सूजन आ जाती है।

  यह रोंग पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में ज्यादा देखने में आता है इसका कारण यह है कि स्त्रियों की पेशाब की नली 2 इंच के बजाय पुरुषों की मूत्र की नलिका 7 इंच लंबी की होती है। छोटी नलिका से होकर संक्रमण सरलता से मूत्राशय को आक्रांत कर लेता है। गर्भवती स्त्रियों और सेक्स सक्रिय औरतो में मूत्र
 रोग अधिक पाया जाता है। इस रोग में मूत्र खुलकर नहीं आता जलन की वजह से रोग बढ़ता जाता है।

  आयुर्वेदिक उपचार:-

  • रोगी के उपचार के लिए गेहूं के व पौधे लेने चाहिए जिसमें वढवार के लिए किसी प्रकार का रासायनिक खाद्य प्रयोग में न की गई हो।
  • रोगी को अंगूर खाने के लिए देनी चाहिए अंगूर के साथ मौसमी टमाटर काजू बदाम का प्रयोग भी इस रोग में लाभदायक रहता है।
  • भोजन में डबल रोटी की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए डबल रोटी अन्य खाद्य पदार्थों की अपेक्षा जल्दी पच जाता है।

फूलगोभी नींबू गाजर साबुत डाले पत्ता गोभी याद सब्जियां तथा फल किस रोग में विशेष गुण कारी होते हैं।

स्तन कैंसर (Breast Cancer):-

लंबे समय तक हार्मोन चिकित्सा के कारण स्तनों में कैंसर होने की संभावना बनी रहती है। इसरो का रोगी की खुराक में भी संबंध रखता है। शुरू में स्तन में किसी भाग में गांठ भी बन जाती है लेकिन इसमें दर्द नहीं होता। जब यह गांठ कैंसर का फोड़ा बनकर फैलती है तो स्थल की दुग्ध उत्पादक नलिया प्रभावित होती है।

स्तन कैंसर के बारे में जानने के लिए शरीर रचना के बारे में जानना बहुत जरूरी है. स्तन शरीर का एक अहम अंग है. स्तन का मुख्य कार्य अपने दुग्ध उत्पादक ऊतकों (टिश्यू) के माध्यम से दूध बनाना है. ये टिश्यू सूक्ष्म वाहिनियों (डक्ट) के जरिये निप्पल से जुड़े होते हैं. इसके अलावा इनके चारों ओर कुछ अन्य टिश्यू, फाइब्रस मैटेरियल, फैट, नाड़ियां, रक्त वाहिकाएं और कुछ लिंफेटिक चैनल होते हैं, जो स्तन की संरचना को पूरा करते हैं. यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि ज्यादातर स्तन कैंसर डक्ट में छोटे कैल्शिफिकेशन (सख्त कण) के जमने से या स्तन के टिश्यू में छोटी गांठ के रूप में बनते हैं और फिर बढ़कर कैंसर में ढलने लगते हैं. इसका प्रसार लिंफोटिक चैनल या रक्त प्रवाह के जरिये अन्य अंगों की ओर हो सकता है.

Breast Cancer Stages:

कैंसर स्टेजेस को और बड़ा होने से बचाने के लिए नियमित ब्रेस्ट सेल्फ एग्जामिन करें ।

ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ी सावधानियां :

इन लक्षणों में से एक या एक से ज्यादा लक्षण दिखने पर तुरंत जांच करा लेनी चाहिए. जल्दी पता लगने से बीमारी को बेहद कम इलाज और कम जटिलताओं के साथ ठीक किया जा सकता है.

ब्रेस्ट कैंसर के कारण और रिस्क फैक्टर

Breast cancer causes: स्तन कैंसर का असल कारण अब भी पता नहीं चल सका है. हालांकि कुछ स्थितियां (रिस्क फैक्टर) स्पष्ट हैं, जिनमें स्तन कैंसर होने की आशंका रहती है और इन रिस्क फैक्टर वाली महिलाओं को लक्षणों पर लगातार ध्यान देते रहना चाहिए.

क्या हैं ब्रेस्ट कैंसर के रिस्क फैक्टर

पारिवारिक इतिहास : पारिवारिक इतिहास का रिस्क फैक्टर सबसे महत्वपूर्ण है. स्तन कैंसर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है. यदि फस्र्ट डिग्री रिलेटिव यानी सगे रिश्ते में किसी को स्तन कैंसर हो तो ऐसी महिला में स्तन कैंसर होने की आशंका अन्य की तुलना में करीब दोगुनी ज्यादा हो जाती है. दो जीन बीआरसीए1 और बीआरसीए2 इस बीमारी को आगे की पीढ़ी में ले जाते हैं और इनकी जांच से यह पता लगाया जा सकता है कि किसी महिला में पारिवारिक इतिहास के कारण स्तन कैंसर होने का खतरा है नहीं.

परिवार में किसी को किसी अन्य प्रकार का कैंसर होना : स्तन कैंसर ही नहीं, परिवार में किसी को किसी भी अन्य प्रकार का कैंसर हो, तब भी सतर्क रहना चाहिए.

उम्र : 50 साल से ज्यादा की उम्र की महिलाओं में स्तन कैंसर का खतरा ज्यादा रहता है.

समुदाय : कोकेशियान (मूलत: यूरोप के और पश्चिमी एशिया व भारत के कुछ हिस्सों के गोरे लोग) और यहूदी महिलाओं में अफ्रीकी-अमेरिकी महिलाओं की तुलना में स्तन कैंसर की आशंका ज्यादा रहती है.

हार्मोन : स्त्री हार्मोन एस्ट्रोजन का ज्यादा स्राव स्तन कैंसर होने की आशंका बढ़ा देता है. गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करने वाली और मीनोपॉज के बाद हार्मोन रिप्लेसमेंट कराने वाली महिलाओं में स्तन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.

स्त्री जीवन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव जिन महिलाओं में मासिक धर्म से जुड़े विभिन्न पड़ाव में कुछ असामान्य बात रही हो, उन्हें स्तन कैंसर को लेकर सतर्क रहना चाहिए. इनमें कुछ मुख्य पड़ाव हैं, जैसे 12 साल से कम उम्र में मासिक धर्म शुरू होना, 30 साल की उम्र के बाद गर्भ धारण करना, 55 की उम्र के बाद मीनोपॉज होना और मासिक धर्म का चक्र 26 दिन से कम या 29 दिन से ज्यादा का होना.

मोटापा: मोटापा और शराब का सेवन भी महिलाओं में स्तन कैंसर होने का खतरा बढ़ा देता है.

स्तन कैंसर में कितने स्टेज होते हैं

स्टेज 0 से शुरू होकर अलग-अलग स्टेज बीमारी की गंभीरता को दशार्ते हैं.

स्टेज 0 : दूध बनाने वाले टिश्यू या डक्ट में बना कैंसर वहीं तक सीमित हो और शरीर के किसी अन्य हिस्से, यहां तक कि स्तन के बाकी हिस्सों तक भी नहीं पहुंचा हो.

स्टेज 1 टिश्यू का धीरे-धीरे विस्तार होने लगता है और यह आसपास के स्वस्थ टिश्यू को प्रभावित करने लगता है. यह स्तन के फैटी टिश्यू तक फैला हो सकता है और स्तन के कुछ टिश्यू नजदीकी लिंफ नोड में भी पहुंच सकते हैं.

स्टेज 2 इस स्टेज का कैंसर उल्लेखनीय रूप से बढ़ता है या अन्य हिस्सों तक फैलता है. हो सकता है यह बढ़कर अन्य हिस्सों तक फैल चुका हो.

स्टेज 3 कैंसर हड्डियों या अन्य अंगों तक फैल चुका हो सकता है, साथ ही बाहों के नीचे 9 से 10 लिंफ नोड में और कॉलर बोन में इसका छोटा हिस्सा फैल चुका होता है, जो इसके इलाज को मुश्किल बनाता है.

स्टेज 4 कैंसर लिवर, फेफड़ा, हड्डी और यहां तक कि दिमाग में भी फैल चुका होता है.

ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग :

बीमारी को शुरूआती स्तर पर पहचानने के लिए यह सर्वाधिक प्रभावी तरीकों में से है. यह न्यूनतम इलाज के साथ कैंसर को नियंत्रित करने में मदद करता है.

ब्रेस्ट कैंसर सेल्फ एग्जामिन: कैसे स्‍वयं करें अपने स्‍तनों की जांच :

सभी महिलाओं को स्तन की आकृति, आकार, रंग, ऊंचाई और सख्ती में होने वाले बदलाव को सही तरह से समझने की जानकारी होनी चाहिए. किसी भी तरह का स्राव होने, स्तन, आसपास की त्वचा और निप्पल पर धारियां, निशान पड़ने या सूजन जैसी हर स्थिति पर ध्यान दें. खड़े होकर और लेटकर स्तनों का सही से परीक्षण करना चाहिए.

40 की उम्र के बाद ज्यादातर महिलाओं को वार्षिक स्क्रीनिंग मैमोग्राम कराना चाहिए. जिन महिलाओं में कैंसर का कोई पारिवारिक इतिहास हो उन्हें 20 साल की उम्र से ही हर 3 साल में जांच करानी चाहिए और 40 की उम्र के बाद हर साल जांच करानी चाहिए.

हाई रिस्क वाली श्रेणी में आने वाली महिलाओं को थोड़ा कम उम्र से ही हर साल स्क्रीनिंग मैमोग्राम करवाना शुरू कर देना चाहिए.

मैमोग्राम के अलावा अल्ट्रासाउंड भी कराई जा सकती है.

अगर रिस्क ज्यादा हो तो स्तन कैंसर की जांच के लिए स्तन की एमआरआई भी कराई जा सकती है.

स्तन कैंसर से बचाव स्तन कैंसर के कारण और रिस्क फैक्टर के बारे में इतनी जानकारी और जागरूकता के बाद निश्चित तौर पर बहुत से ऐसे रास्ते भी हैं जिनकी मदद से इससे बचना या इस बीमारी को टालना संभव हो सकता है.

- शराब के कम सेवन के साथ व्यायाम और स्वस्थ आहार से निश्चित रूप से कैंसर फैलने की आशंका को कम किया जा सकता है.

- स्तन कैंसर के हाई रिस्क फैक्टर वाली महिलाओं टेमोक्सिफिन का इस्तेमाल किया जाता है.

- मीनोपॉज के बाद ऑस्टियोपोरोसिस के इलाज में प्रयोग होने वाली दवा एविस्टा (रेलोक्सिफिन) का इस्तेमाल भी स्तन कैंसर से बचाव के लिए किया जाता है.

- हाई रिस्क वाली महिलाओं में कैंसर के प्रसार को रोकने के लिए ऑपरेशन के जरिये स्तन हटा दिया जाता है (इसे प्रीवेंटिव मास्टेक्टोमी) कहा जाता है

ब्रेस्ट कैंसर का इलाज :

डॉ. सज्जन राजपुरोहित ने कहा कि जैसा हर कैंसर में होता है, स्तन कैंसर में भी इलाज इसी आधार पर तय होता है कि बीमारी का पता किस स्टेज पर चला है. इलाज में कीमोथेरेपी, रेडिएशन और सर्जरी होती है. जैसा कि शुरू में कहा गया है कि अगर आप हाई रिस्क फैक्टर में हैं, तो लक्षणों की जांच करते रहें. बीमारी का जल्दी पता चलने से सर्वाधिक रिकवरी की उम्मीद रहती है.


आयुर्वेदिक उपचार:-

  1. शीशे के सामने खड़े होकर दोनों बाहें दोनों बगलो की और करके देखें कि स्तन वाले भाग में कुछ असामान्य तो दिखाई नहीं देता।
  2. अगर एक और ऐसा दिखाई दे तो दूसरी और भी देखना चाहिए यह देखना कि जरूरी है कि त्वचा के रंग में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन तो नहीं हो रहा है।
  3. दोनों हाथ ऊपर उठा कर सभी ओर से देखना चाहिए कि स्तनों में किसी प्रकार का परिवर्तन और दूध वाले निप्पल से किसी प्रकार का स्राव तो नहीं हो रहा है।
  4. अगर कुछ भी असामान्य लगे तो कैंसर चिकित्सा वाली औषधियां इस्तेमाल में लाएं।

पेट का कैंसर (colon cancer):-

इस स्थान पर कैंसर होने का विशेष तो मालूम नहीं हो पाया है वैसे यह रोग 40 वर्ष से अधिक आई के लोगों की ओर भोजन में अनियमितता के कारण होने की संभावना रहती है। आंतों के कैंसर के मुख्य लक्षण है कि या तो रोगी को अत्यधिक कब्ज रहने लगती है लगातार दस्त आने लगती है।

पेट कैंसर से जुड़े ऐसे कई लक्षण होते हैं, जो अन्य कई प्रकार की गंभीर बीमारीयों से भी जुड़े होते हैं। इस कारण से पेट के कैंसर को प्रारंभ में ही पहचान पाना कठिन होता है। कई कैंसर ग्रस्त मरीजों का निदान तब तक नहीं हो पाता जब तक कैंसर पूरी तरह से विकसित ना हो गया हो।

कैंसर के प्रारंभिक लक्षणों में निम्नलिखित शामिल होते हैं -

  1. खाना खाते समय एकदम से पेट ज्यादा भरा हुआ महसूस होने लगना।
  2. डिस्फेजिया (Dysphagia; निगलने में कठिनाई)
  3. खाना खाने के बाद पेट का ज्यादा फूला हुआ महसूस होना।
  4. बार बार डकार आना।
  5. सीने में जलन महसूस होना।
  6. खट्टी डकारें या अपच जो ठीक ना हो पा रही हो (indigestion)
  7. पेट दर्द या छाती की हड्डी में दर्द।
  8. पेट में हवा भरना जैसा महसूस होना।
  9. उल्टी आना (उलटी में खून भी आ सकता है)

नीचे पेट के कैंसर के जोखिम को बढ़ाने वाले कुछ ऐसे लक्षणों के बारे में बताया गया है जिन्हें देखकर बिलकुल भी अनदेखा नहीं करना चाहिए बल्कि गंभीरता से लिया जाना चाहिए, और जल्द से जल्द डॉक्टर को बताना चाहिए।

  1. डिस्फेजिया (Dysphagia; निगलने में कठिनाई)
  2. खट्टी डकार और उसके साथ निम्न में से कोई एक (या ज्यादा)
  3. अचानक वजन घटना।
  4. बीमार पड़ना या एनिमिया होना (आमतौर पर मरीज खुद को थका हुआ महसूस करता है या फिर सांस फूलने लगती हैं।)

इंगलैंड के एनएचएस (National Health Service) के मुताबिक जिन 55 साले से ऊपर के लोगों को लगातार अपच की समस्या रहती हो, उनको डॉक्टर को जरूर दिखाना चाहिए।

जिन लोगों को निरंतर अपच की समस्या हो और जीवन में पहले कभी नीचे दी गई समस्याओं में से किसी एक को अनुभव किया हो तो इस स्थिति में भी डॉक्टर को दिखाना बहुत जरूरी हैं -

  1. एक करीबी रिश्तेदार/ व्यक्ति जिसको पेट का कैंसर था या अभी भी है।
  2. बैरेट इसोफेगस (Barret's esophagus)
  3. डिस्प्लेसिया (Dysplasia) - कोशिकाओं का असामान्य रूप से एकत्र होना। मुख्य रूप से ये कैंसर जैसे कोशिकाओं के गठन का संकेत हो सकता है।
  4. गैस्ट्राइटिस (Gastritis) – पेट की परत में सूजन होना।
  5. घातक एनीमिया (Pernicious anemia) – जब पेट खाद्य पदार्थों से पूरी तरह विटामिन बी12 को सोख ना पाए।
  6. पेट में अल्सर (छाले या फोड़े)

जब पेट का कैंसर पूरी तरह से शरीर में विकसित हो जाएगा तब उसके लक्षण और संकेत भी स्पष्ट होने लगेंगे जिनमें से कुछ नीचे बताए गए हैं।

  • पेट के अंदर द्रव का एकत्र होना, जिससे पेट ढेलेदार सा अनुभव होने लगे।
  • एनीमिया
  • काले रंग का मल या मल के साथ खून आना (इसे चिकितैया भाषा में "मेलेना" कहते हैं; Melena)
  • थकावट
  • भूख कम लगना
  • वजन कम होना

पेट के कैंसर के कारण-

पेट का कैंसर क्यों होता है?

4 में से 3 पेट के कैंसर के मामलों में मरीज की जीवनशैली के कारक जुड़े होते हैं। पेट कैंसर होने के कारणों की स्पष्ट जानकारी नहीं है, मगर यहां पर कुछ ऐसे कारक दिए जा रहे हैं जो पेट में कैंसर विकसित होने का खतरा बढ़ा सकते हैं।

  1. हैलिकॉबैक्टर पाइलोरी संक्रमण – 3 में से 1 पेट के कैंसर का मामला हैलिकॉबैक्टर पाइलोरी (H.pylori) के संक्रमण की वजह से होता है। एच पाइलोरी एक बैक्टीरिया होता है जो पेट की अंदरूनी परत के म्यूकस (mucous; एक चिपचिपा पदार्थ) में रहता है। ज्यादातर लोगों में इसके संक्रमण से कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती, मगर कई बार लंबे समय तक संक्रमण रहने से सूजन और पेट में अल्सर (फोड़े या छाले) होने लगते हैं।
  2. सिगरेट पीना – तंबाकू का सेवन पेट कैंसर के विकसित होने के जोखिम को बढ़ा देता है। उदाहरण के तौर पर यहां अनुमान लगाया गया है कि ब्रिटेन में हर 5 पेट कैंसरों में से 1 को धूम्रपान करने की वजह से हुआ है।
  3. एल्कोहॉल – कुछ शोध करने पर पाया गया की एल्कॉहोल के सेवन से भी पेट कैंसर विकसित होने के कारण बनते हैं।
  4. अत्यधिक वजन या मोटापा – कुछ अध्ययनों के मुताबिक पेट का वजन बढ़ना या मोटापे के कारण भी पेट का कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है। हालांकि इस बात की अभी पूरी तरह से पुष्टी नहीं की गई है।
  5. हानिकारक आहार – अधिक भुने हुऐ खाद्य पदार्थ और अधिक नमक वाले खाद्य पदार्थों को हमेशा पेट कैंसर से जोड़ा जाता है। क्योंकि इनके सेवन से पेट कैंसर के विकसित होने का जोखिम बढ़ जाता है। इसके अलावा, जैसे की दुनियाभर में खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए फ्रिज का इस्तेमाल बढ़ गया है, इसके कारण पेट कैंसर विकसित होने के जोखिम भी कम हो गए हैं।

पेट के कैंसर से बचाव-

पेट का कैंसर होने से कैसे रोका जा सकता है?

पेट के कैंसर का कोई स्पष्ट कारण नहीं है, इसलिए इसके विकसित होने से पहले इसकी रोकथाम नहीं की जा सकती है। पर रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ छोटे-छोटे बदलाव लाकर पेट में कैंसर होने के जोखिम को कम किया जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर आप इन्हें इस्तेमाल भी कर सकते हैं:-

  1. व्यायाम – रोजाना व्यायाम करना पेट कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद करता है। हफ्ते के ज्यादातर दिनों में अपनी रोज की शारीरिक गतिविधियों से खुद को फिट रखने की कोशिश करें।
  2. फल और सब्जियों का अधिक सेवन करें – अपने रोजाना के आहार में ज्यादा से ज्यादा फल और सब्जियां शामिल करने की कोशिश करें। अपने आहार के लिए रोज विभिन्न रंगयुक्त फल और सब्जियों का चयन करें।
  3. अपने खाने में अधिक नमकीन और भुने हुए पदार्थों की मात्रा को कम करें – इस तरह के खाद्य पदार्थ की की मात्रा को कम करें और अपने पेट को स्वस्थ बनाएं रखें।
  4. धूम्रपान बंद करें – अगर आप धूम्रपान करतें हैं तो इसे छोड़ दें अगर नहीं करते तो इसे शुरू तो बिल्कुल भी मत करें क्योंकि धूम्रपान अन्य कैंसरों सहित पेट में कैंसर के जोखिम को भी बढ़ाता है। धूम्रपान छोड़ना कठिन हो सकता है इसलिए इसको छोड़ने के लिए डॉक्टर की मदद लें।
  5. एस्पिरिन या अन्य एनएसएआईडी दवा का उपयोग ध्यान से करें – अगर आप ह्दय से जुड़ी समस्याओं के कारण एस्पिरिन लेते हैं या गठिया (arthritis) के रोग के लिए एनएसएआईडी लेते हैं, तो इस बारे में डॉक्टर से बात करें और इस बात की जानकारी रखें कि ये दवाएं आपके पेट को कितना प्रभावित कर सकती हैं।
  6. पेट के कैंसर के जोखिम के बारे अपने डॉक्टर से बात करें – अगर आपको अपने पेट में कैंसर होने का खतरा बढ़ता दिखाई पड़ रहा है, तो इस बारे में डॉक्टर से बात करें। साथ ही आप पेट के कैंसर के संकेत देखने के लिए सामयिक एंडोस्कोपी के लिए भी डॉक्टर के साथ विचार कर सकते हैं।

पेट के कैंसर में परहेज़ -

पेट कैंसर में क्या परहेज करना चाहिए?

कुछ हानिकारक खाद्य पदार्थ जिनका सेवन करने से बचना चाहिए। जिनमें से कुछ नीचे बताए गए हैं:-

  1. तैलीय मीट – पाचन तंत्र (digestive-tract) में कैंसर और पेट के कैंसर के साथ मीट का गहरा रिश्ता माना जाता है। ऐसी स्थिति में कई डॉक्टर तैलीय मीट के सेवन को कम करने की सलाह देते हैं और यहां तक कि कई डॉक्टर तो अब इसे पूरी तरह से छोड़ने की सलाह देने लगे हैं।
  2. नमक युक्त भोजन – शरीर को अपनी सामान्य प्रक्रिया के लिए एक सिमित और कम मात्रा में ही नमक की जरूरत पड़ती है पर कुछ लोग जरूरत से ज्यादा नमक युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करने लगे हैं। नमक की ज्यादा मात्रा वाले खाद्य पदार्थों को पेट कैंसर से जोड़ा जाता है। आलू के चिप्स, और डिब्बाबंद नमकीन पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में ना करें, खाने के दौरान नमकदानी प्रयोग करने से भी बचें।
  3. हैलिकोबैक्टर पाइलोरी – पेट कैंसर से बचने के लिए सिर्फ खाद्य पदार्थों में ही परहेज नहीं करना है। इसके अलावा हैलिकोबेक्टर पाइलोरी के संक्रमण होने से भी खुद को बचाना है। ये सामान्य बैक्टिरिया होते हैं जो पेट में अल्सर (छाले या फोड़े) कर देते हैं जिससे पेट कैंसर होने का खतरा बढ़ा जाता है।

पेट के कैंसर में क्या खाना चाहिए?

पेट का कैंसर हो तो क्या खाएं?

पेट के कैंसर के इलाज के लिए आहार को एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। पोषण के लिए सही मात्रा में कैलोरी, विटामिन, प्रोटीन, और मिनरल्स लेने की जरूरत पड़ती है। जो शरीर में ताकत को बनाए रखता है और रोग ठीक करने में मदद करता है।

  1. अधिक प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ – प्रोटीन के लिए अधिक मात्रा में दूध पीना, अंडे और पनीर खाएं।
  2. उच्च फाइबर खाद्य पदार्थ, मगर कम मात्रा में – साबुत अनाज का चयन करते समय, साबुत गेंहू से बनी ब्रैड, साबुत अनाज का पास्ता और साबुत चावल चयन करें। इन खाद्य पदार्थों में उच्च मात्रा में फाइबर होता है। लेकिन इन्हे कम मात्रा में खाना चाहिए क्योंकि इनको खाने के बाद आप असहज महसूस कर सकते हैं। सेम की फलियां, मसूर की दाल, पत्तेदार सब्जियां और गोभी आदि पर भी ये बात लागू होती है।
  3. बिना नमक का आहार – पेट के कैंसर के मरीजों को अक्सर मतली महसूस होती है। बिना नमक का खाना खाने से इससे राहत मिल सकती है।
  4. साफ तरल पदार्थ – तरल पदार्थ जैसे सेब का जूस, शोरबा (सूप), चाय आदि को धीरे-धीरे पीना लाभदायक हो सकता है।

आयुर्वेदिक उपचार:-

  1. अगर कैंसर बहुत अधिक फैल गया हो तो या मलाशय का भाग भी इससे प्रभावित हूं तो सेल चिकित्सा द्वारा इस भाग को बाहर निकाल दिया जाता है।
  2. प्रारंभ में ही कैंसर का उपचार करने से पहले रोगी को एक-दो दिन उपवास कराएं उपवास के दिनों में रोगी को अंगूर का सेवन करना चाहिए।
  3. पेट के रोगों में छाछ अमृत के समान काम करती है कैंसर के रोगी को पेट साफ कराने के लिए भोजन करने के बाद एक-दो दिन अंगूर देखकर फिर उसे छाछ का सेवन कराएं कुछ दिनों अन्य कोई भी चीज खाने को ना दी जाए।
  4. कैंसर के रोगी को अंगूर का रस देने पर कभी-कभी पेट में दर्द या मलद्वार में जलन होती है लेकिन या कोई चिंता की बात नहीं है।
  5. गाजर का रस पीने से भी पेट के कैंसर में रोगी को काफी लाभ होता है।
  6. फूल गोभी का रस भी आंतों के कैंसर में लाभ पहुंचाता है नित्य प्रातः काल भूखे पेट फूल गोभी का आधा अथवा पौन कप रस  पीने  से लाभ होता है।
  1. लहसुन का प्रतिदिन प्रयोग करने से व्यक्ति पेट के कैंसर से बचा जा सकता है।
  2. लहसुन की कुछ मात्रा प्रतिदिन रगड़ कर और पानी में घोलकर कुछ सप्ताह पीने से पेट का कैंसर ठीक हो जाता है।

अंडकोष का कैंसर (testicular cancer):-

अंडकोष के कैंसर का अभी तक ठीक से पता नहीं चल पाया है यह अधिकतर युवा या अधिक आयु के पुरुषों को होता है इस रूप में सबसे पहले अंडकोष में पीड़ा नहीं सूजन आ जाती है।

आयुर्वेदिक उपचार :-

  1. इस रोग में होने पर कई प्रकार के परीक्षण करने पड़ते हैं। कैंसर सामक औषधियों के सेवन के साथ-साथ सर चिकित्सा की आवश्यकता पड़ती है।
  2. रूप कब पता अगर आरंभ में ही लग जाए तो उपचार सफलतापूर्वक हो जाता है पुरुषों को चाहिए कि नियमित रूप से अपने अंडकोष को जांचते रहे।
  3. किसी भी तरह की आज सामान्यता दिखाई देते ही तुरंत परीक्षण करवाना चाहिए कैंसर प्रमाणिक हो जाए तो कैंसर की औषधियां लेनी चाहिए।

गले का कैंसर (throat cancer):-

इसके निश्चित कारण का तो पता नहीं चल पाया लेकिन ऐसा विश्वास किया जाता है कि अत्यधिक धूम्रपान करने वाले लोगों को अक्सर गले का कैंसर हो जाता है। गले में दर्द और निरंतर बेचैनी रहती है भूख भी कम हो जाती है सॉरी यंत्र में होने वाले कैंसर से व्यक्ति को बोलने में खराश अनुभव होती है।

आयुर्वेदिक उपचार:-

  • सभी प्रकार के कैंसर रोगों के उपचार में तभी सफलता मिल सकती है जब उसे आराम में पहचान लिया जाए। स्वर यंत्र में होने वाले कैंसर में लेजर चिकित्सा अथवा कीमोथेरेपी से उपचार हो सकता है।
  • यदि फोड़ा बढ़ गया हो तो इस सारे अथवा कुछ भाग को निकालना पड़ सकता है।
  • गले में कैंसर वाले लोगों को हराया ऐसे तरल पदार्थ का सेवन करना चाहिए जिनसे किसी प्रकार की जलन हो प्रारंभिक अवस्था है तो कैंसर की औषधियां लेनी चाहिए।

निष्कर्ष (conclusion):-

कैंसर दुनिया के सामने सबसे गंभीर स्वास्थ्य खतरों में से एक है। यह दूसरी सबसे बड़ी जानलेवा बीमारी है, जिसमें हृदय रोग पहले नंबर पर है। कैंसर तब विकसित होता है जब कोशिकाएं उत्परिवर्तन से गुजरती हैं और शरीर के भीतर गुणा करना शुरू कर देती हैं। ये असामान्य कोशिकाएं ट्यूमर में विकसित हो सकती हैं, जो सौम्य या घातक हो सकती हैं।

कैंसर कई प्रकार के होते हैं, हर साल नए म्यूटेशन की खोज की जाती है। ये कैंसर के प्रकार किसी भी आयु वर्ग को प्रभावित कर सकते हैं, और यह पुरुषों और महिलाओं दोनों में आम है। कैंसर के विकास का सटीक कारण अभी भी अज्ञात है, और कई कारक जैसे उम्र, आनुवंशिकी, जीवन शैली, रसायनों या विकिरण के संपर्क में, वायरल बीमारियां आदि। इन किलर कैंसर के लक्षणों और लक्षणों के बारे में जानकर आप शुरुआती दौर में ही इस बीमारी को पहचानने में ज्यादा सतर्क रहेंगे।

फेफड़ों के कैंसर को सबसे घातक कैंसर माना जाता है। हर साल स्तन, कोलोरेक्टल और प्रोस्टेट कैंसर से संयुक्त रूप से अधिक लोगों की मृत्यु फेफड़ों के कैंसर से होती है। 13 में से 1 पुरुष और 16 में से 1 महिला का इलाज उनके जीवन में कभी न कभी फेफड़ों के कैंसर के लिए किया जाता है। दुर्भाग्य से, फेफड़ों के कैंसर के सभी रोगियों में से दो-तिहाई से अधिक का निदान देर से चरण में किया जाता है जब शरीर में एक से अधिक साइट पर ट्यूमर मौजूद होते हैं।

हाल की प्रगति के बावजूद, अन्य आम कैंसर की तुलना में फेफड़ों के कैंसर के लिए पांच साल की जीवित रहने की दर अभी भी खराब है। फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित आधे से अधिक लोग निदान होने के एक वर्ष के भीतर यदि उचित उपचार न किया जाए तो मर जाते हैं, इसलिए, फेफड़ों के कैंसर को सबसे घातक कैंसर माना जाता है।

धूम्रपान और तंबाकू उत्पादों का उपयोग इसके प्रमुख कारण हैं, और यह एक स्टडी के अनुसार 55 से 65 वर्ष की आयु के बीच सबसे अधिक बार होता है। दो प्रमुख प्रकार हैं: नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर, जो सबसे आम है, और स्मॉल सेल लंग कैंसर, जो अधिक तेज़ी से फैलता है।

श्वसन तंत्र से संबंधित दो सबसे आम कैंसर फेफड़े और ब्रोन्कियल कैंसर हैं। वे बाजार में बेचे जाने वाले विभिन्न तंबाकू उत्पादों के कारण होते हैं फेफड़े के कैंसर में सांस लेने में कठिनाई, पुरानी खांसी, थूक में खून, घबराहट, सीने में दर्द और थकान की विशेषता होती है। इसका निदान छाती रेडियोग्राफी, सीटी स्कैन और बायोप्सी द्वारा किया जा सकता है।

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