google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical home made ramdeies: सेहत के लिए रामबाण हैं दादी मां के ये घरेलू नुस्खे, नहीं होंगे Side Effects to

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home made ramdeies: सेहत के लिए रामबाण हैं दादी मां के ये घरेलू नुस्खे, नहीं होंगे Side Effects to

home made ramdeies: सेहत के लिए रामबाण हैं दादी मां के ये घरेलू नुस्खे, नहीं होंगे Side Effects

1= वज़न घटाना में सहायक:अनार

  1. पाचन शक्ति सुधारता: पुदीना
  2. वायु विकार कृमि रोग में :अजवाइन
  3. फोड़े फुंसी रोगों में कारगर :तुलसी
  4. बच्चों की खांसी और शारीरिक कमजोरी में हितकारी :शहद
  5. थकान मिटाने नींद लाने में उपयोगी: मूली
  6. स्किन टाइट और झुर्रियां मिटाने में सहायक :खीरा
  7. सूजन, जोड़ों, हड्डियों के दर्द ,में लाभदायक :अदरक
  8. फ्रेश व एनर्जीटिक करता: नींबू
  9. गठिया, जिगर को राहत देता: अंगूर
  10. शरीर की बदबू से निजात दिलाता: प्याज
  11. रक्तशोधक :करेला
  12. स्फूर्ति दायक और शक्तिवर्धक :आंवला
  13. श्वास और दमारोग का नाशक :पीपल
  14. मस्तिष्क गुर्दे में हितकारी: गन्ना
  15. लु और मूत्र रोग में रक्षक :धनिया
  16. रक्तशोधक त्वचा विकार में हितकारी: नीम
  17. पित्त कफ नाशक : लौंग
  18. आंखों की रोशनी के लिए गुणकारी :सौंफ
  19. मिर्गी मुर्छा की बेजोड़ औषधि :राई
  20. वात पित्त कफ नाशक: हल्दी
  21. शूल नासक व आंतों के रोग में उपयोगी :बेल
  22. बंद गला खोलने सुरीला आवाज देने वाला :काली मिर्च
  23. तनाव से मुक्ति देता: तिल
  24. स्फीतिक्रीमी और कुष्ठ रोग नाशक :वायविंडिंग
  25. अम्ल पित्त और आमाशयिक व्रण में उपयोगी :सतावर
  26. वातगुल्म, जलोधर में लाभकारी :सनाय
  27. अपस्मार तथा उन्माद में उपयोगी: सरसों
  28. बच्चों के अधिकार और प्रवाहिका का नाशक: सूर्यमुखी
  29. गर्भवती महिला के रोगों का नाशक: सिंघाड़ा
  30. हृदय और मस्तिष्क का बलवर्धक: सेब
  31. हिचकी नियंत्रक :हरण
  32. जीर्ण ज्वर में लाभकारी :हरसिंगार

  1. वज़न घटाना में सहायक:अनार:-

शरीर को फिट और स्वस्थ रखने में वैसे तो लगभग सभी फलों के रस लाभकारी है लेकिन अनार का रस खासतौर पर वजन घटाने में मदद करता है। अनार को आपको अपने आहार योजना में शामिल करना चाहिए अनार खाने से पेट के आसपास की चर्बी कम हो जाती है। अनार के जूस के बहुत सारे लाभ अनार में मुख्य रूप से विटामिन ए ,सी, ई ,फोलिक एसिड, और एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं।

आइए जाने अनार के स्वास्थ्यवर्धक अन्य लाभों के बारे में:-

  • प्रतिदिन अनार के जूस से शरीर में रक्त का संचालन अच्छी तरह से होता है।
  • अनार खाने से ब्रेस्ट कैंसर और फेफड़ों के कैंसर की संभावना कम रहती है।
  • अनार के सेवन से हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को भी कम किया जा सकता है।
  • अनार रक्त में आयरन की कमी को दूर करता है एनीमिया जैसी बीमारियों से छुटकारा दिलाता है।
  • अनार के सेवन से त्वचा में निखार आता इसलिए स्वस्थ त्वचा के लिए भी आप अनार के जूस का सेवन कर सकते हैं।
  •  अनार खाने से दांतों संबंधित समस्याओं से निजात पाया जा सकता है।
  • वह गर्भवती महिलाएं जो अनार के जूस का सेवन करती है उनका बच्चा हेल्दी और स्वस्थ होता है।
  • अनार से अधिक उम्र के लोगों को होने वाली एलजाइमर मा नामक बीमारी से छुटकारा मिलता है।
  • इस तरह से अनार खाने या अनार का रस पीने से निकला वह लंबी उम्र और अधिक ऊर्जावान बने रहने के लिए नियमित रूप से अनार के जूस का सेवन करना चाहिए।

  1. 2 पाचन शक्ति सुधारता: पुदीना:-

पुदीने में कई औषधीय गुण होते हैं। अंग्रेजी में मिनट के नाम से जाने वाला पुदीना एक अच्छा माउथ फ्रेशनर भी है। तू दिल्ली के कुछ ऐसे ही लाजवाब गुरु के बारे में हम चर्चा करेंगे आइए जानते हैं:-

  • पुदीना हाशमी के लिए भी अच्छा है इसके सेवन से पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है। पुदीना की चटनी बहुत स्वादिष्ट होती है। पुदीना शानदार एंटीबायोटिक कितना काम करता है।
  • मुंह में बदबू आने पर पुदीने का सेवन करना चाहिए पुदीने के रस को पानी में मिलाकर कुल्ला करने से मुंह की बदबू दूर हो जाती है। इससे मुंह में ठंडक का भी एहसास होता है।
  • पुदीना का रस किसी घाव पर लगाने से जख्म जल्दी भर जाते हैं यदि किसी गांव से बदबू आ रही है तो उसके पत्तों का लेप लगाने से बदबू आना बंद हो जाता है।
  • पुदीना कई प्रकार के चर्म रोगों को समाप्त करता है चर्म रोग होने पर पुदीने के पत्तों का लेप लगाने से आराम मिलता है।
  • गर्मी में लू लगने के बाद पुदीने का सेवन करना चाहिए लू लगने पर रोगी को पुदीने का रस और प्याज का रस देने से फायदा होता है।
  • हैजा होने पर पुदीना बहुत फायदा करता है हैजा होने पर पुदीना प्याज का रस नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।
  • उल्टी होने पर आधा कब पुदीना का रस हर 2 घंटे पर रोगी को पिलाएं इससे उल्टी आना बंद हो जाता है।
  • अजीर्ण होने पर पुदीने का रस पानी में मिलाकर पीने से फायदा होता है।
  • पीठ दर्द होने पर पुदीने को जीरा हींग काली मिर्च में नमक मिलाकर पीने से पेट का दर्द समाप्त हो जाता है।
  • महिला को प्रसव के समय पुदीने का रस पीना चाहिए इससे आसानी से प्रसन्न हो जाता है।
  • बुखार होने पर पुदीना पीना चाहिए से बुखार में फायदा होता है बुखार में पुदीने का पानी में उबालकर थोड़ी चीनी मिलाकर उसे गर्म गर्म चाय की तरह पीना चाहिए।
  • हिचकी आने पर पुदीना का प्रयोग करना चाहिए इससे हिचकी आना बंद हो जाता है।

  1. 3 वायु विकार कृमि रोग में :अजवाइन:-

अजवाइन रूचिकारक एवं पाचक होता है। पेट संबंधी अनेक रोगों को दूर करने में सहायक होता है जैसे वायु विकार ,कृमि ,अपच ,कब्ज आदि। अजवाइन में स्वास्थ्य सौंदर्य सुगंध तथा ऊर्जा प्रदान करने वाले तत्व होते हैं। यह बहुत ही उपयोगी होता है।

  • बरसात के मौसम में पाचन क्रिया के सिथिल पड़ने पर अजवाइन का सेवन काफी लाभदायक होता है इससे अपच को दूर किया जा सकता है।
  • अजवाइन मोटापे को कम करने में मदद करती है कि रात में एक चम्मच अजवाइन एक गिलास पानी में भिगोए सुबह छानकर उस पानी में शहद डालकर पीने से लाभ होता है।
  • मसूड़ों में सूजन होने पर अजवाइन के तेल की कुछ बूंदे पानी में मिलाकर कुल्ला करने से सूजन समाप्त हो जाती है।
  • अजवाइन काला नमक सूट तीनों को पीसकर चूर्ण बना ले भोजन के बाद फाकने पर अजीर्ण अशुद्ध वायु का वरना वह ऊपर वरना बंद हो जाता है।
  • सर्दी गर्मी के प्रभाव के कारण गला बैठ जाता है बेर के पत्तों और अजवाइन को पानी में उबालकर छानकर उस पानी से गरारा करने पर लाभ होता है।
  • आधे सिर के दर्द होने पर एक चम्मच अजवाइन आधा लीटर पानी में डालकर उबालें पानी को छानकर रखें एवं दिन में दो बार थोड़ा-थोड़ा लेते रहने से काफी लाभ होता है।
  • सरसों के तेल में अजवाइन डालकर अच्छी तरह गर्म करें इससे जोड़ों की मालिश करने पर जोड़ों के दर्द में आराम होता है।
  • खीरे के रस में अजवाइन पीसकर चेहरे की झाइयों पर लगाने से लाभ होता है।
  • चोट लगने पर नीलेश लाल दाग पड़ने पर अजवाइन मेहंदी को पुटिल्स चोट पर बनने पर दर्द व सूजन कम होती है।
  • मुख से दुर्गंध आने पर अजवायन को पानी उबालकर  रख लें इस पानी से दिन में तीन बार कुल्ला करें दो-तीन दिन बाद दुर्गंध आना बंद हो जाएगा।

4.फोड़े फुंसी के लिए कारगर: तुलसी:-

तुलसी का प्रयोग मनुष्य काफी समय पहले से भारत में धार्मिक अनुष्ठानों सुधीर एवं सौंदर्य प्रसाधनों के लिए करता है। तुलसी के बहुत से औषधि गुण हैं आप घर में ही तुलसी का प्रयोग बहुत सी बीमारियों को ठीक करने के लिए कर सकते हैं तुलसी के बहुत सारे औषधि गुण हैं आइए उन गुणो के बारे में जानते हैं:-
  • यदि आपके शरीर के किसी हिस्से में फोंडे हो गया हो तो सूखी तुलसी के पत्तों का बारीक चूर्ण बना ले इसको फोड़े वाले हिस्से पर पाउडर की तरह छिड़कने पर फोंडे ठीक हो जाते हैं।
  • तुलसी के पत्तों का रस आंखों में डालने से लाभ मिलता है इसलिए आंखों की बहुत सी दवाइयों में तुलसी के पत्तों का रस मिलाया जाता है।
  • तेरी नाक के भीतर फुंसी हो जाए तो तुलसी के पत्तों को बारीक पीसकर सुंघने से लाभ मिलेगा।
  • तुलसी के पत्तों और कालीमिर्च को पीसकर और मिलाकर चूर्ण बना लें इस चूर्ण को दांतों के नीचे रखने से दांत का दर्द दूर हो जाता है।
  • जिन लोगों को स्वास्थ्य संबंधित बीमारी होती है उन्हें तुलसी के पत्ते के साथ चुटकी भर नमक मुंह में रखकर सूचना चाहिए। इससे श्वास रोगियों को लाभ मिलता है।
  • बालों का टूटना या फिर बालों का कम उम्र में ही सफेद हो जाना इस तरह की परेशानी में तुलसी काफी लाभ पहुंचाती है। तुलसी के पत्तों और आंवले को बारीक पीस लें इससे तेल में मिला लें अब इसे बालों पर मैंने इसे बालों पर मलने से बालों का गिरना या बालों का असमय सफेद हो जाना जाता है यह पेस्ट डेढ़ महीने तक हर हफ्ते में तीन बार बालों पर भले।
  • तुलसी के पत्तों का लेप बनाकर चेहरे पर लगाने से चेहरे पर निखार आता है।
  • तुलसी के पत्तों का लेप सिर पर लगाने से सिर दर्द में मिलता है।

5. बच्चों की खांसी और सारीरिक कमजोरी में हितकारी :शहद:-

आदिकाल से हम देखते और सुनते आए हैं कि घरेलू नुस्खे और आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां बारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक होती है। कोई बार ऐसा होता है कि हमें औषधियों के विषय में पता ही नहीं होता।खांसी से जल्दी राहत के घरेलू नुस्खे, जो रामबाण औषधि है

6. थकान मिटाने, नींद लाने में उपयोगी: मूली:-मूली का सेवन करने से व्यक्ति की  थकान मिटती है और अच्छी नींद आती है।

  • मुलियाबारी दांतों को मजबूत करती है तो हड्डियों को शक्ति प्रदान करती है गोली खाने से पेट के कीड़े नष्ट होते हैं तथा पेट के घाव ठीक होते हैं।
  • मूली के पत्तों से भी अधिक पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं सामान्य लोग मोटी मूली पसंद करते हैं। कल उसका अधिक स्वादिष्ट होना है मगर स्वास्थ्य तथा उपचार की दृष्टि से पतली और चरपरी भूली ही उपयोगी है। ऐसी बोली त्रिदोष नाशक होती है।
  • अफारे में मूली के पत्तों का रस विशेष रूप से उपयोगी होता है।
  • मूली सौंदर्य वर्धक विजय इसके प्रतिदिन सेवन से रंग निखरता है खुश्की दूर होती है ,रक्त शुद्ध होता है और चेहरे की झाइयां , और कील मुंहासे, साफ हो जाते हैं। सर्दी जुकाम तथा कफ खांसी में मूली के बीज का चूर्ण विशेष लाभदायक होता है। मूली के रस में तिल्ली का तेल मिलाकर और उसे हल्का गर्म करके कान में डालने से कर्णनाद,कान का दर्द ,तथा कान की खुश्की दूर होती है। मूली के पत्ते चबाने से हिचकी बंद हो जाती है।
  • मूली के पत्ते के 4 तोला रस में 3 माषा, अजमोद अर्जुन और चार रत्ती जोखार मिलाकर 1 सप्ताह तक दिन में दो बार नियमित लेने से गुर्दे की पथरी भी गल जाती है। एक कप मूली के रस में एक चम्मच अदरक का और एक चम्मच नींबू का रस नियमित सेवन करने से भूख बढ़ती रतन पेट संबंधी सभी रोग नष्ट हो जाता है।
  • होली के रस समान मात्रा में अनार का रस मिलाकर पीने से रक्त में हीमोग्लोबिन होता है और रक्ताल्पता का रोग दूर हो जाता है। सुखी मूली का काढ़ा बनाकर उसमें जीरा और नमक डालकर पीने से खांसी और दमा में राहत मिलती है।

7. स्किन टाइट और झुर्रियां मिटाने में सहायक: खीरा:-

  • हीरे में मौजूद फाइटोकेमिकल्स हमारी स्किन को टाइट करते हैं और झुर्रियों को बाय-बाय करने में मदद करते। शेविंग करने के पहले या बाद में अपनी प्रॉब्लम एरिया पर एस्से खीरे के कुछ टुकड़े मलने से वजन तेजी से घटता है
  • इसमें मौजूद विटामिन बी और कार्बोहाइड्रेट से आपको तुरंत एनर्जी तो मिलेगी आपको घंटों फ्रेश ही महसूस होगा।
  • खीरा गुणो की खान है। हीरा न केवल भूख मिटाने बल्कि पोषण व इंस्टेंट एनर्जी देने, फैट कम करने सिर दर्द भगाने और मुंह की दुर्गंध दूर करने में काम आता है। यह डायबिटीज किडनी लीवर और मूत्राशय संबंधी बीमारियों में लाभदायक होता है।
  • अगर एक पूरा खीरा काट कर गर्म पानी में डालने तो इसमें निकलने वाले केमिकल और न्यू ट्रेंस से ऐसी रिलैक्स अरोमा निकलती है जो भाग के रूप में अपने करीब रखने से आपका सारा तनाव दूर कर देगी।

8. सूजन, जोड़ो ,हड्डियों के दर्द ,में लाभदायक: अदरक:-

  • अदरक जोड़ो हड्डियों के रोगों के कारण सूजन दर्द हाथ पैर चलाने में कठिनाई पेट के कीड़े और खांसी आदि समस्या में अदरक सेवन करने से आराम मिलता है।
  • 1 ग्राम अदरक सेवन करने से यात्रा के दौरान संवेदनशील व्यक्तियों में होने वाली मितली और उल्टी से आराम मिलता है। इसी प्रकार ढाई सौ ग्राम सोंठ हुए 4 बार सेवन से महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान होने वाली मितली व उल्टी से आराम मिलता है और इसके सेवन से कोई दुष्प्रभाव भी नहीं होता है।
  • अदरक के सेवन से अपच गैस दूर करने पर दर्द सूजन दूर करने, पेट में कीड़े ,पेशाब की मात्रा बढ़ाने, हाजमा ठीक करने ,तथा खांसी आदि के लिए व्यापक रूप से किया जाता है।
  • 0.5 से 1 ग्राम अदरक प्रतिदिन 3 माह तक सेवन करने से ओस्टियोआर्थराइटिस ,रूमेटाइड ,अर्थराइटिस तथा मांस पेशियों के दर्द के मरीजों को आराम मिलता है ।
  • अदरक एक शक्तिशाली जीवाणु नाशक भी है। अदरक बड़ी आंत में पाए जाने वाले बैक्टीरिया का बढ़ना रोक देता है जिसके कारण गैस से राहत मिलती है। इसमें विद्वान गुड़ के कारण कैंसर से भी बचा जा सकता है। इसमें एंटी ऑक्सीजन गुण भी होते हैं इसके सेवन से कैंसर बचाव में सहायक एंजाइम सक्रिय हो जाते हैं।
  • सर्दी और पेट की बीमारियों को दूर करने में अदरक का उपयोग में अदरक का रोजाना उपयोग बयान से होने वाली मांस पेशियों के दर्द में भी कम करता है।

9.फ्रेश एनर्जीटिक करता है: नींबू:-

  • नींबू के खुशबू से आप अलवर में प्रेशर एनर्जी टिक हो जाते हैं और यह आपकी कॉन्फिडेंस को भी बढ़ाता है। यही नहीं नींबू में बनाया गया तेल कंसंट्रेशन बनाने में बहुत कारगर है।
  • सुबह खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी में एक नींबू का रस और एक चम्मच शहद मिलाकर पिए। भोजन के आधा घंटा बाद एक कप गर्म पानी घुट घुट कर दिए पेट साफ होता है।
  • नींबू विटामिन सी का अच्छा सोच है रोजाना सुबह गर्म पानी के साथ नींबू का रस पीने से डाइजेस्टिव सिस्टम ठीक बना रहता है यह यूनिटी सिस्टम को भी ठीक बनाए रखता है। साथी इसके इस्तेमाल से किसी भी तरह के इंफेक्शन के चांश भी बहुत कम हो जाते हैं। इसमें एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल प्रॉपर्टीज होती है जिससे आप लू और कल्ड वगैरह से बचे रह सकते हैं। ब्लड को बेवफाई करने के साथ ही बाडी के टॉक्सिन को भी बाहर कर देता है।

10.गठिया जिगर को राहत देता :अंगूर:-

  • अंगूर गठिया और जिगर के रूप में फायदेमंद है। दूध के साथ इसका संयोग अधिक गुणकारी होता है।
  • ताजी उत्तम पके हुए कालिया हरे रंग की अंगूर को गर्म पानी में धोकर कर एक से रस निकालें। 2 किलो चीनी को 1:30 शेर पानी में पकाएं। उबाल आने पर अंगूर का रस उसमें मिला दे। एक तार की चाशनी आने पर बोतलों में भरकर रखें। यह शरबत स्वर् भंग खासी टीवी रोग और रक्त विकार के रोगों में भी लाभप्रद है। वैसे यह शरबत हर आदमी को निरोग रखने में सहायक है। मुझे दूध बढ़ाने वाला है जिन माताओं के स्तनों में दूध कम आता है उन्हें अंगूर का सेवन करना चाहिए काले अंगूर विशेष गुणकारी है।
  • धतूरा खा लिया हो तो उसे अंगूर का सिरका दूध में मिलाकर पिलाने से काफी लाभ मिलता है। अंगूर टाइफाइड बुखार मानसिक परेशानी पाचन की गड़बड़ी आदि भी काफी लाभकारी है। अंगूर शरीर में मौजूद विषैले तत्वों को आसानी से बाहर से बाहर निकाल देता है। यह एक अच्छा रक्तशोधक व रक्त विकारों को दूर करने वाला है।

11. पसीने की बदबू से निजात दिलाता: प्याज:-

  • अधिक पसीना आता हो तो कच्चा प्याज खाए पसीना आना कम और वदबू खत्म हो जाती है।
  • प्याज अजीर्ण और पतले दस्त में लाभकारी है। यह जीवाणु रोधी तनाव रोधी व दर्द निवारक मधुमेह नियंत्रण प्रदाह निवारक पथरी हटाने वाला और गठियारोधी भी है।
  • मच्छर भगाने के लिए बिस्तर पर प्याज का रस छिड़क दें तुरंत मच्छर भाग जाएंगे। गठिया रोग में प्याज के रस में जरा सा राई का तेल मिलाकर मालिश करें गठिया रोग में लाभ होगा।

12.रक्तशोधक : करेला:-

  • करेले में रक्त शोधक गुण पाए जाते हैं इसका प्रयोग करने से फोड़े फुंसी एवं चर्म रोग नहीं होते। करेले के बीज में भी दहशत तेल पाया जाता है जिसके कारण करेले की सब्जी खाने से कब्ज नहीं होता है। अगर जोड़ों के दर्द में करेले की सब्जी का सेवन व जोड़ों पर करेले के पत्तों का रस लगाने से आराम मिलता है।
  • सांस संबंधी समस्याएं हो तो ताजा करेली से अस्थमा सर्दी और खांसी जैसी सांस संबंधी समस्याओं से छुटकारा मिलता है।
  • करेला मधुमेह में रामबाण है औषधि का कार्य करता है, हरिया में सुखाए हुए करेले का एक चम्मच पाउडर प्रतिदिन सेवन करने से डायबिटीज में चमत्कारिक लाभ मिलता है। करेला पैंक्रियास को उत्तेजित कर इंसुलिन किस स्रावण को रोकता है।

13: स्फूर्ति दायक और शक्तिवर्धक: आंवला:-

ओन्ली में अनेक रुप दूर करने के गुण व शक्ति होती है आंवला युवकों को भी स्थिति बन बनाई है 1 शक्ति प्रदान करता है तथा बच्चों को  युवा जैसी शक्ति देता है; बशर्ते आंवला किसी न किसी रूप में रूप में रोज  सेवन करें। आंवला के बारे में अधिक जानकारी के लिए हमारी पोस्ट को विजिट करें लिंक यहां ✓सर्दियों में आंवले का इस तरह करें सेवन, बीमारियों से रखेगा दूर क्योंकि अमृत फल हैं आंवला

14. श्वांस और दमारोग का नाशक: पीपल:-

पीपल का पेड़ सबसे गुणकारी माना जाना जाता है ऑक्सीजन के लिए यह हर जगह पाया जाता है। पीपल ही एक ऐसा वृक्ष है जो 24 घंटे ऑक्सीजन देता है इसके औषधी गुणो को बहुत कम लोग जानते हैं:-
  • पीपल की अंतर्छाल निकाल कर सुखा लें और कूट पीसकर खूब महीन चूर्ण कर लें यह चूर्ण स्वास्थ दमा रोगी को देने से स्वास में दमा रोग में आराम मिलता है। पूर्णिमा की रात को खीर बनाकर उसमें यह छोड़कर बुरा कर खीर को चार-पांच घंटे चंद्रमा की किरणों में रख दें इससे खीर में ऐसे औषधीय तत्व जाते हैं कि श्वास में दमा रोगी को बहुत आराम मिलता है। इसके सेवन का समय पूर्णिमा की रात को माना जाता है।
  • मसूड़ों की सूजन दूर करने के लिए इसकी छाल में काढ़े से कुल्ला करें।
  • इसकी छाल का रस पिया दूध लगाने से पैरों की बिवाई ठीक हो जाती है।
  • पीपल की छाल को जलाकर राख कर ले इसे एक कप पानी में घोलकर रख दे। जब रात नीचे बैठ जाए तब पानी निथार कर पिलाने से हिचकी आना बंद हो जाती है।
  • इसके पत्तों को जलाकर राख कर ले यह राघव पर बुरा अपने से घाव ठीक हो जाते हैं।

15. मस्तिष्क, गुर्दे रोगो में हितकारी :गन्ना:-

  • आयरन व कार्बोहाइड्रेट की प्रचुर मात्रा होने के कारण गन्ने का रस तुरंत शक्ति व स्फूर्ति प्रदान करता है। इसमें ढेर सारे खनिज तत्व ऑर्गेनिक एसिड होने के कारण इसका औषधीय महत्व भी है। गन्ने का रस मस्तिष्क गुरुदेव आंखों के लिए विशेष लाभदायक है। गन्ने का रस हमेशा ताजा व छना हुआ ही पीना चाहिए।
  • बुखार होने पर इसका सेवन करने से बुखार जल्दी उतर जाता है बुखार के कारण आई मस्तिष्क की कमजोरी दूर होती है।
  • एसिडिटी के कारण होने वाली जलन में भी गन्ने का रस लाभदायक होता है।
  • गन्ने के रस का सेवन यदि नींबू के साथ किया जाए तो पीलिया जल्दी ठीक हो जाता है। को पीलिया के कारण है कमजोरी से बचाता है।

16.लू और मूत्र रोग से रक्षक : धनिया:-

  • Garmi mein bahar jaane se lu lag jaane per pareshani Ho jaati hai to dhaniya piskar ras nikal kar ise Pani mein gholkar mithaas ke liye chini dalkar Pi le lu ka asar jata rahega.
  • एक छोटा चम्मच धनिया ले इसे एक कब बकरी के दूध में मिलाएं एक चम्मच मिश्री भी इसको पीने से पेशाब की जलन खत्म हो जाती है।
  • यदि मासिक धर्म में अधिक रक्त गिरने लगे तो धनिया पिए देसी खांड ले ली भी इन बराबर मिलाकर खाएं आराम मिलेगा।
  • भोजन से अरुचि है तो एक गिलास पानी में दो चम्मच धनिया मिलाकर उबाल कर छान लें और तीन भागकर दिन में तीन बार पी ले।
  • खाना खाने का मन नहीं करता भरपेट नहीं खा सकते पता भी नहीं तो धनिया छोटी इलायची काली मिर्च तीनों एक जैसी मात्रा में लें इन्हें पीसकर छानकर शीशी में रख लें। चौथाई चम्मच की कथा आधा चम्मच चीनी में आधा चम्मच इस चूर्ण को डालकर खाएं चंद दिनों में भोजन से अरुचि खत्म हो जाएगी।
  • खांसी हो दमा हो सांस फूलता हो धनिया तोता मिश्री पीसकर रख लें एक चम्मच चावल के पानी के साथ रोगी को पिलाएं आराम आने लगेगा कुछ दिन नियमित करें।
  • आधा गिलास पानी ले इसमें दो चम्मच धनिया डालें उबाले और गुनगुना पीले पेट दर्द ठीक रहेगा।
  • हरा धनिया पीसकर गंजे सर पर लेप करें कुछ दिनों के इस उपचार से बाल आने लगते हैं।
  • अधिक कामवासना या स्वप्नदोष हो जाने से आने वाली कमजोरी में रात को पानी में बड़ा चम्मच धनिया भिगो दें प्रातः छानकर पी ले कुछ दिन नियमित करें कमजोरी दूर होगी।

17. रक्तशोधक त्वचा विकार में हितकारी: नीम:-

  • नीम एक बहुत ही अच्छी वनस्पति है जो एक भारतीय पर्यावरण के अनुकूल है और भारत में बहुतायत में पाया जाता है। इसका वानस्पतिक नाम आज़ादीरचता इंडिका है। इसका साथ तो कड़वा होता है लेकिन इसके फायदे अनेक और बहुत प्रभावशाली है।:-
  • नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और कांति में हो जाती है।
  • नीम का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों के निवारण में सहायक होता है।
  • नीम की दातुन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।
  • नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं और यह खासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने से रोकता है।
  • मलेरिया बुखार फैलाने वाले मच्छरों को भगाने के लिए नीम की सूखी पत्तियां घर में जलाकर दुआ करें मच्छर मर जाएंगे या भाग जाएंगे।
  • नीम के फल और उनकी पत्तियों से निकाले गए तेल से मालिश की जाए तो शरीर के लिए अच्छा रहता है।
  • नीम के द्वारा बनाया गया लेख बालों में लगाने से बाल स्वस्थ रहते और कम झड़ते।
  • नीम की पत्तियों के रस को आंखों में डालने से आंख की बीमारी समाप्त हो जाती है।
  • नीम की पत्तियों के रस और शहद को दो अनुपात एक की अनुपात में पीने से पीलिया में फायदा होता है इसको कान में डालने से कान के विकारों में फायदा होता है।
  • नीम के तेल की पांच से 10 वोटों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज्यादा पसीना आना और जलन होने संबंधी विकारों में बहुत फायदा होता है।
  • नीम के बीजों के चोरों को खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफी फायदा होता है।

18.पित्त कफ नाशक :लौंग:-

  • लौंग कफ पित्त नाशक होती है। पित्त कफ से परेशान है तो एक लोंग मुंह में रखकर घंटा भर चुसिए से आराम मिलेगा।
  • ,प्यास लगने और जीमर चलाने पर लौंग का सेवन करना चाहिए। इसके लिए लॉन्ग को पानी में उबालकर छानकर ठंडा कर जल का सेवन करें।
  • यह भूख बढ़ाती है इससे पाचन सरसों का स्रव बढ़ता है।
  • पाचन क्रिया पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है।
  • पेट के कृमि इसके प्रयोग से नष्ट हो जाते हैं।
  • श्वेत रक्त कणों को बढ़ाती है तथा जीवन शक्ति के लिए जिम्मेदार कोसों को पोषण देती है।
  • एंटीबायोटिक है अतः दमा रोग में अत्यंत लाभकारी है।
  • त्वचा के किसी भी प्रकार के रोग में इसको चंदन बुरा के साथ मिलाकर लेप करने से फायदा मिलता है।

19. आंखों की रोशनी के लिए गुणकारी: सौंफ;-

सौंफ में कई और सभी गुण मौजूद होते हैं जिनका सेवन करने से स्वास्थ्य को फायदा होता है। सौंफ हर उम्र के लोगों के लिए फायदेमंद होती है। इसमें कैल्शियम सोडियम आयरन पोटैशियम टेशन जैसे तत्व पाए जाते हैं। इसका फल बीज के रूप में होता है और इसके बीच को प्रयोग किया जाता है पेट की समस्याओं के लिए बहुत लाभदायक होती है सौंफ।
  • आंखों की रोशनी को इसका सेवन करके बढ़ाया जा सकता है। सौंफ और मिश्री समान भाग लेकर पीस लें इसकी एक चम्मच मात्रा सुबह-शाम पानी के साथ 2 माह तक दीजिए इस स आंखों की रोशनी बढ़ती है।
  • इसको खाने से पेट और कब्ज की शिकायत नहीं होती है सौंफ को मिश्री या चीनी के साथ पीसकर चूर्ण बना लीजिए रात को सोते वक्त लगभग 5 ग्राम छोड़ो को हल्के गुनगुने पानी के साथ सेवन करें पेट की समस्या नहीं होगी वह गैस व कब्ज दूर होगा।
  • डायरिया होने पर सौंफ खाना चाहिए। इसको बेल के गूदे के साथ सुबह शाम चबाने से अजीर्ण समाप्त होता है और अतिसार में भी फायदा होता है।
  • खांसी होने पर सौंफ बहुत फायदा करता है। इसके 10 ग्राम अर्क को शहद में मिलाकर लीजिए इससे खांसी आना बंद हो जाएगी।
  • खाना खाने के बाद सौंफ का सेवन करने से खाना अच्छे से पता है। सौंफ, जीरा व काला नमक मिलाकर चूर्ण बना लीजिए। खाने के बाद हल्के गुनगुने पानी के साथ इस चूर्ण को ले जाए उत्तम पाचक चूर्ण ।
  • यदि आपको पेट में दर्द होता है तो भूनी हुई सॉफ्ट चलाइए इससे आपको आराम मिलेगा। सौंफ की ठंडाई बनाकर कीजिए। गर्मी शांत होगी यदि मत लाना बंद हो जाएगा।
  • यदि आपको खट्टी डकार आ रही है तो थोड़ी सी साफ पानी में उबालकर मिश्री डालकर पीजिए 2 दिन बाद प्रयोग करने से आराम मिल जाएगा।
  • हाथ पांव में जलन होने की शिकायत होने पर सौफ के साथ बराबर मात्रा में धनिया कूट जनकर मिश्री मिलाकर खाना खाने के पश्चात 5-6 ग्राम मात्रा में लेने से कुछ ही दिनों में आराम हो जाता है।
  • अगर गले में खराश हो जाए तो सौंफ चबाना चाहिए सौंफ चबाने से बैठा हुआ गला भी साफ हो जाता है।
  • रोजाना सुबह-शाम खाली पेट सौंफ खाने से खून साफ हो जाता है। चाचा के लिए बहुत फायदेमंद होता है इससे त्वचा में चमक आ जाती है।

20.मिर्गी मुरझा की बेजोड़ दवाई: राई:-

  • राई की गिनती सरसों की जाति में होती है इसका दाना छोटा वह काला होता है।
  • मिर्गी मूर्छा में राई पीसकर सुघाने मात्र से मिर्गी की बीमारी और मूर्छा की बीमारी जाती रहती है।
  • राई का प्रमुख गुण पाचक होता है।
  • पेट के कीड़े इसका पानी पीने से मर जाते हैं।
  • है जी मिठाई को पीसकर पेट पर लेप करने से उधर सूल व मरोड़ में आराम मिलता है।
  • इसकी पुल्टिस बनाकर दर्द वाली जगह पर से किया जाए तो तुरंत राहत मिलती है।
  • राई के तेल से सूजन कम होती है।
  • गर्म पानी में राई डालने से राय फूल जाती है और उसके गुण पानी में पहुंच जाते हैं। इस पानी को गुनगुना सहने योग्य कर किसी तब में कमर तक भरकर बैठा जाए तो सभी प्रकार के यौन रोग प्रदर में आदि से बेहतर सुधार आता है।
  • इसे पीसकर शहद में मिलाकर सूखने से जुकाम में आराम मिलता है।
  • राई के तेल में बारीक नमक डालकर पेस्ट बनाकर मंजन करने से पायरिया रोग का नाश हो जाता है।
  • पेट के कीड़े इसका पानी पीने से मर जाते हैं।
  • है जी में राई को पीसकर पेट पर लेप करने से उदर शूल वह मरोड़ में आराम मिलता है।
  • इसकी पुल्टिस बनाकर दर्द वाली जगह पर से किया जाए तो तुरंत राहत मिलता है।
  • राई के लेप  से सूजन कम होती है।

21. वायु पित्त कफ समनकरी: हल्दी:-

हल्दी के औषधि गुण तभी लाभकारी होंगे जब आप साबुत हल्दी को पीसकर उपयोग में लाएंगे क्योंकि बाजार की हल्दी मिलावटी हो सकती है। शरीर में रक्त को शुद्ध करने के साथ-साथ तीनों 200 यानी वात पित्त कफ का भी सम्मान करती है हल्दी है शरीर की काया और रंग को सुधारने में एक महत्वपूर्ण देसी औषधि के रूप में कारीगर भूमिका निभाती है। इससे फेस पैक के रूप में बेसन के साथ लगाने से त्वचा में निखार आता है जबकि खांसी होने पर गर्म पानी से पीने से लाभ मिलता है।
  • आयुर्वेद के अनुसार मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति को हल्दी की गांठ को पीसकर तथा देसी घी में भूनकर और थोड़ी चीनी मिलाकर कुछ दिनों तक रोजाना देने से रोगी को काफी राहत मिलती है।
  • यदि शरीर में पथरी हो गई हो तो हल्दी और पुराना गुड़ छाछ में मिलाकर सेवन करने से निजात मिल जाती है।
  • ठंड देकर आने वाले बुखार में दूध को गर्म कर हल्दी और काली मिर्च मिलाकर पीने से बुखार जल्दी ही शरीर से छूमंतर हो जाता है।
  • देखने में आया है कि चेचक के घाव अक्सर व्यक्ति को रुला कर रख देते हैं इसलिए इस दौरान हल्दी और कट्ठे को महीन पीसकर चेचक के घाव पर चढ़कर निसंदेह काफी लाभ पहुंचेगा।
  • हल्दी और दूध को गर्म करें इसमें थोड़ा गुड़ और नमक मिलाकर बच्चों को पिलाने से कफ और जुखाम का अंत हो जाता है।
  • अक्सर शादी विवाह के दौरान दुल्हन के सौंदर्य रूप निखार के लिए हल्दी का उत्तर ली पर मालिश किया जाता है इससे शरीर की काया और रंग में काफी सुधार आता है।

22. शूलनासक व आंतों के रूप में उपयोगी :बेल:-

आयुर्वेद में बेल को स्वास्थ्य के लिए काफी लाभप्रद फल माना गया है। बेल मधुर रुचिकर पार्षद तथा शीतल फल है। कच्चा बेल फल रुखा पाचक गर्म ,वात, कफ, शूलनासक व आंतों के रोगों में उपयोगी होता है। सूल वेदना से ग्रस्त स्थान पर कच्चे बेल के गूदे को गर्म कर कपड़े की पुल्टिस के रूप में पहनने से वेदना का तुरंत नाश हो जाता है। पके फल का गूदा खाने से आंतों के रोग का समन होता है। बेल का फल ऊपर से बेहद कठोर होता है इसे नारियल की तरफ होना पड़ता है अंदर पीले रंग का खुदा होता है। जिसमें पर्याप्त मात्रा में बीज होते हैं गुदा लसादार  तथा चिकना होता है, लेकिन खाने में हल्की मिठास लिए होता है। ताजे फल का सेवन किया जाता है और इसके गूदे को बीज हटाकर सुखाकर उसका चूर्ण बनाकर भी सेवन किया जा सकता है।
  • कब्ज के रोगियों के इसके शरबत का नियमित सेवन करना चाहिए बेल का पका हुआ फल उधर की स्वच्छता के अलावा आंतों को साफ कर उन्हें ताकत देता है।
  • मधुमेह के रोगियों के लिए बेल फल बहुत लाभदायक है बेल की पत्तियों को पीसकर उसके रस का दिन में 2 बार सेवन करने से डायबिटीज की बीमारी में काफी राहत मिलती है।
  • रक्ताल्पता में पके हुए सूखे बेल की गिरी का चूर्ण बनाकर गर्म दूध में मिश्री के साथ एक चम्मच पाउडर प्रतिदिन देने से शरीर में रक्त का निर्माण होकर स्वास्थ्य लाभ होता है।
  • गर्मियों में प्राया अतिसार की वजह से पतले दस्त होने लगते हैं ऐसी स्थिति में कच्चे बेल को आग में बोलकर उसका गुर्दा रोगी को खिलाने से फौरन लाभ मिलता है।
  • गर्मियों में लू लगने पर बेल के ताजे पत्तों को पीसकर मेहंदी की तरफ पैर के तलवों में भली-भांति वाले इसके अलावा सिर छाती पर भी इसकी मालिश करें मिश्री डालकर बेल का शरबत पिलाया तुरंत राहत मिलती है।

22. बंद गला खोलने सुरीली आवाज देने वाली: काली मिर्च:-

काली मिर्च एक अनुपम औषधि है लाल मिर्ची की अपेक्षा कब नाहक और अधिक गुणकारी है। इसीलिए मसाले में लाल मिर्च की बजाय काली मिर्च का प्रयोग प्रचलित है काली मिर्च का उचित रूप से उपयोग किया जाए तो यह रसायन गुण देती है। काली मिर्च को सभी प्रकार की बैक्टीरिया वायरस आदि का नाश करने वाली औषधि माना जाता है। यूनानी मतानुसार काली मिर्च उधर पीड़ा डकार और अफारा मिटाकर कामोत्तेजना पर विवेचक होती है। अरुचि, जीर्ण ज्वर ,दांत दर्द, मसूड़ों की सूजन, पक्षाघात, नेत्र रोग आदि में भी हितकारी है।
  • काली मिर्च को घी और मिश्री के साथ मिलाकर चाटने से बंद गला खुल जाता है और आवाज सुरीली हो जाती है। 8-10 काली मिर्च पानी में उबालकर इस पानी से गरारा करें इससे गली का संक्रमण खत्म हो जाएगा।
  • जुकाम होने पर काली मिर्च मिलाकर गर्म दूध पिए। एक जुकाम बार-बार रोज होता है अक्सर छींके आती है तो काली मिर्च की संख्या 1 से शुरू करके रोज एक बढ़ाते हुए 15 तक ले जाए फिर प्रतिदिन एक घटा ते हुए 15 से 1 पर आए इस तरह जुकाम 1 माह में समाप्त हो जाएगा।
  • खांसी होने पर आधा चम्मच काली मिर्च का चूर्ण और आधा चम्मच शहद मिलाकर दिन में तीन चार बार चाटने से खांसी दूर हो जाएगी।
  • गैस की शिकायत होने पर एक कप पानी में आधे नींबू का रस डालकर आधा चम्मच काली मिर्च का चूर्ण आधा चम्मच काला नमक मिलाकर नियमित कुछ दिनों तक सेवन करने से गैस की शिकायत दूर हो जाती है।
  • काली मिर्च को घी में बारीक पीसकर लेप करने से दांत फोड़ा फुंसी आदि रोग दूर हो जाते हैं।

23. तनाव से मुक्तिदाता: तिल:-

भारतीय खानपान में तिल का बहुत महत्व है सर्दियों के मौसम में तिल खाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है और शरीर सक्रिय रहता है। दिल में कई प्रकार के प्रोटीन कैल्शियम b-complex और कार्बोहाइड्रेट आदि तत्व पाए जाते हैं। तिल का सेवन करने से मानसिक दुर्बलता नहीं होती प्राचीन समय में खूबसूरती बनाए रखने के लिए तिल का प्रयोग किया जाता रहा है। तीन तीन प्रकार के होते हैं काले तिल सफेद तिल और लाल तिल। लाल तिल का प्रयोग कब किया जाता है तिल का तेल भी बहुत फायदेमंद होता है।
  • कान की भुजिया चिंता ग्रस्त होने के से होने वाले तनाव में सफेद तिल को प्रातः काल पीसकर मिश्री मिलाकर दो चम्मच छोटा फंकी लेने से मस्तिष्क शांत रहता है तनाव से मुक्ति मिलती है।
  • प्रतिदिन दो चम्मच काले तिल को चबाकर खाइए और उसके बाद ठंडा पानी पी लीजिए इसका नियमित सेवन करने से पुराना बवासीर ठीक हो जाता है।
  • जल्दी पर भी तिल का प्रयोग किया जाता है जले हुए स्थान पर देसी घी और कपूर के साथ मिलाकर जले हुए स्थान पर इसका लेप लगाने से फायदा होता है।
  • कब्ज के लिए तिल फायदा करती है कब्ज होने पर 50 ग्राम तेल भूनकर उसे कूट लीजिए उसमें चीनी मिलाकर खाइए इससे कब्ज दूर हो जाती है।
  • बच्चा सोते समय पेशाब करता है तो भूलने काले तिलों को गुड़ के साथ मिलाकर उसका लड्डू बना लीजिए बच्चों को यह गुण रोज रात में सोते समय खिलाई है बच्चा सोते वक्त पेशाब नहीं करेगा।
  • खांसी आने पर तिल का सेवन कीजिए खांसी ठीक हो जाएगी तिलवा मिश्री को पानी में उबालकर पीने से सूखी खांसी भी दूर हो जाती है।
  • पीठ में दर्द होने पर एक चम्मच काले तिल चबाकर ऊपर से गुनगुना पानी पी जी ऐसा करने से पेट दर्द ठीक हो जाता है।
  • कान में दर्द होने पर तिल के तेल में लहसुन की टीम टीम कलियां घूम लीजिए इस तेल को दो-तीन भूतकाल में डालिए कान का दर्द ठीक हो जाएगा।
  • हींग और सोठ डाल कर गर्म किए हुए तिल के तेल की मालिश करने से कमर का दर्द जोड़ों का दर्द और लगवा दी रोग ठीक हो जाते हैं।
  • मुंह में छाले होने पर तिल के तेल में थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर मुंह के छालों में लगाइए इससे मुंह के छाले ठीक हो जाएंगे।
  • फटी हुई एड़ियों पर गर्म तेल में सेंधा नमक और मोम मिलाकर लगाने से फायदा होता है।
  • तिल को पीसकर मक्खन के साथ मिलाकर नियमित रूप से चेहरे पर लगाने से चेहरे का रंग निखरता है।
  • मुंहासे होने पर चेहरे पर तिल को पीसकर मक्खन के साथ मिलाकर लगाने से चेहरे के कील मुंहासे भी समाप्त हो जाते हैं।
  • किसी भी प्रकार की चोट पर तिल के तेल का फाहा रखकर पट्टी बांधने से आराम मिलता है।

24.स्फीतिकृमि और कुष्ठ रोग नाशक: वायविंडिंग:-

  • यह एक झाड़ी नुमा एवं शीघ्र पढ़ने वाला पड़ता है इसका झालकुबरी होती है इसकी टहनियां लंबी पतली और लचीली ओम लंबे पर्व वाली होती है। इसकी पत्तियां लचीली हम लंबे पर्व वाली होती हैं। अतिथि छंद वाले ऊपर से चमकदार जबकि निचले सत्ता रजाभ सुक्ष्म में ग्रंथियों युक्त होती है। पुष्प श्वेत या हल्के रंग के तथा फल गोलाकार पकने पर लाल रंग के दिखाई देते हैं यह नगर के पंसारी के यहां आसानी से मिल जाती है।
  • स्थिति क्रीमी बच्चों को स्वस्थ नहीं होने देते आहार के पोषण तत्व कीड़े ही ग्रहण कर लेते हैं। इस रोग में वायविंडिंग के पत्तों को कुचलकर पांच बुद्रस पिलाने से स्थिति कृमि मर कल माल के साथ बाहर आ जाते हैं। चार-पांच दिन इसका सेवन कराना चाहिए।
  • वायविडंग के पत्तों का रस इसकी जड़ को पकाकर रस मीठा कर एक चम्मच मित्र पिलाने और इसी रस को किस स्थान पर लगाने से कुष्ठ रोग दूर होता है तथा त्वचा का रंग बदलने लगता है। प्राकृतिक त्वचा का रोग आने तक नियमित सेवन करें।
  • श्वास रोग में रसायन के रूप में वीडियो यष्टि मधु का संभाग जुड़ शीतल जल से पीना चाहिए। इस प्रकार नियमित प्रातः सायं चौथाई तोला चूर्ण शीतल जल के साथ 1 माह तक लेना चाहिए। इस बीच आहार में केवल चावल, घी, मुंग तथा आंवले का सेवन करना चाहिए। प्रात एवं सायं काल का भोजन इसी प्रकार लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का भोजन नहीं लेना चाहिए।
  • इस केयर्स बवासीर में लाभ देते हैं कृमि मर जाते हैं। इसमें शक्ति की वृद्धि होती है। इस तरह का प्रयोग एक 1 मास तक करने से 100 वर्ष की आयु बढ़ती है। वायविडंग का प्रयोग पीठ के समस्त विकारों पर काबू पाने में होता है। इसका नियमित प्रयोग निरोगी बनाता है शरीर में किसी भी रोग को पनपने नहीं देता।
  • कामला में वायविंडिंग मूल को तंडुलोदक में घिसकर पिलाना चाहिए। इससे सभी प्रकार के भीषण सड़कों का विष भी उतर जाता है। क्रीमिघ्न औषधियों में वायविंडिंग सर्वश्रेष्ठ है। यह एक दिव्य औषधि है इसके सेवन से पाचन क्रिया सुधरती है इसी कारण शिशुओं को विडंग का यवकउट्ट जो दूध में मिलाकर उबालना पिलाना लाभकारी होता है।
  • सामान्य कृमि रोग में इसका चूर्ण गुड़ मिलाकर सेवन से या मधु मिलाकर सेवन से क्रिमिनल होता है शिशु के पूर्ण निरोगी होने के लिए 1 माह तक विडंग का चूर्ण मधु के साथ देना चाहिए, इससे शिशु को कभी कोई रोग नहीं होगा।
  • अरुचि या ज्वर में विडंग तथा मधु की गोली बनाकर मुख में रखनी चाहिए। जिससे अरुचि तथा जीर्ण ज्वर नाश शीघ्र हो जाता है। मात्रा 5-10 ग्राम उपयोग कराएं।

25.अम्लपित्त और आमाशयिक व्रण में उपयोगी:शतावरी:-

यह विशाल घनी ,अतिशाखित पत्र रहित  होती है। इसकी कंकड़ युक्त लता तथा पत्र सदृश्य शाखाएं होती है तथा पुष्प सफेद छोटे होते हैं। बड़ी बुढ़िया सतावर के गुण जानती हैं।
  • यह संभावित गर्भपतन,श्वेत प्रदर, शुक्र दुर्बलता, सामान्य दुर्बलता, दुग्ध वर्धक ज़ीरो वेदना मुरझ से रक्तमारधिक्य को कम करता है।
  • शतावर अम्ल पित्त एवं आमाशयिक  व्रण में उपयोगी है। इसका पत्र आभास कांड का सच कैंस दर्दर प्रतिरोधक है।
  • इसके मूल के चूर्ण में संभाग गोचर का चूर्ण मिलाकर इसमें से एक चम्मच चूर्ण लेकर एक कप दूध में उबालकर शर्करा मिलाकर प्रातः प्रतिदिन तीन बार सेवन कराने से मूत्र में रक्त आना बंद होता है।
  • रक्त अतिसार में शतावर का ताजा चूर्ण बकरी के दूध से सेवन करने से तथा चावल का सेवन बकरी के दूध के साथ करना चाहिए।
  • मूत्र रोग में इसके मूल का चूर्ण गोमूत्र के साथ सेवन कराना चाहिए।
  • रात्रि अंधता में इसकी हरिदास शाखाओं को भी में शेखर सेवन कराने से लाभ होता है।
  • रक्तपित्त में सतावर की मूल का चूर्ण दूध में उबालकर सेवन कराने से इन रोग में लाभ होता है।
  • उदर अमाशय छोटी आत में अल्सर होने पर 57 के मूल का चूर्ण बकरी के दूध में उबालकर प्रतिदिन तीन चार बार सेवन कराने से लाभ होता है।
  • अम्ल पित्त में सतावर के मूल का चूर्ण दूध में उबालकर सेवन कराना चाहिए या चूर्ण चल के साथ फाकी के रूप में सेवन कराने से लाभ होता है।
  • स्त्री रोग मे प्रसुता  माता की दूध की कमी हो या गर्भाशय में किसी प्रकार की विकृत हुई हो तो शतावर मूल का चूर्ण अधिक बार शेयर करने से लाभ होता है।
  • शुक्र दोष मिस शुक्राणु की कमी वीर्य का पतला होना शुक्र दुर्बलता नपुसंकता में सतावर के मूल का सेवन दूध के साथ या चूर्ण का पाक बनाकर सेवन करना चाहिए।
  • वृक शोथ में रक्त प्रदर एवं श्वेत में इसके मूल का चूर्ण -दुध में डालकर सेवन कराने से लाभ होता है।
  • मधुमेह रोग में एक कप दूध में 20 ग्राम सतावर का रस मिलाकर पिलाना चाहिए।
  • राज्यक्षमा यानी टीवी इसके मूल का चूर्ण का एक-एक चम्मच शतावर चूर्ण दूध में उबालकर या जल के साथ सेवन कराना चाहिए।
  • 57 का मूल का चूर्ण 306 ग्राम क्वाथ 5 से 100 मिली स्वरस 10 से 20 मिलीलीटर उपयोग कर आनी चाहिए।

 26.वातगुल्म, जलोदर में लाभकारी :सनाय:-

सनाय एक लघु क्षुप है। इसके संयुक्त पत्र जिसमें 1 से 6 जोड़ी पत्रिकाओं की कोणीय रेशम के पीत पुष्प होते हैं।
  1. बातगुल्म में इसके पत्रों का चूर्ण बच के साथ सेवन करने से लाभ होता है। जलोदर तथा श्रित में इसके चूर्ण का प्रयोग आंवले के रस के साथ सेवन करने से लाभ होता है।
  2. खांसी उधर रोग भी विबंध में यह औषधि लाभदायक है।
  3. इसके पित् ज्वर में विरेचन के लिए उपयोग से दूषित पेट निकल जाता है यह दाह शिर: वेदना शांत हो जाती है। पित्त वाले ज्वर में इसके पत्रों तथा अमलतास का चूर्ण जल के साथ सेवन करने से लाभ होता है। विबंध मेष के पत्रों का छोड़ इमली के स्वरस के साथ सेवन करना चाहिए।
  4. अग्निमांद्य में इसकी पत्रों के चूर्ण का प्रयोग बिजोरा के रस तथा मिश्री के साथ करने से भूख लगती ‌।
  5. मात्रा इसके बीज छोड़ 3 से 10 ग्राम उपयोग करनी चाहिए।

  27.अपस्मार तथा उन्माद में उपयोगी: सरसों:-

सरसों कफ, की वात नाशक रक्त पित्त तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाला शुक्र नाशक होता है। अपस्मार उन्माद तथा वातरक दांत के रोगों में लाभकारी है।

अपस्मार तथा उन्माद में;-

करंज के बीज तथा सरसों के बीज संभाग लेकर गोमूत्र में पीसकर गोली बनाकर छाया में सुखा लें अपस्मार तथा उन्माद के रोगी की आंख में अंजन करने से यह रोग नष्ट हो जाता है।

कुष्ठ रोगियों को:-

सरसों का तेल कुष्ठ रोग में अति उपयोगी है। उरूस्तंभ‌ में -करंज
फल तथा सरसों गोमूत्र में पीसकर लेप करना चाहिए ।

श्रीपद में:-

इस रोग के नाश के लिए सरसों के तेल का सेवन करना चाहिए।

दांत के रोगों में:-

संध्या और लवण में सरसों का तेल मिलाकर दांतों पर उंगली से गिरना चाहिए सभी प्रकार के दंत रोगों में लाभ होता है।

वात रक्त में:-

सरसों के बीज का चूर्ण लेप करना चाहिए स्वस्थ रहने के लिए सरसों की मौसम में सरसों की पौधों की कोमल पत्ते एवं कांड का साग बना कर खाना चाहिए सरसों का तेल उत्तम प्लीहा नाशक है।
अशोक के तेल की मालिश त्वक रोगों तथा बात विकारों में की जाती है।

28. बच्चों के अतिसार और प्रवाहिका का नाशक: सूर्यमुखी:-

  • बच्चों के अतिसार में दस्त होते हो या प्रवाहिका के कारण मरोड़ वाले दस्त होते हो या उदर शूल हो तो सूर्यमुखी के सूखे हुए पत्तों का साग दही तथा खट्टे अनार के रस में मिलाकर तथा पका कर खिलाना चाहिए।
  • बच्चों के उदर शूल तथा उधराध्मान मैं इसके फूलों के रस की 10:00 बूंद दूध में डालकर पिलाने से लाभ होता है।
  • बिच्छू के बिष में इसके पत्रों के चूर्ण का नरसय्या जल में पीसकर लेप करना चाहिए या ताजे पत्रों को मसल कर सुघाने से बिच्छू का बिष उतर जाता है।
  • रेचन के लिए इसके बीजों के तेल की एक बूंद नाभि पर गिरने से रेचन क्रिया होकर दस्त साफ होता है।
  • सूजन में सूर्यमुखी के पत्रों का साग लाभकारी है। वातपित्तानुसंग श्वांस इसके पंचांग का चूर्ण त्रिकूट दूध तथा घी के साथ खिलाकर तथा इसके पश्चात चावल तथा गीत खिलाने से स्वास रोग में लाभ होता है।
  • योनि दाह मैं इसके मूल को चावल की मांड में घिसकर पिलाने से योनि शूल में लाभ होता है।
  • छाती में जकड़न हो गई हो तो इसके ताजे पत्तों के रस में हींग मिलाकर पिलानी चाहिए।
  • कान में क्रीमी पड़े हो तो इसके पत्रों के स्वरस को थोड़ा सा त्रिकूट मिला गुनगुना कर कान में 1 -2 बुद डालने से कीड़े मर जाते हैं।
  • अश्मरी में इसके मूल को गाय के दूध में पीसकर मिलाने से तीव्र अश्मरी निकल जाती है।
  • सूर्यमुखी के बीजों को अंकुरित कर खाया जा सकता है इसमें कोलेस्ट्रोल कम करने का गुण है।
  • दुश्ट व्रणो के लिए इसके पत्रों के क्वाथ से धोने से लाभ होता है।
  • इसका रोपण आरोग्य शास्त्र की दृष्टि से बहुत ही महत्व का है। सूर्य की किरणें जहां नहीं पहुंचती वह स्थल कभी भी निरोगी नहीं रह सकता है आप बात तो निर्विवाद है ऐसे स्थलों में सूर्यमुखी के पौधे उगाए जाते हैं तो रोग होकर दूर हवा शुद्ध हो जाती है। तरह का उदाहरण दक्षिण अफ्रीका तथा यूरोप के अनेक देशों में जो दूषित हवा के कारण रोग ग्रस्त बन चुका था वहां पर संधान करता डॉक्टरों ने सूर्यमुखी के पौधे का रोपण करवाया। जिसका फल यह हुआ कि वहां पर हो रही बीमारियां नष्ट होकर वहां के लोग आरोग्य वाले हो गए।
  • सूर्यमुखी उत्तम गुड वाला पौधा होने के कारण अपने घर के सामने 10-15 पौधे अवश्य रोपण करना चाहिए। यह पौधे रोग उत्पन्न करने वाले नमी वाले का दुर्गंध हवा का शोषण करने की शक्ति रखते हैं। इसमें हवा शुद्ध होती है मलेरिया ज्वर संधिवात तथा नवी से उत्पन्न होने वाली बीमारियां दूर हो जाती है।


 29.गर्भवती महिला के रोगों का नाशक :सिंघाड़ा:-

सिंघाड़ा का सेवन गर्भावस्था के समय होने वाले अतिसार रक्त दो श्वेत प्रदर दोष को दूर करता है। गर्भवती महिलाओं को दूध के साथ इसके सेवन से नाड़ी तंत्र तथा सामान्य दुर्बलता तथा शुक्र दोष में लाभ होता है। इसके कांड का रस नेत्र रोगों में लाभकारी है रक्तस्तंभक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। इसके फल का सेवन दूध के साथ पित्त के रोग तथा गड़बड़ी को लाभ देता है गर्भवती महिलाओं को सातवे मांस का सेवन लाभकारी है। मूत्र रोगों में इसका क्वाथ लाभकारी है अतिसार में अति लाभकारी है। इसके फलों में चावल के सामान पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं मैगजीन धातु को खींचने की इसमें अद्भुत शक्ति है इसमें भी इस धातु का थोड़ा अंश पाया जाता है।

30. हृदय और मस्तिष्क का बलवर्धक :सेब:-

सेब का मुरब्बा हृदय को बल देता है मानसिक तथा छाती पर के दबाव में लाभकारी फल में उपस्थित फ्लोरिजन जो एंटीबैक्टीरियल होने के कारण पॉजिटिव तथा नेगेटिव दोनों प्रकार की कीटाणुओं को नाश करता है। इसके फल पचने में भारी, मधुर तथा सीत वीर्य रक्तस्राव , सभी लोगों में फल का सेवन लाभकारी है। श्वास रोग अग्निमांद्य में फल हृदय को बल प्रदान करने वाले होते हैं।
सेब का सेवन प्रतिदिन लाभकारी है यूरोपियन लोग भोजन के पश्चात एक से अवश्य खाते हैं सेब को कभी भी छीलकर नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसके छिलके में अनेक महत्व के छार होते हैं।पार्रयायिक ज्वर में इसकी छाल के क्वाथ का सेवन लाभकारी होता है। सेब के मूल दाह  सामक  तथा निद्रा जनक गुण वाले होते हैं। सेब का मुरब्बा रक्तिसार दिशा तथा अतिसार में सेवन करने से लाभ होता है।

31. हिचकी नियंत्रक: हरण:-

हिचकी में हरण की गुठली दूध में डालकर अच्छी तरह पका कर सेवन से तुरंत लाभ होता है। विबंध काश रफ्तार चर्म रोग स्वरूप प्रवाहिका गर्भाशय दुर्बलता हरड़ का चूर्ण देने से लंबे समय से जुड़े दस्त में लाभ होता है। उदर रोग में अगर किसी भी प्रकार के उधर रोक से बचना चाहते हैं तो नियमित काफी समय तक बड़ी हरड़ का सेवन करना चाहिए। कफ जन्य पांडु रोग में गोमूत्र में भिगोकर हरण का सेवन करने से लाभ होता है।वमन
मैं हरण का चूर्ण मधु के साथ सेवन करने से लाभ होता है। वात रक्त में हरण का चूर्ण गुड़ के साथ शेयर करने से लाभ होता है। कफ जन्य रोग में हरण का चूर्ण गोमुत्र के साथ सेवन करने से लाभ होता है। अश्मरी में हरण का पाठ मधु मिलाकर सेवन करने से लाभ पांडुरोग शीर: सूल मधुमेह  में भी लाभकारी है।मुखगत व्रण पुरानी कहावत तथा अर्थ में हरण के चोर का लेप करने से लाभ होता है। दंत मंजन में हरण का महीन चूर्ण बहुत ही उपयोगी है। सूल युक्त में भोजन से पहले हरण का चूर्ण गुड़ में मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है। दस्त आते हो तो औषधि से इसको तुरंत बंद करना चाहिए पहले उधर को साफ होने दे दोष वगैरह को पकाने के बाद बाहर निकालने के लिए प्रथम हरण के सेवन से दोष बाहर निकलकर दस्त मिट जाते हैं शरीर एकदम हल्का होकर जठराग्नि प्रदीप्त होती है।
  शरीर में शक्ति के लिए बड़ी हरण की छाल को घी में तलकर किसका इसका चूर्ण बना लेना चाहिए तलने के बाद बचा हुआ तेल एक पात्र में भर ले यह की तथा चूर्ण दोनों को मिलाकर चाटने से बल प्राप्त होता है।

  रक्त पित्त में हरण तथा पीपली बराबर भाग लेकर इसको अडूसा के रस की भावना देकर इसका चूर्ण बनाकर मधु के साथ चाटने से लाभ होता है। कुष्ठ रोग में हरण का चूर्ण तिल के तेल में तलकर सेवन करने से लाभ होता है। संधि रोग में हरण को अरंड के तेल में तलकर पीसकर चूर्ण बनाकर सेवन करने से लाभ होता है। इसका  सेवन चूर्ण रूप में दो से चार मासा करना चाहिए।

32 .जीर्ण ज्वर मेल आबकारी: हरसिंगार:-

  • जीर्ण नजर में इसके फूलों को पकाकर छानकर दिन में तीन बार एक-एक चम्मच जल पीने से ज्वर उतर जाता है।
  • प्रवाहिका, कष्टार्तव,व्रण, बीज का कल्प केस में रूसी नाश करने के लिए लाभकारी है।
  • इसके पत्रों का स्वरस कृमि नाशक तथा पित्त नाशक।
  • पत्रों क्वाथ गृध्रसी, कृमिघ्न, आमवात में लाभकारी है।
  • इसकी छाल खांसी तथा स्वास्थ्य रोगों में इसके बीजों को जल में पीसकर सर के गंजे बालों पर लगाने से नए बाल उग जाते हैं।
  • बच्चों के कृमी रोग में इसके पत्रों के स्वरस में चीनी मिलाकर सेवन करने से क्रीमी बाहर आ जाती है।
  • खांसी तथा दमा में इसके कांड की छाल का चूर्ण एक से दो रत्ती पान में रखकर दिन में 3-6 बार देने से लाभ होता है।
  • इसके पत्रों का स्वर्ण शिशु के लिए उत्तम एवं सरल विरेचक है।

33.उदर शूलनासक:हींग:-

  • उदर शूल में हींग तीन माशा, कोष्ठक तीन माशा, वायविंडिंग तीन माशा, इनको मिलाकर 2 तोला गर्म जल नेम मिलाकर पिलाना चाहिए पिलाते ही आराम मिलता है।
  • आ्त्रशूल,वइसूचइकआ,विषम ज्वर, न्यूमोनिया,श्वसनिशोथ, मोर्चा मूत्र विकारों, कास,अध्यापन, कृमिघ्न,मेधा उत्तेजक,है। मूत्र रोग एवं शुक्र रोग में घी डालकर इसका धुआं मुख द्वारा ग्रहण करने से हिचकी ठीक हो जाती है।
  • अफीम का नशा उतारने के लिए हींग का चूर्ण छाछ है जल में मिलाकर सेवन करना चाहिए।
  • बुखार में हींग तथा पुराना की कथा कर बुखार समय नासिका छिद्रों में एक-एक बूंद डालना चाहिए।
  • चूड़ी बनाने की विधि इसमें सोंठ, काली मिर्च पीपर अजवाइन सेंधव जीरा काला जीरा तथा तली हुई हींग सब एक बराबर लेकर चूर्ण बना लें इस चूर्ण को 4 गुनी धीमी या भोजन समय चावल के साथ सेवन करने से अग्निमांद्य , अजीर्णता,कोलेरा,पआंण्णउरओग, कुछ चक्कर तथा सूल पर हींग को घी में शेक तथा मिलाकर सेवन करना चाहिए।
  • गर्भपात को रोकने के लिए 6 मांशे हींग की गोलियां बनाकर प्रारंभ में एक गोली दिन में दो बार धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ाते हुए 10 गोली प्रतिदिन देते हैं प्रसव तक धीरे-धीरे इसकी मात्रा कम करते हैं।
  • बिच्छू के बीष में मदार के दूध में से की हुई हींग तथा इलाची का 3 रत्ती चूर्ण दूध में मिलाकर सेवन करने से लाभ मिलता है।
  • सउत्रकऋमइ,अध्यापन, तथा शूल एवम आक्षेप में 2से 3माशा‌ हींग जल के साथ घोटकर इसकी बस्ती दी जाती है।
  • अग्निमांद्य जोड़ता पांडुरोग आंख तथा गुल्लम में भी हींग का उपयोग लाभकारी होता है।
  • हिचकी में धुआं युक्त जलते कोयले पर हींग तथा उड़द की दाल कचोरी को पीसकर लेप करना चाहिए।

34. उदर शूल अफारा निवारक: त्रायमाण:-

पेट की वायु को नष्ट करती है जिससे उधर सूल व अफारे में लाभ होता है। इसका सेवन करने से भूख लगती है पाचन क्रिया में सुधार होता है भोजन जल्दी पता है पित्र का सट्टा है तथा दस्त तथा पेशाब साफ होता है। इसकी पंचांग की राख सामक कृमिनाशक होती है। यह बनस्पति बहुत प्राचीन काल से चिकित्सा के रूप में उपयोग में लाई जाती है हकीम लोग इससे बहुत समय से उपयोग में लेते आए हैं कड़वी होने की वजह से अजीर्ण रोग और अग्निमांद्य की वजह से होने वाली शरीर की शिथिलता में पौष्टिक वस्तु की तरह दी जाती है। यह मृत्यु विरेचन और पीड़ा नाशक होने से यह बवासीर में भी बहुत उपयोगी सिद्ध होती है। इसे मूल गुण होने से प्लीहा ,यकृत जलोदर और हृदय रोग में भी इसका प्रयोग संतोषजनक पाया जाता है। यह कटु पौष्टिक मुत्रल, और मृदुवि रेचक गुणों की वजह से यह जींर्ण ज्वर और पित्त ज्वर  में भी लाभ पहुंचाता है। इसकी रात को नीम के रस में अथवा घी में मिलाकर खुजली वगैरह चर्म रोगों पर लगाने से अच्छा लाभ होता है इसके उपयोग की मात्रा तीन माशा के अंदर होनी चाहिए।

35.सब रोगों का एक औषधि :त्रिफला:-

त्रिफला एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक रासायनिक योग है जिसमें अमलकी आंवला बहरा और हरण के बीज की निकालकर समान मात्रा में लिया जाता है। जिसकी पूरी विस्तृत जानकारी मैंने अपनी पोस्ट में की है कृपया आप वहां पर एक बार विजिट करें।

त्रिफला चूर्ण का उपयोग कब, कैसे, क्यों और कितनी मात्रा में करना चाहिए?

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