Health and wellness,आहार के पोषक तत्व कौन से है
Health and fitness
शारीरिक क्रियाओं के लिए हमें पौष्टिक तत्वों को गुर्जर की आवश्यकता पड़ती है जिसे हम संतुलित आहार का सेवन करके प्राप्त कर सकते हैं। प्रोटीन ,कार्बोहाइड्रेट , वसा, खनिज लवण विटामिन फुजला । यह साथ तक हमारे आहार के प्रमुख अंग है शारीरिक आवश्यकता अनुसार इनका सेवन करने से शरीर निरोगी रहता है यह तभी संभव है जब हम पौष्टिक तत्वों के महत्व तथा इनकी आवश्यकता के बारे में विस्तृत जानकारी ले । दैनिक आवश्यता प्रोटीन का पाचन युक्त पेट में होता है इसकी आवश्यकता प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन 45 से 65 ग्राम के लगभग होती है।
प्रोटीन;
प्रोटीन को भोजन का प्रमुख अंग कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा।
प्रोटीन की आवश्यकता;
यह शरीर का निर्माण करता है शारीरिक यंत्रों की क्षतिपूर्ति और पुष्टि शरीर का पोषण कर के भीतरी और बाहरी शक्ति उत्पन्न करने में मुख्य भूमिका निभाता है। शरीर की क्षतिपूर्ति, धातु की वृद्धि ,स्वस्थ त्वचा का निर्माण हुआ उसका पुनर्जीवन मानसिक शक्ति रोग निवारण शक्ति गर्भ में शिशु के शरीर का गठन शिष्यों की शारीरिक वृद्धि करता है। भोजन पचाने में सहायता करता है क्योंकि भोजन को पचाने के काम आने वाले एंजाइम प्रोटीन के ही बने होते हैं। यह विचार शक्ति को प्रेरित करता है हिमोग्लोबिन प्रोटीन के द्वारा बनता है।
प्रोटीन के अभाव में होने वाले रोग;
रोग निवारण शक्ति घटना सारे छतिपूर्ति ना होना बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास रुकना, मांस के सिंह की शिथिलता,निश्तेजता, त्वचा का रूखापन झुर्रियां पड़ना, व चकता पडना, रक्त हीनता, चिड़चिड़ापन, क्रोध, बालों में रूखापन व टूटना ,नाखून का सूखना ,और उन पर सफेद दाग भरना ,पाचन शक्ति में कमी ,आंतरिक अंगों की क्षमता में कमी, पेट फूलना ,यकृत बढ़ना आदि प्रोटीन की कमी से होते हैं।
प्रोटीन की अधिकता से होने वाले रोग;
इसका अधिक सेवन साइड विधि के समय ही करना चाहिए जब प्रोटीन की अधिकता होती है तो उसका संचय होना शुरू हो जाता है। हमारे शरीर में अम्लता की बुद्धि, खट्टी डकार, रक्त संचालन में बाधा पडना, रक्तचाप बढ़ जाने से जोड़ों में दर्द, गठिया, यकृत व गुर्दे खराब होना, रक्त दूषित हो जाना, त्वचा रोग, कैंसर ,हृदय रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
प्रोटीन से मिलने वाले स्रोत;
मांस ,मछली, अंडा,द्विवल अन्न, जैसे -चना ,मटर ,मूंग ,उड़द, अरहर ,तेल ,सोयाबीन, हरी साग सब्जी ,फल ,मेवा ,गेहूं ,चावल दूध, दही, पनीर ,नारियल आदि प्रोटीन के स्रोत है।
कार्बोहाइड्रेट् (श्वेतसार)
यह भोजन का मुख्य अंग है भोजन का दो तिहाई भाग इस से युक्त होता है इसका पाचन में लार के साथ ही शुरू हो जाता है।
कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता;
कार्बोहाइड्रेट शरीर को ताप्ती और शक्ति की उपलब्धि कराता है तथा शरीर में चर्बी का निर्माण करता है शारीरिक श्रम करने वाली व्यक्ति को इस की अधिक आवश्यकता होती है शरीर की सारी ऐच्छिक कि वह अनैच्छक क्रियाओं के लिए गति शक्ति प्रदान करता है।
कार्बोहाइड्रेट के अभाव से;
कार्बोहाइड्रेट क्या भाव से शरीर में आलस्य उत्साह इनका थकान कमजोरी शरीर में शक्ति व कर्मी की कमी महसूस होती है।
कार्बोहाइड्रेट की अधिकता से;
शरीर में कार्बोहाइड्रेट की अधिकता होने पर यह भाषा के रूप में परिवर्तित होकर आमाशय आठ इत्यादि रोगों एकत्र होकर मोटापा पेनक्रियाज पर अधिक इंसुलिन पैदा करने का बोझ डालता है। इसके निरंतर सेवन से मधुमेह दांत हड्डियां दुर्बल बडी आंत में विकार, गैस,कोष्ठबदद्वता, स्लेष्मा इकट्ठा होने के कई भयंकर रोग पैदा हो जाते हैं।
कार्बोहाइड्रेट मे मिलने वाले स्रोत;
फलों ,सब्जियों की शकर्रा, मुनक्का, शहद ,खजूर ,दूध और किशमिश, गेहूं ,चावल, साबूदाना ,आलू ,शकरकंदी ,शक्कर, गन्ने का रस ,जौ, बाजरा ,ज्वार ,सिंघाड़ा ,चुकंदर ,नारियल, आदि के सेवन से कार्बोहाइड्रेट प्राप्त कर सकते हैं।
कार्बोहाइड्रेट की दैनिक आवश्यकता;
प्रतिदिन कार्बोहाइड्रेट 400 ग्राम काब्रोज वाली पदार्थ ले सकते हैं।
वसा (fat)
वसा में कार्बोहाइड्रेट से दुगनी शक्ति में गर्मी प्रदान करने की क्षमता होती है। इससे शरीर चिकना सुडौल व सुदृढ़ बनता है। हृदय की मांसपेशियों को मुख्यता यही ऊर्जा प्रदान करता है। विटामिन ए ,डी, ई व के जो इसमें विलीन हो जाते हैं उसकी शरीर में जहां जरूरत होती है उसी जगह पहुंचते हैं। त्चाव के नीचे वसा में उसको में चर्बी के रूप में संग्रहित होकर सर्दी में शरीर का तापमान संतुलित करती है पर गर्मी में यही तत्व कष्टदायक हो जाता है। आंतरिक अवयवों विशेषकर हृदय गुर्दे के चारों ओर जमा होकर संरक्षण व स्थिरता प्रदान करता है। आकस्मिक आघात से शरीर की यथाशक्ति रक्षा करता है। भोजन को स्वादिष्ट बनाती है कार्बोहाइड्रेट के साथ मिलकर क्षुदा संतुष्टि की अनुभूति कराती है।
वसा के अभाव से ;
शरीर में चिकनाई के अभाव से भोजन से संतुष्टि नहीं होती। बराबर लगी रहती है शरीर को उचित पोषण नहीं मिलता त्वचा में रूखापन आ जाता है सारी तापक्रम साधारण नहीं रहता।
वसा की अधिकता से ;
वर्षा की अधिकता हृदय धमनियों उधर एवं अन्य स्थानों में एकत्रित होकर सारी दैनिक कार्यों में बाधा पहुंचाती है। धमनियों में कोलेस्ट्रोल जमने से उसका मार्ग संकरा हो जाता है। रक्तचाप बढ़ने से हृदय पर अनावश्यक दबाव बढ़ जाता है। शारीरिक श्रम करने वालों को वसायुक्त आहार लेना चाहिए किंतु मानसिक श्रम करने वालों को वृद्ध कमजोर मंदागिनी मधुमेह रोग वालों को वसायुक्त पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। शरीर घंटा मोटापा आई छूट होती है मोटी स्त्रियों में बांझपन भी हो सकता है।
वसा प्राप्ति के स्रोत;
वनस्पति जन्य वसा -तेल, मूंगफली, अखरोट ,काजू ,बादाम, चिलगोजा ,जैतून, सोयाबीन ,तेल ,सरसों।
प्राणी जन्यवसा; घी ,मक्खन, क्रीम, दूध, मलाई, पनीर ,पशु, चर्बी, चर्बी मछली का तेल।
वसा की दैनिक आवश्यकता;
प्रतिदिन 40 से 60 ग्राम वसा शरीर के लिए पर्याप्त है। शरीर में पाचन पक्वाशय से छोटी आंत पर पूरा होता है।
खनिज लवण;
हमारे शरीर के लिए आवश्यक लवण खाद्य पदार्थों से प्राप्त होते। खाद्य पदार्थ जब प्राकृतिक रूप में खाए जाते हैं तभी शरीर में स्थित लवणों का पूरा पूरा लाभ उठा पाता है क्योंकि अधिक पकाने से यह लवण नष्ट हो जाते हैं। यह लवण पानी में घुलनशील होते हैं अतः खाद्य पदार्थों को उबालकर उनका पानी फेंक देने से शरीर को उनके लाभ से वंचित होना पड़ता है।
आवश्यकता खनिज लवण की;
खनिज लवण शरीर के शोधन संरचना एवं विकास के लिए आवश्यक है। सोडियम पोटैशियम क्लोराइड फास्फेट आदि चार प्रकार के लवण पाए जाते हैं। लोड 24 होते हैं जिनमें से कैल्शियम लोहा मैग्नीशियम पोटेशियम तथा सोडियम क्षारोत्उपादक उत्पादक होते हैं। कैल्शियम फास्फोरस लोहा आयोडीन सोडियम पोटैशयम क्लोरीन हमारे लिए अधिक महत्व रखते हैं। शरीर के अनगिनत को सालों में से प्रत्येक का निर्माण लवणों से होता है। यह तंतु किस तरलता को अत्यधिक अम्ल एवं छार होने से बचाते हैं और स्नायु तंत्र तथा स्नायु केंद्रों की उत्तेजना के संतुलन को बनाए रखने में सहयोग करते हैं। यह हृदय की मांसपेशियों के संकुचन के कार्य में भी योगदान देते हैं।
लवण प्राप्ति के स्रोत;
यह लवण अनाज के चोकर ,चावल के कण ,फल ,दालों व सब्जियों के छिलकों के ठीक नीचे ,विशेष रूप से पाए जाते हैं। धरोष्ण दूध, धनिया पुदीना आदमी खनिज लवण के प्रमुख स्रोत।
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कैल्शियम हड्डियों का सत्व है हड्डियों को बनाने बढ़ाने ठोस व सुदृढ़ करने दातों की रचना मस्तिष्क व त्वचा के निर्माण आमाशय रस रक्त में थक्का बनाना आदमी ,बच्चों, में गर्भवती और दूध पिलाने में स्त्रियों को कैल्शियम की अधिक आवश्यकता होती है यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है रक्तचाप को संतुलित रखने के लिए किस की आवश्यकता होती है।
कैल्शियम के अभाव से होने वाले रोग;
कैल्शियम की कमी से शरीर का विकास रुक जाता है। दांत व हड्डियां कमजोर टेढ़ी व टूटने की आशंका रहती है। बच्चों में रिकेट्स वयस्कों में ओस्टियो मलेशिया वृद्धों में ओसयोपोरोसिस रोग हो जाता है। दांत उखाड़ने लगते हैं सूखा रोग होने का खतरा रक्त में थक्का नहीं जमता मूत्र में फास्फेट आना , आंतों क्रीमी अधिक रक्तस्राव होना, आदि रोग हो जाते हैं। ह्रदय गति में विच्छेद, स्नायु दुर्बलता, मांसपेशियों में अकड़न ,सुरसुराहट आदी रोग हो जाते हैं।
कैल्शियम प्राप्ति के स्रोत;
गाजर, चुकंदर, पत्ता गोभी ,दूध ,पालक ,मेथी ,बथुआ, चंद्र लाई, तेल ,खजूर ,पानी, सोयाबीन ,राजमा ,रागी, सूखे मेवे, चोकर सहित आटा ,सभी अनाज, दालें ,मांस, मछली, हरी सब्जियां ,फल आदि।
फास्फोरस;
सिम के साथ मिलकर फास्फोरस हड्डियों और दातों को सुदृढ़ और मजबूत बनाता है। शरीर कोष में शक्ति का संचार करता है मस्तिष्क को सदा तरोताजा व चैतन्य रखता है। स्नायु नाड़ी संस्थान को सशक्त क्रियाशील बनाता है। धमनियों में रक्त संचार सुचारू करता है बालों को काले व चमकदार बनाता है।
फास्फोरस के अभाव से होने वाले रोग;
फास्फोरस के अभाव से मस्तिष्क कमजोर हो जाता है ,अतः मानसिक थकावट के अनुभूति ,याददाश्त में कमी, बाल झड़ना, बाल सफेद होना ,स्नायु की दुर्बलता ,वजन घटना ,शरीर की तेज हीनता, हड्डियों एवं दातों का उचित विकास नहीं होना, आदि रुक हो जाते हैं।
फास्फोरस प्राप्ति के स्रोत;
प्याज ,नींबू ,टमाटर, गाजर, रसभरी ,जामुन ,अमरूद ,अनार, सेब ,पपीता ,पका कटहल ,नारियल ,फलियां, तरबूज, बेर, अखरोट ,बादाम ,इमली ,आलू ,लहसुन, अंजीर ,खजूर, किशमिश ,पिस्ता, आलू ,पनीर, पता फूलगोभी ,खीरा, ककड़ी, मूली, पालक, दाले ,गेहूं, जौ ,बाजरा, मूंग, दूध आदि।
आयरन या लोहा;
इससे रक्ताणुओ में वृद्धि, हीमोग्लोबिन का निर्माण, सारिरीक क्रियाओं के करने की शक्ति प्राप्त होती है। यह अक्सीजन कोई का स्थान से दूसरे स्थान ले जाने की तंतुओं के स्वास प्रस्वास क्रिया में सहायक है। यकृत को बल देता है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की इसकी आवश्यकता अधिक होती है। आयुक्त खाद्य के सेवन से शरीर की जीवन शक्ति बढ़ती है। इससे भूख लगती है रक्त शुद्ध बनता है गाल नाखून होठों पर लाली छा जाती है एवं शरीर की कांति बढ़ती है।
आयरन के अभाव से होने वाले रोग;
लोहा तत्व के अभाव से हिमोग्लोबिन का अभाव रक्त कणों की कमी ,रक्त हीनता, कमजोरी ,थकावट ,भूख की कमी, सांस उठने व हृदय धड़कन की शिकायत, आंखें निस्तेज ,आंखों की पलकों में लाली की कमी ,चेहरा पीला, नाखून सफेद, हाथ पांव पर जलजमाव के कारण सूजन, जीवन शक्ति का ह्रास, रोग प्रतिरोधक शक्ति में कमी ,चिड़चिड़ापन आदि रोग हो जाते हैं।
आयरन प्राप्ति के स्रोत;
पालक ,खुबानी, खजूर, किशमिश ,सोयाबीन ,काली गाजर, धनिया पत्ता ,गोभी ,हरी पत्ते वाली सब्जियां ,चोकर, बथुआ,
चौड़ाई, मूंगफली ,मेवा ,फालसा, करौंदा, नींबू ,अमरूद ,लौकी, पपीता ,अनानास ,सोयाबीन ,गेहूं ,चावल, बाजरा ,उड़द, मूंग, मसूर ,अरहर आदि।
आयोडीन;
शरीर में उत्पन्न होने वाले विषाक्त पदार्थों को मस्तिष्क की आक्रांता होने से बचाता है। विभिन्न ग्रंथियों का पोषण शरीर को स्थूल व घेंघा होने से बचाता है। कोलेस्ट्रोल के निर्माण को नियमित करता है। गल ग्रंथियों के लिए जरूरी है। त्वचा बाल नाखून को स्वस्थ रखता है। शरीर की सुंदरता बौद्धिक विकास के लिए आवश्यक है।
आयोडीन के अभाव से;
आयोडीन क्या भाव से चिल्ली क ग्रंथि बढ़ जाने से घेंघा रोग हो जाता है। बच्चों में अगर आयोडीन की कमी हो जाती है तो शारीरिक मानसिक विकास रुक जाता है। बच्चों की चमड़ी मोटी खुरदरी हो जाती है चेहरे और शरीर पर सूजन त्वचा पर झुर्रियां चेहरा भावहीन रोगी आलसी व सुस्त जाता है। मोटापा गलगंड बाल सफेद व झड़ने लगते हैं। पेंशन शक्ति जीवन शक्ति की कमी हो जाती है।
आयोडीन की प्राप्ति के स्रोत;
सब्जियों फलों के छिलकों के ठीक नीचे होता है। अनानास, गाजर ,प्याज, लहसुन ,जीरा, कमलगट्टा ,सिंघाड़ा, लेटिस सेब, केला ,नाशपाती, दूध, मक्खन, पालक ,टमाटर ,आलू, फूलगोभी, चुकंदर, मछली, संपूर्ण अनाज ,कांस्ठज फल, मूंगफली, मूली ,सलाद पत्ता।
सोडियम;
कैल्शियम और मैग्नीशियम उसके संयोग से घुलकर शरीर को लाभ पहुंचाते हैं। यह पाचक रसायन और रक्तशोधक है। इसके सारे शरीर में लोहा लवण अपना कार्य करते हैं। थूक, पित्त क्रलोमरस की रचना में ,इसका विशेष महत्व है। कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन के लिए आवश्यक है रक्त की अम्लता को सामान रखता है तथा रक्त को गाढ़ा होने से बचाता है। तत्व विशेषकर ग्लूकोस की कोशिकाओं में प्रविष्ट कराने में सहायक होता है।
सोडियम के अभाव से;
किडनी वह मेदे के रोग, मधुमेह अपच पेट फूलना पित्त की कमी मांस पेशियों में कठोरता बहरापन मोतियाबिंद अत्यधिक उल्टी या दस्त में इसका अधिक विकास हो जाता है पाचन प्रणाली में खराबी वजन घटना पेट में ऐठन व साधारण कमजोरी शरीर में पानी कम रुकना आदि।
सोडियम प्राप्ति के स्रोत;
ताजे फल, सब्जियां ,अंगूर ,तरबूज, खीरा ,ककड़ी ,गाजर, नारियल ,भिंडी, आलू, अजवाइन के पत्ते ,मूली ,फूल गोभी, पत्ता गोभी ,शलजम ,प्याज की पत्तियां, पालक, चुकंदर, अंजीर, खजूर ,किशमिश ,दूध ,पनीर ,अंडा, खाने वाला सोडियम युक्त नमक, सेब केला।
विटामिन;
आयुर्वेद में विटामिन का उल्लेख नहीं है क्योंकि विटामिन की खोज बीसवीं शताब्दी के शुरू में हुई थी। हिंदी भाषा में इसको खाद्य प्राण, कहते हैं। विटामिन की डिब्बी मानता का सर्वप्रथम पता 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में अंग्रेजी जहाज यात्रियों से लगा था। जहाज पर सीमित खाद्य होने की वजह से भोजन संबंधी अनेक गड़बड़ियों के कारण जहाज यात्री रोग ग्रस्त हो जाते थे। 1747 में हंगरी के सैनिक सर्जन लिटिल जेम्स लिंड नॉर्वेजियन सर्जन होल्स और फोलिस आदि ने इस दिशा में सराहनीय खोज की। जहाज यात्रियों को ताजा फल सब्जियों के अभाव में वेरी-वेरी बस कर भी रग हो जाते थे। तब उनको ताजे फल सब्जियां खाने को दी गई तब वह पूरी तरह स्वस्थ हो गए। तथ्य की पुष्टि हुई कि प्राकृतिक भोजन में कोई ऐसा तत्व जरूर पाया जाता है जिसका प्रयोग स्वास्थ्य रक्षा एवं रोग निवारण के लिए आवश्यक है। खोज के लिए डॉक्टर इक मैन को 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। तभी से विटामिन की चर्चा वह उसका विस्तार अधिक हो रहा है। 15 वर्षों में खाद्य विशेषज्ञों ने 15 से 20 विटामिन खोज निकाले हैं।
विटामिन की परिभाषा;
विटामिन सूक्ष्म परंतु अधिक शक्तिशाली रासायनिक तत्व जिसे आंख से देख कर नहीं बल्कि नित्य प्रयोग करके उससे हुए लाभ से अनुभव किया जा सकता है। यह विटामिन भोजन पदार्थों में उसके प्राण रूप में स्थित होते हैं ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमें हमारे शरीर में जीवन शक्ति विद्यमान रहती है।
विटामिन की आवश्यकता;
विटामिन न तो छतिपर्ति करते हैं नहीं ऊर्जा का उत्पादन
इनको शरीर के संरक्षक या उत्प्रेरक का दर्जा दिया जा सकता है। के प्रयोग से शरीर की अनेक क्रियाएं संक्षिप्त रूप से होती रहती है। यह रोगों को रोकथाम करते हैं रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास करते हैं शरीर को स्फूर्ति और सुचारू रूप से चलाने का काम करते हैं इसीलिए इनकी आवश्यकता अधिक होती है। अच्छे स्वास्थ्य व शारीरिक विकास के लिए इनका होना आवश्यक है।
विटामिन को मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:-
वसा में घुलनशील विटामिन:-
विटामिन ए विटामिन डी विटामिन ए और विटामिन के वसा में घुलनशील विटामिन है।
पानी में घुलनशील विटामिन:-
विटामिन सी तथा विटामिन बी वर्ग के विटामिन पानी में घुलनशील होते हैं।
Vitamin "a" :-
विटामिन ए वसा में घुलनशील होने से शरीर में संचय किया जा सकता है। शरीर के उचित विकास एवं वृद्धि के लिए बहुत ही आवश्यक तत्व है। हड्डियों को बनाने में वृद्धि करने संक्रामक रोगों से बचाव और रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि पाचन क्रिया को ठीक रखने स्वसन तंत्र एवं अन्य तत्वों को श्लेष्मा झिल्ली की कोशिकाओं त्वचा नेत्रदान नाक कान और गले को स्वस्थ रखने रात में दृष्टि शक्ति बढ़ाने कैल्शियम के शोषण आदि के लिए परम आवश्यक है।
विटामिन के अभाव से होने वाले रोग :-
विटामिन ए की कमी से रतौंधी अंडा नेत्र रोग मोतियाबिंद त्वचा रोग हो जाते हैं इसके अभाव में श्लैशमिक क्षिल्लियो में संक्रमण के निवारण की शक्ति में कमी हो जाने से नजला जुकाम खांसी श्वास रोग निमोनिया बदहजमी अतिसार आंत्र रोग आदि रोग हो जाते हैं। पथरी दांत के एनिमल की कमजोरी के कारण से ठंडा गर्म पदार्थ लगना किडनी रोग मूत्राशय के रोग बालकों की बुद्धि रुकना व अविकसित दांत गलगंड रोग वजन घटना प्रसूति जोर व त्वचा में खुश्की व रक्त की कमी बहरापन लाल ज्वर हृदय रोग स्नायु दुर्बलता स्कर्वी, रिकेट्स, बाझपन, बाल गिरना, नाखून टूटने ,इत्यादि रोग हो जाते हैं।
विटामिन की अधिकता से;-
अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से विषैला प्रभाव डालता है। सिर दर्द हड्डियों में सूजन व दर्द त्वचा में खुजली व काले दाग भूख की कमी नीत की अधिकता यकृत में वृद्धि आदि रोग हो जाते हैं।
विटामिन ए प्राप्ति के स्रोत :-
दही ,दूध, मक्खन, गाजर ,पालक, फूल व पत्ता गोभी ,धनिया, पुदीना, कद्दू ,पपीता, पका मीठा आम, हरे पत्ते वाली सब्जियां, अरबी ,चौराई, मीठा नीम ,सरसों का साग, खुबानी, संतरा, पानी, चने का साग, बथुआ का साग ,आंवला ,रसदार मीठे फल, बेल ,शकरकंद ,अनानास, सहजन, अंगूर ,नाशपाती, अमरुद ,कटहल, बेर, सेब ,केला ,खजू,र आलू, या इमली, कमरख ,आडू ,लेटिस, हरी मटर ,मूली ,प्याज ,हरी मिर्च, करेला, तोरई ,अंकुरित चना ,गेहूं, चावल ,बाजरा, बैगन, लहसुन, भिंडी ,खीरा ,ककड़ी ,चुकंदर ,सिंघाड़ा, क्रीम ,अंजीर, पिस्ता ,अरहर ,मसूर ,अजवाइन की पत्तियां, मुनक्का, सोयाबीन, अंडे की जर्दी, मछली का तेल ,व मांस आदि।
विटामिन" बी";-
विटामिन b1 ,विटामिन b2 ,विटामिन b3 ,विटामिन बी 6, विटामिन b12, आदि विटामिंस का सामूहिक नाम विटामिन बी ही है। विटामिन पानी में घुलनशील होते हैं इसलिए आवश्यकता से अधिक मात्रा में सेवन से पेशाब द्वारा शरीर से निष्कासित हो जाते हैं।
विटामिन b1 आई मीन यह कार्रबोज के पाचन सारीरिक वृद्धि व पाचन क्रिया में सहायक है। भूख बढ़ाने रोगों से रक्षा करना मां के दूध में वृद्धि ज्ञान तंतुओं व स्नायु की शक्तिशाली बनाना। यकृत हृदय व त्वचा को स्वस्थ व सजग रखने के लिए आवश्यक है।
विटामिन बी वन के अभाव में वेरी वेरी रोग ,शारीरिक और मानसिक दुर्बलता, मांसपेशियों में कमजोरी आने से चलते फिरने में मुश्किल ,भूख में कमी, अपच, स्रनायु विकार, पेट के रोग ,नेत्र रोग ,बालों का झड़ना, नकशीर, जननेंद्रिय से रक्त जाना ,घबराहट ,मधुमेह ,दमा, लकवा ,गठिया ,श्वेत कुष्ठ, पागलपन ,जच्चा को दूध ना होना ,मोतियाबिंद ,कब्ज, मानसिक थकावट ,तुरंत निर्णय नहीं ले पाना ,हाथ पांव की तंत्रिकाओं में दर्द ,कमजोरी आदि रोग हो जाते हैं।
कण सहित चावल ,चोकर सहित आटा ,ज्वार जाओ छिलके सहित सभी डाले अंकुरित अनाज मटर सोयाबीन हरे पत्ते वाली सब्जियां और विशेषकर प्याज पालक मेथी चंद्र लाई पत्ता व फूलगोभी । शलजम शकरकंद चुकंदर केला पपीता आम बादाम मूंगफली काजू किसमिस अखरोट दूध पनीर सोयाबीन तेल मसूर अरहर अरबी ककड़ी मेथी चन्द्र लाई, टमाटर ,पुदीना, नारंगी, अंगूर, आम ,नाशपाती, आलू ,केला ,खीरा, अमरूद, लीची, चकोतरा, इमली, नींबू, सेब, पपीता, तोरई ,मूंग ,अखरोट मुनक्का ,अंजीर ,खजूर आदि। चावल को अधिक मसलकर नहीं धोए व सब्जियों को कम पानी में धीमी आंच पर पकाएं।
विटामिन "b2":-
यह गर्मी से नष्ट नहीं होता लाइव को सशक्त करता है तो चाकू क नाखूनों को चमकीला व स्वस्थ बनाता है। शारीरिक विकास में सहायक है मोतियाबिंद को रोकता है।
इसके अभाव से रक्त विकार सफेद दाग होठ फटना जीव का शूज कराना त्वचा का चटकना मुंह में छाले रक्त हीनता पेट के रोग तिल्ली जननेंद्रिय रोग पेट का तपेदिक दमा बहुमूत्र स्नायु रोग गर्भवती को उल्टी चाचा को दूध ना होना या कब होना थकावट अरुचि पक्षाघात मोतियाबिंद बेरी बेरी आदि।
जिन चीजों में विटामिन b1 की प्राप्ति होती है उन्हीं से विटामिन b2 भी मिलता है।
विटामिन b3 नियासिन:-
यह त्वचा को स्वस्थ व रोगमुक्त रखता है नाड़ी संस्थान स्वस्थ व क्रियाशील व शक्ति प्रदान करता है। शरीर के तापमान को संतुलित रखना रक्त प्रवाह को ठीक रखना आंतों को निरोग और सशक्त बनाना शरीर का वजन बढ़ाना आदमी लाभकारी होता है या बालों को सफेद होने से रोकता है।
इसके अभाव से पेलाग्रा नामक रोग हो जाता है ।जीभ पर छाले तालु मसूड़ों और दांतों की श्लैष्मिक झिल्ली दिल्ली पर सूजन भूख में कमी शरीर निर्मल पेट में कीड़ी दस्त अनिद्रा भुलक्कड़ पर पक्षाघात मानसिक विक्षिप्त ता कमर व सिरदर्द आदि रोग हो जाते हैं।
खमीर छिलके सहित अनाज मूंगफली ताले अंकुरित अनाज सोयाबीन अंडा मांस कुछ मात्रा में दूध व हरी सब्जियां आदि इसके प्राप्ति के स्रोत है।
विटामिन बी सिक्स पायरीडाक्सिन;-
यह हिमोग्लोबिन बनाना एंटीबॉडी तैयार करना स्नायु का शिथिलता स्नायु व मस पेशी तंतु को स्वस्थ रखता है।बालों को स्वभाविक रखना त्वचा स्वस्थ रखना शरीर का वजन सामान्य रखना तक मसूड़ों व किडनी को स्वस्थ रखना गर्भावस्था में प्रातः काल की मितली एठन आदि में सहायक है।
इसके अभाव से पाचन क्रिया तथा भूख में कमी वजन घटना सत्य की कमी कब्ज कमजोरी क्लोन ग्रंथि श्लैष्मिक झिल्ली शुद्ध यकृत उदर और चुल्लिका ग्रंथि में वृद्धि तथा मस्तिष्क में जड़ता आती है। गर्भवती के प्रायर उल्टियां त्वचा और बालों की परेशानी आदि रोग हो जाते हैं।
यह विटामिन गेहूं चावल की ऊपरी परत अन्य अनाजों एवं डालो मटर मूंगफली कमी व सब्जियों में तथा अल्प मात्रा में दूध में पाया जाता है।
विटामिन" b12 "कोबालमिन;-
यह विटामिन लाल रक्त कणों को मजबूत बनाता है कार्बोहाइड्रेट का पाचन करता है शारीरिक वृद्धि करता है ब्लास्ट इसको व तत्रिका कोशिकाओं को ऊर्जा प्रदान करता है। उपयुक्त मात्रा में गुलकोज की उपस्थिति बच्चों की वृद्धि के लिए आवश्यक।
विटामिन b12 की कमी से जिह्वा पर सूजन स्वाद में खटास अंगूठी अंगूठी में चेतना हीनता मेरुदंड में विकृति रक्त हीनता भुजाओं में कड़ापन आंशिक पक्षाघात थकान कमजोरी मंदाकिनी स्मरणशक्ती कम होना नेत्र ज्योति घटना आदि रोग हो जाते हैं।
दूध पनीर गाजर पालक मेथी सोयाबीन अंडे मछली कलेजी आदि भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
विटामिन "सी";-
यह पानी में घुलनशील है सब्जियों की उबले पानी को फेंकना नहीं चाहिए अन्यथा इसके गुणों से शरीर वंचित रह जाता है। संक्रामक रोगों से बचाता है लागली श्वास नली गांव की कोशिकाओं को जोड़ता प्रदान करता है जिससे बार-बार नजला जुखाम ना हो। दांत के रोगों से बचाता है त्वचा को सशक्त व सुंदर बनाता है हड्डियां दांत मसूड़ों की सुरक्षा और मजबूत करता है। छोटा ऑपरेशन हड्डी टूटने पर क्षतिपूर्ति करता है। आयरन का अवशोषण करने में सहायक सच रक्त धमनियों की भित्तियो पर कोलेस्ट्रॉल के जमाव को रोकता है।
विटामिन सी के अभाव से मसूड़े फूल जाते हैं उनमें रक्तस्राव होना बंद हो जाता है दांत ढीले हो जाते हैं दंत प्रतियां वितरित हो जाती हैं, जोड़ों में सूजन आ जाती है, हाथों में छाले पड़ जाते हैं रक्त में विकार आ जाता है अस्थि रोग हो जाता है गठिया बाद जोड़ों में सूजन चर्म रोग मुख से दुर्गंध, रक्तचाप बढ़ना, लकवा, गर्भवती के सुस्ती ,पीलिया ,थकावट ,भूख में कमी, दम फूलना, नजला ,जुकाम ,स्कर्वी आदि रोग हो जाते हैं।
खट्टे फल ,नींबू ,आंवला ,संतरा ,पपीता ,अमरूद, अनानास, टमाटर, अंकुरित अनाज ,पत्ता गोभी, धनिया ,शसजन, चौराई, जामुन ,फालसा ,बेल ,मौसमी ,पालक ,हरी मिर्च, मूली के पत्ते, काहू की पत्तियां ,गाजर ,आलू ,बैंगन ,प्याज ,टमाटर ,मटर, पुदीना ,चुकंदर ,ककड़ी, तरबूज ,चकोतरा, लीची ,इमली, खीरा, रसभरी अंगूर ,अमरूद ,अदरक ,आदि विटामिन सी के खजाने है।
विटामिन "डी";-
इसके शरीर विकसित सुडौल और सुंदर बनाता है। हड्डियों का निर्माण करता है और कैल्शियम को हड्डियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दांत की सफेदी मजबूती बालों में वृद्धि में सहायक है इसके भाव से कैल्शियम फास्फोरस का उपयोग नहीं हो सकता।
विटामिन डी की कमी से स्नायु व मांसपेशियां भी दुर्लभ हो जाती है अन्य संक्रामक रोग उत्पन्न होने लगते हैं। सूखा रोग पर्दे में रहने वाली स्त्रियों में अस्थिमृदुता, शक्ति का ह्रास श्वेत प्रदर संधिवात मधुमेह क्षय, निमोनिया हृदय रोग हिस्टीरिया आदि रोग जाते हैं।
आधा घंटा धूप में बैठना टहलना या मालिश करने से दैनिक विटामिन डी की आवश्यकता पूरी हो जाती है। भोजन को कुछ देर धूप में रखने से उसमें विटामिन डी की उत्पत्ति हो जाती है सूर्य किरणों में विद्यमान पराबैंगनी किरणों से त्वचा के नीचे विशेष रासायनिक पदार्थ विटामिन डी में परिवर्तित हो जाते हैं। मक्खन नींबू टमाटर संतरा सरसों का साग आम केला बबी गोभी सहज सोयाबीन गाजर लेटिस प्याज पुदीना मक्का गेहूं का चोकर आदि से भी विटामिन डी की प्राप्ति होती है।
विटामिन" ई":-
इसकी उपस्थिति से पुरुष स्त्रियों में संतानोत्पत्ति की क्षमता उत्पन्न होती है। यह ह्रदय कैंसर व क्षय रोग से बचाता है। शारीरिक वृद्धि व मस्तिष्क चेतना देता है।
इसके अभाव से बांझपन नपुसंकता मां को दूध न होना पुरुषों में वीर्य विकार शक्ति हीनता फोड़े फुंसी रीडर व छह रोग आदि। चिलिका ग्रंथि का स्राव ठीक नहीं होता। समय से पूर्व बच्चे का जन्म होने पर बच्चे की मृत्यु में दमा पुरानी कब्जा समय वृद्धावस्था जीवन शक्ति का ह्रास आदि रोग हो जाते हैं।
सोयाबीन मूंगफली बिनौला तथा गेहूं के अंकुर व नारियल आदि का तेल खड़ा मेवा अंडे की जर्दी टमाटर सूर्यमुखी के बीज चोकर सहित आटा पनीर सहज गुण अलसी मक्खन दूध नारियल लहसुन पालक मटर पत्ता गोभी प्याज सलाद चुकंदर की पत्तियां अखरोट केला तथा ताजे फल व हरे पत्तेदार शाक आदि।
विटामिन "के":-
यह रक्त स्राव को रोककर जमाने का कार्य करता है। ग्लूकोज की कोशिकाओं की झिल्ली में प्रवेश कराने में और ग्लाइकोजन में परिवर्तित करने में सहायक है। ऑपरेशन में बच्चे के जन्म से 2 सप्ताह पहले गर्बनी को प्राप्त मात्रा में दिया जाता है। विटामिन के पिता द्वारा आंतरिक दीवारों में पहुंच जाता है।
पीलिया रक्तस्राव यस का शीघ्र बंद ना होना आंतों के रोग इसके अभाव से हो जाते हैं।
टमाटर सोयाबीन हरी सब्जियां कर्मकल्ला आलू गेहूं का चोकर अंडे की जर्दी दूध मक्खन गोभी चुकंदर गाजर चना मटर दाल ए आदि भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
कृतिम विटामिन चिकित्सा की भ्रांतियां ;-
सारे विश्व में स्वास्थ्य का अर्थ डॉक्टर अस्पताल द माइटी के इंजेक्शन दवा बनाने वाली कंपनियां दवाइयों की दुकानें आदि से ही जुड़ा है। चाहे गांव के अशिक्षित लोगों या उच्च वर्ग के शिक्षित शहरी लोग आधुनिक दवाओं और एलोपैथिक को ही एक मात्र वैज्ञानिक पद्धति और शिक्षा स्वास्थ्य प्रदान करने वाला मानते हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा जो समृत पुरातन विज्ञान है उसकी उपेक्षा हो रही है यह पद्धति कहती है कि" प्रकृति ही चिकित्सक है, प्राकृतिक आहार ही औषधि है, दवा नहीं आंवल नींबू संतरा गाजर खाओ"। प्राकृतिक चिकित्सा कहती है सूर्य जल पानी मिट्टी हवा ही औषधि और चिकित्सक है। लोगों को भ्रम है कि और सभी हीरो कौन से लड़ती है और बचाती है। बल्कि लोगों को यह विचार करना चाहिए कि हमारे शरीर में विद्यमान जो रोग प्रतिरोधक शक्ति है हमारी प्राणशक्ति है उसे कैसे उन्नत व शक्तिशाली बनाया जाए। यह ना सोच कर लोग रोग होने पर भयंकर जहर को खाकर मरने के प्रयास में लगे हुए हैं। प्रकृति के स्वस्थ रहने के नियमों को न अपनाने पर जीवन शक्ति कमजोर पड़ जाती और अप्राकृतिक आहार-विहार के कारण शरीर में जहर जमा होती जाते हैं। उनका शोधन ना करके एंटीबायोटिक एंटीसेप्टिक या सीरम इत्यादि का प्रयोग करने से शरीर में जटिल में गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
आजकल जरा जरा सी बात पर स्वयं वह बच्चों को लेकर डॉक्टर के पास भागते हैं दवाई खिलाते हैं जो दवाइयां हम खाते हैं उनके साइड इफेक्ट और टॉक्सिन इफेक्ट अवश्य होते हैं। इनसे जो रोग दूर होते हैं उनके स्थान पर उन दवाओं के साइड इफेक्ट नई तथा जटिल बीमारियां पैदा हो जाती है। इनसाइक्लोपीडिया ऑफ अमेरिका में इन औषधियों के संबंध में लिखा है:-कीटाणु नाशक औषधि सीरम एवं इंजेक्शन न केवल हमारे रोगों को दूर करने में असमर्थ है बल्कि सुखी जीवन के लिए भी अभिशाप है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनेक दवाओं के दुष्परिणाम और हानिकारक प्रतिक्रिया को देखकर एवं उनके प्राणघातक होने के कारण उनकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। किंतु भारत में खुलेआम ऐसी दवाइयां बिकती है भारत ने मधुमेह में दी जाने वाली अधिकतर दवाएं हार्ड फेल होने का खतरा बढ़ाती है।
आंकड़ों के अनुसार बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में प्रतिबंधित दवाएं बेच कर दो हजार करोड़ से अधिक कर मुनाफा कमा रही है। सर्वेक्षण से पता चला है कि 25 पणघातक दवाओं के सेवन से रोगी ठीक होने के बजाय मौत के मुंह में जा रहे हैं। इन दवाओं से कैंसर अंधापन लकवा विकलांगता जैसी गंभीर रोगों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है।
सरकार भी टीकाकरण को काफी प्रोत्साहन दे रही है पर इस बात पर विचार करने आवश्यक है कि इनकी अनिवार्यता है या नहीं। सारा शरीर पहले से ही अन्य फल सब्जी की फसल में प्रयोग होने वाले घातक रासायनिक खाद व छिड़काव प्रदूषित जल वयु द्वारा विषाक्त हो चुका है। प्रकृति ने शरीर से विश्व निष्कासन के अनेकों मार्ग गले नाक से बलगम त्वचा से पसीना मल मूत्र बनाए हैं और प्रकृति खुद भी 20 निष्कासन करती है पेड़-पौधों पौधों मे सूर्य द्वारा फिर यह जहरीले एंटीबायोटिक्स क्यों? हमें ऐसे जीवंत रोगाणु नाशक चाहिए जो शत्रु गानों को नष्ट करके मित्र कोषाणुओ की रक्षा करें। प्याज लहसुन हल्दी जैन रोगाणु नाशक है इनका मुकाबला दुनिया की कोई एंटीबायोटिक नहीं कर सकती सभी प्रकार के फल कच्ची हरी सब्जी में रोग जीवाणु नाशक रसायन होते हैं। रोग से लड़ने रोग दूर करने रोग से बचने के लिए प्रकृति के भंडार में तथा हमारे अंदर उत्तम वह निर्दोष साधन मौजूद है। किंतु फिर भी अनिवार्य टीकू के प्रयोग में होने वाली विषैली दवा ए हमारे रोग जीवाणु को मारने के साथ-साथ रक्षक जवानों को भी नष्ट कर देती हैं। आवश्यक जीवाणु को आहत व दुर्बल कर देती है। रूप शरीर की विशेषता को हटाते हैं। एंटीबायोटिक एंटीसेप्टिक सिरम शरीर की विषाक्तता को और बढ़ाते हैं।
हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अगर कोई आपातकालीन समस्या दुर्घटना हो तो आधुनिक चिकित्सा अति उत्तम है अन्यथा पर्याप्त मात्रा में ताजे फल सब्जियां प्राकृतिक रूप से खाने या मन आग पर पकाने और उनकी पानी ना फेंकने पर हमें सभी पौष्टिक तत्व मिल सकते हैं जिनसे शरीर की आवश्यकता पूरी हो सके। प्रकृति के नियमों पर चलने प्राणायाम व हल्के व्यायाम करने से हम पूर्ण स्वस्थ रह सकते हैं यह भ्रम है कि कोई भी रोग होने पर दवाइयां या विटामिन की गोलियां खाते रहने से शरीर की छत पुटी हो जाएगी और हम स्वस्थ हो जाएंगे। मुकाबला यह दवाइयां कभी भी नहीं कर सकती इससे को स्वीकार करना चाहिए।
फुजला" स्पोक":-
फुजला आहार का वह भाग जो बिना पूछे ही बल के साथ बाहर निकल जाता है।
भोजन में अन्य तत्वों की उपेक्षा फुजला का महत्व कम नहीं है। क्योंकि खाए हुए भोजन के बचे हुए अंश की सफाई पर्याप्त फुजला द्वारा हो जाती है। खाने से हमें प्राकृतिक स्वाद व पूरी मात्रा में विटामिन और खनिज लवण तो मिलते नहीं किंतु स्फोक पूरे परिणाम में मिलते हैं। जिससे सब रोगों का मूल मला वरोध सदैव दूर रहता है। पेट खराब हो अपच कब्ज हो उस दिन उनका भोजन बंद करके मूली गाजर सरसों या किसी भी साफ के हरे पत्ते खाने से 4 घंटे बाद खुलकर शौच हो जाएगा। इन्हें कच्चा खाएं यदि उबालने तो पानी भी पी जाए। गोभी को बिना पकाए कच्चे खाने से शरीर के कोषाणु बहुत शीघ्र बनते हैं।
फुजला के अभाव में आंतों में सड़न रक्त दूषित होना पथरी ह्रदय रोग चर्म रोग मोटापा गैस रक्त हीनता रक्त संबंधी रोग ब्लड कोलेस्ट्रोल आदि रोग हो जाते हैं। इसकी कमी से मांसपेशियों का व्यायाम नहीं हो पाता और ना पर्याप्त रक्त संचार हो पाता है। बदहजमी निर्बलता गठिया कमर दर्द आदि रोग हो जाते हैं।
गेहूं का चोकर चावल माड सहित छिलके सहित दालें सब्जियां व फल छिलके सहित सूखे मेवे इसबगोल अगर अगर अंजीर बेल अंगूर अमरूद नाशपाती रसभरी सेब केला नारंगी ककड़ी खीरा आलू टमाटर पालक लौकी आदि इसके प्राप्ति के स्रोत है।
इसबगोल हुआ अगर अगर को प्रतिदिन लेने की आदत नहीं डालनी चाहिए पर्याप्त मात्रा में उपरोक्त चीजों को 25 से 30 ग्राम की मात्रा में लेने से कुछ ही भी लेने की आवश्यकता नहीं है।
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