जब बहुत अधिक मात्रा में श्वेत सार (मैदा, चीनी, कणरहित , चावल, भिंडी ,अरबी) खा लिए जाते हैं तब भी बच नहीं पाते और दांतों में सड़न उत्पन्न करके रक्त को विषैला कर देते हैं। हिस्सेदार भोजन स्लेष्मा उत्पन्न करके आप तो हमारे फेफड़ों व श्वास नली में जलते जाते हैं। चिकनाई युक्त आहार आहार से मोटापा दमा खांसी आदि लोग पैदा हो जाते हैं। अत: रेसे युक्त फल ,साग सब्जी चोकर युक्त रोटी आदि खाना चाहिए, चिकनाई युक्त आहार का उपयोग कम करना चाहिए।
नमक का रासायनिक नाम सोडियम क्लोराइड है जो सोडियम क्लोरीन के मेल से बनता है। 80% नमक समुद्र के पानी को सूर्य की गर्मी से सुखाकर तैयार किया जाता है। सही में अन्य तत्वों के साथ साथ प्राकृतिक लवण का भी महत्वपूर्ण अंश है। शरीर के प्रत्येक अंग के किसी न किसी भाग नमक की आवश्यकता होती है। जैसी हड्डियों के लिए कैल्शियम रक्त के लिए लोहा मांस पेशियों के लिए फास्फोरस को संतुलित करने के लिए सोडियम क्लोराइड की आवश्यकता होती है।
हमें नमक साल हरी सब्जी पालक चने का साग मूली के पत्ते दूध अन्य से पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं। इनको लेते रहने से शरीर की अपेक्षित सभी खनिज लोगों की पूर्ति हो जाती है। मिट्टी में पाए जाने वाले नमक को सजीव में बदलने की पौधों में अनुपम शक्ति होती है। यह पौधे निजी तत्वों पर जीवित रहकर हमें सजीव तत्व प्रदान करते हैं।
डा.रिचेड़ तथा अन्य विशेषज्ञों के मतानुसार हमें नीत्य 3 से 4 ग्राम यानी एक चुटकी नमक की आवश्यकता होती है। इतना नमक नित्य के संतुलित आहार के खाधो में मिल जाता है। बाजारू नमक सजीव ना होकर निर्जीव है। या नमक शरीर में आत्मसात नहीं हो पाता तथा मल निष्कासन के कार्य में कठिनाई बढ़ा देता है। यदि इस कृतिम नमक की सामान्य मात्रा ली जाए तो शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा परंतु ज्यादा मात्रा लेने पर से शरीर से बाहर निकालने के लिए उत्सर्जन तंत्र पर अनावश्यक बोझ पड़ता है। एक स्वस्थ व्यक्ति के गुर्दे 1 दिन में 4 से 5 ग्राम से अधिक नमक बाहर नहीं निकाल सकते। शरीर के महत्वपूर्ण अंग गुरुदेव उचित मात्रा में सोडियम मिलते रहने से सक्रिय रहते हैं।
शरीर को जल तथा नमक की मात्रा मिली अत्यंत आवश्यक है। यह मात्रा अधिक हो जाती है तो पसीने वह मूत्राशय के माध्यम से शरीर के बाहर निकाल दी जाती है किंतु जिन व्यक्तियों के शरीर में सोडियम को विसर्जित करने की क्षमता नहीं रहती जिनके गुड्डे ठीक तरह काम करने योग्य नहीं रहते या शरीर किसी अन्य वजह से पूरा नमक निकालने में असमर्थ होता है तो बचा हुआ नमक शरीर के अंदर विषाक्त पदार्थ के रूप में भंडारित हो जाता है। सही में अधिक नमक पानी को रोके रखने की क्षमता को बढ़ा देता है परिणाम स्वरूप हाथ पैर मुंह या शरीर पर सूजन आ जाती है।
अधिक नमक से उत्तेजित होकर जब आमाशय ग्रंथियां अधिक स्राव करती है तो वे शिथिल हो जाती है तब मंदाकिनी हो जाती है। जिन लोगों को अधिक पसीना आता है या जो गर्म जलवायु में शारीरिक श्रम करते उनके पसीने दौरा नमक काफी मात्रा में निकल जाने से शरीर में दर्द व अकड़न हो जाती है। ऐसे लोगों को अपने आहार में नमक का उचित ध्यान रखना चाहिए। गर्मी में धूप में निकलने से पहले पानी में थोड़ा नमक कर घोलकर पीना चाहिए। उसे पसीने द्वारा पानी में नमक की कमी नहीं आएगी तथा किसी भी संभावित विकार से बचा जा सकता है। मांसाहारी की अपेक्षा शाकाहारी नमक ज्यादा खाते हैं क्योंकि फलों सब्जियों में पोटेशियम ज्यादा मात्रा में होता है तथा सोडियम कम मात्रा में।
प्राचीन काल में मिश्रा निवासी तेल के साथ नमक मिलाकर मृत पूर्वजों के शरीरों को परिलक्षित शव बनाने के लिए प्रयोग में लाते थे हम जीवित व्यक्तियों के शरीर को नमक और तेल के अत्यधिक प्रयोग से परिचित शव बना रहे हैं।
शरीर की हड्डियों को मजबूत बनाने में नमक मदद करता है। निम्न रक्तचाप होने पर तुरंत नमक का घोल पिलाना चाहिए। दीर्घकाल तक नमक का सेवन किया जाए तो दुर्बलता जाती है नमक का घोल पीने से स्फूर्ति आ जाती है। नमक के अभाव में शारीरिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। नमक यदि उचित मात्रा में लिया जाए तो जीवन प्रदेश जबकि अतिशय उपयोग किया जाने पर विषतुल्य है। नमक अमल के रूप में क्लोरीन आमाशय में पाचन रस का आवश्यक अंग होता है। नमक शरीर में अम्ल और छार का संतुलन बनाए रखने में सहायक होती है।
सेंधा नमक खाद्यान्नों से निकलता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए ऐसे नमक की आवश्यकता होती है जो पूरी तरह पानी में घुलनशील हो सेंधा नमक पानी में पूरी तरह घुलनशील है। शरीर के एंजाइम इसका अच्छा उपयोग कर सकते हैं इसके विपरीत व्यवसायिक नमक में पोटैशियम क्लोराइड सल्फेट तथा अन्य क्लोराइड जैसे तत्व होते हैं जो पानी में घुलने नहीं देते।
सेंधा नमक सभी छार लवण में श्रेष्ठ है दूसरे लवणो के अपेक्षा यह सौम्य है। सेंधा नमक पथ्य, और त्रिदोष नाशक है। अग्नि प्रदीपक, लघु, स्निग्ध, रुचिकर, सीत वीर्य ,कामोत्तेजक ,नेत्र के लिए हितकारी ,मलस्तंभ ,और हृदय रोग का नाश करता है। वात_ पित्त _कफ इन तीनों में से जो दोस्त को पीट हुआ हो उसे शांत करता है। अतः दाल दलिया अन्य सब्जियों जिनके नमक कम मात्रा में होते हैं उनमें सेंधा नमक ही प्रयोग में लाएं।
1=नामक के अधिक सेवन से आंतों की श्लैश्मिक कला को नुकसान पहुंचता है तथा आमाशय की श्लेष्मा कला में अधिक मात्रा में पानी का स्राव होकर वहां की कोशिकाओं में खिंचाव पैदा होकर भी सिकुड़ जाती हैं जिससे वमन होनी शुरू हो जाती है।
2=अधिक सेवन से रक्त दूषित हो जाता है रक्तचाप को बढ़ाता है तथा हृदय रोगों की उत्पत्ति करता है।
3=गुर्दे इसे निकालने के लिए अधिक श्रम करते हैं तो भी क्षतिग्रस्त हो जाते हैं तथा उनके कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है जिससे गुर्दे में रोग हो जाते हैं मूत्र में एल्ब्यूमिन फास्फोरस जाने लगता है।
4=अधिक प्रयोग से धमनिया कड़क हो जाती है बाल शीघ्र सफेद होने लगते हैं इंद्रलोक का रोग हो जाता है तथा चेहरे पर झुर्रियां पड़ने लगती है
5=जलोदर में नमक बहुत ही घातक होता है आधा औंस नमक शरीर में 4 पाउंड पानी बनाता है। रक्त में नमक की अधिकता से गाना प्रभारी बना जाने से रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
6=पाचन संस्थान की कोमल जिलों में घाव हो जाते हैं पाचन प्रणाली बिगड़ जाती है तथा पाचक रसों को भी छोड़ कर देता है जिससे मंदाग्नी हो जाती है। जिन महिलाओं को अधिक रक्तचप रहता है उनमें अस्थि रोग की संभावना अधिक हो जाती है।
7=चर्म रोग ,सिरदर्द ,कैंसर ,रक्त विकार ,शुक्रक्षय, हीनवीर्रयता, जोड़ों में दर्द ,मधुमेह ,मूत्र रोग ,अनिद्रा, आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
सावधानियां=सूजन ,चेचक ,चर्म रोग, खुजली ,कोढ विषजन्यरोग ,उच्च रक्तचाप, रक्तविकार रोग उच्च रक्तचाप में नमक का सर्वथा त्याग करना चाहिए।
नमक के विषैले में प्रभाव =नमक एक उत्तेजक पदार्थ है इसके सेवन से शरीर में शोध उत्पन्न हो जाता है इसके कारण शरीर के अनेक विजातीय तत्वों का निष्कासन उचित रूप में नहीं हो पाता। नमक उष्ण वीर्य होने के कारण शुक्र नाशक और अम्ल पित्त की वृद्धि करता है।
नमक खाना क्यों शादी की वजह से आदत बन गई है। नमक की वजह से बिना भूख की आवश्यकता से अधिक खाया जाता है। अति भोजन से उत्पन्न गंदगी तथा नमक को निकालने के लिए त्वचा व गुरदे शिथिल हो जाते हैं। नमक खाने से अधिक प्यास लगती है जिससे पानी अधिक किया जाता है परंतु निष्कासन मार्ग उदावत वचा अतिरिक्त जल नहीं निकाल पाते तो शरीर में रहकर वह जल मोटापा सूजन व अनेक रोग पैदा करता है। नमक की गर्मी शांत करने के लिए कोसों में पानी रिसना शुरू हो जाता है और वह कमजोर हो जाते हैं। नमक कितना विषैला होता है कि उससे मनुष्य ही नहीं पशु तक मर सकते हैं। जिस जमीन में नमक बहुतायत में होता है उसे रेहार कहते हैं वहां कुछ भी पैदा नहीं होता।
नमक के उपयोग=नामक जंतु हन है अतः सडन को रोकने वह चमड़ा साफ करने के कार्य में उपयोग करते हैं। कपड़े धोने का सोडा व अन्य रासायनिक उद्योगों में बहुतायत में नमक की आवश्यकता होती है। पापड़ अचार तथा आहार को दीर्घकाल तक संग्रह करने के लिए नमक की आवश्यकता होती है। सूखे पदार्थ जैसे इमली मक्खन मांस आदि शीघ्र बिगड़ने न पाए इसलिए उनमें नमक डाला जाता है। मोच गांव की सिकाई कपड़ों की रंगाई मरसिरेज कपड़ों को तैयार करने में सिले हुए कपड़े को सुरक्षित रूप में रखने के लिए नमक का उपयोग किया जाता है। कई खनिज पदार्थ जैसे तांबा सोना चांदी आदि के शुद्धिकरण में भी इसका उपयोग किया जाता है।
नमक का औषधि रूप में प्रयोग=नमक का पानी मिलाकर भवन करवाने से पेट में गया विष बाहर निकल आता है। गर्म पानी में नमक मिलाकर मिलाकर वमन करवाने से कफ पित्त बाहर निकल जाता है। गर्म पानी में नमक डालकर गरारे करने से गले की सूजन गले की पीड़ा दूर हो जाती है। उबले पानी में नमक डालकर पीने से विषमय ज्वर दूर हो जाता है। दांत मसूड़े में सूजन हो तो गर्म पानी में नमक डालकर कुल्ला करें। गांव में खून बहता हो तो उस पर नमक के पानी में भीगी पट्टी बांधने से जख्म पता नहीं बल्कि मुरझा जाता है। नमक को गर्म करके बढ़ने से मौत ठीक हो जाती है। नमक को सरसों के तेल मिलाकर दांत पर मलने से दांत मजबूत हो जाते हैं। बिच्छू मधुमक्खी के दंश पर नमक घिसकर लगाने से राहत मिलती है। पानी में थोड़ा सा नमक डालकर आंखों में दो बूंदें डालने से बिच्छू का विष उतर जाता है। निमोनिया सुखी खांसी दमा में छाती पर तेल लगाकर गर्म नमक की पोटली से सेकने से आराम मिलता है।
मैदा के लाभ और हानियां; हमारे खाद्य में 4 सफेद विष शामिल है जो कि हमारे शरीर को घुन की तरह धीरे-धीरे खोखला कर रहा है। सफेद चीनी नमक मैदा वनस्पति घी। देवी द्वारा तैयार किया जाता है मैदा किंतु इसको तैयार करते समय प्राय गेहूं के सभी प्राकृतिक लवण विशेषकर लोहा पोटेशियम कैल्शियम तेल पदार्थ सोकर ऊंचे दर्जे की प्रोटीन विटामिन b1 आदि नष्ट हो जाते हैं। या यूं कहिए कि इसमें से निकाल दिए जाते हैं केवल इसमें निम्न कोटि का स्टार्च व प्रोटीन बच जाता है। मैदा को सुंदर व पर शोधित करने के लिए उसमें शरीर को हानि पहुंचाने वाले नाइट्रोजन ट्राई फ्लोराइड जैसे रासायनिक द्रव्य मिलाया जाते हैं। डबल रोटी में प्रिजर्वेटिव आदि अनेक रसायन मिलाए जाते हैं।
मैदा से बनी मिठाइयां बेकरी की सभी सामग्री डबल रोटी बिस्कुट नानखटई टोस्ट इसके अलावा समोसा कचोरी नान रोटी आदि खाने से शरीर को कोई प्राकृतिक तत्व नहीं मिलता। मैदा से बनी चीजें गर्म होने के कारण अच्छी तरह चलाई नहीं जातीयता कम चबाने से पाचन प्रणाली गड़बड़ हो जाती है। मैदा अति बारीक पिसी हुई होने की वजह से इसको खाने से हाथो में जाकर चिपक जाती है जिससे कब्ज होकर सरल उत्पन्न होने लगती है सड़न से रक्त दूषित होकर अनेक बीमारियां उत्पन्न हो जाती है।
तत्व विटामिन b1 के अभाव के कारण मैदा के उपयोग से ज्ञान तंतुओं पाचन संस्थान और मांस पेशियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। चोकर के अभाव में मेंढक के ज्यादा उपयोग से कब्ज घर कर लेता है कब जिससे रक्त दूषित होकर शरीर में विकार उत्पन्न होते हैं। जैसे चर्म रोग मानसिक विकार गैस सिरदर्द जुकाम कब आदि। प्रोटीन के अभाव में पाचन स्राव कम निकलता है। मैदा से प्राप्त अतिरिक्त कैलोरी का भी रक्त परिभ्रमण प्रणाली पर विपरीत असर पड़ता है। मैदा से अल्कोहल उत्पन्न होता है।
इधर से बने व्यंजन खाने में नरमा स्वादिष्ट होने की वजह से बाजार में बहुत प्रचलित है अतः व्यक्ति इनको खाकर अपने पेट में पैसे की बर्बादी कर रहा है। यह बस तू ही भूख न होने पर भी लालच से ज्यादा खाने में आती है जैसे पेट खराब हो जाता है। छोटे बच्चे वृद्धि तथा बीमार व्यक्तियों को डॉक्टर की सलाह पर बिस्कुट, डबल रोटी ,आदि की जाती है जिससे पेट जिगर रक्तदान आज सभी में विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
वनस्पति घी: यह एक सफेद विश है जो सस्ते खाने योग्य तथा नहीं खाने योग्य तेल पाम आयल रिफाइंड आयल कॉटन सीड तेल अलसी बिनौला नारियल मूंगफली आदि तेल का मिलावटी विकृत रूप है। यह तो शुद्ध की है और ना ही शुद्ध तेल बाजार में रथ पालकी पनघट डालडा आदि नाम से यह वनस्पति घी बहुत तेजी से प्रसारित हो रहा है।
इस भी को बनाने के लिए निखिल धातु को तेल में मिलाकर हाइड्रोजन गैस द्वारा जमाया जाता है। इसमें जीव जंतुओं की चर्बी का तेल मिलाकर प्रोटीन युक्त किया जाता है निखिल धातु इससे विषाक्त तो बनाती है साथी कृतिम विटामिन ए से और भी हानिकारक बना देते हैं इसे वनस्पति घी कहना लोगों को धोखा देना है यह तो केवल जमाया हुआ वनस्पति तेल है जो कि पोषक तत्वों से रहित बीष तुल्य खाद्य है।
इसको इतने ताप पर गर्म करके जमाया जाता है कि इस को आत्मसात करने के लिए शरीर को भी उतने ही ताप की आवश्यकता होती है। शरीर में इतने ताप की कोई संभावना नहीं सिले इसके कारण कंपनी होने की वजह से हमारी आंखों में चिपक जाते हैं। चिपकने के कारण आंतों की मांसपेशियों की गति मंद हो जाती है इस कारण आंतों में सेकंड होकर रक्त संचार कम हो जाता है। इसके प्रयोग से रक्त दूषित हो जाता है इसलिए रक्त संबंधित अनेक रोग हो जाते हैं। धातु को भी शरीर आत्मसात नहीं कर पाता जिससे उसके विजातीय द्रव्य बनकर अनेक रोग पैदा हो जाते हैं जैसे मोटापा कब्जे में मूत्र रोग आओ कोलाइटिस रतौंधी अंधापन मोतियाबिंद हृदय रोग आदि। देश में नेत्र रोगों पाचन संस्थान के रूप तीव्र गति से बढ़ती रहे। इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण परीक्षण तक द्वारा इज्जत नगर में चूहों को वनस्पति घी व शुद्ध घी पर रखकर प्रयोग किया गया। नतीजा यह हुआ की वनस्पति घी खाने वाले चूहे अंधे हो गए।
गांधी जी ने कहा है "कि वनस्पति घी हिंदुस्तान के साथ किया जाने वाला धोखा है वह जाली सिक्के बनाने से भी बुरा है"।
वनस्पति घी की हानियां=वनस्पति घी से विकास वृद्धि क्षीण हो जाती है और इस गीत से कैल्शियम ठीक से शरीर में आत्मसात नहीं होता जिसकी वजह से शरीर में चर्बी बढ़ती है और मोटापा बढ़ जाता है बेकरी की सभी खाद्य सामग्री वनस्पति घी व मैदा स बनाई जाती है। इन का प्रयोग ना करें तथा शुद्ध तेल खाएं।
सफेद चीनी या सफेद जहर =गन्ने में पाए जाने वाली सभी विटामिन लोहा कैल्शियम फास्फोरस तथा प्राकृतिक लवर सफेद चीनी से प्राप्त नहीं होते। क्योंकि जिस दीदी से से तैयार किया जाता है उसमें इसके उपयोगी को पौष्टिक तत्वों का ह्रास हो जाता है। यह केवल तत्व ह मिठास होने के कारण इसके सेवन से शरीर को लाभ की जगह हानि उठानी पड़ती है सफेद चीनी को पचाने के लिए कैल्शियम की आवश्यकता होती है यदि भोजन में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम प्राप्त नहीं होता तो पाचन प्रणाली इसे हड्डियों से प्राप्त करती है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव दातों पर दिखाई पड़ता है। चीनी से बनी मिठाई टॉफी चॉकलेट दूध ज्यादा उपयोग में लाने वाले बच्चों में बड़ों की हड्डियां तथा दांत और मसूड़े खराब होकर उन में से खून में सड़न आने लगती है समय से पहले गिर जाते हैं या पायरिया हो जाता है। साथ ही साथ पाचन शक्ति बहुत कम हो जाती है चीनी से शारीरिक व आंतरिक गति में अवरोध आता है। बच्चों के शरीर का विकास उचित रूप से नहीं हो पाता उनकी हड्डियां भी अविकसित रह जाती हैं। चीनी रक्त में यूरिक अम्ल व शर्करा की मात्रा बढ़ा देती है जिससे घटिया उच्च रक्तचाप व गुर्दे यकृत आदि के रोग हो जाते हैं। यह चीनी शरीर को सिर्फ गर्मी में शक्ति देती है चीनी में किसी प्रकार का झाड़ नहीं है चीनी की मिठास सिर्फ शरीर के लिए ईंधन का काम करती है जिस प्रकार आग में घी डालने से तुरंत लपटें निकलती है तथा कुछ समय के लिए सख्त करूं प्रदान करती हैं उसी प्रकार चीनी खाने से शरीर पर क्षणिक असर होता है।
चीनी का पाचन छोटी आंख में होने के बाद रक्त में अवशषण होता है रक्त में घुल जाने के बाद चीनी का ग्लाइकोजन के रूपांतरण होकर भविष्य में उपयोग के लिए यकृत में संग्रह हो जाता है। हृदय की मांसपेशियों की दुर्बलता में उपवास अधिक थकान तथा मधुमेह की चिकित्सा में इंसुलिन की अधिक मात्रा के समय रक्त में शर्करा की मात्रा शीघ्रता से बढ़ाने के लिए या तत्काल शक्ति पूर्ति के लिए चीनी का विशेष उपयोग किया जाता है। चीनी से श्वेत विष है यह दांतों में सड़न तथा थकान उत्पन्न करती है सफेद चीनी में अत्यधिक प्रदाह कार्यक्रम रहते हैं अक्सर चीनी तोड़ने वालों को हाथ से चीनी का बराबर स्पर्श करते रहने की वजह से अकोटा हो जाता है। लंदन यूनिवर्सिटी के केमिस्ट्री के प्रोफेसर डॉ प्लीक्नर कहते हैं "संसार में सफेद चीनी की खपत के साथ ही कैंसर व मधुमेह फैल रहा है"चीनी युक्त खाद्य में विटामिन बी की अनुपस्थिति से प्रारंभिक कष्ट शुरू कैंसर तथा मध्य में हो जाता है। सफेद चीनी में कार्बोज और कैलोरी के अलावा कुछ भी नहीं है।
विकासशील बच्चों में शक्ति का बहुत बड़ा होता है उनकी पूर्ति के लिए वे अज्ञानता व समिति वस्तुओं के प्रति उन्मुख होते हैं। ऐसे समय में घर में बड़े व्यक्तियों को चाहिए कि वे बच्चों को चीनी से बनी वस्तुओं के स्थान पर सूखे मेंवे फल गुड आदि से निर्मित वस्तुएं दें। इनसे मिठास के साथ बच्चों को चर्बी गर्मी शक्ति उचित मात्रा में प्राप्त होती है।
सफेद चीनी को हम नहीं खाते बल्कि यह हमें खा जाती है। स्थान पर गुड़ खाएं इनमें विटामिन b12 विटामिन सी तथा अल्प मात्रा में विटामिन ए का पूर्ण स्वरूप केरोटीन होता है। बूरा सफेद चीनी के अपेक्षा सुपाच्य होता है क्योंकि उसके अन्य तत्व कम नष्ट होते हैं। प्राकृतिक फल व सब्जियां केला, सेब ,नाशपाती, खजूर ,चीकू ,आम ,शकरकंदी ,सीताफल, किसमिस, अंजीर आदि से प्राप्त होने वाली शर्करा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
चीनी के अधिक उपयोग से होने वाले रोग=चीनी के अधिक उपयोग से कैंसर ,मधुमेह ,मेरुदंड में अर्थराइटिस, गैस ,मोटापा ,मस्तिष्क रोग ,गठिया, दमा, पीलिया, पोलियो, वेरी-वेरी ,रक्त विकार ,हृदय रोग ,दांत रोग, पायरिया ,जुकाम ,आधासीसी ,सिर दर्द ,कोलाइटिस, पेप्टिक अल्सर ,नाड़ी दुर्बलता , अजीर्ण, बहुमूत्र ,चर्म रोग, बच्चों में सूखा रोग आज होने की संभावना होती है।
निष्कर्ष; आयुर्वेद में विटामिन का उल्लेख नहीं है क्योंकि विटामिन की खोज बीसवीं शताब्दी से शुरू हुई थी। शरीर के लिए आवश्यक लवण खाद्य पदार्थों से प्राप्त होते हैं खाद्य पदार्थ जब प्राकृतिक रूप में पाए जाते हैं तभी शरीर उसमें स्थित लवणों का पूरा पूरा लाभ उठा सकता है क्योंकि अधिक पकाने से यह लोन नष्ट हो जाते हैं। पानी में घुलनशील होते आटा खाद्य पदार्थों को उबालकर उनका पानी पीने से शरीर को उनके लाभ से वंचित होना पड़ता है।
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