शरीर में होने वाले रोग और उसके कारण
रोग क्या है?
विजातीय द्रव्यों का शरीर को एकत्रित होना ही रोग है । रोग में चेतावनी देते हैं कि विजातीय द्रव्य रूपे शत्रु हमारे शरीर में अड्डा जमा रहे हैं। उसमें हमें सजग और सावधान होना चाहिए। प्रकृति ने तो ग्रह को न भूत प्रेत को न त्रिदोष को और न ही कीटाणुओं को रोग का कारण मानती है। प्रकृति एक सुयोग्य माता के समान है जो अपने अबोध शिशु की गलती पर मीठी फटकार लगाती है तात्पर्य कहने का कि गलत आहार-विहार पर नियंत्रण लगाती। इस मीठी फटकार का नाम ही रोग है। शरीर की अस्वाभाविक अवस्था।
डॉक्टर जैस्मीमसर के अनुसार स्वास्थ्य की परिवर्तित अवस्था को रोग कहते हैं।
रोग के कारण ;-
गलत रहन-सहन व गलत खान-पान के कारण रक्त दूषित होने पर स्वास्थ्य की अवस्था में परिवर्तन होकर रोग का प्रादुर्भाव होता है। रूप क न तो कोई नाम होता है और ना ही कोई शक्ल होती है परंतु जब ही वह बाहर प्रकट होता है त्यो ही वो विविध नाम और शक्लो से विख्यात जाता है। रोग शरीर में दो रूपों में विद्यमान होता है साकार तथा निराकार रूप में। ऊपर से देखने में शरीर भले ही स्वस्थ प्रतीत हो किंतु अंदर कोई न कोई रोग सुसुप्त अवस्था में या निराकार रूप में विद्यमान हो सकता है जो परिस्थिति के अनुकूल होने पर साकार रूप धारण कर लेता है। शरीर में रोग अपना साकार रूप अचानक नहीं धारण करता बल्कि धीरे-धीरे जब विजातीय द्रव्य ज्यादा इकट्ठा हो जाते हैं तब वह रोग रूप में हमारे सामने आते हैं हमें स्वास्थ्य प्रदान करने के लिए।
हमारा खान-पान नियमित व प्राकृतिक है तो कीटाणु जो सर्वत्र फैले हुए हैं हमारे शरीर में प्रविष्ट होकर भी वहां रह नहीं सकते। अपितु वह हमारे शरीर में अनगिनत स्वास्थ्य कोसों के रूप में बदल जाएंगे जिनसे शरीर का निर्माण हुआ है। किंतु इसके विपरीत यदि हमारा आहार विहार अली अमित अप्राकृतिक है तो सर्वव्यापी कीटाणु हमारे शरीर में प्रवेश करके असंग के कारणों का रूप धारण करके हमें रोगी बना देते हैं।
किस शरीर में पहले से रोग का कारण विजातीय द्रव्य विद्वान होगा प्राकृतिक नियम के अनुसार कीटाणुओं का आक्रमण वहां होना संभव है। निर्मल शरीर में संसार के सारे रोगाणु एक साथ मिलकर भी रोग उत्पन्न कर सकते हैं परंतु जिस शरीर में कीटाणुओं के पोषण योग्य विजातीय द्रव्य विद्वान है उसमें रोगाणु अवश्य उत्पन्न होंगे पनपेगे और वृद्धि करेंगे। हमारा शरीर स्वयं चिकित्सक है वह किसकी कारणवश विजातीय द्रव्य को पसीना मल मूत्र का लाभ व मुंह द्वारा निकालने में असमर्थ या ना काम होता है तभी रोग का जन्म होता है। प्रकृति उसे रोक के रूप में प्रकट कर निकालने का प्रयत्न करती है।
तीव्र रोग (तीव्र रोग क्या है?)
तीव्र रूप भी लोग हैं जो तीव्रता से अचानक आ जाते हैं और जल्दी ही ठीक हो जाते हैं। तीव्र रोग शरीर के मित्र हैं शत्रु नहीं वह इशारा करते हैं कि शरीर में विजातीय द्रव्य एकत्रित हो रहा है इनका इलाज करो वरना यह जीर्ण रोग में बदल जाएगा। संचित मल शरीर से निकलकर अपने आप चला जाता है और शरीर को भला चंगा और निर्मल करके छोड़ जाता है। हमारा कर्तव्य है कि इन लोगों को औषधियों से दबाना है रुकना नहीं चाहिए बल्कि प्राकृतिक संसाधनों से उनकी निकलने में सहायता करनी चाहिए। औषधि पिता हिप्पोक्रेट्स तीव्र रोग का स्वागत करते थे।"मुझे बुखार दो मैं सब लोग दूर कर दूंगा"उनके मतानुसार "प्रकृति रोग मिटाती है,डॉक्टर नहीं"।
तीव्र रोग क आहार क्रम;-
ज्वर, खांसी, जुकाम, दस्त, आदि तीव्र रोग में भोजन बिल्कुल बंद कर दे। केवल थोड़ी थोड़ी देर में मौसम अनुसार गर्म या ताजा जल ही दे । यदि रोगी बहुत कमजोर है तो फल सब्जियों का रस नींबू पानी तुलसी का काढ़ा किसमिस पानी में भिगोकर उनका पानी आदि दे। उपवास करने से शरीर की निष्कासन क्रिया तेज हो जाती है और रोगी को पूर्णाराम अति शीघ्रता से मिलता है। रोग सुधार होने पर धीरे-धीरे क्रम सा फल सब्जी दूध आदि देने से कुछ दिन बाद रोटी सब्जी दाल आदि दें।
एनिमा अवश्य देते रहें रोगी को पूर्ण विश्राम शवासन प्राणायाम वायु व सूर्य स्नान जल उपचार(मेहन कटि स्नान, गरम पाद स्नान, चादर लपेट पट्टी, जलनेति, कुंजल क्रिया, भापस्नना आदी) मिट्टी पट्टी पेट पर गर्म ठंडा से आदि आवश्यकता अनुसार व रोगी की अवस्था देखकर चिकित्सीय उपचार दिया जा सकता है।
जीर्ण ज्वर ( जीर्ण ज्वर क्या है?)
शरीर में तीव्र रोग होने पर सफाई के प्रयत्न में बार बार और सही देख कर बाधा उपस्थित करने से ऊपर से सब ठीक ठाक सा प्रतीत होता है पर शरीर के भीतर विजातीय द्रव्य रुक जाते हैं जिससे जीर्ण रोग उत्पन्न हो जाता है। विजातीय द्रव्य लंबे समय तक शरीर में पड़े रहने से तीव्र रोग जीर्ण रोग का रूप कर लेते हैं। जैसे जुकाम को दवाइयों से दबाने से दमा हो जाता है। दस्त दबाने से एग्जिमा एग्जिमा दबाने से कैंसर हो जाता है। बुखार से यक्ष्मा हो जाता है। अस्थमा, गठिया, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, टीवी ,चर्म रोग, सोरायसिस ,हृदय रोग, बवासीर, संग्रहणी ,आदि जीर्ण रोग होते हैं।
जीर्ण रोग में आहार क्रम ;-
रोगी को क्षारीय भोजन करवाएं। यदि रोगी फल सब्जी पर नहीं रह सकता तो एक समय फल सब्जियां दूसरे समय दालिया चोकर सहित आटे की रोटी व उबली सब्जी अंकुरित अन्न व सलाद दें। धीरे-धीरे दूसरे समय भी फल व सब्जी पर ही ले आए। इसके बाद नींबू पानी फल व सब्जी का रास्ते फिर लघु उपवास 1 से 3 दिन तक करवाएं। यदि आवश्यकता हो तो लंबा उपवास करवाएं इस तरह जीवन रोग को तीव्र रोग में परिवर्तित किया जाता है।
रोगी को पूर्ण विश्राम वायु स्नान धूप स्नान वापस स्नान जल उपचार स्नान या स्पंज पटिया मडबाथ आज आवश्यकता अनुसार व रोगी की अवस्था देखकर चिकित्सक की देखरेख में करें। एनिमा बराबर देते रहना चाहिए। रोगानुसार विशेष खाद्य का कल जिन लोगों में करवाया जाए तो बहुत लाभकारी सिद्ध होता है।
प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े रोग जड़ से चले जाते हैं किंतु चिकित्सा में काफी समय लगता है। खैरी पूर्वक चिकित्सा लेनी चाहिए। रोगी की जीवनी शक्ति को बढ़ाना चाहिए रोगी के विचारों में शुद्धता धैर्य व अपने चिकित्सक के प्रति विश्वास जरूरी है। जेल रोड से आक्रांत छोड़ जीवनी शक्ति वाली माता पिता से उत्पन्न संतान में उनके रोग बीज रूप में आ जाते हैं। जिनको वंशानुक्रम रोग कहते हैं। जीण रोग में जीवन अत्यंत दुख में और नीरज बन जाता है।
घातक रोग;-जब बार-बार तीव्र रोगों को औषधियों से दबा दिया जाता है तब वह जीर्ण रोग का रूप ले लेता है। और जब जीर्ण रोगों का इलाज लंबे समय तक नहीं होता तो घातक रोग बन जाते हैं। जैसे पुराना यक्ष्मा, कैंसर कोढ आदि। लंबे समय तक निरंतर प्राकृतिक चिकित्सा देने से कठिन ता से घातक रोग को जड़ रोग में तथा जीर्ण रोग को तीव्र रोग में परिवर्तित कर के रोग दूर किया जाता है।
यह घातक रोग अब प्राकृतिक भोजन गलत रहन-सहन के कारण रक्त विषाक्त होने से शरीर में पैदा होते हैं। अधिक भोजन अत्यंत गर्म खाद्य पदार्थ कम पानी चाय तंबाकू शराब व अन्य नशीली चीजें श्वेत विष डिब्बा बंद चीजें कृतिम खुशबू आरंग आदि का प्रयोग प्लास्टिक का उपयोग बेमेल भोजन आदि के कारण जन्म लेते हैं।
लुक्का चोर कम ना हो तो लोग उपवास या रासाहार कराते हैं। दोनों समय एक समय जरूरत के मुताबिक एनिमा देना चाहिए। दीर्घ उपवास याद दीर्घ रसाहार इस रोग में विशेष लाभदायक होते हैं। सूर्य स्नान, कटि स्नान, भाप स्नान, रात भर पेड़ों पर गीली पट्टी मिट्टी के साथ रोगी को पूर्ण विश्राम जरूरी है। रोगी को भूख लगने स्थिति में सुधार होने पर ताजे फल गुगली व कच्ची सब्जी भिगोकर सूखे मेवे बकरी या गाय का दूध मलाई निकाल कर मक्खन निकालकर छाछ आदि रोगी की पाचन शक्ति के अनुसार दिए जा सकते हैं।
गेहूं के जवारे का जूस गाजर का जूस चुकंदर का जूस हरी पत्तियों सब्जियों का जूस मौसमी का जूस सेब अंगूर का जूस अंकुरित अन्य सहज नारियल पानी किशमिश मुनक्का तुलसी पत्र दही में तुलसी पत्र आज दिया जा सकता है। घातक रोग में रोग के अनुसार विशेष प्रकार के खाद्य कल्प कराना गुणकारी सिद्ध होता है। प्राकृतिक चिकित्सालय में रहकर विशेष चिकित्सक की देखरेख में स्वास्थ्य लाभ कर आना चाहिए तथा धैर्य पूर्वक चिकित्सा लेनी चाहिए क्योंकि घातक रोगों को ठीक होने में समय लगता है किंतु यह जड़ से ठीक हो सकते हैं।
रक्त ही जीवन है;-प्राणियों का जीवन आधारित है शरीर का धारण रक्त से ही है। रक्त की यत्व पूर्वक रक्षा करें क्योंकि यही जीवन है। रत स्नेक भारी चंचल और सुस्वादु होता है। शरीर का स्वास्थ्य रक्त कोशिकाओं पर निर्भर है। स्वस्थ रक्त कोशिकाओं का आधार हमारा संतुलित जैविक आहार है। हमारे हजम किए हुए अन्य का रूपांतरण रक्त में होता है।खाए हुए आहार में रस रस में रक्त रक्त में मांस मांस में वेद वेद में अस्थियां अस्थियों से मज्जा मज्जा से वीर्य बनता है। अधिक वह बेमेल भोजन पचता नहीं है आंतों पर पड़ा रहता है जिससे जहरीले पदार्थ उत्पन्न होकर रक्त में मिलकर रक्त को जहरीला बना देते हैं। हार को हम जितना चलाते हैं वह उतना प्रभावी होता है।
रस पीने से रक्त विकार दूर होते हैं। रक्त में अमलत्व में वृद्धि होने के साथ ही 7 दिन की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। शरीर में 4 संख्या कम हो जाने पर चर्म रोग मोतियाबिंद घटिया और वातवधि आज रोग उत्पन्न हो जाते हैं। साधारण स्वास्थ्य में उन्नति और बुढ़ापा जल्दी आ जाता है। रक्त में चार और अम्ल का अनुपात क्रमशः 80% और 20% रहना चाहिए। रक्त को इस स्वाभाविक अवस्था में लाने के लिए प्रकृति की है विशेष व्यवस्था है कि प्रकृति रक्त का विष पाक स्थली के रास्ते से देह से बाहर फेंकने की कोशिश करनी चाहिए। रक्त को क्षार प्रधान बनाने के लिए क्षारीय री भोजन अधिक मात्रा में खाना चाहिए। रस व कच्चे भोज्य पदार्थ रक्त प्रवाह को लगातार प्राकृतिक तत्व प्रदान करते हैं। जीवन रक्त में ही है और शुद्ध रक्त में रोक नहीं पनपते। जब रक्त प्रवाह को भोजन मिलता है तो पूरे शरीर को भोजन मिलता है। रक्त रक्त शरीर की प्रत्येक कोशिका को पोषण तत्व पहुंचाता है। तथा वहां से हानिकारक पदार्थों को निष्कासित करता है। आहार के छह प्रकार के विभिन्न तत्व प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट वसा विटामिन खनिज लवण तथा जल ऑतो द्वारा अवचूसित होते हैं। रेशा रक्त में शक्कर कोलेस्ट्रोल का स्तर कम करता है।
क्रोध में रक्त विषाक्त हो जाता है तथा डर से रक्त सूख जाता है जिससे व्यक्ति पीला पड़ जाता है अतः क्रोध अशोक डर आदि को अपने से दूर रखने की कोशिश करनी चाहिए। लिपटस के अनुसार ;-"मांस का पूरा जीवन रक्त में है"
आहार का चुनाव मध्यम मार्ग होना चाहिए;-सभी तक आपके सामने प्रस्तुत कर दिए गए हैं। जीवन यापन के दो रास्ते हैं पहला सात्विक युक्ताहा द्वारा दूसरा प्राकृतिक नियमों का पालन करें तो आपको उत्तम स्वास्थ्य शारीरिक व मानसिक शांति प्रसन्नता व दीर्घायु प्राप्त करेगा। इस माध्यम निरोगी काया व सुखी जीवन व्यतीत कर सकते हैं। दूसरा बिना सोचे समझे शत विषपान मादक द्रव्य व्यसन निर्जीव व अमानुष्य भोज्य पदार्थ का उपयोग भोग विलास आज जीवन को दुखी रोगी का या शारीरिक व मानसिक अशांति तथा अकाल मृत्यु की ओर धकेल देते हैं। इस आयुक्त आहार से व्यक्ति आलसी क्रोधी भोग बिलासी हो जाता है।
पहले रास्ते से आप अपने रक्षक बनते हैं दूसरे रास्ते से आप अपने भक्षक बन जाते हैं। जैसा जीवन व्यतीत करते हैं उसका असर बच्चों पर भी पड़ता है धीरे-धीरे बच्चे भी वैसे ही जिंदगी जीना पसंद करने लगते हैं। दूसरा रास्ता अपनाकर आप बच्चों को दीर्घायु का आशीर्वाद न देकर अल्पायु की तरफ स्वयं अंगुली पकड़कर चलाते हैं।
दोनों रास्तों में से मध्यम मार्ग का चुनाव किया जा सकता है मन को दृढ़ करके चले कि हमें स्वास्थ्य व निरोगी जीवन व्यतीत करना है वर्षों से पीढ़ियों से जो आहार हम ले रहे हैं उस आदत व स्वाद को एकदम नहीं बदल सकते। शरीर के आंतरिक अंग प्रत्यंग उस आहार के आदी हैं इसलिए व्यवहारिक बात यह है कि धीरे-धीरे इस स्वाद व आदत को बदल कर अपक्वाहार पर आ जाएं ।
जैन फल सब्जियों के छिलके सहित खाना है फलों को ताजे पानी से मसलकर धोकर खाए, संतरा आम चीकू नाशपाती अमरुद खजूर खरबूजा जामुन शहतूत बेल अंगूर पपीता से अनार फालसा आलूबुखारा अनानास आदि। सब्जियां वह हरे पत्ते वाली साग बिना पकाए प्राकृतिक अवस्था में खाए जा सकते हैं जैसे -मूली, गाजर ,खीरा, टमाटर, प्याज, ककड़ी, सिंघाड़ा ,फूल गोभी, पत्ता गोभी, मेथी, पालक, सरसों ,चुकंदर ,आंवला, धनिया, पुदीना ,मूली गाजर के पत्ते ,आदि। समस्त कास्ठज मेवे जैसे- मूंगफली, काजू ,बादाम ,अखरोट, अंजीर, किसमिस, चिलगोजा, पिस्ते ,चिरौंजी ,खजूर, छुहारा आदि। फसल पकने से पहले कच्चे चना गेहूं मटर मूंग मक्का, जाओ ज्वार बाजरा आदि अंकुरित करके गेहूं चना मूंग मोठ अध्यापक को अन्य पेय पदार्थ धारोष्ण दूध, गन्ने का रस बेल संतरा मौसमी अनानास का रस नींबू का पानी नारियल पानी ताड़का रास नीरा आदि । यह सब अपक्वाहार है। इनके सेवन से भरपूर शक्ति रोग प्रतिरोधक क्षमता पौष्टिकता मिलती है जिससे शरीर बलिष्ठ व निरोगी बनता है।
इतना अपक्वाहार होने के बाद 20% पक्वाहार खाने से शरीर को हानि नहीं होगी। रोटी चावल भाप से उबाल कर बनाई हुई सब्जियां सीमित मात्रा में मसाले व घी तेल का प्रयोग करना शरीर के लिए वार आवश्यक पर लाभकारी सिद्ध होता है इससे भोजन को पौष्टिक बना दे सकते हैं।

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