google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical साधना का लक्ष्य क्या है? साधना का परम लक्ष्य है चित् शुद्धि दो एक

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साधना का लक्ष्य क्या है? साधना का परम लक्ष्य है चित् शुद्धि दो एक

 साधना का लक्ष्य क्या है? साधना का परम लक्ष्य है चित् शुद्धि।

इंद्रिय संयम का उद्देश्य जहां देह भाव से ऊपर उठते हुए एक स्वस्थ निरोगी जीवन जीना है तो वही व्यक्ति को उपवास के नाम पर एकदम भूखे रहने या फिर अवसाद व्रत को अतिरेक तक ले जाते देखा जाता है। इंद्रिय संयम के नाम पर एक दम कठोर, शुष्क एवं नीरस जीवन शायद किसी आध्यात्मिक साधना का मूल उद्देश रहा है।
  ऐसे में साधक एक अवधि विशेष तक संयम के नाम पर हठ योगिक तब करते हुए झूठा संतोष अवश्य पा लेते हैं कि साधना हो रही है लेकिन कालावधी समाप्त होने पर फिर वही साधक भोजन व्यंजन से लेकर विषय भोगों पर ऐसे टूट पड़ता है कि संयम का मूल प्रयोजन सिद्ध होता नहीं दिखता। ऐसे में लगता है कि संयम साधना को समझने में कहीं भारी चूक हो रही है।
   
     वास्तव में संयम साधना के अतिरिक्त के बजाय मध्यम मार्ग के अनुसरण का पद है जिसमें अपनी यथास्थिति को सम्यक समझ के आधार पर आगे बढ़ा जा सकता है। इसका मूल उद्देश्य इंद्रिय वमन को क्रमिक रूप से साधते हुए चित्र शुद्धि को प्राप्त करना रहता है जिससे कि वासना तृष्णा एवम अहंता जैसे चित्रबंधनो की जकड़न ढीली हो सके। देश राग द्वेष अहंकार जैसे सूचनाओं का परिमार्जन करते हुए काम क्रोध ,लोभ ,मोह, हीनता ,एवं दर्प, दंभ जैसे आंतरिक रिपुओ पर विजय पाना रहता है।
  
   इसके साथ उद्देश्य ज्ञान के जागरण भक्ति के उदय एवं विकास के साथ आत्मबोध आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वर प्राप्त जैसी अवस्था को की ओर बढ़ना वर् इनमें स्थापित होना रहता है । इस राह में सेवा का महत्तर  कार्य  भी चित् सुद्धि योग और संतुष्टि के उपकरण के रूप में महत्वपूर्ण रहता है

  इस तरह संयम साधना के नाम पर किसी हठयोग या विवेक हीन तप की प्रक्रिया नहीं है। जिससे कि व्यक्ति का अहंकार पोषित होता हो तथा अज्ञान की ग्रंथियां और कसती हो। संयम इनके परिमार्जन -परिष्कार के साथ अपनी इंद्रियों अर्थ विचार एवं समय का समिति नियोजन एवं संतुलन है ।
   अनुशासन मानव समाज की एक आवश्यक इकाई के रूप में हर समय हर परिस्थिति में प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण इसी मध्यम मार्ग का प्रतिपादन करते हुए विषाद ग्रस्त अर्जुन से कहते हैं;-

  युक्ताहारबिहारस्य युक्तचेस्टस्य कर्मसु। 

   युक्तश्वपनाबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।6/17

अर्थात संसार ज्योति दुख का नाश तो उस योग द्वारा सिद्ध होता है जिसमें आहार-विहार ,कर्तव्य ,कर्म, शयन ,जागरण के यथा योग्य संतुलित स्वरूप को अपनाया जाता है।
   यह प्रयंकारातंर मैं संयम साधना के आधार स्वरूप का प्रतिपादन है। जिसके आधार पर जीवन के दुख का नाश होता है इस तरह जीवन कि संयम समझ के साथ साधा गया संयम ही साधक की अभीष्ट परिणाम की ओर ले जाता है।

  तप- साधना के चमत्कारिक परिणाम;-

मनुष्य जीवन के बिना अधूरा है जीवन में पुण्य के बाद तब के क्षेत्र में प्रवेश होता है। जीवन की सच्ची और वास्तविक संपत्ति तप है। या अनेक धार्मिक क्रियाएं आत्म कल्याण के लिए बनाई गई है और उन सबके अपने-अपने महत्व भी है पर तब से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। सद्बुपदेश श्रवण से धार्मिक ज्ञान बढ़ता है। तीर्थ यात्रा से पाप वासनाओं का संबंध होता है। यज्ञ से देव शक्तियों का पोषण होता है पूजा पाठ से भक्ति भावना जागृत होती है ‌ दान -पुण्य भविष्य कालीन सुख सौभाग्य का निर्माण होता है ।  
‌‌ यह सब कार्य अपने अपने महत्व के अनुसार फल देते हैं परंतु एक कार्य ऐसा है जो इन में से किसी से भी नहीं हो सकता है। तब से ही आत्मबल बढ़ता है तब से ही ब्रह्म तेज प्रदीप्त होता है। तब से ही दिव्य शक्ति की उपलब्धि होती है। कोई मनुष्य अनेक वस्तुओं से सुसज्जित हूं उससे रेशमी कपड़े स्वर्ण और रत्नों से बने आभूषण पुष्प मालाएं कस्तूरी चंदन का शुरुआत बढ़िया अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित करके बहुमूल्य पालकी में बैठाया जाए परंतु उसके शरीर में शक्ति नहीं आसक्ति से वह जकड़ा हुआ हो तो सारी सूचना किसी काम की नहीं रहेगी। इसके विपरीत यदि कोई ह्स्ट -पुष्ट पोस्ट पहलवान चिथड़े भी पहने हो तो वह अपनी अच्छी स्थिति में होगा।

  विविध प्रकार की धार्मिक क्रियाएं एक प्रकार की सुसज्जा है । प्रिंसेस जीवात्मा की शोभा बढ़ती है परंतु वह शोभा तभी विशेष उपयोगी हो सकती है जब उसके पीछे तपश्चयर्या द्वारा संचित ब्रह्म शक्ति का भंडार है। यदि वह कोष खाली है तो सौभावर्धक अन्य धार्मिक उपकरणों से कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। तप के जितने भी मार्ग हैं उनमें गायत्री से बढ़कर सुलभ, सुनिश्चित एवं शीघ्र फलदायक और कोई मार्ग नहीं है। जितनी प्रकार की तपश्चयर्याए विभिन्न रूपों में दिखाई पड़ती है उन सब का उद्गम वस्तुतः तब साधना ही है।

  जैसे बिना नीव जमाए कोई मकान खड़ा नहीं हो सकता और यदि खड़ा भी हो जाए तो ठहर नहीं सकता उसी प्रकार बिना तप साधना की कोई तपस्या ना तो पूर्ण होती है और ना उसमें सफलता ही मिलती है। तब का मूल तत्व गायत्री मंत्र में सन्निहित' मर्ग ' है।

  84 लोगों में केवल गायत्री योग ही ऐसा है जिससे गृही, बैरागी सभी समान सुविधा से कर सकते हैं। इसके लिए गुरु की अस्मिता अनिवार्य नहीं है केवल संरक्षण से काम चल सकता है। भूल होने पर अधिक से अधिक इतनी हानि हो सकती है कि साधना निश्चफल चली जाए। इसमें अन्य योगों की भांती उल्टे अनिष्ट का ना तो कोई प्रकार का खतरा है और ना ही कोई भय।। इसके द्वारा केवल भौतिक या आध्यात्मिक ही नहीं दोनों क्षेत्रों में समान लाभ होते हैं। साधक का जीवन सुखी बनता है और आत्मशांति भी निश्चित रूप से मिलती है।

  प्राणी जगत में अगर किसी को कुछ प्राप्त हुआ है तो वह सब साधना के कारण ही प्राप्त हुआ है। परिश्रम कष्ट सहिसुण्ता तो लगन अध्यवसाय एकाग्रता निरंतरता की साधना प्रयत्न पुरुषार्थ के कारण ही लोगों को तरह-तरह की शक्तियां योग्यताएं सामर्थ्य संप्रदाय प्राप्त होती है। विद्यार्थी व्यापारी किसान मजदूर शिल्पी संगीतज्ञ चिकित्सक नेता साधु सभी वर्गों के लोग अपने अपने कार्य क्षेत्र में अपने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपने अपने ढंग से तप करते हैं। जिसका तप जितना अधिक होता है उसी अनुपात से उसे सफलता और संपन्नता मिलती है।

  इतिहास बताता है कि पुरुषार्थ प्रधान जातियां आगे बढ़े और ऊंचे उठी। इसके विपरीत आलसी विलास सीपीयू अकर्मण्य लोग व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से विनाश के गर्त में चले गए। जो ब्रिज ऋतु के प्रभाव को सहते हैं वह दीर्घ जीवी होते हैं और जिनकी सहनशक्ति निर्बल होती है वे थोड़ी सी गर्मी सर्दी में नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार तपस्वी मनुष्य ही सफल होते देखे गए हैं या संसार तक के आधार पर बना है और तब के आधार पर ही उसकी जीवन चर्या एवं गतिशीलता निर्भर है। जड़ चेतन सभी पर देवी विधान के नियम समान रूप से काम करते हैं।

   यह नियम आध्यात्मिक रूप से और भी व्यापक रूप में काम करता है। सृष्टि के आदिकाल से लेकर आज तक जितने भी आत्मशक्ति संपन महापुरुष हुए हैं उनकी महत्ता का एक ही कारण रहा है और वह है तप साधना।

   परमात्मा ने मनुष्य के शरीर और मन में अनेक शक्तियों के अद्भुत भंडार भर दिए हैं उसके अलवर में चमत्कारी दिव्य शक्तियों के कोष छुपे हुए हैं। यह कोर्स सुसुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं जिस प्रकार रात्रि में सब जीव जंतु सोते रहते हैं और प्रातः काल सूर्य की गर्मी फैलते ही उन सब की निद्रा खुल जाती है उसी प्रकार तक की गर्मी से भी सुसुप्त को जागृत होते हैं मनुष्य ईश्वर प्रदत्त शक्तियों के बल से सुसज्जित हो जाता है जो चिरकाल से उसके भीतर सोई हुई पड़ी थी।

  जैसे चिड़ियों की छाती की गर्मी से अंडे पकते हैं जैसे आम के कच्चे फलों की और ना जब उसे नेपाल लगाकर म पकाते हैं वैसे ही तपती गर्मी से गुप्त मना शक्तियों का परिपाक होता है और सुपर को मधुर परिणामों का आविर्भाव होता है। मनुष्य के सामने दो मार्ग है तप या पत । यह दोनों अर्थ है पतित होना जो तप नहीं करता उसे आध्यात्मिक पतन क्यों चलना पड़ेगा और जो आध्यात्मिक पतन से बचना चाहता है उसे तप के लिए अग्रसर होना पड़ेगा। दोनों में से एक ही मार्ग को चुना जा सकता है।

   तप के संघर्ष से ही शक्ति उत्पन्न होती है आध्यात्मिक जगत में भी यह नियम समान रूप से लागू होता है। मनुष्य को पशु मनोवृत्तिया  उसे नीचे की और पतन की ओर ले जाती है। यदि उसे ऊंचा उठना है तो उसे विशेष तत्परता पूर्वक प्रयत्न करना पड़ता है और उसे उस विशेष प्रयत्न को ही तप कहते हैं। पानी को कहीं भी छोड़िए वह नीचे की ओर ही रहगाउसे ऊपर की ओर से जाना है तो विशेष प्रयत्न करना पड़ेगा। उसी प्रकार पत्नोमुख  मनोवृत्तिया को उर्वधगामी बनाने के लिए तप ही एकमात्र उपाय माना गया है। आध्यात्मिकता का महत्व और महात्मा सर्वोपरि है। 

   प्राचीन काल में राजा से लेकर प्रजा तक साधना की दिशा में उत्साह पूर्वक अग्रसर होते थे। राजा अपने बालकों को गुरुकुल में तपस्वी जीवन बिताते हुए शिक्षा प्राप्त करने के लिए बनवासी ऋषियों को सुपुर्द कर देते थे। उसी का परिणाम है कि भारत माता की कोख में सदैव महापुरुष उत्पन्न होते रहे हैं। आज उस महानता का परित्याग करके लोग भूख और लाभ के लिए निम्न स्तर पर उतर आए हैं। उसी का फल है कि वे व्यक्तिगत और सामूहिक शांति और उन्नति से रहित होते जा रहे हैं वह चिंता कलह पाप एवम  अशांति से सारा वातावरण प्रदूषित हो रहा है

 तप पुरुषार्थ है जिसके द्वारा सिद्धि शांति समृद्धि स्वर्ग एवं मुक्ति जैसी सफलताएं उपार्जित की जाती है और पाप ,ताप विघ्न, संकट, प्रारब्ध एवं आसुरी तत्वों को परास्त करके अपने पौरुष का विजय प्राप्त किया जाता है। कहते हैं कि ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं। बहादुर और उद्यमी को ही पुरस्कार मिलते हैं। ईश्वरी कृपा और विशेष सहायता का अधिकारी वही व्यक्ति होता है जो तपश्चार्य द्वारा अपनी प्रामाणिकता सिद्ध कर देता है।
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  अन्य धार्मिक क्रियाएं करके पुण्य लाभ प्राप्त करने वाले व्यक्ति मर्यादा तक आत्मवृत्त कर लेते हैं। परंतु तपस्वी की शक्ति किसी भी सीमा या मर्यादा में बंधी हुई नहीं है। अष्ट सिद्धि नव निधि और करवलतगत हो सकती है। यह अपनी को पूर्णता के अंतिम लक्ष्य तक पहुंचा सकती है और अपने तेज से अन्य अनेकों को प्रकाश एवं बल प्रदान कर सकता है। इस प्रकार हमें सतत सत्कर्म करते हुए तप के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए।तप के साथ विवेक को भी आवश्यकता है विवेक से तप की ऊर्जा को दिशा मिलती है। विवेकशीलता को धारण करके तप करना एवं उर्जा को विश्व कल्याण में लगाना ही साधक का यात्रा पथ है।

  समयातीत  है समाधि:-

इच्छा रहित मृत्यु जन्म मरण के चक्र से मुक्त कर देती है। इच्छा का समाप्त हो जाना ही मोक्ष है, बंधन से मुक्ति है। कृष्ण अर्जुन से गीता में कहते हैं"परम सिद्धि को प्राप्त हुए महात्मा जन्म मुझे पाने के बाद दुख का जहां घर है ऐसे क्षणभंगुर जीवन को जीने के लिए फिर नहीं आते हैं। क्योंकि हे अर्जुन! ब्रह्मलोक से लेकर सभी लोग पुनरावृत्ति स्वभाव वाले हैं परंतु हे कुंती पुत्र! मुझसे मिल जाने के बाद उनका पुनर्जन्म नहीं होता है"।

   इसमें गहरा तत्वज्ञान है यह गंतलु तर्क है अंतर्दृष्टि है दुख का घर है पुनर्जन्म पुनर्जन्म का प्रारंभिक जीवन की आकांक्षा है जीवेषणा  है और मैं जीता ही चला जाऊं। एक इच्छा पूरी नहीं होती कि वह तो शिक्षकों को जन्म दे दी जाती है और किसी भी इच्छा को पूरा करना हो तो जीवन चाहिए समय चाहिए अन्यथा इच्छा पूरी नहीं होगी।

   इच्छा के लिए भविष्य चाहिए अगर भविष्य ना हो तो इच्छा क्या करेगी अगर मैं किसी क्षण मर जाने वाला हूं तू इच्छा क्या होगी व्यर्थ हो जाएगी क्योंकि इच्छा के लिए जरूरी है कि कल हो आने वाला दिन हो आने वाला दिन हो तो ही इच्छा को फैलाया जा सकता है। और इसके लिए श्रम किया जा सकता है इच्छा पूरी हो सके तो उसका पूरा करने के लिए समय की जरूरत है। इच्छा पूरी करनी है तो समय के बिना पूरी नहीं हो सकती इसके लिए समय चाहिए और अगर हर इच्छा 10 इच्छाओं को जन्म दे जाती है तो हर इच्छा के बाद 10 गुना समय चाहिए हर जीवन के बाद हम 10 और नई इच्छाए पैदा लेते हैं।

  मजेदार बात यह है कि पूरे जीवन हमेशा को पूरा करने की कोशिश करते हैं और आखिर में हम पाते हैं कि कोई इच्छा पूरी ही नहीं हुई मरते छड़ हम और इच्छाओं को जिंदा कर लेते हैं। तब मरते क्षण में एक और जन्म की आकांक्षा पैदा होती है क्योंकि इच्छा है तो एक जीवन और चाहिए। और जीवन को पाने की इच्छा पुनर्जन्म बन जाती है।

  भगवान श्री कृष्ण कहते हैं"पुनर्जन्म ही दुख का घर है पुनर्जन्म होता है जीवन की आकांक्षा से जीवन की आकांक्षा होती है इच्छा को तृप्त करने के लिए समय की मांग से। पुनर्जन्म का सूत्र या दुख का आधा इच्छा है , तृष्णा। अगर हमें कोई भी इच्छा नहीं है तो हम कहेंगे कि आने वाले कल की मुझे अब जरूरत नहीं रही।

   समय की जरूरत इसलिए है क्योंकि इच्छा की दौड़ के लिए स्थान चाहिए। इच्छा दौड़ती है समय में इच्छा स्थान में नहीं दौड़ेगी। अगर हमारे शरीर को दौड़ना है तो स्थान की जरूरत पड़ेगी लेकिन अगर हमारे मन को दौड़ना है तो स्थान की कोई जरूरत नहीं समय काफी। इसीलिए हम सपने में भी दौड़ सकते हैं सपने में कोई स्थान नहीं होता लेकिन समय होता है।काल होता है सपने में भी दौड़ सकते हैं। आराम कुर्सी पर लेट कर आंखें बंद करके भी अनंत अनंत यात्राएं कर सकते हैं। वी यात्राएं इच्छाओं की यात्राएं हैं और समय में घटित होती है।

  भगवान महावीर से कोई पूछता है-"जब समाधि उपलब्ध हो जाती है तो हमारे भीतर से कौन सी चीज निकल जाती है"तू भी कहते हैं" समय"समय तब हमारे भीतर से निकल जाता है क्योंकि जिस व्यक्ति के भीतर समाधि फलित होती है उसके भीतर इच्छा की दौड़ नहीं रह जाती और उस दौड़ का जो मांग है वह दर्द हो जाता है वह निकल जाता है।

   इसीलिए किसी भी देश में किसी काल में किसी महान व्यक्ति ने समाधि की परिभाषा की ही उसमें बातें अलग हो पर एक बात अनिवार्य रूप से समान है और वह है कि समाधि समयातीत  है कालातीत है। उसे पाने के लिए अपने प्रयासों में तेजी लाओ समग्रता लाओ। अगर इच्छा की है तो इच्छा के स्वाद को और तीव्र करो अगर उस तरफ बड हो तो फिर डरो मततीखे स्वाद से।

   उन्माद की परिपक्वता के लिए पागलपन पूरा होना चाहिए। कच्ची चाहत से काम चलने वाला नहीं है। चाहत पक्की होनी चाहिए। भला ऐसे धीरे-धीरे क्या चलना एक पाव इधर तो एक पाव उधर। समय के नृत्य को और तेज करो। कम समय ज्यादा नहीं है चूको मत जल्दी करो तेजी लाओ। साधना अपनी पूरी त्वरा पर ही होनी चाहिए। जब पानी 100 डिग्री पर उबलता है तो भाप बन जाता है। साधना भी जब 100% होगी तो अहंकार विलीन हो जाएगा। संपूर्णता में पहुंचना ही होगा इसके सिवा कोई अन्य मार्ग नहीं है। इसी मार्ग पर सभी शंकाओं का समाधान।

  

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