google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical संतुलित आहार की परिभाषा क्या है, किस तरह के खाने को संतुलित आहार कहा जाएगा?

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संतुलित आहार की परिभाषा क्या है, किस तरह के खाने को संतुलित आहार कहा जाएगा?

 संतुलित आहार की परिभाषा क्या है, किस तरह के खाने को संतुलित आहार कहा जाएगा?

 Health and wellness

आहार के अभाव में जीवन यापन करना असंभव है। साजिद क्रिया तथा मानसिक विकास में सहायक रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाला पर्याप्त शक्ति और ऊर्जा देने वाला और स्वास्थ्य में वृद्धि करने वाला आहार संतुलित आहार कहलाता है। संतुलित आहार में प्रोटीन ,काब्रोज, वसा, खनिज, लवण, फुजला ‌, जल तथा सभी प्रकार के विटामिन उचित मात्रा में होते हैं जिनसे शरीर की सभी शारीरिक और आवश्यकतओ की पूर्ति हो जाती है। उसे कहा सही हमारे और अंग प्रत्यंग पनपते हैं परिपक्व सु गणित व सुडौल बन पाते हैं। तभी शरीर में शक्ति स्फूर्ति और कार्यक्षमता का संचार हो पाता है। पूर्ण शक्ति और सामर्थ्य के स्लंवालंबी होकर 100 या 100 से अधिक वर्षों तक जी पाएंगे संतुलित आहार से बीमारियां व व्याधियों से छुटकारा ही नहीं वरन पूर्व शारीरिक व मानसिक शक्तियों का विकास हो पाता है।

संतुलित आहार के कार्य;-


  1. भोजन हमारे शरीर को निरोगी रखता है।
  2. भोजन हमारे शरीर में उत्साह स्फूर्ति तेजी सजगता स्मृति तथा उनका प्रवाह रखता है।
  3. भोजन शारीरिक व मानसिक विकास में सहायक है।
  4. भोजन के द्वारा नई कोशिकाओं का निर्माण होता है।
  5. भोजन क्षीण व ह्मस हुई कोशिकाओं की मरम्मत करता है।
  6. भोजन शरीर का निश्चित तापक्रम बनाए रखता है।

संतुलित आहार के कार्य का चुनाव;-

आहार का चुनाव व्यवसाय आयु लिंग जलवाए शारीरिक बनावट पाचन क्षमता तथा गर्भवती को प्रोटीन की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए। प्रतिदिन हमें ढाई सौ से 3000 कैलोरी की आवश्यकता होती है।


  यह कैलोरी हमें संतुलित आहार से ही मिल सकती है। जो हर एक व्यक्ति के लिए संतुलित हो सकता वहीं दूसरे व्यक्ति के लिए असंतुलित भी हो सकता है। आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त,कफ तीनों प्रकृतियां अलग-अलग‌ है फिर एक  जैसा आहर सबके लिए अनुकूल कैसे हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति की रूची ,प्रकृति ,तथा उसकी सारी आवश्यकताएं भिन्न-भिन्न होती है। देश और प्रांत में एक जैसा आहार उपलब्ध नहीं होता इसीलिए संतुलित आहार को निश्चित परिधि में नहीं बांधा जा सकता। एक ही तरह का हाल लेते रहने से शारीरिक आवश्यकता पूरी नहीं होती। अलग-अलग प्रकार के आहार से पूर्व पोषण व शारीरिक आवश्यकताओ पूरी होती है। संतुलित आहार निम्नलिखित बातों को को ध्यान में रखते हुए।
1**आयु;-आयु के साथ हमारे शरीर की जरूरते बदलती रहती है। बच्चों में शारीरिक व मानसिक विकास की गति तीव्र होती है। अताउल ने प्रचुर मात्रा में ऐसे आहार की जरूरत होती है जिसमें सभी प्रकार के पोषक तत्व संतुलित मात्रा में पाए जाए। बच्चों में ऊर्जा की जरूरत की पूर्ति के लिए कार्बोहाइड्रेट सारी विकास के लिए प्रोटीन हड्डियों के विकास के लिए कैल्शियम और फास्फोरस जैसे खनिज लवण एवं बीमारियों से लड़ने के लिए विटामिन आदि पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ आहार में परिवर्तन करना चाहिए क्योंकि इस उम्र में शरीर के निर्माण की कार्यक्रम होते जाते हैं। बढ़ती उम्र में भोजन की मात्रा कम और उसकी गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसीलिए खनिज विटामिन जल युक्त आहार आवश्यक हो जाता है। अतः फल सब्जियां दूध बुढ़ापे में हल्का और सुपाच्य आहार लेना चाहिए।
2**लिंग**स्त्री व पुरुष की शारीरिक बनावट एवं कार्य क्षमता में अंतर होता है। पुरुष स्त्री की अपेक्षा अधिक समय तक कठोर परिश्रम कर सकता है उसका वजन लंबाई व शारीरिक गठन स्त्री से अधिक होता है इसीलिए इतनी का अपेक्षा पुरुषों को अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
3**पाचन क्षमता**पाचन क्षमता और आहार का बहुत गहरा संबंध है कमजोर पाचन क्षमता वालों को वसायुक्त अधिक कैलोरी युक्त आहार नहीं देना चाहिए। कमजोर पाचन शक्ति वाले किसी से कहने से या किसी को ज्यादा खाता देख भी अधिक भोजन नहीं कर सकते। स्त्री की अपेक्षा पुरुषों की पाचन शक्ति अधिक होती है।
4**शारीरिक बनावट**सभी व्यक्तियों की शारीरिक बनावट भिन्न-भिन्न होती है लंबे-लंबे दुबले मोटे व्यक्तियों को सारी बनावट के अनुसार की आवश्यकता होती है।
5**वातावरण, मौसम और जलवायु**आहार का जलवायु आचरण से गहरा संबंध है। ठंडी प्रदेश में सर्दियों में ऐसे हार की आवश्यकता होती है जो शरीर में गर्मी बनाएं या ऊर्जा प्रदान करें जैसे गरम मसाले बाजरा मक्की गुड मेवे आदि। गर्मियों में या गर्म प्रदेशों में गर्म पदार्थ का सेवन हानि प्रद है। इस मौसम में ठंडी में शीतल आहार ले जैसे खरबूजा, तरबूज, जामुन ,शहतूत, पुदीना खिन्नी आदि।
 
6**कार्य और आहार**आहार दैनिक कार्यों पर निर्भर करता है। शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्तियों में अधिक ऊर्जा का व्यय होता है। उनका भोजन ऐसा होना चाहिए जिससे अधिक उर्जा है कैलोरी प्राप्त हो। काब्रोज या वसायुक्त भोजन की आवश्यकता हर अधिक प्रदान करने वाले होते हैं । शिक्षण अधिक करने वाले व्यक्तियों को अधिक ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती है तो उन्हें प्रोटीन युक्त आहार जैसे फल सब्जियां लेनी चाहिए। घर पर रहने वाली भेजनी है काम मशीन या नौकर करते हैं उन्हें हल्का पौष्टिक और सुपाच्य आहार लेना चाहिए।
7**रोग और आहार**रूप में यहां पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि रोग में आहार ही औषधि है। जैसे हृदय रोगी को वसायुक्त आहार होता है,, मोटापे में असंतुलित वरिष्ठ आहार, मधुमेह में मीठे आहार, जुकाम हुआ जोर में ठंडे शीतल प्रकृति के आहार लेना हानिप्रद है।
फल व सब्जियों की पौष्टिकता;-प्रकृति प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट पैदा नहीं करती वह तो संपूर्ण खाद्य  पैदा करती है। हमें अपनी आवश्यकता द्वारा आहार को संतुलित  बनाना चाहिए। जो सब्जियां जमीन के ऊपर होती है जैसे लौकी तोरई टिंडे बैगन गोभी परवल आदि उन्हें जल तत्व अधिक होता है। इनमें शरीर से मल निष्कासन की शक्ति अधिक होती है। गाजर मूली खीरा टमाटर सिंघाड़ा ककड़ी आदि को कच्चा ही खाना चाहिए। इसमें रेशा अधिक मात्रा में होता है ।आलू शकरकंद आदि में जल तत्व कम होता है। यह कंद उपर्युक्त सब्जियों के अपेक्षा गरिष्ठ होते हैं। सूर्य की गर्मी से प्राकृतिक तत्व उससे पके फल खाने चाहिए इसमें अप्राकृतिक रूप से पकाए हुए फलों से बहुत अधिक गुण होते हैं। रसदार फल शरीर का शुद्धिकरण करने में सहायक होते हैं। गुदेदार फलों में पोषक तत्व अपेक्षा कृत अधिक होते हैं। रसदार फल सुपाच्य तथा गुर्जर दारफल गरिष्ठ माने जाते हैं।
  संतुलित आहार में 60% फल सात सब्जियों में 20 परसेंट अन्य दाले काष्ठज मेवा दो 20% देसी घी दूध दही तेल आदि सम्मिलित करनी चाहिए।
आज पदार्थों का पाचन (कब कहां और कैसे?)
खाए पिए का पाचन कैसे होता है ‌ भोजन शरीर में जाकर कैसे परिवर्तित होता है तथा लाभप्रद कैसे सिद्ध होगा। पानीपत क्यों होगा आदि के बारे में पाचन तंत्र का ज्ञान होने पर जाना जा सकता है। तभी हम समझ सकेंगे कि भोजन की आदत सही रखना क्यों आवश्यक है। हम ज्ञान से सर्वसाधारण शरीर को निरोगी रख सकते हैं।
1=मुंह में पाचन;-जो हम खाते हैं उसे दांतो से चलाया वह पीसा जाता है मुंह के नीचे ऊपर मसूड़ों में विशेष प्रकार की ग्रंथियां होती है जिनसे एक प्रकार का गाढ़ा रस निकलता है जिसको लार या सलाइवा कहते हैं। लार में एक प्रकार का एंजाइम या हार पदार्थ टाइलिन होता है जो श्वेतसार, कार्बोहाइड्रेट गेहूं चावल जाओ आलू शकरकंद मीठे फल आदि को शर्करा में परिवर्तित कर देता है। इसीलिए भोजन को हम जितनी देर चलाएंगे उतनी देर में अधिक मात्रा में लार का स्राव होता रहेगा। जमाने से बिना शक्ति लगाए अपने आप भोजन गले के नीचे चला जाएगा। पूरी तरह से चबाया गया आहार शीघ्र पच जाता है। रानू भाई उसको कुछ देर चलाते रहने पर अंत में मिठास का अभव इस एंजाइम के प्रभाव के कारण ही स्टार्ट से शर्करा बनने से होता है।
2=अमाशय में पाचन;-निगला हुआ आहार ,आहार नली से होता हुआ अमाशय में प्रवेश करता है। यह एक 13 इंच लंबी में 4 इंच चौड़ी गतिशील थैली होती है। अमाशय की भीतरी सतह पर पाचक रस का निर्माण करने वाली ग्रंथियां होती हैं जिनमें पेप्सिन व रेनिंन नामक पाचक आंवला निकलकर भोजन में मिलते हैं। दीपक दहिया बना देता है जैसी पचाने में सुगम हो जाता है । पेप्सिन वसा, मांस, अंडा ,दाले काष्ठछ मेवे  आदि‌ का पाचन करता है जिससे वसाका ग्लिसरीन जैसा पदार्थ बनता है । यह दो बातों का ध्यान रखें प्रथम भोजन करने में 3 घंटे बाद तक कोई भी वस्तु पेट में न डाले क्योंकि जब अमाशय में पाचन क्रिया जारी रहती है और हम आशंका रस भोजन को पचाने योग्य बनाता रहता है उस समय कोई खाद्य या पेय पदार्थ अमाशय में जाने से उसमें लार की खाल मिल जाती है। टाइलिन खार  पहुंचने में गैस्ट्रिक जूस का कार्य उस समय तक स्थगित हो जाता है जब तक टाइलिन खार का समन्वय ना हो जाए। दूसरा ठुसकर नहीं खाना चाहिए क्योंकि इससे अमाशय में पाचन क्रिया करने में बाधा पैदा होती है। इसीलिए आधी रोटी की भूख रखकर भोजन करना चाहिए।
3=पाक स्थली में पाचन;-जब तक अमाशय का कार्य पूरा नहीं होगा पक्काशय (डइडओनम) की ओर मुंह का खाना नहीं खुलेगा। जब हम तैयार हो जाता है तब वह भोजन छोटी आंतों के पहले भाग अर्थात पक्काशय में पहुंच जाता है।यह पक्काशय 10 इंच लंबा और 1 इंच मोटा अंग्रेजी केc आकार जैसा पाइप होता है । इस पाइप में दो नदियां आकर मिलती है। एक नली यकृत से मिलती है इससे पित्ताशय से द्वारा एक गिलास लिए हुए हरा , खारा वह कड़वा रस आता है जिसको पित्त कहते हैं। यह पित्त वसा का पाचन योग्य बनाता है। दूसरी नली से क्लोम निकलता है। यह कार्बोहाइड्रेट वाले पदार्थों को अच्छी शक्कर में बचे हुए प्रोटीन को 15 म और चिकनाई को एक गाड़े खट्टे पाचन युक्त रस में बदल देती है।
4=छोटी आंत में पाचन;-लीवर के दाहिने फेफड़े के नीचे अमाशय की दाहिनी ओर स्थित शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। पक्वाशय से में भोजन खूब पचने लायक बन जाने पर छोटी आंत में आता है। छोटी आते लगभग 22 फुट लंबी 1 इंच चौड़ी है। इनके अंदर की दीवारों में करोड़ों छोटी-छोटी फुल बत्तियां होती है। इसके अंदर दो प्रकार की बाल से ज्यादा बारीक नलिया होती है। एक रत ले जाने वाली नली आया कोशिकाएं जिसको कैपिल रोज कहते हैं जो पचे हुए भोजन से रस चूस कर लीवर में पहुंचा देती है। दूसरी सफेद रस की रस्सी कहा है जिस को लिम्फेटिक ड्रक्ट्स कहते हैं जो गाड़ी चिकनाई के लेस को एक बड़ी लसिका नली द्वारा गर्दन तक पहुंचा देती है। इसके अतिरिक्त आंतों की दीवारों से एक रस और भी निकलता है जो कार्बोहाइड्रेट वाले पदार्थों को ग्लूकोस में तथा प्रोटींस को पेप्टिन में बदले जा चुके हैं को एमिनो एसिड में बदल देता है ताकि रक्त में मिल सके।
5=बड़ी आंत में पाचन:-छोटी आंखों में फूल बच्चियां द्वारा चूसने के बाद आहार बड़ी आंख में पहुंचता है यहां बचा खुचा रस चूस कर रेक्टम में पहुंच जाता है जहां सारा पानी अवशोषत हो जाता है।
6=मलाशय:-मलाशय  लगभग 6 से 8 इंच लंबा होता है। यदि मल निष्कासन नहीं होता तो वह इसमें चढ़ता रहता है अन्यथा मलद्वार से बाहर निकल जाता है।
  श्वेतसार और प्रोटीन खाद्य एक साथ नहीं खाने चाहिए क्योंकि श्वेतसार की पाचन क्रिया मुंह में मुंह के बाद छोटी आंत में होती है, प्रोटीन की पाचन क्रिया अमाशय में, राई का पाचन पाक स्थली में, मैं होता है। इस सिद्धांत के अनुसार हर प्रकार के खाद्य के लिए विशेष प्रकार की पाचन ग्रंथियां अपना अपना कार्य करती है। विरुद्ध आहार लेने पर कब्ज गैस अपच हो जाती है जिससे दांतों में खून, पुल, मुंह पर मुंहासे टांसिल बढ़ना और खांसी यकृत रोग हृदय रोग सिरदर्द आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
बेमेल भोजन;-
कई खाद्य पदार्थ एक दूसरे से मिलकर विष के समान हो जाते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थों को एक साथ नहीं लेना चाहिए ।


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