Health care tips,मानव शरीर में जल की मात्रा शरीर के भार का कितना प्रतिशत होता है
तरल पदार्थो का प्रयोग;-
जल एक मात्र ऐसा पेय है जिसकी पूर्ति किसी भी तरल पदार्थ से नहीं हो सकती। दूध ,मट्ठा ,लस्सी ,सर्वत ,फल व सब्जियां के रस तरल आहार है।
चाय कॉफी सॉफ्ट ड्रिंक्स जैसे कोकोकोला मिरांडा माझा आदमी रसायन व प्रिजर्वेटिव जैसे अनेक जहर मिले होते हैं। अतः इनका का प्रयोग नहीं करना चाहिए। प्रकृति ने हमें बहुत से प्राकृतिक तरल पदार्थ दिए हैं उनका हम प्राकृतिक रूप में ही सेवन करके उनसे पूर्ण लाभ उठा सकते हैं।
जल (Water);-
जीवन के लिए वायु के पश्चात दूसरा स्थान पानी का है भोजन के बिना 1 से 2 माह तक रह सकता है किंतु जल के बिना 1-2 दिन भी जिंदा नहीं रह सकता। यह हमारे शरीर के वजन का लगभग 65 परसेंट होता है। जल का इतने अधिक परिमाण में हमारे शरीर में होना स्वयं यह सिद्ध करता है कि हमारे शरीर में कितना महत्वपूर्ण स्थान है। हम पानी की आवश्यकता प्यास द्वारा अनुभव करते हैं। पानी की प्यास पानी द्वारा ही बुझाने चाहिए पानी के स्थान पर चाय कॉफी शरबत सोडा दूध लस्सी आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
हमारे शरीर में जल का कार्य( function of water in our body)
मुंह की लार और अमाशय का पाचक रस पानी के साथ मिलकर भोजन का पाचन शीघ्रता से करते हैं। जल का निष्कासन निरंतर हमारे शरीर से मल मूत्र पसीना सांस आदि द्वारा होता रहता है। जलवायु ,शारीरिक श्रम, आहार, उम्र का इस पर विशेष प्रभाव पड़ता है। बच्चों में युवाओं की तुलना में पसीना अधिक निकलता है। खाद्य पदार्थों के सेवन से पोषक तत्व जल में घुलनशील होने के कारण प्रत्येक कोशिका तक पहुंचते हैं जैसे चीनी पानी के साथ मिलकर रासायनिक क्रिया द्वारा ग्लूकोज फल शर्करा में परिवर्तित हो जाते हैं। शरीर को बाहरी गर्मी से बचाने में पानी त्वचा के चित से पसीने के रूप में निकल कर उसे शीतल बनाए रखता है तथा सर्दी में गर्माहट लाता है।
हिप्पोक्रेट्स;-
"बुखार में पानी पीना उपचार का काम करता है"पानी शरीर में केवल जहर निष्कासन का कार्य नहीं करता बल्कि शक्तिदायक भी है। पानी पीने से रोग की गंदगी तीव्र गति से बाहर निकल जाती है। और शक्ति भी मिलती है। यदि पेशाब का रंग पीला हो तो समझना चाहिए कि पानी पर्याप्त मात्रा में नहीं किया जा रहा है चाहे वह स्वस्थ व्यक्ति हो या बीमार। ज्वर में प्रति 1 घंटे एक गिलास पानी पीना चाहिए। आहार में अधिक प्रोटीन अधिक जल मांगता है क्योंकि उन से निकले नाइट्रोजन पदार्थों को निष्कासित करने के लिए गुर्दों को अधिक जल की आवश्यकता होती है। बच्चों के विकास में प्रोटीन अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होना चाहिए। उसके अनुसार जल किया जाना चाहिए दूध पिलाने वाली मां को जल अधिक पीना चाहिए जिससे दूध पतला व सुपाच्य हो जाए।
नमक मसाले उत्तर भोजन शक्कर के पाचन से उत्पन्न गर्मी की अवस्था में रक्त को सम अवस्था में रखने के लिए पानी की आवश्यकता अधिक होती है। उपवास काल में जीवन शक्ति को और कामों से छुट्टी रहती है अतः शरीर की गंदगी निकालने में लगी रहती है अताउल वास में हर 2 घंटे में एक गिलास पानी पीते रहना चाहिए जिससे जीवन शक्ति के काम में सहायता मिले।
जल कब और कैसे पिए?(when and how to drink water);-
नाश्ते वो भोजन के आधे घंटे पहले एक गिलास ठंडा और जल पीने से आमाशय में बचा हुआ भोजन आंतों में चला जाएगा और भूख अच्छी तरह लगेगी। इससे आंतरिक जीर्ण निष्क्रियता व कब्ज दूर होगा। अमाशय की सफाई के लिए गर्म जल बिना उपयोगी है गर्म जल कीटाणुओं को रोकता है तथा रक्त वक्त तंत्र की सफाई करता है। भोजन के बीच में एक-एक जल पी सकते हैं।3से,4 घंटे में आमाशय में भोजन हाथों में चला जाए तब प्रत्येक भोजन के बाद ढाई सौ ग्राम गर्म जल पीना चाहिए। 3 घंटे से पहले जल पीने से यह भोजन में मिल जाता है तब उस जल के साथ पाचक रस अमाशय से शीघ्र बाहर निकल जाते। अतः भोजन के पाचन में अधिक समय लगता है। अन्य समय में डेढ़ घंटे में एक गिलास जल पीते रहना चाहिए। तरल खाद के साथ मुक्त रूप में जल पीना चाहिए।
आयुर्वेद के अनुसार जल का सेवन( water intake according to ayurveda)
रात्रि के प्रथम पहर में जल पीना शरीर के लिए जहर के सामान हानि प्रद होता है। प्रात सूर्योदय से पहले पिया गजल मां के दूध के समान शरीर को लाभ देता है। आयुर्वेद ग्रंथ योगरत्नाकर के अनुसार नियमित उषाकाल में जल का सेवन करना अर्थात सुबह बिस्तर से उठ कर तत्काल बिना मुख प्रक्षालन बिना मूत्र मल त्याग के चार गिलास जल पीने वाला व्यक्ति रोगी तथा बुढ़ापे से मुक्त रहते हुए 100 साल तक जीता है। इससे वात पित्त कफ तीनों दोषो से पैदा हुआ विविध विकार शांत होने लगते हैं। पाचन क्षमता में अपेक्षित सुधार आने लगता है शरीर मजबूत होता है।
आयुर्वेद के अनुसार लोहे के बर्तन में रखा तथा तांबे के बर्तन में रखें जल का महत्व (According to the importance of water kept in iron vessel and water kept in copper vessel)
लोहे के बर्तन में रखा दूध तथा तांबे के बर्तन में रखा जल पीने वाले व्यक्ति को कभी यकृत या रक्त संबंधी बीमारियां नहीं होती। इनका रक्त सदा निर्मल बना रहता है। जल से भरा ताम्र पात्र सीधे भूमि के संपर्क में नहीं रखना चाहिए बल्कि उसे लकड़ी के टुकड़े के ऊपर रखना चाहिए। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता में आश्चर्यजनक बढ़ोतरी होती हैं। तांबा कोशिकाओं की झिल्ली और एंजाइम में हस्तक्षेप करता है जिससे रोगाणुओं के लिए जीवित रह पाना संभव नहीं हो पाता। जल सदैव उकडू होकर पीना चाहिए।
जल शरीर के सामान तापमान का ही होने वाला होने के काम में लाना चाहिए। बर्फ काजल जिसमें पर्याप्त औसजन का अभाव होता है पीने से पाचन क्रिया खराब हो जाती है ज्यादा गर्म जल या चाय पीने से पाचन प्रणाली झुलस जाती है। सोते समय एक गिलास जल अवश्य पीना चाहिए। रात को सोने से पहले पेशाब अवश्य करके सोना चाहिए स्नान करने से पहले पेशाब अवश्य करना चाहिए पेशाब करने से पहले जल पीना चाहिए पेशाब करने के तुरंत बाद जल नहीं पीना चाहिए। दोनों समय भोजन के तुरंत बाद पेशाब जाना चाहिए इससे गुर्दे ठीक रहते हैं। दिन भर जितना जल पिया है लगभग उसका आधा भाग पेशाब जरूर होना चाहिए। सुबह का उबला जल दूसरे दिन काम में ना लें रात को वाले तो रात को पीने सुबह ताजा जल उबाले जल को दोबारा गर्म नहीं करना चाहिए।
जल की उपयोगिता ( utility of water )
- जल से हमारे शरीर में शांति,कार्य में तत्परता आती है तथा सभी तंतु र्कियाशील रहते हैं।
- ठण्डे जल की गुण होते इसलिए इसका प्रयोग औषधि रूप में किया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में जल से अनेकों रोग ठीक किए जाते हैं।
- जल में दिव्य शक्ति इसलिए स्नान से सारा शरीर हल्का-फल्का सा हो जाता है । शरीर की मैल गंदगी दूर हो जाती है मन शांत एकाग्र होकर अलौकिक आनंद की अनुभूति करता है।
- सुबह से रात तक जल की हर काम में आ सकता पड़ती है जल में हर प्रकार की स्वच्छता मिलती है।
- जल से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है।
- आंतरिक ग्रंथियों के स्राव व हारमोंस का मौलिक अंश बनाता है कोशिकाओं को आवश्यकतानुसार ऑक्सीजन पहुंचाता है।
- मस्तिष्क को मरुदंड के लिए पोषक को बफर का कार्य करता है और अच्छा वह प्यास को दूर करता है।
- जहां चिकनाई की आवश्यकता होती हूं चिकनाई पैदा करता है जैसे जोड़ों में हृदय में, आवरण परतो ,में आंतो में।
- जल थकान को दूर करता है ऑक्सीजन ऊर्जा तथा हाइड्रोलिटिक प्रक्रिया में पोषक तत्वों को कोशिकाओं की आवश्यकता के अनुरूप नेतृत्व में परिवर्तित करने में सहायता करता है।
- मल में मिश्रित होकर उसे आसानी से विसर्जन योग्य बनाता है।
- भोजन का रंग रूप और सुगंध से लार ग्रंथियों में विद्यमान ट्रांस कोशिकाओं से जल्लाद के रूप में टपकने लगता है। यह लाल भोजन के कौर को मुंह में पहुंचते ही अपना कार्य प्रारंभ कर देती है। क्लार्क और को छोटे-छोटे टुकड़ों में बुलाकर कौर को निकलने में सहायता मिलती है।
- जले कृत तथा गुर्दे में भी विजातिय है के संचय को दूर करता है।
- अफीम तंबाकू शराब तथा अन्य विषैले पदार्थों का विश्व जल पीने से तेजी से घुलकर निकल जाता है।
- पर्याप्त जल पीने से सर्दी ,जुकाम ,सिर दर्द ,मधुमेह, जोड़ों का दर्द ,खून की कमी ,आति अम्लता, पेचिश, कब्ज, मासिक स्राव की अनियमितता ,उच्च रक्तचाप, अपच भूख न लगना पाचन संबंधी सभी बीमारियां त्वचा विकार आदि रोग दूर हो जाते हैं। तथा जल शरीर की गर्मी को भी दूर करता है।
जल के अभाव में होने वाले रोग (Diseases caused due to lack of water);-
यदि शारीरिक जल की मात्रा 10% की कमी हो जाए तो निर्जलीकरण की स्थिति बन जाती है। बच्चों को यदि 20 परसेंट जल की कमी हो जाए तो मृत्यु तक हो सकते हैं। निर्जलीकरण से आंखें निस्तेज वह धसी हुई मुंह सुखा सुखा चमड़ी पर झुर्रियां पड़ी हुई हाथ पैर में ऐठन व ठंडे पेशाब की अत्यधिक कमी रक्तचाप गिरा हुआ तथा नाड़ी पकड़ से बाहर हो जाती है। ऐसी स्थिति में एक गिलास जल में चुटकी नमक व दो चम्मच ग्लूकोस मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पिलाते रहना चाहिए। जल के अभाव में शरीर के तंतु तथा रक्त से जल्द खर्च होता है तब तंतु का लचीलापन नष्ट हो जाता है रक्त गाढ़ा हो जाता है तब हृदय को अधिक श्रम करना पड़ता है। परिणाम स्वरूप रक्तचाप मल सूखने से कब्ज होकर उस में सड़न उत्पन्न हो जाती है।
गर्म जल पीने के लाभ (Benefits of drinking hot water);-
जल मात्र प्यासी नहीं पूछा था बल्कि से गर्म करके पीने से यह औषधि के समान हो जाता है। चंचल के अनेक औषधीय गुण छिपे हुए हैं जिनसे शरीर की विविध रोगों से मुक्ति मिलती है।
- आयुर्वेद के अनुसार जल उबलते जल से झाग आने बंद हो जाए और जल आधा रह जाए तब वह निर्मल हो जाता है इससे उष्णोदक की संज्ञा दी जाती है। उष्णोदक तक का सेवन करने से होने वाले लाभ इस प्रकार है;-
- कफ संबंधी रोग जुखाम खांसी दमा नजला आदि बीमारियों का नाश होता है।
- गर्म जल के नियमित सेवन से शरीर संतुलित बनता है एवम मोटापे से मुक्ति मिलती है।
- इससे पेट की अग्नि जेठाराग्नि ठीक रहती है।
- मूत्र संस्थान की भली-भाति सफाई हो जाती है पुराना बुखार दूर हो जाता है।
- जल उबलते समय चौथाई हिस्सा जल जाए और तीन चौथाई भाग पानी का शेष रह जाए तब इसे आग से उतार दे आयुर्वेद के अनुसार यह जल्द स्वास्थ्य को असीम लाभ देता है वॉयु से पैदा हुए दोषों को दूर करता है।
- आयुर्वेद के अनुसार शेष रह जाए ऐसा उबला हुआ जल हमारे शरीर में त्रिदोष को शांत करता है।
- ईट के टुकड़े को आग में गर्म करके जिस जल से बुझाया गया हुआ जल शरीर के समस्त दोषों का हरण करते हुए स्वास्थ्य प्रदान करता है।
- गर्म जल के सेवन से अपार स्नेह एवं आंतों में गति पैदा हो जाती है इससे पेट में रुका हुआ आहार आंतों में जाकर पच जाता है।
- चरक संहिता के अनुसार वायरस जनित तथा वात पैतिक बुखारो में प्यास लगने पर गर्म जल ही पीना चाहिए। घर में गर्म जल पीने से रोगी को होने वाले कुछ लाभ इस प्रकार है;-
- पीटीएम आंतों की बढ़ी हुई वायु सुगमता पूर्वक निकल जाती है,
- पिया गया जल हल्का होने के कारण शीघ्र पच जाता है।
- थोड़ी मात्रा में पिया गया जल भी प्यास को शांत कर देता है।
- फ्री में बढ़ा हुआ कफ आसानी से सूख जाता है। ढीला होकर निकल जाता है।
- पेट की अग्नि प्रज्वलित होती है।
- बालगढ़ ठंडा किया हुआ जल पीने से वायु गोला बवासीर 6 उदर रोग अग्निमांद्य बुखार नेत्र रोग भोजन में अरुचि अतिसार नजला जुकाम आदि रोग दूर हो जाते हैं।
रात को गर्म जल पीने से लाभ;-
- शरीर में बड़ी हुई वायु नष्ट होती है जिससे अनावश्यक रूप से बढ़ी हुई चर्बी आदि से शरीर को मुक्ति मिलती है तथा पेट जांघों आदि पर चर्बी जमना बंद हो जाती है।
- अजीर्ण ,अपच, अफारा ,कब्ज आदि उदर विकार सुगमता पूर्वक दूर हो जाते हैं।
- कब संबंधी विकार जैसे बलगम बनना कोलेस्ट्रॉल बढ़ना लाडला बना रहना सिरदर्द आदि से मुक्ति मिलती है।
सावधानियां;-
दिन में उबला हुआ जल दिन भर रखे रहने से रात को भारी हो जाता है इसी प्रकार रात के समय उबाल आ गया जल सुबह तक भारी हो जाता है। इसीलिए दिन का उबाला जल रात में और रात में उबला हुआ जल दिन में पीना नहीं चाहिए। गर्मी के कारण होने वाले दस्त में गर्म जल नहीं पीना चाहिए। बुखार की उस अवस्था में जब रोगी के शरीर में जलन हो रही हो चक्कर आ रहे हो रोगी अंड संड बोल रहा हो गर्म जल पीना निषिद्ध है।
दूध का सेवन (consumption of milk);-
दूध रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाकर शरीर को सदैव रोगमुक्त रखता है। दूध में विटामिन सी को छोड़कर शरीर के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व होने से इसे एक संपूर्ण प्राकृतिक व संतुलित आहार माना गया है। बीमार व्यक्ति के लिए गाय का दूध औषधि एवं पथ्य के रूप में सर्वोत्तम आहार है। दूध कैल्शियम का अच्छा स्रोत है। दूध को ज्यादा उबाल लेने से उसके पोषक तत्व कम हो जाते हैं और गरिष्ठ हो जाता है किंतु उसकी वायु प्रकृति को कम करने तथा जंतु रोहित करने के लिए दूध को उबालना हितकारी है। वायु प्रकृति को कम करने तथा जंतु रोहित करने के लिए दूध को पालना अधिकारी है दूध को उबालकर उसके ऊपर आई मलाई निकाल देनी चाहिए। मलाई गरिष्ठ शीतल वृष्य बलवर्धक तृप्ति कारक पुष्टि दायक स्निग्ध, कफ कारक, और धात वर्धक है। यह पित्त,वायु, रक्त पित्त,एवम रक्त दोष दूर करती है। शर्करा युक्त दूध कफ कारक
व वायु नाशक होता है। मिश्री वाला दूध वीर्य वर्धक तथा पित्त कफ तीनों दोष को दूर करता है। गुड वाला दूध मुत्रकृच्छ को मिटाता है परंतु पित्त और कफ को खूब गाढ़ा बना लेता है।
गाय का दूध;-पाचक,शईतवईर्य, बुद्धि -बल, वीर्य की वृद्धि करने वाला मधुर शीतल रेचक, कब्ज को दूर करने वाला,स्तन्य,(माता का दूध) बढ़ाने वाला, पित्त तथा रक्त संबंधी रोगों का इलाज करने वाला, 200 धातु तथा नालियों को कुछ ऑर्द करने वाला होता है। यह बुढ़ापे के प्रभाव को नष्ट करने वाला होता है। धरोष्ण दूध अमृत के समान होता है। गाय का दूध निकालने के लिए 2 घंटे बाद उबालकर पीना चाहिए। जो गाय थोड़ा बहुत अन्य खाती हो उसका दूध भारी कब कारक बल तथा मैथुन शक्ति को बढ़ाने वाला और स्वस्थ मनुष्य के लिए गुणकारी है। गाय का दूध सब प्रकार के दूध को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस दूध में विटामिन ए कैरोटीन अन्य दो से अधिक मिलता है।
भैंस का दूध;-
यह दूध ज्यादा मीठा, स्निग्ध, शुक्र कारक, वीर्य वर्धक भारी नींद लाने वाला, कब कारक मोटापा तथा आलस्य बढ़ाने वाला, भूख शांत करने वाला शीतल होता है। एस के दूध के बने दही मट्ठा और घी में भी सभी गुण होते हैं,। भैंस का दूध मानसिक श्रम करने वाले को नहीं पीना चाहिए बल्कि शारीरिक श्रम करने वालों को पीना चाहिए क्योंकि यह शरीर को शक्तिशाली वह पुस्ट करता है।
बकरी का दुध;-
बकरी अधिकांशत पेड़ पौधे के तीखे व कड़वे पत्ते तथा विभिन्न प्रकार की वनस्पति का सेवन करती है। थोड़ा पानी पीती है तथा छोटी पतली होने की वजह से घूमने-फिरने का श्रम ज्यादा करती है। इसीलिए इसके दूध में सब रोगों को दूर करने की क्षमता होती है विशेष रूप से 6 लोगों के लिए बकरी का दूध बहुत ही हितकारी होता है। किसी कारणवश बच्चे को माता का दूध नहीं दे पा रहे हो तो उसके स्थान पर बकरी का दूध उत्तम होता है हल्का व सुपाच्य होने से शिशु इसमें सरलता से पचा लेता है। बकरी का दूध कसैला मधुर शीतल ग्राही हल्का रक्तपित्त अतिशय खांसी तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है। सभी नेत्र रोग नेत्र में लाली वसूल आदि होने पर बकरी के दूध में भिगो ही पट्टी आप पर बांधकर सोने से अमृत का काम करता है।
मां का दूध;-
प्रकृति ने दूध को संपूर्ण आहार इसीलिए बनाया है। ताकि वह नवजात शिशु के शरीर को विकसित पुष्ट और सुडौल बनाने में सक्षम सिद्ध हो। मां के दूध में प्रोटीन कब तथा कार्बोहाइड्रेट अधिक होता है जिससे बच्चा मां के दूध को सरलता से बचा सकता है। मां के दूध से बच्चे का मानसिक विकास अच्छा होता है बच्चे की मां को विटामिन सी की मात्रा बढ़ाने से बच्चे के विकास में मदद मिलती है। मां के दूध में कई प्रकार के एंजाइम तथा रोग प्रतिरोधक तत्व पाए जाते हैं। जो बच्चों को पोलियो, डिप्थीरिया, दस्त ,खांसी, मस्तिष्क शोध, अन्य कई बीमारियों से बचाते हैं। माता का प्रथम दूध कॉल एस्टरियम बच्चे को अवश्य पिलाना चाहिए उसमें रोग अवरोधक तत्व होते हैं।
जिन बच्चों को मां का दूध नहीं मिलता वे उदंडी तथा अपराधी प्रकृति के होते हैं मां का दूध शीतल, लघु ,स्निग्ध ,अग्नि प्रतिपक्ष व जीवनदाई होता है।
दूध कब पीना और कब नहीं पीना चाहिए;-
- प्रात 9:00 से 10:00 बजे दूध का सेवन करने से शरीर में सभी रसों की वृद्धि होती है यह भूख को बढ़ाता है तथा रक्त की वृद्धि करता है। ब्रह्म मुहूर्त में किया गया दूध वीर्य वर्धक पुष्टि कारक और अग्नि प्रदीपक होता है।
- सुबह का दूध विशेषता शाम के दूध की अपेक्षा भारी व शीतल होता है शाम का दूध सुबह की अपेक्षा हल्का होता है और वायु तथा का नाश करने वाला होता है। दोपहर का दूध का सेवन शरीर को बल प्रदान करने वाला कफ पित्त का नाश करने वाला तथा भूख बढ़ाने वाला होता है।
- राज्य में दूध का सेवन करने से सभी दोष दूर होते हैं तथा आंखों के लिए विशेष लाभदायक है। बुध प्रदोष नाशक वृद्धि के लिए वीर्य प्रद वह अत्यंत पथ्य कारक है। दिन में दाहकारक खानपन का सेवन करने वालों को दाह शांत करने के लिए रात को दूध पीना चाहिए।
- दूध को गर्म करके गुनगुना पी पीने से कफ तथा वायु का नाश वह गर्म करके ठंडा पीने से पित्त का नाश होता है।
- अधिक उबला गाढ़ा दूध रक्त में अमृता लाकर कई जीण रोग, उदर रोग , गठिया ब्लड प्रेशर आदि पैदा करता है।
- अधिक गर्म दूध पीने से मुंह की लार दूध में मिल जाती है जिससे दूध देर से पचता है।
- रात को सोते समय दूध पीना हानिकारक होता है इससे पाचन क्रिया फिर से शुरू हो जाती है। फल स्वरुप गहरी नींद नहीं आती अतः सोनू से दो-तीन घंटे पहले दूध पीना उचित है।
- दूध धीरे-धीरे चुस्की ले कर पीने से शीघ्र पचता है।
- दूध का सेवन मुरली शराब मांस मछली खटाई पान केला साग नमक तेल तुलसी आदि के साथ ना करें यह विरुद्ध आहार है।
- दूध को खट्टे फलों के साथ लेने से यह शीघ्र पचता है।
लस्सी;-
दही में बराबर का पानी डालकर मारने से लस्सी बनती है इसमें वध के स्थान पर थोड़ा ठंडा पानी डाला जाए तो अधिक हितकारी होता है उत्तर भारत में पंजाब में छाछ में थोड़ी शक्कर डालकर लस्सी बनाई जाती है यह गर्मियों में गर्मी शांत करती है तथा लू से बचाती है। यह शरीर को शक्ति देती है इसको मीठा करने के लिए शक्कर मिश्री गन्ने का रस गुण से हराया फलों का रस मिला सकते हैं इसमें दही के सभी गुण निहित होते हैं।
छाछ;-
छाछ गर्मियों का टॉनिक है। भाव प्रकाश ने बताया है कि देवलक में जो अस्थान अमृत कहा है वही अस्थान मृत्युलोक में छाछ का है। दूध की अपेक्षा दही व मट्ठा अधिक सुपाच्य होती है। छाछ के नेत्र सेवन से शरीर निरोगी रहता है तथा तक्र चिकित्सा से समाप्त रोग पुनः कभी नहीं होते। छाछ पीने वालों को वृद्धावस्था देर से आती है उनकी त्वचा पर सिलवटें नहीं पड़ती यदि पड़ गई तो दूर होकर त्वचा वर्ण में क्रांति आ जाती है। छाछ की कढ़ी स्वादिष्ट पाचक होती है या शरीर के पोषण में लाभकारी व अंगों को ताकत देती है। बुद्धि को बढ़ाती है प्रोटीन विटामिन की कमी पूर्ति करती है मानसिक शारीरिक स्वास्थ्य बनाने में उपयोगी है आंखों की रोशनी बढ़ाने में सहायता करती है।
छाछ कैसे बनाएं;-
गाय का दूध जमा कर कम खटाई दही में 3 गुना पानी मिलाकर मक्खन निकालने उसको सुबह भोजन के बाद एक गिलास की पतली चार्ज हल्की और पचने वाली होती है। छठ शीतल हल्की पित्त श्रम तथा तृषा को दूर करती है। यह उष्ण वीर्य हैं। यह हृदय को बल देती है रक्त शुद्ध करती है। गलती है भूख बढ़ाती है इसका कसैला रस कफ दोष को दूर करता है तथा पीलिया में पांडुरोग में उपयोगी है। आज का मधुर रस पित्त को शांत करता है।
जिन व्यक्तियों को भूख नहीं लगती पाचन होता हो खट्टी डकार ए पेट में आभारी की वजह से छाती में घबराहट संग्रहणी आदि रोगों उनके लिए छाछ अमृत के समान है। हर बंद करने केवल छाछ का सेवन करने से मल शुद्धि होती है शरीर फूल साल का हो जाता है शरीर में स्फूर्ति उत्साह जठर आंतों को आराम और ताजगी मिलती है। छठ जठराग्नि को प्रदीप्त करता है तथा पाचन संस्थान के विभिन्न अंगों को बल देती है। इसीलिए भोजन के पश्चात छाछ पीने से भोजन का ठीक से पाचन होता है। छाछ आंतों के रोगों में उपयोगी है यह हाथों को संकुचित कर उन्हें क्रियाशील बनाकर जीर्ण मल को बाहर निकाल देती है। छाछ टाइफाइड से उत्पन्न आंतों की गर्मी आंतों में पड़े हुए वरण उस में आने वाली बुखार शरीर के दाह व तृषा को मिटाती है।
छाछ कल्प ;-
आहार बंद करके केवल छाछ का सेवन करने से नवजीवन प्राप्त होता है। अग्नि प्रबल होने पर रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। बात जन्य रोगों में छाछ में सेंधा नमक और सोंठ डालें, पित्तजन रोगों थोड़ी सी इलायची और मिश्री डालें। कफ जन्य रोगों में त्रिकूट मिलाएं। अतिसार ग्रहणी रोगों में जीरा घी में भनी हुई हींग और सीधा नमक मिलाकर तक्र कल्प करना चाहिए। पेट की बीमारियों में थोड़ा-सा सेंधा नमक और भुना जीरा मिलाकर पीने से लाभ होता है। नमक की छाछ अग्नि वर्धक तक होती है।
छज्जा हरलाल किस राव विषम ज्वर, पांडु रोग भेद मूत्र रोगों में भगंदर में मधुमेह वायु गुल्म,शूल,अरूचि,श्वेतकुष्ठ,सुजन,कृमि रोगों दूर करने वाली होती है।
छाछ कब वर्जित है;-
- दुर्बल व्यक्ति को छाछ का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
- इसको मिट्टी के अलावा अन्य धातु के पात्र में नहीं रखना चाहिए मिट्टी के बर्तन में या खराब नहीं होती।
- रात्रि में छाछ का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
- कफ प्रधान व्यक्तियों को इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।
- मूर्छा तथा रक्तपित्त के रोगियों को छाछ का सेवन नहीं करना चाहिए।
फल व सब्जियों के रस का प्रयोग (Use of fruit and vegetable juices);-
सब्जियों व फलों में बड़ी मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। जैसे प्याज लहसुन टमाटर अनार अंगूर आदि। प्रतीक अवस्था में लेने से यह व्यक्ति को स्वस्थ सुंदर व युवा रखते हैं।
सब्जी का रस आहार;-
जिन सब्जियों को कच्चा खा सकते हैं उनका ही रस निकालकर पीना चाहिए जैसे आंवला गाजर टमाटर खीरा ककड़ी पालक धनिया पुदीना आदि। सब्जियां ताजा होनी चाहिए इनको कच्चे रूप में उपयोग करने से उनके अधिकांश पोषक तत्व को गुण का लाभ शरीर को मिल सकेगा। लौकी टमाटर टिंडे ककड़ी पालक आदि कई सब्जियों को मिलाकर उबालने मिक्सी में पीस लें यह सब्जियों का सूप बन गया बीमार व स्वस्थ व्यक्ति के लिए औषधि के रूप में पोषक व शक्ति दायक पेय पदार्थ है।
फलों का रस;-
सेब अनार अनानास नाशपाती अंगूर संतरा मौसमी आदि का रस पीना शक्ति दायक है। रस शरीर के रक्त व सभी तत्वों को शुद्ध करते हैं। यह मैसेज से सीधे रक्त संचार में आत्मसात हो जाते हैं। शरीर के विजातीय द्रव्यों को रक्त से निकालकर उसे निर्विकार कर देते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में फल व सब्जियों के रस आहार से ही असाध्य रोग दूर किए जाते हैं। द्राक्ष का रस शरीर शुद्धि के लिए उत्तम है मधुमेह के रोगियों के लिए संतरा का रस ज्यादा अनुकूल है। फलाहार से तनमन में स्फूर्ति व चेतना आ जाती है।
गन्ने का रस;-
गर्मियों में गन्ने का रस गर्मी शांत करके शीतलता प्रदान करता है गन्ने का रस पौष्टिक और स्वादिष्ट दृष्टि से उत्तम पेय पदार्थ है। अनुपम उपहार है जो हमें मिठास के साथ ऊर्जा भी प्रदान करता है। इसके अद्भुत गुरु के कारण दिनों दिन इसका प्रयोग बढ़ता जा रहा है। पीलिया मंदाकिनी त्वचा रोग पिक अम्ल पित्त खांसी बुखार स्वर भंग मानसिक रोगों में लाभदायक है।
गाजर का रस;-
आजकल सर्दियों में गाजर के रस में चुकंदर डालकर पीने का प्रचलन है यह एक वनस्पति फल है यह कैंसर विटामिन ए की कमी से उत्पन्न रोग नेत्र ज्योति में कमी छाती में दर्द चर्म रोग स्त्री रोग पाचन संस्थान के रूप पेट के कीड़े बच्चों के सामान्य रोग आदि रोगों में उत्तम पेय पदार्थ है।
रसा आहार के नियम;-
- रस को ताजा निकालने पर तुरंत पी लेना चाहिए फ्रिज में रखने से भी इस के औषधि गुण नष्ट हो जाते हैं।
- इन रसो में कुछ भी नमक मिलाकर नहीं पीना चाहिए ना तो शक्कर मिलाकर पीना चाहिए। प्रकृति ने सब कुछ मिलाकर हमें दिया है।
- जिन व्यक्तियों की पाचन शक्ति क्षीण हो उनको पानी मिलाकर पीना चाहिए।
- विनीत दोपहर में खाने के 3 घंटे पश्चात किया जा सकता है।
शरबत;-
नींबू बेलहोल साली जी आदि का गुर्दा पानी में निकालकर मिश्री शक्कर की थोड़ी मात्रा डालकर ठंडा पानी मिलाकर पिए गर्मियों में शरबत शीतलता प्रदान करते हैं तथा इनसे जल पूर्ति होती है क्योंकि यह स्वादु होते हैं।
मिल्क शेक;-
दूध में खट्टे व फलों पके हुए हैं का रस बगुला मिलाकर मिल्कशेक बनाया जाता है। शिव को मीठा करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि फल व दूध की मिठास ही पर्याप्त है। इसमें केसर इलायची बाद आम आदमी पीसकर डल सकते हैं। मिक्सी में बनाया गया से एक अच्छी तरह मिलाकर गाढ़ा हो जाता है इससे एक में वायु भूल जाती है हटाया से पचने में आसान होता है। बेहद ठंडा से दांतों को नुकसान करता है तथा पेट में पहुंचकर पाचन ग्रंथियों को शिथिल कर देता है। बादाम पिस्ता उसका के दाने साफ गुलाब के फूल काली मिर्च सबको भिगोकर पीसकर ठंडाई बनाई जाती है जिस को दूध में मिलाकर पीते हैं इससे मस्तिष्क को ठंडक पोषकता सकता मिलती है।
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