google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical आयुर्वेद के चमत्कार ,ऐसे ८ दिन में खून बढ़ाकर, नवीन रक्त का निर्ण करती है! बेजोड़ इम्यूनिटी बूस्टर

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आयुर्वेद के चमत्कार ,ऐसे ८ दिन में खून बढ़ाकर, नवीन रक्त का निर्ण करती है! बेजोड़ इम्यूनिटी बूस्टर

आयुर्वेद के चमत्कार ,ऐसे ८ दिन में खून बढ़ाकर, नवीन रक्त का निर्ण करती है! बेजोड़ इम्यूनिटी बूस्टर

कोई भी दवा देने से पूर्व यह जानना आवश्यक है की रोग की उत्पत्ति किस कारण से हुई है । जिस कारण से रोग पैदा हुआ उसकी पूरी जानकारी पहले रोगी से पूछ कर करें। तत्पश्चात मूल रूप के चिकित्सा करें। कभी-कभी ऐसी भी स्थितियां देखी गई है की दवा अपना पूरा असर नहीं दिखाती क्योंकि रोग कुछ और कहता है और चिकित्सा अन्य किसी रोग की होती है।

  पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की प्रकृति अधिक कोमल होने के कारण इनको पुरुषों के समान मात्रा औषधि नहीं देनी चाहिए। इसके अतिरिक्त कमजोर व्यक्तियों तथा वृद्धावस्था वाले लोगों को स्त्रियों के समान मात्रा निश्चित करके देनी चाहिए। मात्रा प्रत्येक औषधि के साथ जो लिखी गई है वह दे या वैध हकीम से परामर्श करके दे। नुक्सा उतना ही बनाना चाहिए जितना की आवश्यकता हो अन्यथा अधिक बनाने से एक तो पैसे अधिक खर्च होंगे दूसरा खराब होने का डर रहता है।

पथ्यापथ्य का पूरा ध्यान देना चाहिए क्योंकि औषधि से अधिक परहेज लाभप्रद है इसके बिना रोग मुक्त होना कठिन है।

विशेष जानकारी;-

रोग की पूरी परीक्षा करने के बाद दवा लेने से पहले हल्का गुलाब जुलाब देकर पेट को साफ करा देना चाहिए तत्पश्चात दवा का सेवन कराना चाहिए।

औषधि सेवन विधि तथा मात्रा;-

रस का प्रयोग;-

प्रतीक रस की मात्रा रोगानुसार जो लिखी गई है वही दे फिर भी यथा समय आवश्यकतानुसार अवस्था अनुसार मात्रा निश्चित करके देनी ही उचित है बच्चों को चौथाई गोले की मात्रा देनी चाहिए।

चूर्ण सेवन की विधि;-

साधारणत: 3 से 6 मासी तक की मात्रा में उचित अनुपात से सेवन करें। इसके अतिरिक्त अक्सर बतिया शीतल जल के साथ भी ले सकते हैं। विरेचन चूर्ण गर्म जल या गर्म दूध के साथ लेना चाहिए। अन्य पाचक छोड़ भोजन के बाद आवश्यकतानुसार मुंह में रखकर घुट घुट पानी से या किसी अन्य तरल पदार्थ के अनुपात से सेवन करें। अनुपात से दवा का प्रयोग करने से दवा शीघ्र ही अपना प्रभाव दिखाती है जिससे रूप घटने लगता है। कोई छूट शहद या घी के साथ लेने के लिए लिखा हो तो उससे दवा के साथ मिलाकर फिर चाट जाए। वीर्य दोष वाले रोगी की मात्रा 1:30 से 3:00 मासिक तक जो दूध अश्वगंधारिष्ट के साथ सुबह शाम दे । बच्चों को चौथाई मात्रा दे। जमालगोटा मिश्रित गुलाब जल गर्भवती व कमजोर स्त्री पुरुषों को देना हानिकारक है। इसके अतिरिक्त अन्य जहरीली तथा नशीली दवा देना भी हानिकारक है।

आवश्यक जानकारियां;-

गर्भावस्था में एलवा तथा वत्सनाग मिश्रित औषधियां तथा पांडुरोग में पारा मिश्रित औषधि देना हानिकारक है। वृद्धावस्था तथा बाल्यावस्था में युवावस्था की मात्रा की आधी मात्रा में औषधि की मात्रा की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त अधिक नशीली दवा देना भी ठीक नहीं है। मादक वमन कारक और स्तंभक दवाइयां सोने से पूर्व एक से 2 घंटे पहले देनी चाहिए। मूत्र दवाइयां दिन में अधिक काम करती हैं क्योंकि दिन के समय शरीर को ठंडा रखा जा सकता है। मूत्र विकार में जौ का पानी या यवक्षार जिसको जवाखार भी कहते हैं देना हितकारी हैं।

 राल वाले जुलाब सोनी के समय तुरंत प्रभाव करने वाले दूसरे जुलाब प्रातः काल देना अच्छा होता है । जुलाब लेने तथा निर्बल होने के पश्चात हल्की चीजें तथा खिचड़ी दही का इस्तेमाल करें।

 औषधि सेवन के दिनों में स्त्री प्रसंग तथा अधिक श्रम करना वर्जित है।

  संखिया वाली तथा कुचिला वाली दवाई भोजन के बाद लेने से अच्छा लाभ पहुंचाता है। इसके अतिरिक्त भोजन के बाद आसव  तथा अरिष्ठ स्वास्थ्य लाभ के लिए डेढ़ से ढाई तोला तक की मात्रा में संभाग जल मिलाकर पिलाने से दवा अपना पूरा असर दिखाती है।

पथ्य;-

खुराक में भी दूध फल तथा पौष्टिक पदार्थों का सेवन करें क्योंकि मूल दवा के साथ आसव वरिष्ठ पीने से अन्नादि पचकर भूख अधिक लगती है। दूध पीने वाले बच्चों को 2 से 10 बूंद तक संभाग जल मिलाकर पिलाएं। ऐसा करने से दूध का पूरा लाभ मिलता है शक्तिहीन रोगियों तथा स्त्रियों को औषधि 9 माशे से बड़े बच्चों को 3 से 6 माशे उपयुक्त विधि से पिलाना चाहिए अगर दवा के साथ अनुपात रूप से लिखा हो तो पहले दवा ले कर बाद में आशा वरिष्ट पीना चाहिए।

औषधि प्रयोग करने की विधि;-

साहिब रोगों के आवश्यकता अनुसार शरीर का अंग ,मुख ,नाक, कान, नेत्र ,गुदा, मूत्र मार्ग ,योनि ,त्वचा आदि अनेक अवयवों के द्वारा खिलाने ,लगाने ,वस्ति देने, मर्दन करने आदि अनेक वीधियो से औषधियों को प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद में औषधि खाने से सविस्तार विधान वर्णित है परंतु यहां संक्षेप में ही उल्लेख करना उचित है।

मुख द्वारा औषधि प्रयोग विधि;-

मुंह से औषधि का प्रयोग दो देशों से किया जाता है प्रथम स्थानिक क्रिया अर्थात संपादनार्थ जैसे ओष्ठ अर्थात होठ से गले तक के रोगों के लिए गंडुस अर्थात कुल्ला करना और दूसरी प्रति सारण आदि क्रियाओं द्वारा औषधि का स्थानिक प्रयोग करना। इन दोनों क्रियाओं में औषधि गले से नीचे नहीं उतारी जाती है। संपूर्ण शरीर में होने वाले रोगों का नाश करने के लिए औषधि भक्षण का वर्णन नीचे किया जा रहा है और सदियों का अधिकार प्रयोग भक्षण द्वारा ही किया जाता है।

अनुपानीय द्रव्य और उसकी मात्रा;-

गोमूत्र गाय का मूत्र दूध जर्जर या अग्निमांद्य हो तो संग्रहणी अतिसार और छय हो तो बकरी का दूध गर्म पानी ठंडा पानी चावलों का दूध गाय बकरी का दूध आदि 5 तोला से 8 तोला तक ले।
मीठे आनार का रस 2 तोला मिश्री मक्खन आंवले का रस मुरब्बा गुलकंद पुराना गुड(1 वर्ष से 3 वर्ष का पुराना हो) नींबू का रस पुदीने का रस प्याज का रस इनमें से कोई भी पदार्थ एक एक तोला ले।
 जी सभी विकारों में गाय का और कुष्ठ विकार हो तो भैंस का लेना चाहिए। मात्रा छ:माना ताजा ही होना चाहिए जितना ही पुराना होगा उतना ही अच्छा गुण वाला होगा। सहजन की छाल का रस भांगरे की पत्तियों का रस तीन मास इससे हरी दूब का रस व कुटजमूल का रस 6 मानने लें। अनुपात के लिए किसी भी दवाई का क्वाथ बनाना हो तो आधा शेर पानी में मिलाकर आग पर चढ़ाकर खूब उबालना चाहिए 5 तोला शेष रहने पर उतारकर साफ कपड़े से छान लेना चाहिए। गाड़ी के लिए ताजा जड़ दो तोला और सुखी जड़ एक तोला लेनी चाहिए। कान्हा उतना ही बनाना चाहिए जितना कि 3 बार या एक बार भी पिया जा सकता है। अन्यथा पहले दिन का काला दूसरे दिन खराब हो जाता है।

आयुर्वेदिक दवाओं के लिए कुछ विशेष जानकारी;-

नुस्खे में यदि एक नहीं लिखा हो तो दवा की जड़ लेनी है या फल पत्ते लेनी है तो बीच वाली दवा की छाल लेनी चाहिए तथा छोटे-छोटे पौधों की जड़ सहित सारा भाग लेना चाहिए तथा फल वाली दवा का फल देना चाहिए। इतने पर भी यदि कहीं संसद हो तो उसमें उस दवा की जड़ी लेनी चाहिए क्योंकि औषधियों का मूल भाग बहुत गुणकारी होता है।

नुस्खे मेरी दवाओं का अलग-अलग तौल नहीं लिखा हो तो नुस्खे की सभी दवाइयों को बराबर बराबर भाग लेना चाहिए। जहां यह न लिखा हो कि दवा के तैयार करने के किस चीज का बर्तन काम में लाना वहां मिट्टी का ही बर्तन प्रयोग करना चाहिए। मिट्टियों में चीनी मिट्टी के बर्तन का व्यवहार अधिक ठीक होता है। जहां दवा से 1 घंटे का समय नलिका हो वहां प्रातः काल समझना चाहिए। दवाओं में जहां केवल मल्ल्या मूत्र लिखा हो वहां गाय का गोबर और गोमूत्र ही समझना चाहिए। इसी प्रकार की और दही में भी समझना चाहिए कि गाय का घी दही ले। जहां खाली दमक ही लिखा हुआ सेंधा नमक या सांभर नमक लेना चाहिए। पूरी नुस्खे की दवाओं के ना मिलने पर जो जड़ी-बूटी मिल रही है उसे ही उपयोग कर सकते हैं। इनके अतिरिक्त यंत्र या मर्द द्वारा भी रोग से मुक्ति पा सकते हैं।

नुस्खे में सभी दवाई नहीं डालनी चाहिए परंतु नीचे लिखी हुई है दवाई जितनी पुरानी हो उतनी ही अच्छी समझी जाती है। वायविंडिंग ,पीपल, गुड़  ,घी, और शहद।

नुस्खे में दवा दाजी हो तो साथ में सूखी भी होनी चाहिए किंतु किसी दवा को जब खासतौर पर ताजा और हरी जैसे अदरक आदि डालना लिखा हो तो उस दवा का तौल का दुगना डालना चाहिए। केवल नीचे लिखी हुई दवाई जब गीली डालना हो तो दुगना लेकर बराबर भाग डालना चाहिए। गिलोय, कुरैया, अडूसा ,पेठा ,शतावरी ,अश्वगंधा ,पियाबासा, या सहचरी सौंफ और प्रसारिणी। यदि किसी नुस्खे में एक ही दवा का नाम दोबारा गया हो तो उसे भूलना समझकर वह दवा दुगनी लेनी चाहिए। यदि किसी नुस्खे में कोई दवा हानिकारक मालूम पड़े तो उसे निकाल देना चाहिए और उसकी जगह लाभप्रद दवा मिला देनी चाहिए। नुस्खे में जो दवाई लिखी हो और सभी लेनी चाहिए। दवा रोगी की आवश्यकता अनुसार ही बनाए ज्यादा नहीं बनानी चाहिए। नुस्खे की कोई दवा यदि बाजार में ना मिलती हो तो उसे उसके बदले में उसी के समान गुण वाली दूसरी दवा डालकर भी काम चलाया जा सकता है।

अनुपात औषधि बनाने की विधि;-

भावना;-

सूखी दवा के चूर्ण को किसी दवा के काढा या रस से अच्छी तरह धो कर सुखा देने को ही भावना कहते हैं।

कल्क;-

ताजा हरी चीजों को लोढी से भांग की तरफ देखने से जो पदार्थ तैयार होता है उसे कल्क कहते हैं। सुखी दवा उसे कल्प बनाने के लिए पानी मिलाकर पीसा जाता है।

स्वरस;-

ताजा हरी चीजों को काटकर गाढे कपड़े के द्वारा निचोडने से जो रस निकलता है उसे ही स्वरस कहते हैं।

गोलियां;-

गोलिया या वटी बनाने की विधि यह है कि नुस्खे की सब दवाओ  को महीन  चूर्ण  करके पत्थर की खरल में डालें। फिर जिस दवा की भावना लिखी हो उसी के स्वरस में घुट घुट कर गोली बना ले अगर कुछ भी ना लिखा हो तो खाली पार्टी में घोटकर भी लिखी अनुसार गोली बना सकते हैं,।

चूर्ण ;-

सूखी हुई दबाव को लोहे के इमाम दस्ते में कूटना चाहिए। जब खूब महीन आटे की तरह हो जाए तब कपड़े से छान लेना चाहिए । इसी को चूर्ण कहते हैं।

काढ़ा;-

मिट्टी के बर्तन में दवा के वजन से 16 गुना पानी डालकर चूल्हे पर धीरे-धीरे आंच के पकाए । आधा भाग पानी जलकर आधा भाग शेष रह जाए तब उतार लें और ठंडा होने पर छानकर पीए।

रोगी की परीक्षा और उसका निदान;-

नाड़ी की परीक्षा;-

वात पित्त और कफ को त्रिदोष कहते हैं नारी की चाल से इन दोनों का पता लगाने के लिए कुशल बेड से परामर्श करना चाहिए यह गाड़ी की चाल का विस्तृत वर्णन आयुर्वेद के अनुसार किया गया है-
नाड़ी की गति तेज हो तो ज्वार, दुर्बलता में भयानकता, आदि और धीमी हो गई हो तथा ढूंढने पर भी नहीं मिल रही हो तो शीघ्र  मृत्यु समझनी चाहिए। जन्म से 1 साल तक के बच्चों की नारी प्रति मिनट 140 से 150 बार तक, 2 से 5 वर्ष के बच्चों की गाड़ी 100 से 110 बार तक, 6 से 15 वर्ष की आयु किनारी 90 बार प्रति मिनट, 16 से 50 वर्ष की आयु में 75 बार नाड़ी चलती है। उसी हिसाब से कम या अधिक होने पर रोग की अवस्था समझनी चाहिए।

थर्मामीटर से जांच कराना,

स्वस्थ अवस्था में शरीर की गर्मी 98. 4 डिग्री रहती है। सिर्फ बच्चों की कुछ अधिक होती है नींद या आराम के समय शरीर की गर्मी डेढ डिग्री कय रहती हैं।
स्वाभाविक गर्मी से 2:30 डग्री बढ़ जाना खतरे का चिन्ह हो जाता है। 101 डिग्री तक साधारण ज्वर 105 डिग्री तक जोर का बुखार समझना चाहिए 106 से 160 डिग्री तक भयानक बुखार 108 और 110 तक बुखार मृत्यु को निमंत्रण देता है।

पीत ज्वर में,

सुबह 100 से 102 डिग्री तक रहता है तथा शाम को 103 से 106 डिग्री तक रहता है बुखार की अधिकता में रोगी आधी आंख बंद किए पड़ा रहता है बुखार इनफ्लुएंजा में 104 डिग्री तक बुखार रहता है।

सन्निपात ज्वर,

पहले सप्ताह में सायं काल 100 से 100 डिग्री तक बुखार रहता है परंतु सुबह डेढ़ डिग्री कम हो जाता है दूसरे सप्ताह में 103 से 105 डिग्री तक बुखार आता है कभी 106 डिग्री तक भी बढ़ जाता है तीसरे सप्ताह में बुखार का कम होना ठीक है तथा बढ़ना खराब है। जिस से मृत्यु तक हो जाती है शरीर की गर्मी 1 डिग्री बढ़ने पर नाडी की चाल प्रति मिनट में 10 बार ज्यादा चलती है। साधारण अवस्था में मनुष्य 1 मिनट में 20 बार सांस लेता है परंतु गर्मी बढ़ने पर सास दो बार अधिक लेता है। 100 डिग्री गर्मी होने पर 1 मिनट में नाड़ी की चाल 91 बार और सांस की गति 23 बार होती है। साधारण अवस्था में दो बार सांस लेने पर 7 बार नाड़ी चलती है। आगे नाड़ी की गति तथा स्वासोच्छवास विस्तार पूर्वक विवरण आयुर्वेद के अनुसार प्रस्तुत

नाड़ी की गति,

तंदुरुस्ती में अनेक कारणों से गति न्यून अधिक हो सकती है साधारणतः पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की गाड़ी अधिक तेज चलती है। किसी प्रकार की मेहनत करने के वक्त मेहनत करने के बाद भोजन बचाने के समय और मानसिक उत्तेजना के समय नारी का गति बढ़ जाती है। दिन के एक अन्य भागों की अपेक्षा प्रातः काल नाड़ी अधिक तेज चलती रहती है। जब मनु सो कर उठता है या बैठा हुआ आदमी खड़ा होता है तो उसकी नाड़ी कुछ तेज हो जाती है। रोग में जाने के बाद निर्मलता के कारण और निर्मल हृदय वाले मनुष्य खिलाड़ी जरा सी फेरफार से भी तेज चलने लगती है।
श्वासोच्छवास की गति और नाड़ी की गति में एक से चार का अनुपात रहता है अर्थात जितनी देर में नाड़ी चार बार चढ़ती है उतनी देर में श्वासोच्छवास एक बार आता है।

आयुर्वेदिक औषधि के प्रयोग से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां;-

किसी भी रोग का उपचार करने से पहले रूप का सही परीक्षण औषधि के गुण ,दोष, देश, ऋतु तथा प्रकृति का विचार करने अत्यंत ही आवश्यक होता है। क्योंकि इन सब बातों का ध्यान रखें बगैर यदि औषधि का प्रयोग किया जाता है तो हो सकता है लाभ होने के बजाय हानि हो। जैसा कि गाय का तुरंत दुआ हुआ ताजा दूध पाचन योग्य है, तेजो वर्धक, सध:, वीर उत्पन्न करने वाला उत्तम औषधि के रूप में माना जाता है जबकि नए पित्त बुखार में अतिसार में संग्रहणी में और संग्रहणी कफ में, काश विद्रधि, क्रीमी तथा सुझाव एवं कुष्ठ रोगों में अब दूध हानिकारक माना जाता है इसीलिए औषधि का प्रयोग करने से पहले पूरी तरह से विचार करना चाहिए।
  इस प्रकार कुछ ऐसी बनो और सदियां है जिनका प्रयोग करने से पहले शोधन किया जाता है जैसे, कलिहारी ,कुचला, भिलामा, कनेर अफीम भांग धतूरे के बीज एवं गुंजा के बीज आदि।
औषधि की तरह हींग का प्रयोग किस में डालकर किया जाता है फिटकरी का प्रयोग फुला कर ही करना चाहिए।

क्वाथ,

मिट्टी के बर्तन में ढके के बगैर बनाना चाहिए। यदि मिट्टी का बर्तन उपलब्ध ना हो तो कलाइयां पीतल के बर्तन में कोट बनाना चाहिए इसी तरह तेल को सिद्ध करने के लिए पीतल के बर्तन का ही प्रयोग करना चाहिए।

कल्क;-के लिए लोहे के बर्तन का प्रयोग किया जाता है।
अपथ्य;-वस्तु का सेवन शिक्षा से अब भूल से भी किया जाता है तो औषधि का लाभ नहीं होता इसीलिए पथ्य वस्तु का पूरा ध्यान देना चाहिए।
लओहभस्म;-वाली औषधि भोजन पश्चात सेवन नहीं करना चाहिए।
जुलाब;-की औषधि प्रातः काल में लेनी चाहिए गर्भवती महिलाओं को गिरे चक्के तेज और सभी का सेवन नहीं करना चाहिए।

वाजीकरण;-शक्ति वर्धक औषधि का सेवन करने से पहले शरीर में से सभी लोगों को दूर कर लेना चाहिए तथा शरीर का पूर्व सोलन करना चाहिए स्तनपान करते बच्चों को औषधि देने से पहले मां भी रोग से पीड़ित है तो उससे भी औषधि देनी चाहिए। प्रसूति रोग यात्री दष में घी का सेवन पूर्णतया वर्जित है।
ऐलुमिनियम के बर्तन का प्रयोग किसी भी प्रकार की औषधि बनाने में भोजन तैयार करने में शुद्ध करने में उबालने में वस्तु संग्रह में जल पीने के लिए खाद्य पदार्थ सेवन में कभी भी नहीं करना चाहिए।

औषधि का चयन;-

जहां तक संभव हो ताजी औषधि का ही प्रयोग करना चाहिए किंतु पीपर ,गुड, वायविंडिंग ,धनिया ,मधु, तथा घी यह छ: पदार्थ 1 वर्ष पुरानी होनी चाहिए।

 गिलोय अनुषा सतावर अश्वगंधा पीलावासा सौफ प्रसारिणी, कुटज की छाल तथा पेठा यह नो सदियां जहां तक ताजी उपलब्ध हो उसी का उपयोग करना चाहिए ताजा होने के कारण दुगनी मात्रा में नहीं लेनी चाहिए अन्य और सदियां सुखी तथा नई लेनी चाहिए। जबकि ताजी हो तो दुगनी मात्रा में लेनी चाहिए। जिस प्रयोग में औषधि सेवन का समय ना बताया गया उसका सेवन प्रात काल करना चाहिए। जिस औषधि का प्रयोग अंग न बताया गया उसके मूल्य का ही प्रयोग करना चाहिए। 

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