google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical आयुर्वेद ऐसे बीमारियों को जड़ से करता है खत्म

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आयुर्वेद ऐसे बीमारियों को जड़ से करता है खत्म

 

आयुर्वेद ऐसे बीमारियों को जड़ से करता है खत्म जानिए कौन सी है?

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का नाम नहीं है बल्कि जीवन पद्धति का नाम है। आयुर्वेद में हमें जीवन से जोड़ता है। जीवन को सात्विक और सरल तरीके से जीने का नाम ही आयुर्वेद । इस पद्धति में हमें आयु का वरदान मिलता है जिसका पालन करके हम निरोगी काया और लंबा जीवन जी सकते हैं। आयुर्वेद में के चमत्कारी परिणाम आते हैं जिसको देखकर आप कह सकते हैं किस के अचूक इलाज से हर व्याधियों समाप्त हो जाते हैं।

पीला कनेर /आश्वाह /पीत कनेर( yellow oleander)

इसका प्रचलित नाम है पीला कनेर, औषधि के रूप में होता है छाल पत्र तथा मूल। सदाहरित लघु गुल्म जैसा वृक्ष है जो  औसतन 10,12 फुट ऊंचा होता है स्कीम पत्र सरल संकुचित तीक्षणाग्र एकांतर किंतु पास पास होते हैं ।पुष्प घंटी आकार के पीत वर्ण होते हैं।
‌ इसके गुण मुत्रक,ह्दयबल्य,भेदक,ज्वरघ्न,ज्वरप्रतिबंक।

उपयोग;-

इसकी छाल का प्रयोग नियतकालिक ज्वर  में शोथ ,जलोधर,आमवात, मैं लाभकारी होती है। इसके बीच अतीरेचक,पत्र-वामक,अतिरेक,मूल का प्रयोग गंड पर प्लास्टर के रूप में लाभकारी है। पीत कनेरके विभिन्न भागों से निकलने वाला दूध क्षीर अति विषैला होता है। छाल का चिकित्सा में उपयोग अधिक मात्रा में करना चाहिए अधिक मात्रा में प्रयोग से उल्टी तथा  दस्त होने लगते हैं। छाल का चूर्ण आधी रोटी देने से मलेरिया बुखार में लाभकारी होता है हृदय रोग में छाल का चूर्ण अल्प मात्रा में सेवन से हृदय को बल मिलता है। रिक्त में रक्ताभिसरण अधिक होने से मुत्रों सर्ग अधिक होता है। न्यू का असली रूप में प्रयोग करना चाहिए कुछ मारता किया सूखी हुई क्षाल रखे रहने पर सत्वहीन हो जाती है। इसके बीज विषैले होते प्रयोग अल्प मात्रा में ही करना चाहिए। औषधि के रूप में इसकी छाल का प्रयोग कभी भी खाली पेट नहीं करना चाहिए। बुखार में इसके फांट का प्रयोग करते हैं। यह सभी जंगली होने के कारण इसका आंतरिक प्रयोग बहुत कम किया जाता है।

  कनेर का वृक्ष बाग बगीचे तथा घर के खाली पड़ी जमीन पर खूबसूरती के लिए खूब लगाए जाते हैं इसके फूल रात को खेल कर कुछ समय बाद छोड़ जाते हैं बुखार में इसके पत्तों को उबालकर थोड़ी मात्रा में पीने से बुखार उतर जाता है। छाल का चूर्ण आधा रती ही लेना चाहिए।

नागकेसर का पौधा (cobras saffron)

इसको पिला नाग नागपुष्प भी कहते हैं।नर केसर ,गुच्छ, छाल,पत्र,  फल तथा बीज का प्रयोग औषधि के रूप में होता है।
यह मध्यम कदका सदाहरित वृक्ष इसका ताला छोटा होता है। इसकी छाल चिकनी चिकनी होती है अभी मुखी तथा तीक्ष्ण युक्त होते हैं। इन की ऊपरी सतह चमकीली तथा निचली सतह स्वीट एवं रज आक्षादित होती है। इसके पुष्प सुगंधित से तथा नरकेसर पीत वर्ण  होते हैं। स्वादिष का तीखा और कसैला होता है।

 वेद नाहर, क्रीमिघ्न,दीपन, संग्राहक ,गर्भ स्थापक, आम पाचक वमन नाशक, विषघ्न,।

उपयोगिता औषधि गुण;-

रक्ताषर्श, गुद्दा, बीदर, प्रवाहिका, कृमि नाशक,अपचन,रक्तश्राव रोग, रक्त प्रदर मुत्राशय रोग, कंठ दोष ,शिर:शूल,खास,अमाशय,प्रक्षोभ तथा जीर्ण प्रतिश्याय, मे लाभकारी है। रक्त विकार तथा रक्त कास, रक्त पित्त में उत्तम औषधि है। रक्त अतिसार में नागकेसर के चूर्ण का मिश्री के साथ सेवन से लाभ मिलता है। खांसी तथा आमाशय रोग में इसकी छाल योग मूल का ख्वाब देने से लाभ होता है।

 अमाशय की गड़बड़ी से होने वाली बेचैनी तथा उसी से खुश्की के कारण होने वाली खांसी में इसका क्वाथ लाभकारी होता है।
को हाथ बनाने के लिए पीला लाख की छाल लाकर एक मुट्ठी 1 लीटर पानी में उबाले। पानी आधा रह जाए तो छानकर क्वाथ रूप में प्रयोग करें।
रक्तार्श नागकेसर का चोर मक्खन तथा मिश्री के साथ मिलाकर खाने से लाभकारी होता है। केसर का चूर्ण 1 से 3 ग्राम जल या मधु के साथ सेवन करें। रक्त विकार में नाते सरकार चूर्ण मिश्री के साथ सेवन से रक्त विकार का नाश होता है। संधिवात एवम पामा मैं नागकेसर के बीजों के तेल का ब्रह्म उपचार इन रोगों में उपयोगी है। काश में इसके पुष्पों का प्रयोग लाभकारी होता है मात्रा 1 से 2 ग्राम।

  

पीला धतूरा या सत्यानाशी( Mexican poppy)

पीला धातु राजा सत्यानाशी के नाम से प्रचलित है इसके प्रयोग में आने वाले भाग हैं मूल और पिता छीर। इसका स्वरूप कंटकी गुल्म , वर्र्रणी,पीत वर्ण होते हैं। इसका स्वाद तीखा होता है।
इसके गुण का कफ रोगी के लिए, कृमी रोगों के लिए, मृदु रोचक ,शामक, कुष्ठ घन ,सोथ हर, रसायन।

इसका औषधी उपयोग;-

पीत क्षीर ,कामरा,त्वक रोग,एवम विषम ज्वर मैं लाभकारी। यदि सीने में बलगम जमा है सांस लेने में तकलीफ हो रही हो तो इसके पुष्पों को उबालकर पिलाने से बलगम साफ हो जाता है। इसका वॉल प्रयोग अंग ,व्रण, से बहते रक्त को बंद करने में क्या जाता है। मूल का स्वरस काली मिर्च के साथ मिलाकर बच्चों को बिल्ली काटने से लाभ होने वाले रोग पर लाभकारी हैं। व्रण रोपड़ में कुष्ठ रोग में एवं रक्त शोधन में लाभकारी है। रेचन के लिए इसके मूल का चूर्ण गर्म जल के साथ सेवन करना चाहिए।  नपुसंकता दूर करने के लिए इसकी एक मासा छाल तथा बरगद का दूध दोनों को गर्म करके चने के बराबर गोली बनाकर 14 दिन तक खाने के साथ सेवन करने से नपुसंकता दूर हो जाती है। पीला धतूरे का तेल इसके 750 ग्राम बीज उबलते हुए जल में डालते पर कुछ समय पश्चात जल को ठंडा होने दें जिससे बीज का तेल जल का टाइम में लगेगा रोई फाहे द्वारा इस तरह के तेल को इकट्ठा कर एक छोटी सी सीसी में भाग लेना चाहिए। इस तेल का प्रयोग खाज खुजली में प्रतिदिन स्नान से पहले किया जा सकता है। नेत्र रोग में पीला धतूरे का झाड़ एक मासा 5 तोला गुलाब जल में मिलाकर प्रतिदिन दो बार दो-दो गुण नेत्रों में डालने से उपयोग नेत्र रोगों में लाभ होता है। स्वास रोग तथा काश में इसके मूल का चूर्ण आधा से 1 ग्राम उष्ण जल या दूध के साथ मिलाने से कब बाहर निकल जाता है। या चार से पांच बूंद पीत क्षीर  को बतासे पर डालकर सेवन कराने से लाभ होता है। नेत्र रोगों में इसके पीत क्षीर को शीशे के बर्तन में डालकर इस रस से दोगुना गाय का घी मिलाकर अच्छी तरह घुटना चाहिए। नेत्रों में इसका अंजन करने से अनेक नेत्र रोग दूर हो जाते हैं। दर्द रोग  के साथ खाज खुजली तथा त्वचा रोगों में भी औषधि अत्यंत कारगर सिद्ध होती है। जलोदर में इसका स्वरस पिलाने से मूत्र खुलकर आता है तथा संग्रहित जल निकल जाता है उत्तम रक्तशोधक, इसके पंचांग का स्वरस 1 भाग 2 भाग शहद में मिलाकर एक तार की चाशनी कर बोतल में भर लेना चाहिए। इसमें एक तोला लेकर 2 तोला जल में मिलाकर पिलाने से सब प्रकार के रक्त विकार मिट जाते हैं। चर्म रोगों पर पंचांग का रसिया पीत क्षीर रोग ग्रस्त भाग पर लगाने से लाभ होता है। कफ प्रकोप सहित श्वास रोग में इसके पत्तों के रस के रस क्रिया बनाकर इसमें व्यंक्षक एसिड में संभाग मिलाकर चने के बराबर गोलियां बनाकर स्वास्थ रूबी को खिलाने से लाभ होता है। इथोस्नोफीलिया नाम का स्वास रोग हुआ हो जिसमें रक्त में श्वेत कणों की मात्रा बढ़ गई हो एवं स्वास् रोग जैसे ही चिन्ह दिखाई देते हो तो इसका प्रयोग करने से इस रोग में लाभ होता है। इसके फिरंग रोग सिफलिस पंचांग का रस निकालकर उसमें से आधा तोला लेकर 1 मिलीलीटर दूध में मिलाकर पिलाना चाहिए। इस के छालों का पीला धतूरे का छन भी लगाना चाहिए। कुष्ठ रोग में इसके स्वरस में थोड़ा नमक मिलाकर सेवन करने से यदि कुष्ठरोग लंबे समय का है तो शीघ्र लाभ होता है। प्रतिदिन आधा से एक तोला ताजे रस का सेवन लाभकारी होता है यह प्रयोग चालू रखना चाहिए। कुछ लोग चाहे साधारण हूं या गलने वाला हो दोनों में ही इसका रस धैर्य रखकर माह 2 माह तक उपयोग करने से लाभ होता है। खाज खुजली में इसके पत्तों के रस का तेल में पकाकर पके हुए तेल का प्रयोग लाभकारी है। पीले फूलों का प्रयोग पीलिया तथा विषम ज्वार में लाभकारी है पुराने खुजली में लगाने से बहुत अधिक लाभ होता है।

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