google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical Health knowledge in hindi, योग साधना के चमत्कारिक परिणाम।

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Health knowledge in hindi, योग साधना के चमत्कारिक परिणाम।

health information in Hindi, योग साधना के चमत्कारिक परिणाम।

  
 मनुष्य का जीवन तब के बिना अधूरा है। जीवन में पुण्य के बाद तब के क्षेत्र में प्रवेश होता है जीवन की सच्ची और वास्तविक संपत्ति तब साधना है। यूं तो अनेक धार्मिक प्रक्रियाएं आत्म कल्याण के लिए बनाई गई हैं उन सबके अपने-अपने महत्व भी हैं पर तब से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। योग साधना का एक महत्वपूर्ण सोपन है इसके अंतर्गत इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, से समय संयम और विचार संयम की बात कही जाती है। योग साधना को समझने में अनेकों से भूल हो जाती है लोग संयम का मतलब अतिवादी समझने लगते हैं । योग संयम का मतलब होता है इंद्रियों का संयम। इंद्रिय संयम का उद्देश जहां देह भाव से ऊपर उठते हुए एक स्वस्थ निरोगी जीवन जीना था तो वही व्यक्ति को उपवास के नाम पर एकदम भूखे रहने का फिर अवसाद व्रत को अतिरेक तक ले जाते देखा जाता है।
    
ऐसे में योग साधक एक अवधि विशेष तक संयम के नाम पर हठयोग इक तक करते हुए झूठा संतोष अवश्य पा लेता है कि साधना हो रही है लेकिन कालावधी समाप्त होने पर वही साधक भोजन व्यंजन से लेकर विषय लोगों पर ऐसे टूट पड़ता है कि संयम का मूल प्रयोजन सिद्ध होता ही नहीं दिखता। ऐसा लगता है कि संयम योग साधना को समझने में कहीं भारी चूक हो गई है
  84 योनियों केवल योग ही ऐसी साधना है जिससे गृही, वैरागी सभी समान सुविधा में कर सकते हैं। इसके लिए गुरु गुरु की समीपता अनिवार्य नहीं । केवल संरक्षण से ही काम चल जाता है। फूल होने पर अधिक से अधिक इतनी ही हानि हो सकती है कि साधना निष्फल चली जाए इससे अन्य लगों की भांति उल्टे अनिष्ट का तो किसी प्रकार का कोई खतरा ही नहीं होता। इसके द्वारा केवल भौतिक या केवल आध्यात्मिक ही नहीं दोनों क्षेत्रों में समान लाभ होते हैं। योग साधक का जीवन सुखी बनता है और आत्मशांति भी निश्चित रूप से मिलती है।
   
    वास्तव में योग साधना अतिरेक के बाजार मध्यम मार्ग के अनुसरण का पथ है जिसमें अपनी यथास्थिति की सम्यक समझ के आधार पर आगे बढ़ा जाता है। इसका मूल उद्देश्य इंद्रिय वमन को क्रमिक रूप से साधते हुए चित्त शुद्धि को प्राप्त करना रहता है जिससे कि वासना तृष्णा एवं पहनता जैसे त्रिबंधनों की जगह ढीली हो सके। योग साधना का उद्देश्य राग ,द्वेष अ,हंकार जैसे भाव का परिमार्जन करते हुए काम ,क्रोध लोभ ,मोह इन हीनता, ओर दर्प_ दम जैसे आंतरिक रिपुओ पर विजय प्राप्त करना रहता है ।
   देखा जाए तो प्राणी जगत में अगर किसी को कुछ प्राप्त हुआ है तो वह सिर्फ योग और तप साधना से ही है। परिश्रम ,कष्ट , सहिषुणता, लग्न, अध्यवसाय, निरंतरता की साधना, प्रयत्न ,पुरुषार्थ के कारण ही लोगों को तरह-तरह की शक्तियां, संप्रदाय, योग्यताएं, सामर्थ प्राप्त होती है। विद्यार्थी ,व्यापारी ,किसान ,मजदूर ,शिल्पी, संगीतज्ञ, चिकित्सक ,नेता ,साधु, सभी वर्गों के लोग अपने अपने कार्य क्षेत्र में अपने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपने-अपने ढंग से योग साधना करते हैं। जिसका तक जितना अधिक होता है उसी अनुपात में उसे सफलता और संपन्नता भी मिलती है।
    इसके साथ उद्देश ज्ञान के जागरण भक्ति के उदय एवं विकास के साथ आत्मबोध आत्म साक्षात्कार एवं ईश्वर प्राप्ति जैसी अवस्था की ओर बढ़ना इन में स्थापित होना भी योग साधना का महत्व पूर्ण विषय है। इस राह में सबसे बड़ा कार्य जो होता है वह चित शुद्धि एवं आत्म संतुष्टि के उपकरण के रूप में महत्वपूर्ण कार्य होता है।

   इस तरह साधना का जो मूल मंत्र होता है वह होता है संयम। साधना के नाम पर किसी हठयोग या विवेक हीन तक की प्रक्रिया नहीं जिससे कि व्यक्ति का अहंकार पोषित होता हो या अज्ञान की ग्रंथियां और कसती हो। संयम इनके परिमार्जन परिष्करण के साथ अपनी इंद्रियों अर्थ विचार एवं समय का समय नियोजन एवं संतुलन है।


  श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण इसी मध्यम मार्ग का प्रतिपादन करते हुए विषाद में पड़े हुए अर्जुन को योग साधना का मूल मंत्र बताते हैं..
 
युक्तआहारविहारसय  युक्तचेस्टसय कर्मसु।
  युक्तस्वप्नावबोधसय योगों भवति दुख:हा।।6/17

अर्थात संसार रूपी दुकान आज तो उस योग द्वारा सिद्ध होता है जिसमें आहार ,बिहार ,कर्तव्य ,कर्म शयन, जागरण के यथा योग्य एवं संतुलन स्वरूप को अपनाया जाता है।
 
  इतिहास बताता है कि पुरुषार्थ प्रधान जातियां आगे बढ़े और ऊंची उठी। इसके विपरीत आलसी, बिलासी ,भीरू,
अकर्मण्य, लोग व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से विनाश के गर्त में चले गए। जो बीच ऋतु के प्रभाव को सहते हैं वह दीर्घ जीवी होते हैं तथा उनकी सहनशक्ति निर्बल होती है पर थोड़ी सी सर्दी गर्मी में नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार तपस्वी मनुष्य की सफल होते देखे गए हैं। 
    
   अगर इच्छा रहित अमृत जन्म मरण के चक्र से मुक्त करा सकती है तो उसका माध्यम सिर्फ योग साधना और तप साधना ही है। इच्छा का समाप्त हो जाना ही मूछ है बंधन से मुक्ति है। कृष्ण अर्जुन से गीता में कहते हैं "परम सिद्धि को प्राप्त करते हुए महात्मा जन मुझे पाने के बाद दुख का जहां घर है ,ऐसे क्षणभंगुर जीवन को जीने के लिए फिर नहीं आते ;क्योंकि हे अर्जुन !ब्रह्मलोक से लेकर सभी लोग पुनरावृत्ति वालेहै, स्वभाव के होते हैं परंतु हे कुंती पुत्र! मुझसे मिल जाने के बाद उनका पुनर्जन्म नहीं होता"। इसमें गहरा तत्व ज्ञान हैं।

     मानव जीवन इच्छा से भरा हुआ है और इच्छा के लिए एक सुनहरा भविष्य चाहिए और अगर भविष्य ना हो तो इच्छा का होगा ही क्या ? क्योंकि इच्छा के लिए जरूरी है कल आने वाला दिन आने वाला दिन हो तो की इच्छा का फैलाव हो सकता है इसके लिए श्रम किया जा सकता है इच्छा पूरी हो सके तो उसका पूरा करने के लिए समय की जरूरत है। कहने का तात्पर्य है कि जब हमारा जीवन सुखमय स्वस्थ होगा तभी हम अपनी सारी क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। क्योंकि जो वृक्ष ऋतु के प्रभाव को सकते ह वह दीर्घ जीवी होते हैं जिनक सहनशक्ति निर्बल होती है वह थोड़ी सी सर्दी गर्मी में नष्ट हो जाते हैं इसी प्रकार तपस्वी मनुष्य ही सफल होते देखे गए हैं यह संसार तक के आधार पर बना है तब के आधार पर ही उसकी दिनचर्या एवं गतिशीलता निर्भर है। जड़ चेतन सभी पर योग और तब के संयम समान रूप से काम करते हैं।
   अंतर जगत की यात्रा है योग (Journey to the inner world) शास्त्रीय संदर्भ का यदि कोई स्मरण करें और महापुरुषों के द्वारा प्रदत सूत्र  संकेतों को याद करे तो वह इस बात को स्पष्टता के साथ महसूस कर सकेगा कि ईश्वर हमारी आत्मा के बीज के रूप में शुद्ध है प्रस्तुत है। यदि हम काम वासना आसक्ति के बंधनों को तोड़ दें तो हमारी योग्य यात्रा उसी और ही बढ़ती है जिस और हम चाहते हैं। हमारा मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ना उतरना तो हुआ पर कभी अपने भीतर चलना नहीं हुआ, अपने भीतर उतरना भी नहीं हुआ। अपने अंदर ईश्वर को खोजना नहीं है ना कभी हुआ ही नहीं और वही करना हमारी अंतर जगत के साधना को योग के माध्यम से हम पूरा करते हैं।
    
   ।। जैसा कि आप जानते हैं कि योग के माध्यम से कितने ही महापुरुषों ने बड़े-बड़े कार्य हमारे लिए करके छोड़ गए हैं उनमें से महावीरजी ,गौतम जी, आचार्य शंकर जी, गुरु नानक देव जी ,मीरा ,तुलसी ,कबीर, सूरदास ,विवेकानंद, महापुरुषों ने योग मार्ग पर चलकर संसार के लिए बड़े से बड़ा त्याग कर गए। वे संसार को अपने भीतर छिपा कर नहीं बल्कि संसार को स्वयं के भीतर से मिटा कर आ सकती के सारे बंधनों को तोड़ कर चले। इसीलिए वे तीर्थों में शरीर भ्रमण करते दिखाई दिए।
    यही कारण था कि परमात्मा का परम आलोक उनकी आत्मा में ही उतर आया तभी तो वह जहां भी रहे जैसे भी रहे आनंद से भरे रहे मस्ती में डूबे रहे, आसक्ति के बंधन से मुक्त रहे ,सब को आनंदित करते रहे ,वे स्वयं ही सत चित आनंद हो गए।

  वे स्वयं ही करुणा प्रेम क्षमा सेवा संवेदना के लहराते सागर हो गए वे स्वयं ही बुद्ध हो गए वह स्वयं ही मुक्त हो गए इसीलिए शास्त्र कहते हैं परमात्मा कहीं और विराजमान नहीं वह तो प्रत्येक जीवात्मा के भीतर बीज रूप में विराजमान है वह तो प्रत्येक चैतन्य के भीतर सोई हुई शक्ति है ,जिससे उठाना है, जगाना है उ,सका आविर्भाव करना और उसे जागृत कराना ही योग है जो हमारे भीतर सोया हुआ है।
  योग का सबसे बड़ा हथियार "समय"
भगवान महावीर से कोई पूछता है"जब समाधि उपलब्ध हो जाती है तो हमारे भीतर से कौन सी चीज निकल जाती है"। तभी भी कहते हैं"समय"समय अब हमारे भीतर से निकल जाता है क्योंकि जिस व्यक्ति के भीतर समाधि फलित होती है उसके भीतर इच्छा की दौड़ नहीं रह जाती और उस दौड़ का जो मार्ग है वह व्यर्थ हो जाता है।
  
   इसीलिए किसी देश में किसी काल में किसी महान व्यक्ति ने समाधि की परिभाषा को ही योग कहा है उसमें बातें अलग हो एक बात अनिवार्य रूप से समान है और वह है कि योग , समयातीत ,है कालातीत है उसे पाने के लिए अपने प्रयासों में तेजी लाना होगा समग्रता लाना होगा। अगर इच्छा की है तो इच्छा के स्वाद को और तीव्र करना चाहिए। योग करने का संकल्प लिया है तो डरना नहीं चाहिए युग के संकल्प को निडरता से और संयम के साथ पूरा करना चाहिए।

   तब हम स्वयं ही सच्चितानद हो सकेंगे हम स्वयं ही करुणा प्रेम संवेदना से भरा लहराता सागर हो सकेंगे। हम स्वयं ही कहेंगे ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप है। ईश्वर करुणा प्रेम का लहराता सागर है ईश्वर यत्र तत्र सर्वत्र है। यह पूरा ब्रह्मांड ही ईश्वर का रूप है। ईश्वर ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त है ।उसे अपने शरीर के भीतर प्राप्त कर लेना ही योग् हैं।
 

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