google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical If You Want To Be A Winner, Change Your AIR POLLUTION Philosophy Now!in Hindi

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If You Want To Be A Winner, Change Your AIR POLLUTION Philosophy Now!in Hindi

 If You Want To Be A Winner, Change Your AIR POLLUTION Philosophy Now! hindi 

Air pollution in Hindi

वायु प्रदूषण अत्यंत संघातिक, इससे सामान्य जीवन बुरी तरह से प्रभावित होता है। देश के महानगरों में आज प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ चुका है। देश की राजधानी के गैस चैंबर बनने में 43 प्रतिशत जिम्मेदारी धूल मिट्टी और हवा में उड़ते मध्यम आकार के धूल कणों की ही है। दुनिया में अब वायु प्रदूषण खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है। पहले हम प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल मृदा,वन‌ इत्यादि को लेकर चिंतित थे पर अब दूसरी दुखित हवा उससे भी बड़ी चिंता बन गई है और आज यह सबसे बड़ी पर्यावरण संकट के रूप में हमारे बीच में है।
वायु प्रदूषण के प्रकार को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जाता है -

प्राथमिक प्रदूषकों से होने वाला प्रदूषण - प्राथमिक प्रदूषक वाले प्रदूषण में ज्वालामुखी विस्फोट से राख, लावा धुँआ; वाहनों आदि से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड गैस, कारखानों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड गैस आदि से होने वाला प्रदूषण आता है।

द्वितीयक प्रदूषकों से होने वाला प्रदूषण - द्वितीयक प्रदूषक सीधे उत्सर्जित नहीं होते हैं। बल्कि जब प्राथमिक प्रदूषक आपस में क्रिया या प्रतिक्रिया करते हैं तब वे वायु में निर्मित होते हैं। जमीनी स्तर की ओज़ोन द्वितीयक प्रदूषक का प्रमुख उदाहरण है जो धूम-कोहरा (स्मॉग) बनाती है।
 जल की आवश्यकता तो हमें कुछ समय के अंतराल पर मालूम होती है तो वही भोजन भी दिन में दो-तीन बार ही ग्रहण किया जाता है मगर सांस लेने के लिए वायु तो हर क्षण चाहिए होती है। इसीलिए हमारे शास्त्रों में इसे जीवन से जोड़कर देखा गया और प्राण को प्राण वायु की संज्ञा दी गई है। वायु महत्व को समझने और समझाने के लिए सबसे बेहतर तरीका और कोई नहीं हो सकता। हवाई के अभाव में सबसे बड़ा संकट और कुछ नहीं हो सकता हाल ही में प्रकाशित ग्लोबल एयर रिपोर्ट में भी इस तथ्य की पुष्टि की है।
 
इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की 91 प्रतिशत आबादी वायु प्रदूषण से प्रभावित है अगर ऐसा है तो बहुत सारे सवाल खड़े होने चाहिए। जैसे कारणों की पड़ताल उपाय और बड़ी रणनीति पर विचार विमर्श होना चाहिए। भारत तो वाइफ दूसरे से गंभीर रूप से प्रभावित है दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों की एक बड़ी संख्या भारत में ही है हवाई शुद्धता के मानकों के अनुसार हवा में प्रदूषण कम 80 पीएम के भीतर होने चाहिए पर देश का शायर ऐसा कोई शहर हो जहां सामान्य रूप से डेढ़ सौ से 200 पीएम तक प्रदुषण ना हो।

  यह हुआ कि खराब हवा करने की में गाड़ियों से निकलने वाले धुएं को 17% और पेट काम जैसे पेट्रोलियम से 16% भागीदारी है। इसके अलावा भी कई कारण है जैसे कूड़ा जलाने इत्यादि।

  बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए यह सभी प्रयास नाकारा से दूर एक अनुमान है कि हर साल अकेले पंजाब हरियाणा के खेतों में कुल 35000000 पराली जलाई जाती है। पराली जलाने पर सल्फर डाइऑक्साइड ठोस कार्बन मोनोऑक्साइड कार्बन डाइऑक्साइड और राख निकलती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब कई करो टर्न फसल अवशेष जलते हैं तो वायु मंडल की कितनी दुर्गति होगी।

  हानिकारक गैसों एवं सूक्ष्म कणों से परेशान दिल्ली वालों के फेफड़े को कुछ महीने हरियाली से उपजे प्रदूषण से भी जूझना पड़ता है। विडंबना है कि परागकण से स्वास की बीमारी पर चर्चा कम होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पर आंकड़ों की ताकत उनके प्रोटीन ग्लाइकोप्रोटीन में निहित हैं। जो मनुष्य के बलगम के साथ मिलकर अधिक  जहरीले हो जाते हैं।

  जैसे हमारे खून में मिलते हैं तो यह एक विशेष तलक की एलर्जी को जन्म देते हैं। यह एलर्जी इंसान को गंभीर स्वास की बीमारी की तरफ ले जाती है। क्योंकि गर्मी में ओजोन परत और मध्यम आकार के धूल कणों का प्रकोप ज्यादा होता है इसीलिए पराग कणों के शिकार लोगों के फेफड़े बहुत शीघ्र ही क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इसीलिए ठंड शुरू होते हैं दमा के मरीजों का दम फूलने लगता है।

  अधिक गर्मी के पीछे वायु प्रदूषण है क्योंकि एयर कंडीशनर या अन्य इस तरह की सुविधाएं वातावरण में हाइड्रो फ्लोरो कार्बन क्लोरोफॉर्म कार्बन की मात्रा बढ़ाते हैं। जिनका पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ता है इससे प्रकृति का तापक्रम पर नियंत्रण खत्म हो जाता है जिससे गर्मियों के दिन भट्टी की तरह सुलगते हैं और जाड़े फ्रिज की तरह व्यवहार करते हैं। सड़कों पर गाड़ियों की बढ़ती तादाद भी हवा का मिजाज बिगाड़ रही है।

  आज लगभग एक अरब 35 करोड़ गाड़ियां दुनिया में धूल उड़ा रही है और सन 2025 तक तो 2 अरब हो जाएंगी। एक सामान्य गाड़ी साल में लगभग 4.7 मेट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करती है। 1 लीटर डीजल की खपत में 2.68 किलो कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है पेट्रोल से यह 2.3 1 किलो के करीब निकलती है।वहीं तमाम सूची जनों की उपलब्धता के बावजूद आज भी लकड़ी और गोबर के उपलों का इस्तेमाल हो रहा है हालांकि समय के साथ इनके उपयोग में कमी आई है फिर भी दुनिया की लगभग आधी आबादी यानी 3.4 अब लोग ऐसे इंधन का प्रयोग कर रहे हैं।

  प्रदूषण के कारण बच्चों में अस्थमा और मानसिक विकार भी उत्पन्न हो रहे हैं प्रदूषण समय से पहले ही लोगों की जीवन लीला को समाप्त कर रहा है। प्रदूषण का बढ़ता प्रकोप शायद ही जमे में क्योंकि सुविधा और विलासिता की होड़ में थमने वाली नहीं है। इसे तथाकथित विकास का प्रतीक भी मान लिया गया है। अमेरिका में विलासिता के जो प्रतिमान बनाए हैं बाकी देश भी उन्हें हासिल करने की होड़ में लगे हैं। ऐसे तथाकथित विकास की दौड़ में ऊर्जा की खपत बढ़ जाती है।

  इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं कि दुनिया में 55 फ़ीसदी लोग शहर में उर्जा की खपत करते हैं। विलासिता के नजदीक जाते-जाते हमको प्रकृति से दूर होते गए इसका हमें ज्ञान भी नहीं रहा। पहले हमने पानी को खोया है जिसके विकल्प के रूप में हमने प्यूरीफायर और बोतलबंद पानी का व्यापारिक विकल्प तलाश लिया आज देश पानी के बड़े संकट से गुजर रहा है अब बारी हवा की है और आज हवा के डिब्बों का भी प्रचलन शुरू हो गया है।

  बीजिंग जैसे शहर में अब ऑक्सीजन बॉक्स बिकते हैं क्योंकि वहां की हवा इस हद तक बदतर हो चुकी है कि कुछ ही घंटों में दमघोंटू  स्थितियां पैदा हो जाती है। इस शहर में पहाड़ों की हवा वह लाकर भेजी जाती है यही हालत भारत में भी बन रहे हैं जहां दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर बसे हैं। अवसरवादी व्यवसायिकता ने इन  परिस्थितियों का जमकर फायदा उठाया है। मतलब अब एयर प्यूरीफायर भी धड़ल्ले से बिकने लगे हैं दिल्ली में तमाम दफ्तरों में हवा अब प्यूरीफायर की सुविधा में सुधार कर रहे हैं।

  कितनी बड़ी विडंबना है कि जीवन में साधन हवा और पानी दूषित होकर हमें मारने पर उतारू हो रहे आप स्वस्थ जिंदगी के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है अफसोस की बात है कोई आने वाले कल को तो छोड़ी आज की फिक्र करने को भी तैयार नहीं यह व्यापक खामोशी बहुत सालती है।

  प्रदूषण के मसले पर न तो कोई बड़ी बात होती है और ना ही नीति निर्माता इस पर पर्याप्त चिंता करते दिखाई पड़ते हैं चुनाव में भी यह मुद्दे नदारत ही रहते हैं ऐसे में इस पर किसी सरकार को दोष भी नहीं दिया जा सकता क्योंकि जनता को इसकी परवाह ही नहीं है। अगर हम अभी नहीं जागे तो हालात और बिगड़ते जाएंगे फिर 1 दिन ऐसा आएगा आएगा कि हम आवाज उठाने के लिए ही नहीं बचेंगे क्योंकि तब तक दुनिया गैस चैंबर बन चुकी होगी। ऐसे में हमें दुनिया और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की खातिर पर्यावरण बचाने का संकल्प लेना ही होगा पर्यावरण बचेगा तो ही जिंदगी बचेगी। के लिए हमें अपनी नहीं स्वार्थों को तिलांजलि देकर पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन हेतु योगदान देना चाहिए।

   यह प्रोटीन जैसे ही हमारे खून में मिलते हैं तो एक विशेष तरह के लड़की को जन्म देने अर्जुन साल को सांस की गंभीर बीमारी की तरफ ले जाती है क्योंकि गर्मी में ओजोन परत और मध्यम आकार के धूल कणों का प्रकोप ज्यादा होता है इसलिए पर आंकड़ों के शिकार लोगों के फेफड़े बहुत शीघ्र ही क्षतिग्रस्त हो जाते हैं इसीलिए ठंड शुरू होते ही दमा के मरीजों का दम फूलने लगता है।

  यह तो सभी जानते हैं कि मिट्टी के कर्ज लोगों के लिए श्वास लेने में बाधक बनते हैं मानकों के अनुसार हवा में पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम की मात्रा 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होनी चाहिए लेकिन अभी यह खतरनाक पार्टिकल 240 के करीब पहुंच गए हैं। इसका एक बड़ा कारण विकास के नाम पर हो रहे अनियोजित निर्माण का जिनसे असीमित धूल हो रही है। हवा में पीएम ज्यादा होने के कारण रूप में सामने आया है आंखों में जलन फेफड़े खराब होना अस्थमा कैंसर और दिल के रोग इत्यादि।

  वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद अर्थात सीएसआईआर और केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान द्वारा हाल ही में दिल्ली की सड़कों पर किए गए सर्वे से पता चला है कि सड़कों पर लगातार जाम लगने वाले इस कारण बड़ी संख्या में वाहनों के अंतर रहने से गाड़ियां डेढ़ गुना ज्यादा ईंधन खपत कर रही है। पता उतना ही अधिक जरीला दुआ हवा में शामिल हो रहा है बीते मानसून के दौरान पर्याप्त बरसात होने से दिल्ली के लोग बारी करो से परेशान हैं तो इसका मूल कारण विकास किए तमाम गतिविधियां है जो अनिवार्य सुरक्षा नियमों के बगैर भी संचालित हो रही है।

  इन दिनों राजधानी में परिवेश में इतना जहर हो रहा है कि जितना 2 साल में कुल मिलाकर नहीं होता है बीते 17 साल में दिल्ली में हवा सबसे बुरी हालत आज भी हर घंटे में दिल्ली वासी सा वायु प्रदूषण का शिकार होकर अपनी जान का वार है। गत 5 वर्षों में दिल्ली सबसे बड़ी सरकारी अस्पताल एम्स में स्वास्थ्य के रोगियों की संख्या 300 गुना बढ़ गई है।

  एक अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई कि अगर प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित किया गया तो सन 2025 तक दिल्ली में हर साल करीब 32000 लोग जहरीली हवा के शिकार होकर आशा लाइट मौत के मुंह में समा जाएंगे। याद रहे कि आंकड़ों के अनुसार और भाई प्रदूषण के कारण दिल्ली में हर घंटे एक व्यक्ति की मौत होती है। यह भी जानना जरूरी है कि स्वच्छ पर्यावरण का मानक अधिकतम 60 एक्यूआइड एयर क्वालिटी इंडेक्स होना चाहिए। लेकिन दिल्ली में आगरा एक समय 999 तक पहुंच गया है।

   देश के अनुसरण में भी यही सा सामान्य स्तर से अधिक रहता है वाहनों में दोहे की बड़ी मात्रा में हाइड्रोकार्बन होते हैं और तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार होते हैं यह हवा में मिलकर दूषित तत्वों का निर्माण करने लगते हैं। यह तो इंसान के लिए जानलेवा है इस खतरे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वायु प्रदूषण करीब 25 फ़ीसदी फेफड़ों के कैंसर की वजह बना हुआ है इस खतरे पर काबू पा लेने से हर साल करीब 1000000 लोगों की जिंदगियां बचाई जा सकते हैं।

   दिल्ली और देश के दूसरे शहरों में वायु प्रदूषण को और खटाना का स्तर पर ले जाने वाले पैटकान पर रोक के लिए कोई ठोस कदम न उठाया जाएगा तो हालात और भी खराब हो जाएंगे। जब पेट्रोल पदार्थों से रिफाइनरी में संशोधित किया जाता है तो सबसे अंतिम उत्पाद होता है पैटकान । इसका दहन करने में कार्बन का सबसे ज्यादा उत्सर्जन होता है।

  क्योंकि इसके दाम डीजल पेट्रोल याद पी एन जी के बहुत कम होते हैं अतः अधिकार बड़े कारखाने अपनी भट्ठियों में इसे ही इस्तेमाल करते हैं। अनुमान है कि जितना जहर लाखों वाहनों से हवा में मिलता है उससे दुगना पैटकान का इस्तेमाल करने वाले कारखाने बल देते हैं।

  दिल्ली जैसे शहरों में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण सड़कों पर जाम लगने से रोकने के साथ-साथ पानी का छिड़काव होना भी जरूरी है। इसके अलावा ज्यादा से ज्यादा सार्वजनिक वाहनों का उपयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए इसके लिए सबसे जरूरी पहलू है सार्वजनिक परिवहन ढांचे को दुरुस्त बनाना ताकि लोगों को अधिकतम सहूलियत मिल सके और वह स्वयं अपनी इसे अपनाने पर जोर दें।

  इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि समय की मांग है कि सार्वजनिक स्थानों पर किस तरह के पेड़ लगाया जाए ताकि पर्यावरण सुरक्षित एवं सुरक्षित रह सके बाय प्रदूषण की रोकथाम जनता जागृत अभियान से ही संभव है हम सभी को सचेतन सजग रहना चाहिए हरीतिमा संवर्धन इस कार्यक्रम में समाधान है।

स्वार्थपरता से ऊपर उठकर दुनिया के सभी देशों को इसमें अपनी भूमिका का सक्रियता से निर्वहन करने की जरूरत है। दुनिया के बड़े और शक्तिशाली देशों ने सबसे अधिक वायु प्रदूषण किया है इसलिए इसकी रोकथाम करने की दिशा में भी सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन्हीं की बनती है, क्योंकि न केवल जरूरी संसाधन और विशेषज्ञता के कारण ये ऐसा करने में सक्षम हैं, बल्कि इनके ही कर्मों की सजा पूरी दुनिया को भुगतनी पड़ रही है। वायु प्रदूषण दुनिया में तेजी से बढ़ रही एक समस्या है, जिसकी रोकथाम करने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने की जरूरत है। छोटे-छोटे व्यक्तिगत प्रयास भी इसमें अहम भूमिका निभाएँगे। हम सभी को पर्यावरण प्रदूषण रोकने और वायु प्रदूषण को कम करने में अपनी भूमिका को समझना होगा और उसका ईमानदारी के साथ निर्वहन करना होगा, केवल तभी वायु प्रदूषण की समस्या पर लगाम कसी जा सकेगी।
  
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