Health and fitness प्रोटीन और फाइबर से भरपूर दालें, जो भूख कम करने में कर सकती हैं मदद
जहां समस्याएं हैं वह समाधान भी अवश्य होता है ऐसे ही बीमारियां हैं तो उसका इलाज भी है। इसके लिए अनेक चिकित्सा पद्धतियां उपयोग में लाई जा रही है यह सच है कि आज संसार भर के लोग एलोपैथी के दुष्प्रभाव से आतंकित है अतः अधिकांश लोग आयुर्वेद एवं देसी चिकित्सा की ओर आकर्षित हो रहा है। बढ़ते सेहत संबंधी खतरों को देखते हैं उन लोगों को सही जानकारी देना और उनके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना एक महत्वपूर्ण काम होता है। हमारा उद्देश्य यही है कि हमारे घर में जो चीजें उपलब्ध है इन्हीं से बीमारियों का तुरंत इलाज किया जाए इससे हमारी पारंपरिक देसी घरेलू चिकित्सा भी पुनर्जीवित रहेगी।दाल (Pulses) कई प्रकार की होती है, जैसे अरहर, मसूर, मूंग आदि, इन सभी दालों का सेवन सेहत को कई लाभ पहुंचाता है। क्योंकि सभी दाल पोषक तत्वों से भरपूर होती है। दाल में सबसे अधिक प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है, जो शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी होता है। साथ ही दाल में फाइबर, विटामिन और कई प्रकार के खनिज पाए जाते हैं, जो कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने में मददगार साबित होते है। लेकिन दाल का सेवन करने से पहले ये जान लेना चाहिए कि कौन सी दाल के क्या फायदे होते हैं और आपके लिए कौन सी दाल फायदेमंद साबित होती हैं। तो आइए जानते हैं कौन सी दाल के क्या-क्या फायदे होते हैं।
अरहर की दाल (Yellow Arhar Lentil)
प्रचलित नाम
तुर, तुवर, अरहर।
प्रय़ोज्य अंग
दाल, छिलका, लकड़ी,
कुल ;
फैंबेसी।
अरहर की दाल को तुवर की दाल भी कहा जाता है इसमें खनिज कार्बोहाइड्रेट आयरन कैल्शियम आधी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है यह सुगमता से बचन वाली दाल है अतः रोगी को भी दी जा सकती है परंतु गैस कब्ज एवं सांस के रोगियों के उनका सेवन ना के बराबर ही करना चाहिए।
यह पूर्वी भारत के दलहन की मुख्य फसल है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो यह दाल कार्ड की अरहर की दाल है यह केवल उत्तर प्रदेश में 3000000 एकड़ से अधिक क्षेत्र में बोई जाती है। इसके नीचे नीचे तथा मटियार भूमि को छोड़कर सभी जमीनों उपयुक्त है। ऊंची दोमट भूमि में जहां पानी नहीं भरता यह फसल विशेष रूप से अच्छी होती है यह बड़ौदा वर्षा ऋतु के आरंभ में और खरीफ की फसलों के साथ मिलाकर बोई जाती है। अरहर के साथ को दो बगरी ,नाम, जवारा, बाजरा, मूंगफली तिल आदि मिलाकर बोते हैं। वर्षा के अंत में की फसल पक जाती है काटी जती है इसके बाद जाड़े में अरहर बढ़कर खेत को पूर्णतया भर लेती है तथा रवि की फसलों के साथ मार्च के महीने में तैयार हो जाती है। पत्नी पर इसकी फसल काटकर गाने चाहिए जाते हैं फसलों के साथ मिलाकर इसका बीच केवल दो शेर प्रति एकड़ के हिसाब से डाला जाता है।
अरहर को वर्षा के पहले 2 महीने में यदि निडाई और गोडाई दो-तीन बार मिल जाए तो इसका पौधा बहुत बढ़ता है और पैदावार भी लगभग दुगनी हो जाती है। चने की तरह इसकी जड़ों में भी हवा से खाद नाइट्रोजन इकट्ठा करने की क्षमता होती है। हर हर बोले से खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और इसे स्वयं खाद की आवश्यकता नहीं होती। इसको पानी की भी अधिक आवश्यकता नहीं होती जब धान इत्यादि पानी की कमी से मर तथा मुरझा जाते हैं तब भी अरहर खेती हरि खड़ी रहती है। कमजोर अरहर की फसल पर पानी का असर कभी-कभी हो जाता है परंतु अच्छी फसल पर जो बरसात में गोराई के कारण मोटी हो गई है पानी का भी असर बहुत कम ही या नहीं होता।
पीली अरहर की दाल बहुत मशहूर अल्केश की अरहर की दाल कनपुरिया दाल एवं देसी दाल भी उत्तम मानी जाती है। दाल के रूप में उपयोग में लिए जाने वाली सभी दलहन में अरहर का प्रमुख स्थान है। एक गर्म और रूप होती है। जिन्हें इसकी प्रकृति के कारण हानि होती है इसकी दाल को भी घी छौककर कर खाएं तो उसका किसी प्रकार की हानि नहीं होगा।
अरहर की दानों को बाल कर इसका सब्जी बनाई जाती अरहर की दाल में इमली अथवा आम की खटाई का गर्म पानी डालने से भी अधिक रुचिकर बनती है। अरहर की दाल में पर्याप्त मात्रा में घी मिलाकर खाने से है वायु कारक नहीं होती। इसकी दाल त्रिदोष नाशक होने से सभी के लिए अनुकूल रहती है। अरहर के पौधे को सुकोमल डांडिया पत्ते आज दूध तथा पशुओं को विशेष रुप से खिलाए जाते इससे अधिक तरोताजा बनते हैं और अधिक दूध देते हैं।
रंग
इसका रंग पीला और लाल होता है।
उपयोगिता (utility)
यह कसैली,लुक्स, मधुर, शीतल, पचने में हल्की ,मल को रोकने वाली ,वायु उत्पादक शरीर के अंगों को सुंदर बनाने वाली कब और रक्त संबंधी विकारों को दूर करने वाली। पीली अरहर की दाल हल्की तीखी तथा गर्म होती है। अग्नि को प्रदीप्त करने वाली भूख बढ़ाने वाली और कफ विद खून की खराबी खुजली कोर्स तथा जट के अंदर मौजूद हानिकारक कीडो को दूर करने वाली है। अरहर की दाल पाचक है तथा बवासीर बुखार और गुल्म रोगों में भी यह लाभकारी है।
अरहर की दाल के औषधि गुण
- अरहर के पत्तों को जलाकर उसकी राख को दही मिलाकर लगाने से खुजली मिटती है।
- अरहर के पत्तों पर दूब का रस मिलाकर नाक में लेने से आधासीसी में लाभ होता है।
- अरहर की दाल को पीसकर पानी मिलाकर पीने से भांग का नशा उतर जाता है अथवा भांग का नशा हो तो अरहर की दाल को पानी में उबालकर या पानी में भिगोकर उसका पानी पिलाने से भांग का नशा चला जाता है।
- अरहर की जड़ को चबाकर खाने से सांप के बिष में लाभ होता है।
- एक मुखी अरहर की दाल एक चम्मच नमक और आधा चम्मच पिसी हुई सोंठ को मिलाकर सरसों के तेल में डालकर छौंककर पीस लें। इस पाउडर से शरीर पर मालिश करने से पसीना आना बंद हो जाता है। सन्निपात की हालत में पसीना आने पर भी यह प्रयोग कर सकते हैं।
- अरहर की दाल छिलके सहित पानी में भिगोकर उस पानी से कुल्ला करने पर छाले ठीक हो जाते हैं यह गर्मी के प्रभाव को दूर करती है।
- अधिक पसीना आने की स्थिति में भुने हुए अरहर के बीजों का बारी सोनिया शंख भस्म को शरीर पर लगाएं। यदि रोग पर इस औषधि का कोई असर ना दिख रहा हो तो उसे फौरन डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।
- अरहर की दाल पानी में भिगो दें उससे पानी में उसी बारीक पीसकर थोड़ा गर्म करें इसके बाद इसे अंडकोष वृद्धि पर लगाएं सुबह शाम कुछ दिनों तक ऐसा ही करने से अंडकोष वृद्धि में लाभ होता है।
- अरहर के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से दातों की पीड़ा खत्म हो जाती है।
- सिर के धब्बों को खुर्द रे कपड़ों से रगड़ कर साफ़ करने के बाद अरहर की दाल पीसकर रोजाना तीन बार इसका प्रयोग करें दूसरे दिन सरसों का तेल लगाकर धूप में बैठ जाए और 4 घंटे बाद फिर से से लगाए इसी तरह कुछ दिनों तक इसका प्रयोग करने से बाल फिर से उग जाते हैं ।
- अरहर के छिलकों का धूम्रपान करने में हिचकी रुक जाती है।
- जीभ में छाले पड़ना तथा जीत की फटने पर अरहर की कोमल पत्तों को चलाएं जीत के छाले और जीप का फटना बंद हो जाता है।
- अरहर की दाल छिलके सहित एक गिलास पानी में रख दें और इसे पीसकर माथे पर लेप करें इसके बाद सिर को धोकर कंघी करें कुछ दिनों तक ऐसा करने से रूसी दूर हो जाती है।
- अरहर की दाल खाने से पेट की गैस की शिकायत दूर होती है।
- कान की सूजन होने पर अरहर की दाल को पीसकर लगाने से सूजन ठीक हो जाती है।
- अरहर के कोमल पत्ते पीसकर लगाने से घाव भर जाते हैं।
- अरहर के पत्ते 6 ग्राम और संगे हूद लगभग आधा ग्राम को बारीक पीसकर पानी में मिलाकर पीने से पथरी में बहुत फायदा होता है।
- स्त्री के स्तनों में दूध अधिक उत्पन्न होने पर अरहर के पत्तों और दालों को एकसाथ पीसकर हल्का सा गर्म करके स्थानों पर लगाने से दूध की अधिकता रुक जाती है।
- दाल को पीसकर लेप की भांति स्थल पर लगाने से स्तरों में आई सूजन नष्ट हो जाती है।
- बेहोशी होने पर आधा घंटे तक अरहर की दाल को एक कप पानी में भीगा ने इसके बाद इस पानी को रोगी की नाक में एक-एक बूंद करके डालें कुछ देर बाद ही यह व्यक्ति होश में आ जाए तो बचे हुए पानी को रोगी को पिला दें।
- शरीर में सूजन वाले अंग पर चार चम्मच अरहर की दाल को पीसकर बांधने से अंग की सूजन खत्म हो जाती है।
बंद उड़द ( wild udad)
वन उड़द पत्र फल एवं व्यूज यह एक फैला हुआ आरोहण शील झुक पत्री पंजा का संयुक्त पत्र छोटे बड़े होते हैं उसको गुलाबी वननिल्ले श्वेत वर्णी होते हैं। स्वाद तिक्त होता है यह वाजीकरण शामक ,मुक्तक, वतानुमोलक ग्राही है।
इसके बीज का प्रयोग आत्रशूल आत्रवजनन, प्रवाहिका, अतिसार, अरुचि में, का जलोदर स्क्रिप्ट प्लीहा वृद्धि ने आवाज पांडु रोग मधुमेह रोग में लाभकारी है। इसके पत्रों का वाक्य प्रयोग दांह सूजन में शीतल होने के कारण लाभकारी है। वाक्य कारण शरीर के किसी अंग पर आई सूजन में इसके पत्तों को पीसकर उसका रस मलने से दांत जाता रहता है एवं दर्द में आराम होता है। वाजीकरण के लिए इसका प्रयोग गाय के दूध दूध शर्करा एवं धृत के साथ सेवन करने से लाभ होता है। वार्षिक ब्रदर में पिंचु( रुई का फाहा) हां रण में इससे सिद्ध तेल का प्रयोग लाभकारी है। वाजीकरण के लिए एक उत्तम गाय जो चारों स्तनों से दूध देती हो जो प्रथम बार प्रसूता हुई हो जो हृस्ट पुषृट तथा तथा अपने सुदृश वर्ल्ड वाले जीवित बछड़े वाली हो। उसको वन उड़द को पंचाग को यथेस्ट भर पेट खिलाना चाहिए। फिर इस गाय का दूध दूध कर उसी समय या उबालकर सीता मधु मिलाकर पिलाना चाहिए। इसके सेवन से व्यक्ति बलवान होकर वाजीकरण गुण प्राप्त करता है। यह वनकाल की दुर्बलता धातु छोड़ता का शीघ्रपतन की शिकायत इसके प्रयोग से जाती रहती है। शरीर बलवान बनता है मूसक विष में वन उड़द साथ निर्गुणी के स्वर में मधु मिलाकर घटाना चाहिए।
उड़द का उपयोग कुष्ठ रोगी ,रतौंधी के उपचार में अति लाभकारी है । कुष्ठ रोग में उछाल पीसकर कुष्ठ रोग के छालों पर लेप करना चाहिए। मूल की छाल का चूर्ण मसूड़ों के लिए उत्तम कुष्ठ रोगों के छालों का प्रयोग प्लास्टर के रूप में लाभकारी है। कपज विसर्प में 1 औरतों के पुष्पों के चुनाव में जीत का थोड़ा सा मोयनल देकर जल में पीसकर लेप करना चाहिए । सांस रोग में वन उड़द के ताजे पुष्पों का स्वरस पीपली एवं मधु के साथ खिलाना चाहिए। सर्विस में श्वेत मरीज के चूर्ण में शिरीष पुष्प रस को 7 दिन तक भावना देकर शुश्क चूर्ण बनाकर इस चूर्ण का नस सेवन एवं अंजन करने से सर्प विष नष्ट हो जाता है। विष विघ्न वनस्पतियों में से इसे श्रेष्ठ बताया गया है।अर्रधाव दत्त में इसके मूल तथा फली का स्वरस नासिका में 1_2 बुंद टपकानी चाहिए। 3 मिनट के लिए बंद उड़द की कोमल पत्र सहित कहानियों का रस एवं अपामार्ग के पंचायत का रस मधु के साथ पिलाना चाहिए।
नवीन नेत्राभिष्यंद में _ सुरेश के पत्रों का सदस्य में मधु मिलाकर नेत्रों में अंजन करना चाहिए। इस कांड के अंदर से निकाली ही कोमल त्वचा प्राप्त होती है इस त्वचा का बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए। यदि किसी को कोई चोट लगी हो सिर फूट गया हो कोई अंग कट गया हो तो रक्त स्राव हो रहा हो तो इस चूर्ण को उस जगह भरकर दवा देने से रखना और शीघ्र ही बंद हो जाता है तथा एक पट्टी में छत का रोपण हो जाता है। गंड शोध में इसके पत्तों को पीसकर कल का बना गर्म करके बांधना चाहिए। इसका प्रयोग प्रत्येक दो दो घंटे बाद करने से या दंड को अंदर से हटाकर बाहर खींच लाता है। इसके बीजों का तेल रक्त अतिसार में उपयोगी। कंठ माल कि गांव में इसके बीज का चूर्ण का सेवन करना चाहिए। वन उड़द में बलकारी गुण काली होता है। जीवन काल में जितना हंसना अच्छा उसके फल को चबाकर खाएं तो शरीर शक्तिशाली और कांति बनता है। यह हर प्रकार की शायरी कमजोरी दूर कर शरीर को हष्ट पुष्ट बनाता है।
कुल्थी(dolicos biflours)
कुर्ती,गहाट,यह दलहन के रूप में दाने से थोड़ा बड़ा,चिकना और चपटा होता है। इसका गाना मशहूर के दाने से थोड़ा बड़ा चिकना और चपटा होता है।
उपयोगिता एवं औषधि गुण- आयुर्वेद के अनुसार;
आयुर्वेदिक मतानुसार इस के बीच कड़वे रसीले गरम खुश्क होते हैं। यह आंतों सिकोड़ने वाली ,ज्वरनाशक कृमि ,नाशक और मज्जावर्रधक होती है । श्वास,खांसी,मुख रोग, हिचकी,उदर रोग, हृदय रोग पीने से मस्तिष्क संबंधी तकलीफ में यह लाभकारी है। आंत शूल, पथरी, नेत्र रोग, बवासीर,कुष्ठ और विष को नष्ट करने में भी उपयोगी है। मूत्राशय की पथरी को दूर करती है। कुलथी के पत्तों को उबालकर इसका काढ़ा तैयार करें
दिन में दो-तीन भारतीय तीन चम्मच इस गाड़ी को पीने से मूत्र की पथरी निकल जाती है। इस काढ़े का सेवन कम से कम 1 सप्ताह करें।
यूनानी मत के अनुसार है भूख बढ़ाने वाली मूत्र निस्तारण आंख के रोगों को दूर करने वाली तथा मसानी और गुर्दे की पथरी को तोड़ने वाली। इसके सेवन से हिचकी मिट जाती है दस्त साफ आता है पेशाब और मासिक धर्म खुलकर आता है तिल्ली की खराबी दूर होती। बवासीर पर इसका लेप करने से लाभ होता है उसके लगाने से बालों का रंग साफ होकर काति निखर जाती हैं।
इसकी दाल कफ और पित्त को दूर करती है। भोजन के पश्चात होने वाली उल्टी को दूर करता हैं। इसकी जड़ का काढ़ा पिलाने से श्वेत प्रदर बंद हो जाता है। बच्चा होने के बाद गर्भाशय के बिगड़े हुए उनका भी मैन और मवाद रह जाता है उससे यह दूर करता है। कुलथी को पकाकर खाने से शरीर का मोटापा कम होता है सरकारें में सर पंखे की जड़ सदा नमक मिलाकर पिलाने से पेशाब में शक्कर का आना बंद हो जाता है।
दाल, भारतीय खाने का मुख्य व्यंजन है. किसी न किसी रूप में हर घर में इसका प्रयोग रोजाना किया जाता है. कुछ घरों में दाल को अलग-अलग तरह से बनाकर खाया जाता है. दाल का पराठा, पकौड़े, पैनकेक, चीला और खिचड़ी आदि बनाकर भी खाई जाती है. वहीं, कुछ लोग रोजना लंच या डिनर में किसी न किसी दाल का सेवन करते हैं. फाइबर, लेक्टिन और पॉलीफेनोल्स जैसे आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर दालें हृदय रोग, मोटापा, डायबिटीज और यहां तक कि कुछ तरह के कैंसर के खतरे को कम कर सकती हैं. डायबिटीज वाले लोग अगर दाल का सेवन करते हैं, तो उनकी ब्लड शुगर भी कम हो जाती है.
दाल, वजन कम करने और मसल्स गेन के सबसे सस्ते, आसान और प्रभावी तरीकों में से एक है. इसमें काफी मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है, जो कि वजन कम करने और मसल्स गेन में मदद कर सकते हैं ।
निष्कर्ष
प्रोटीन युक्त डाइट का सेवन करने से शरीर को कई लाभ होते हैं। यह मसल्स ग्रोथ से लेकर वजन को कम करने में प्रभावी होता है। इसलिए कई जिम जानें वाले लोग प्रोटीन युक्त डाइट लेते हैं। हालांकि, अधिकतर लोग चिकन, अंडे जैसी चीजों को ही प्रोटीन से भरपूर मानते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है, चिकन, अंडे या अन्य नॉन वेजीटेरियन फूड्स के अलावा कई तरह की दाल और सब्जियां भी प्रोटीन से भरपूर होती हैं। अगर आप प्रोटीन युक्त आहार लेना चाहते हैं, तो कुछ हेल्दी दालों को अपने आहार में शामिल कर सकते हैं।
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