google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical for better life in hindi,कर्मयोगी होने पर कौन सा फायदा मिलता है?

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for better life in hindi,कर्मयोगी होने पर कौन सा फायदा मिलता है?

for good existence,कर्मयोगी होने पर कौन सा फायदा मिलता है?

 कर्मयोग (karma yoga )कर्मयोग की अत्यंत सुंदर व्यापक और अति सूक्ष्म में व्याख्या भगवान श्री कृष्ण ने भगवत गीता ने की थी। कर्म भागता है अभिराम श्रृंखला है कर्म की। जो काम हम करते हैं उनका परिणाम भोगने के लिए हमें विवश होना पड़ता है काल हमारे सामने परिणाम को रखता है परिणाम शुभ हो या अशुभ हो लेकिन हमें उसे भोगने के लिए उसे स्वीकारने को विवश होना पड़ता है 

  एक कर्म और फिर उसका परिणाम फिर दूसरा कर्म फिर उसका परिणाम इस तरह कारण की श्रृंखला सदा जारी रहती है। जीव आत्मा शरीर रहते कर्म से मुक्त नहीं हो सकती। शरीर रहे या ना रहे कर्म के परिणाम से मुक्त होना कठिन होता है इसीलिए जन्म जन्मांतर तक यह श्रृंखला चलती रहती है। हमारे जीवन में ऐसा कोई छड़ नहीं जब हम कर्म ना कर रहे हैं। हर छठ हमसे किसी न किसी तरह का कर्म होता है तो प्रश्न उठता है क्या कर्म बंधन से कभी मुक्ति नहीं हुआ जा सकता है?

 भगवान श्रीकृष्ण इसका उपाय बताते हैं _कर्म योग कर्म योग का आचरण क आचरण_स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात। कहते हैं कि थोड़ा सा इस धर्म का आचरण यानी कर्म योग कारण हमें जीवन मरण के महान भय से त्राण दे देता है। भगवान श्रीकृष्ण इसका भविष्य दूध देश देते हैं ।कि शरीर है तो कर्म योग हो लेकिन कर्मों की विधि से किया जाए ,इस ढंग से किया जाए, इस तरीके से किया जाए, इस तरीके से किया जाए कि कर्म करते हुए भी हम कर्म बंधन में ना बंधे। कहते हैं कि भगवान ने भगवत गीता में जो कर्म योग की बात कही गई है अनासक्ति की जो बात कही गई है उसका ईशावास्योपनिषद मे  भी उल्लेख ....

  ईशावास्यमिदं सवऀ यात्किच्च जगत्यां जगत‌् ।

  तेन त्यक्तेन भुज्जीथा मा गृध:कांस्य स्विद् धनम ।।

अर्थात यह सारा जगत ईश्वरी सत्ता से ईश्वरी चेतना से परिव्याप्त है ईश्वर ने इसे घड़ा है जगत में रहो जीवन का सुख दुख उपभोग करूं लेकिन ‌‌‌‌‌"तेन त्यक्तेन  "यूनीटेक पूर्वक अनासक्ति पूर्वक। गृध: यानी कि एक पक्षी होता है लालची होता है वह सड़े हुए मुर्दे के मांस के प्रति भी आसक्त हो जाता है। मां गृध:कांस्य स्विद् धन्य। आसक्ति और लालच उत्पन्न होगी दृष्टि वह हमारे भीतर ना आए क्योंकि एक दिन व जीवन समाप्त हो जाएगा यह जीवन शास्वत नहीं बल्कि ,नश्वर है। 

कर्म योग की जो मूल बातें हैं जो मूल तत्व है वह क्या है? 

ऐसा क्या है जो कहे कि वह आचरण हमारा कर्म योग का है ?

भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कर्मयोग के कई आयाम दिए हैं कर्मों का पहला आया मैं आसक्ति ना रहे अर्थात आसक्ति का त्याग करें।असंॾगोऽस्त्वकर्मणि असंग भाव से यानी असंग होकर कर्म करो कर्म में आसक्ति ना रहे आसक्ति नहीं होगी तो कर्म नहीं बनेगा। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि हाथों से कटहल काटना है तो सरसों का कड़वा तेल लगाकर कटहल काटो। तेल लगाकर कटहल काटोगे तो काटते समय हाथ में चिपके का नहीं अन्यथा बिना टेल के यह चिपक जाएगा। अनासक्ति भी स्टील की तरह ही है जिससे कर्म चिपके गा नहीं इसीलिए पहला सूत्र है आसक्ति का त्याग करो हमारे जीवन में सारी विसंगतियां सारे दुष्परिणाम  आसक्ति हैं कर्म के नहीं है।

 गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में कहा है  मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला।चिन्ह थे पुनि उपजहिं बहुत सुला।। मोह यानी आसक्ति सभी व्याधियों का सभी झंझटो का सभी परेशानियों, की जड़ है ,बीज है, उससे बहुत सारी परेशानियां बहुत सारे शूल बहुत सारे कंटक अपने आप हंसते हैं और जीवन में कष्ट पहुंच जाते हैं। आशक्ति कहीं पर भी हो बंधन कहीं पर भी हो, और किसी रूप में भी हो, हम कष्ट पाते हैं अनेक शुभ आचरण करते हुए भी महाभारत में उल्लेख आता है भीष्म पितामह का भीष्म बढधंते चले गए प्रतिज्ञा से बधंते चले गए वचनों की डोर से, और कहीं सुक्ष्म में अपने वंश की ,अपने परिवार की ,आसक्ति से बंधते चले गए मेरे परिवार का कुछ अनर्थ ना हो ,मेरी परिवार का कुछ अनिष्ट ना हो ,ऐसा सोचते सोचते भीष्म पितामह बंधते चले गए। भीष्म पितामह ने विवाह नहीं किया राज्य का सुख नहीं होगा राजा भी नहीं बनी सर्वप्रथम अधिकार उन्हीं का था। लेकिन वंश की आसक्ति, पिता को दिए हुए वचन के कारण विश्व पितामह का पूरा जीवन कंटकाकिर्रण रहा और अंत उनका सरसैया में हुआ वाणो की शेज में। जीवन में आ सकती हमें संकटों में डालती है हम जितना गहरे में आसक्त होते हैं उतना गहरे में बधंते हैं कर्म बंधनों से। आसक्ति हो ,तो बंधन हमें बनती नहीं है कर्म के परिणाम, हमें प्रताड़ित नहीं करते हमें पीड़ा नहीं देते।


कर्मयोग का दूसरा अध्याय

भगवत गीता में जिस कर्म योग की बात कही गई है उसके स्वरूप को समझते हुए भगवान कहते हैं रागद्बेषवियुक्तैस्तु अर्थात राग देश से थोड़ा अलग रहो । रागिनी हम किसी के प्रति अच्छा भाव रखते हैं हम किसी के प्रति अच्छा सोचते हैं उसे अपनाना चाहते हैं उसे अपना बनाना चाहते हैं। किसी को अपना बनाने की बात किसी के अपनत्व जोड़ने की बात राग है। राग में बनता है व्यक्ति से घटनाक्रम से परिस्थितियों से देश यानी हम उससे दूर जाना चाहते हैं विरक्ति उसके प्रति वैर पालते हैं मन में। इस तरह प्रीति और वह जीवन में राग का और द्बेष है।

भगवान कहते हैं कि यह दोनों ही मानते हैं यदि आप राग में बंधे हैं तो भी उस में बने हैं ,जन्मों तक और द्बेष से बंधे हैं तब भी उस में बंधे जन्मों तक। ऐसा नहीं है कि राग अच्छा है ,द्वेष बुरा है या द्वेष है ,राग बुरा है। अगर हमने किसी से वैर पाला है तो उस बेर को निभाने के लिए हम घूमते रहेंगे उसके पीछे पीछे जाओ हमारे पीछे पीछे घूमेगा ,शरीर छूटेगा, जन्म पर जन्म जाएंगे, लेकिन वैर का बंधन ,राग का बंधन, नहीं जाएगा। क्योंकि राग और देश में जीवात्मा को कर्म बंधन से बांधते हैं। भगवान कहते हैं _गीता में राग द्बेष से मुक्त होकर के ,राग द्बेष को छीड़ कर के जो कर्म किया जाएगा वह कर्म योग है।

कर्म यग का तीसरा आयाम 

भगवान कहते हैं कि करता पन का त्याग करो। क्योंकि क्रिया का परिणाम नहीं होता कर्म का परिणाम होता है। जब यहां पर मैं अपना खड़ा होता है ,जब मैं उपस्थित होता है ,अहम उपस्थित होता है, मैं ऐसा करूंगा यह तो कर्तापन है, कर्म योग में इसी का त्याग करना होता है जब करता है तो कर्म का परिणाम जरूर होगा। अहम का संकल्प है तो परिणाम जरूर होगा लेकिन कर्तापन भाव ना रहे।

 यह अजीब सी बात है कुछ विचित्र से बात है कि कर्म हम कर रहे हैं और हम करता नहीं हैं। जब हमारे द्वारा गर्म हो रहा है तो सच्चाई यही है कि मैं कर रहा हूं भगवान कहते हैं कि यह सच्चाई इतनी आसान नहीं है इतनी सी मी सच्चाई नहीं है आप देख नहीं पा रहे हो कि कौन है और कर्म कहां से आ रहे हैं? कहते हैं कि जीवात्मा अंतरात्मा आत्मा कभी भी कर्म में लिप्त नहीं होती और ना उससे कोई कर्म घटित होता है।

 धर्मों का सारा खेल तो प्रकृति के तीन गुण सत, रज, तम, और चित् की वृत्तियां, चित् से उठने वाली लहरें इन्हीं के सहयोग से कर्म घटित होते हैं। प्रकृति के 3 गुणों के अनुरूप परिस्थितियां होती हैं कहीं सत् की सघनता है, तू कहीं रज की, तो कहीं तम की। हमारे चित्र में भी प्रकृति की यह 3 गुण उपस्थित रहते हैं और फिर इनके कारण हमारे अंदर भाव‌ उठते हैं। वृत्ति उठती है लहरें होती हैं। और इस तरह से प्रकृति के 3 गुण और वृत्तीय के सहयोग से हम कुछ करते हैं,चित् कुछ करता है लेकिन आत्मा कुछ नहीं करती। चित् मैं भाव जागता है, चित् लहर उठती है, चित् इच्छा जागती है ,अभिरुचि जगती है ,कल्पना उठती है ,कर्म के लिए प्रेरित होते हैं।

भगवान कहते हैं कि गुणा:गुणेषु वर्तन्ते॒ ॒ अर्थात गुण ही गुण  में बात करते हैं। आप समझते हैं कि आप कर्म कर रहे हैं आप कौन ? क्या आप इंद्रिय हैं ,? आप शरीर हैं , आप चित् है, मन है ? क्या आप बुद्धि अहंकार हैं या फिर ईश्वर के परम  अंस आत्मा है ? यदि आपको स्वयं अपने स्वरूप का सही भान होता सही ज्ञान होगा तो आप महसूस करेंगे अनुभव करेंगे कि कर्म आपके द्वारा नहीं हो रहे।

 कर्म घटित हो रहे हैं प्रकृति में ही कर्म भी कोई जीवात्मा को, कोई भी करण अंतरात्मा को स्पर्श नहीं ,करता ना कर्म ना उसका परिणाम। सारी सीमा रेखा प्रकृति में ही है। प्रकृति में ही कर्म घटित होता है। कर्मों के परिणाम केवल चित् में संकलित संचित होते हैं। कर्म का कोई परिणाम आत्मा को मानता नहीं है। इसीलिए कर्तापन का त्याग कर्म योग में जरूरी है। कर्तापन एक भ्रम है, एक भ्रांति है ,इस भ्रांति का त्याग कर दो फिर कर्म के परिणाम तुम्हें नहीं बांधेंगे। कर्तापन का परिणाम, कर्तापन का त्याग हमें वास्तविक रूप से कर्म योगी बनाता है।

कर्म योग का चौथा आयाम

समता का भाव है। भगवान गीता में योग को परिभाषित करते हैं कि समत्वम योग उच्यते । संता का उल्टा शब्द है विषमता। जब हमारे अंदर क्षमता का भाव होता है तब हम सबको एक रीति से देखते हैं और सब विषमता होती है तो किसी के प्रति हमारा सद्भाव होता है और किसी के प्रति हमारा दुर्रभाव होता है हम आग्रही ही होते हैं। सद्भाव और र्दुभाव होता है राग और द्वेष के कारण। जिसके प्रति हम  आसक्त होते हैं जिसके प्रति हम राग से भरे होते हैं उसके प्रति हमारा सद्भाव होता है और जिसके प्रति हम द्वेष से पूर्ण होते हैं उसके प्रति हमारा दुर्भाव है। राग द्वेष हमारे अंदर अपनेपन और पराए पन का भाव पैदा करता है हमारे लिए कौन अपना है और कौन पराया? हमारा चित् का अनुभव नहीं कर पाता। राग द्वेष जाए तो समता का अनुभव होता है और क्षमता का अनुभव होने पर हमें सर्वत्र अंतरात्मा व्याप्त लगती है।

 श्री कृष्ण भगवान कहते हैं कि यो मां पश्यति सर्वत्र  जो मुझे सर्वत्र देखता है कहां पर मैं छिपा हुआ नहीं हू। सर्वत्र अस्पष्ट हु, प्रकट हु। जो सर्वत्र दिखत है सर्वत्र अपनी अंतरात्मा को देखता है तो फिर कैसा रहा राग और कैसा द्वेष? फिर ना कोई राग और ना कोई द्वेष । ना कोई अपना और ना पराया । एक संस्कार जगता है तो उसके अंदर अपनापन जग जाता है दूसरा जग जाता है तो परायपन का भाव आ जाता है। काल और कर्म घटित होते हैं घटनाएं घट जाती हैं। राम को बनवास दे दिया ।कर्म पूरा हुआ, घटना पूरी हुई ,कैकेई को विचार खुल गए ,अंधकार छठ गए ,उसे अपने किए पर बड़ा पछतावा हुआ समत्व राग और द्वेष से भिन्न है। संता में स्थित होकर जो कर्म किए जाते हैं ,जो कार्य किया जाता है, वह कर्मो तय है जो बांधता नहीं है वह कर्मयोग का आचरण हैं।

कर्मयोग में योग का पांचवा आयाम 

भगवान कर्मयोग को पुनः परिभाषित करते हैं योगा कर्मसु कौशलम कर्म को कुशलता से करना यह एक स्किल है तकनीक है टेक्नोलॉजी। प्रायः कर्म को हम कुशलतापूर्वक नहीं करते, आप कुशल होकर करते हैं। जैसे कर्म में जब कुशलता होती है तो हमारे तन और मन को कर्म में पूर्ण नियोजन होना चाहिए संपूर्ण रूप से। कर्म में स्थित होना चाहिए ,एकाग्र होना चाहिए। संपूर्ण रूप स्थिर होना चाहिए एकाग्र होना चाहिए ऐसा होता नहीं है हम बार-बार फलाकांची हैं बार-बार सपने बुनते हैं।

  हम अगर परीक्षा की तैयारी करते हैं तो उम्मीद करते हैं आशा करते हैं ,कि जब इस परीक्षा का परिणाम आएगा तो ,हम क्लास में प्रथम आ जाएंगे, तो क्या घटना घटेगी, कितनी खुशी मिलेगी ,परिवार वाले खुश होंगे, नौकरी करेंगे ,फिर पैसा कमाएंगे ,फिर बड़ा धन होगा दौलत होगी , सारे सपने जुड़ जाते हैं , कर्म के साथ फल मिलता नहीं , मिलने में संदेश भी है कि मिलेगा कि नहीं मिलेगा लेकिन उसको फल की आकांक्षा को तीव्रता से बांधता है । फल की आकांक्षा के बढने के कारण मन जो है असंगठित हो जाता है ,मन बिखरता है मन बटता है विभाजित होता है।

जितना मनोयोग होना चाहिए कर्म में जितनी संपूर्णता के साथ कर्म होना चाहिए उतनी संपूर्णता के साथ नहीं होता है। कई बार हम सोचते हैं कि भगवान बार-बार कहते हैं मां फलेषु कदाचन,  फल की चिंता मत करो तो इस बारे में हम सोचते हैं कि जब फल की चिंता ही नहीं करेंगे तो हम कर्म करेंगे ही क्यों? सामान्य क्रम में हर कर्म करते हैं लोग से और भय से हमारे अंदर लोभ होता है कि कुछ मिलेगा ,या हम भयभीत होते हैं ,कि हम नहीं करेंगे तो सब कुछ बिगड़ जाएगा । योगी लोग और भाई के अधीन नहीं होता ना वह लोग करता है और ना भायातूर होता है। वह तो बस पूरे मन से अपना काम करता है, पूरी तल्लीनता से अपना काम करता है।

 प्रश्न उठता है कि अगर हमारे मन में आसक्ति नहीं है तो हम क्या काम करेंगे? हमराज से भर कर के अच्छा काम करते हैं और द्वेष से भर कर के बुरा काम करते हैं। कुछ काम अच्छा मिलेगा ,इस पाने की इच्छा से अच्छे काम करते हैं ,और हमें किसी से बदला लेना है, किसी को मारना है ,किसी को नुकसान पहुंचाना है ,ऐसा सोच कर बुरा काम करते हैं।

भगवान कहते हैं कि यह बात ठीक नहीं। इसके कारण हमें कर्म होते हैं जो अपना जन्म तक बांध दगे जन्मांतर तक बांध देंगे। कर्मसु कौशलम् कर्म से कुशलता सीखो कर्म तो हम करें लेकिन बन्धन मे नहीं। यह तो कर्म ही कुशलता है इससे कर्म करते हुए हम मुक्त रहते हैं। मुक्तसंग  समाचार। सम आचरण करते हुए मुक्ता संग हो करके अनासक्त होकर के ,कर्म बंधन से मुक्त होना यही कर्म की कुशलता है।

कर्मयोग का छठ आयाम भगवान कर्मयोग का एक और तत्व बताते हैं सभी कर्मों को भगवान में अर्पण करें। लोग अपने प्रिय जनों के लिए उपहार लाते हैं उनके लिए कर्म करते हैं लेकिन भगवान यहां कहते हैं कि सर्वप्रिय सबसे प्रिय मैं ही हूं । भगवान से अधिक प्रिय कोई नहीं है इसीलिए जो भी कर्म किया जाए ,वह तू मेरे लिए अर्पण कर दे। यात्करोशी जो कुछ करता है यहां तक कि भगवान कहते हैं यदश्नाषि जो तू खाता है जो तू हवन करता है, यत्ददसि‌ यतपस्यसि जो तू तब करता है प्रत्येक कर्म प्रातः से लेकर साय  तक सब कुछ मुझे अर्पण कर दे।

 संसार में जो हमारे संबंध बने हैं वह चित् एक सीमित है , संस्कार के संबंध है कर्म के संबंध है। चेतना से संबंध नहीं है, चेतनता  से संबंध नहीं है। इस संबंध ऐसे हैं कि एक संस्कार उभरा और एक संबंध बना, और उस संस्कार के साथ जो कर्म जुड़ा है, वहां तक संस्कार की डोर भी चलती है ,और कर्म की डोर भी चलती है। वह संस्कार टूटा ,और कर्म टूटा और संबंध भी टूटा। उस संबंध की एक सीमा एक कालावधी हैं।

 हम बहुत प्रगाढ़ता से किसी से प्रेम करते हैं ,लेकिन वह प्रेम संस्कार जन्य‌ है। प्रेम की टूट जाने पर वह व्यक्ति अलग हो जाता है भिन्न हो जाता है। वह व्यक्ति हमारे जीवन से चला जाता है ,दूर चला जाता है। इसीलिए मिलना बिछड़ना जीवन का मर्म है ,प्रत्येक संबंध में हम मिलते हैं और बिछड़ते भी हैं। एक स्थान में एक विशेष स्थान में एक विशेष समय में कोई व्यक्ति हमारे जीवन में आता है। बड़ा अच्छा लगता है यानी शुभ संस्कार जगा। एक विशेष स्थान में एक विशेष समय में कोई अन्य व्यक्ति हमारे जीवन में आता है, बड़ा बुरा लगता है अशुभ संस्कार जगा।

शुभ संस्कार के जगने पर ऐसा लगता है कि जैसे संपूर्ण जीवन हमने अपने साथ जी लिया और अशुभ संस्कार जगने पर ऐसा लगता है कि संपूर्ण जीवन की दुर्घटनाएं उसके साथ घटित हो गई है। यह संस्कार के स्वरूप पर और कर्म के स्वरूप पर निर्भर करता है। फिर उसके बाद वह स्थान भी बदल जाता है और व्यक्ति भी बदल जाते हैं और उसके संबंध भी बदल जाते हैं।

 बचपन से आज तक अगर हम निरीक्षण करें अपना परीक्षण करें तो पारिवारिक संबंधों के अतिरिक्त अनेक संबंध बने और संबंध टूटे भी लेकिन एक संबंध ऐसा है जो कभी परिवर्तित नहीं होता अपरिवर्तनीय होता है। आज और कल किसी भी छड़ में किसी भी मुहूर्त में उसमें परिवर्तन नहीं आएगा वह संबंध है आत्मा परमात्मा का संबंध।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुख राशि। ईश्वर और जीव का संबंध अविनाशी है, चेतन है, निर्मल है, और सुख की खान है सुख ही सुख है। इसीलिए वह परम प्रिय है ,सर्वप्रिय ,भले ही हम उसकी ओर से आंखें मूंदे हुए हैं। भले ही उसकी और हम उन्मुख ना हो भले ही उसका हमसे त्याग कर रखा हो, लेकिन उसने हमारा कभी भी त्याग नहीं किया। इसीलिए भगवान कृष्ण कहते हैं सभी कर्मों को भगवान में अर्जित करो ईश्वर में अर्पित करो।

कर्मयोग का सातवां आयाम

भगवान कहते हैं मान लो कि हम कर्म योग नहीं कर पाए कर्म करते हुए हमारे चिंतन में  में परमेश्वर नहीं रह पाए तो? हम भगवान को कर्म का फल अर्पित कर दे कर्म कर कर ही रहे हैं हम, और इसका फल भगवान पर छोड़ दें, भगवान के लिए छोड़ दे फिर कर्मफल की हमें चिंता नहीं होगी। भगवान ने 12 वीं अध्याय के बारे में श्लोक में बात कही है....श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यतेध्यानात्कर्मफलत्यागत्यागाच्छान्तिरनन्तरम।। अर्थात भगवान कहते हैं जो काम हम कर रहे हैं अनगढ़ कर रहे हैं । उस अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है लेकिन ज्ञान यदि केवल विचार हैं हम उसके मर्म को नहीं जानते ज्ञान को आचरण में नहीं लाते ,तो ऐसा ज्ञान निरर्थक है, इस ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है, और ध्यान से भी श्रेष्ठ है ,कर्म फल का त्याग क्योंकि त्याग से तत्काल शांति प्राप्त होती है।

इस तरह कर्म योग के बहुत सारे आयाम है इनमें से किसी एक की ओर भी हम अपने जीवन में अपना ले तो हमारे जीवन में कर्म योग सध जाएगा







 


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