google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical आयुर्वेद में है सभी रोगों का उपचार, वैदिक साहित्य के आलोक में शुचिता और सर्वोदय की भावना

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आयुर्वेद में है सभी रोगों का उपचार, वैदिक साहित्य के आलोक में शुचिता और सर्वोदय की भावना

 

आयुर्वेद में है सभी रोगों का उपचार, वैदिक साहित्य के आलोक में शुचिता और सर्वोदय की भावना 

एक मंत्र में कहा गया है कि समृद्धि संपन्न लोगों को चाहिए कि वे अभावग्रस्त लोगों की आर्थिक सहायता करें। उन्हें जीवन पथ को केवल अपने तक ही नहीं आगे भी धूप तक देखना चाहिए यह धन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पास वैसे ही चला जाता है जैसे रथ के पहिए एक सड़क से दूसरी सड़क पर चलते रहते हैं।


अर्थात केक मंत्रिपरिषद प्रबुद्ध जनों को चाहिए कि वह गिरे हुए 28 लोगों को बार बार ऊपर उठाएं।


  अर्थ वेद का आदेश है कि कमाना  तो हाथों से चाहिए; लेकिन कमाए धन का वितरण हजारों हाथ से करना चाहिए।

  शतहस्त समाहर सहस्त्रहस्त सं किर 
                (अथ.सं.३,२४.५)
  जो अभावग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करता है वही हाथ वरदान है।

  दूसरे को धन दान करने वाला अमरता के पथ पर आगे बढ़ते हैं। लोगों को एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए जरूरतमंद व्यक्ति को दान देने के विषय में अधिक विरोध में नहीं पैराशूट मिलते हैं जिसमें से दशम मंडल का एक सुक्त  संदर्भ में उल्लेखनीय इस सूक्त में कुल 9 मंत्र हैं जिनमें से कुछ को यहां उद्धृत किया जा सकता है। 


 केवल भूखे लोग भूख से नहीं मरते हैं वह भी मरते हैं जिनके पेट भरे हुए हैं दान करने वाले का धन समाप्त नहीं होता और कृपण पर कोई दया नहीं कर सकता।
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    जो अन्नयुक्त होने  पर भी किसी किचंन याचक को दान न करने के लिए मन को कठोर बना लेता है उस पर कोई दया नहीं दिखाता।
  
   

  अन्न की कामना से भटकते हुए भिखारी को जो दान देता है वह उधार है याचक को मार में जो सहायता कर देता है भविष्य के लिए उसे मित्र बना लेता है।

Health and fitness in ayurveda in Hindi 

 आयुर्वेद में, हम समझते हैं कि अगर हम शरीर की पर्याप्त गहराई में जाएं, तो यह शरीर अपने आप में कोई संपूर्ण चीज नहीं है। यह एक जारी प्रक्रिया है, जिसमें वह धरती भी शामिल है, जिस पर आप चलते हैं। अगर आप बहुत गंभीर स्थिति में हैं, तो किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर के पास जाना सही नहीं होगा। आप उसके पास तभी जाएं, जब आपके पास ठीक होने का समय हो। आपात स्थिति के लिए एलोपैथी में बेहतर व्यवस्था है। पूरी प्रणाली का ध्यान रखे बिना सिर्फ उसके एक पहलू पर काम करने की कोशिश बहुत फायदेमंद नहीं होती। एक समग्रतावादी प्रणाली का मतलब सिर्फ शरीर का संपूर्ण रूप में उपचार करना नहीं है। समग्रतावादी प्रणाली का मतलब जीवन का एक संपूर्ण रूप में उपचार करना है। जिसमें धरती, हम जो खाते हैं, जिस हवा में सांस लेते हैं, जो हम पीते हैं सब कुछ शामिल होते हैं। इन सब चीजों का ध्यान रखे बिना, आयुर्वेद का असली लाभ नहीं दिख सकता। अगर आयुर्वेद हमारे जीवन और हमारे समाजों में एक जीवंत हकीकत बन जाता है, तो लोग देवताओं की तरह रह सकते हैं।

Chikitsa Shastra ke Janak Aacharya charak (चिकित्सा शास्त्र के जनक आचार्य चरक)

   भारतवर्ष ही नहीं  संपूर्ण विश्व में चरक एक महर्षि एवं आयुर्वेदिक विशारद के रूप में जाने जाते हैं उन्होंने आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ "चरकसंहिंता" का संपादन किया था । चरक संहिता आयुर्वेद का प्राचीनतम ग्रंथ है जिसमें रोग निरोधक एवं रोग नाशक दवाओं का उल्लेख है। इसके साथ ही साथ इसको सोना चांदी लोहा पारा आदि धातु से निर्मित भस्मो एवं उनके उपयोग की विधि बताइए।
  कुछ  लोगों ने आचार्य चरक को "चरक संहिता "का रचनाकार बताया है पर हकीकत यह है कि उन्होंने आचार' अग्निवेश' द्वारा रचित "अग्निवेश तंत्र "का संपादन करने के पश्चात उसमें कुछ स्थान तथा अध्याय जोड़कर उसे नया रूप प्रदान किया। "अग्निवेश तंत्र" का संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण की बाद में" चरक संहिता" के नाम से जाना जाता है। उनके द्वारा प्रतिस्थापित सिद्धांत आज भी उतने ही कारगर है जितने उनके समय में थे।

   चरक पहले चिकित्सक है जिन्होंने पाचन चयापचय और शरीर प्रतिरक्षा की अवधारणा दुनिया के सामने रखी उन्होंने बताया कि शरीर के कार्य के कारण उनके तीन स्थाई दोष पाए जाते हैं जिन्हें वात, पित्त ,एवं कफ के नाम से जाना जाता है यह तीनों दोष से व्यक्ति के शरीर में जब तक संतुलित अवस्था में रहते हैं व्यक्ति स्वस्थ रहता है लेकिन जैसे ही इनका संतुलन बिगड़ जाता है व्यक्ति बीमार हो जाता है इसलिए शरीर को स्वस्थ करने के लिए इस संतुलन को पहचानना उसे फिर से पूर्व व्यवस्था में लाना आवश्यक होता है।


 संस्कृति में ब्रह्मा को सृष्टि का रचनाकार माना गया है। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने मनुष्य को पैदा किया जब मनुष्य पैदा हुए तो उनके साथ भांति भांति के रोग भी उत्पन्न हुए । उन लोगों से निपटने के लिए ब्रह्मा ने आयुर्वेद का ज्ञान सर्वप्रथम प्रजापति को दिया प्रजापति से है ज्ञान अश्वनी कुमार के पास पहुंचा।

   वैदिक साहित्य में अश्वनी कुमार ओके चमत्कारिक उपचार की अनेक कथाएं पढ़ने को मिलती है। अश्विनी कुमारों की विद्या से अभिभूत होकर देवराज इंद्र ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया। चरक संहिता के अनुसार एक बार धरती पर अनेक बीमारियों का प्रकोप हुआ इससे चिंतित होकर तमाम रिसीवर ने हिमालय की तराई में एक बैठक बुलाई।

  इस बैठक में असित, अगस्त्य, अंगिरा,आस्वराथ्य,आश्वलायन,आत्रेय, कश्यप कपिंजल कुशिक, कंकायण, जमदग्नि, आत्रेय ,गौतम ,शाक्य वशिष्ठ, पुलस्त्य, नारद ,बामदेव, मार्कंडेय, परीक्षीत, भारद्वाज, मैत्रेय, विश्वमृत ,भार्गव,च्वयन, अभिजीत ,गर्ग, शांडिल्य ,कोडिंन्य, वार्कषी,देवल,मैम्यातानी,वैखानसगण,गाल्व,वैजवापी,बादरायण,वडिश,शरलोमा,काप्य,कात्यायन,धौम्य,मारीच,काश्यप,शर्कराक्षहिरणाक्ष,लौगाक्षी,पैन्गी, शौनक,शाकुनैय,संर्रकित्य,एवम,बालखिल्यगण, आदि श्रिषियो ने भाग लिया।
  बैठक में सर्वसम्मति से भारद्वाज को प्रमुख चुना गया और बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए उन्हें इंद्र के पास भेजा गया। इंद्र ने आयुर्वेद का समस्त ज्ञान ऋषि भारद्वाज को दिया बाद में भारद्वाज ने अपने शिष्य आत्रेय पुनर्वसु को इस महत्वपूर्ण ज्ञान से परिचय कराया।

  आत्रेय, पुनर्वसु 6 शिष्य थे -अग्निवेश ,भेल,जतुकर्रण,पराशर,हारीत,और, क्षारपाणि, बाद में इन सिस्टर ने अपनी अपनी प्रतिभा अनुसार आयुर्वेद ग्रंथों की रचना की इनमें से ज्यादातर ने आत्रे के ज्ञान को ही संग्रहित किया और उसको थोड़ा बहुत परिमार्जन किया। आत्रे के इंटर मनसे स्वामी अग्निवेश विशेष प्रतिभाशाली थे उन्होंने चरक संहिता के नाम से जाना जाता है जिसके वह रचनाकार। चौकी चरक संहिता के रचनाकार अग्निवेश थे इसलिए उसे अग्निवेश संहिता के नाम से भी जाना जाता है।

   चरक के द्वारा अग्निवेश संहिता का संवाद संपादन कर उसे चरक संहिता का स्वरूप प्रदान किया गया वह कब पैदा हुए उनका जन्म कहां हुआ है इतिहास में इसका कोई वर्णन नहीं मिलता है। त्रिपिटक के चीनी अनुवाद में चरक का परिचय कनिष्क के राज्य के रूप में दिया गया किंतु ध्यान देने वाली बातें आएगी कनेक्शन राजा था और उसका कवि अश्वघोष ही बहुत था पर चरक संहिता में बौद्ध मत का जोरदार खंडन किया गया। इसके बात तो यह बात गलत साबित हो जाती है कि चरक संहिता कनिष्क के राज्य वैद थे। विद्वान गढ़ इस कथन का आशय इस तरह से लगाते हैं कि चरक कनिष्क के समय में रहे होंगे चरक संहिता में अनेक स्थानों पर उत्तर भारत का जिक्र मिलता है। इससे यह प्रभाव प्रमाणित होता है कि चरक संहिता उत्तर भारत के निवासी रहे हैं। दुर्भाग्यवश इसके अलावा चरक विषय में अन्य कोई प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

   आयुर्वेद के विकास की जो कहानी प्रचलित है उसमें भारद्वाज पुनर्वसु और अग्निवेश सी ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित गए हैं। भगवान बुद्ध के काल में मगध राज्य में जीवन नाम से प्रसिद्ध वैद्य का जिक्र मिलता है। ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि आयुर्वेद का अध्यन करने के लिए चरक तक्षशिला गए थे वहां पर उन्होंने अचार्य अत्रे से आयुर्वेद की दीक्षा प्राप्त की थी।
  इससे यह कहा जा सकता है कि आत्रेय पुनर्वसु संभवत आज के लगभग ढाई हजार वर्ष पहले हुए इसका तात्पर्य ही निकलता है कि चरागाह से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व हुई आचार्य चाणक्य वृतांत का सूचक परिचय भले ही नहीं मिलता हो परंतु जीवन एवं स्वास्थ्य के संदर्भ में उनका योगदान अद्भुत रहा है।


 practice of pratyahara in ayurvedic life (आयुर्वेदिक जीवन में प्रत्याहार की साधना)

प्रत्याहार पातंजल योग सूत्र में साधना का एक महत्त्वपूर्ण सोपान है। देखा जाए तो युग का वास्तविक शुभारंभ ही से होता है क्योंकि इससे पूर्व में चरण योग की प्राथमिक तैयारी के होते हैं जिसके अंतर्गत यम नियम के माध्यम से अपने विचार एवं व्यवहार के स्थिरता एवं संतुलन को साधा जा रहा होता है। वही आसन प्राणायाम के माध्यम से तन-मन एवं प्राण का स्थिर एवं स्वस्थ आधार होता है। इसी तैयारी के बाद मन को बाहरी विषयों से समझते हुए उसी एक तत्व उसी परम सत्य आत्म तत्व और की ओर अंतर मुख किया जाता है। मन को अंतर्मुखी बनाने की प्रक्रिया ही प्रत्याहार है जिसके उपरांत धारणा ध्यान का क्रम आता है।

  प्रत्याहार प्रति एवं आहार सब से मिलकर बना है। प्रति का अर्थ है विपरीत अर्थात इंद्रियों के जो विषय आहार है इंद्रियों को उनके विपरीत कर देना प्रत्याहार है। इस तरह प्रत्याहार का अर्थ इंद्रियों को विषयों के पीछे खींचना या हटाना भी हुआ। पतंजलि योग सूत्र में महर्षि पतंजलि के अनुसार अपने शिष्यों के संबंध से रहित होने पर "इंद्रियों का जो चित्र स्वरूप में तदाकार सा हो जाता है वही प्रत्याहार है"। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में "यदि तुम चित्र को विभिन्न आकृतियों धारण करने से रोक सको तभी तुम्हारा मन शांत होगा और इंद्रियों भी मन के अनुरूप हो जाएंगी"इस तरह प्रतिहार इन दिनों का विषय से विमुख होना है अपने बहिर्मुखी विषय से पीछे हट कर अंतर्मुखी होना है।

   ‌ योग साधना में इंद्रियों को विषयों से अलग होना ही प्रत्याहार कहा है। जिस समय साधक अपनी साधना काल में इंद्रियों के विषयों का परित्याग कर देता है और चित्र को अपने इष्ट में एक आकार कर देता है तब उस समय जो चिंतन इंद्रियों के विषयों की तरफ ना जाकर चित्र में समाहित हो जाता है वही प्रत्याहार सिद्ध की पहचान है। यह क्रमिक रूप से साधना पथ पर आगे बढ़ते हुए घटित होता है।

  जब यम नियम आसन प्राणायाम की क्रिया द्वारा अभ्यास करते करते मन एवं समस्त इंद्रियों पर स्थित हो जाती है तत्पश्चात इंद्रियों की ब्रह्म वृत्ति को सब ओर से हटाकर व एकत्र करके मन में ले करने के अभ्यास को प्रत्याहार कहा जाता है। जहां जहां भी इंडिया जती है वहां वहां से इंद्रियों को लौटा कर मन को अंतर्मुखी करने का अभ्यास किया जाता है। दैनिक जीवन में व्यक्ति जहां खड़ा है वहीं से प्रतिहार का अभ्यास करते हुए योग साधना के पथ पर आगे बढ़ सकता है। व्यवहारिक जीवन उपवास एवं मैन मोहन जैसे व्रत प्रत्याहार के ही अभ्यास हैं। क्योंकि जब इंद्रियों को उनके आहार से वंचित किया जाता है तो प्रत्याहार की साधना शुरू हो जाती है। इन व्रत साधना का उद्देश्य शरीर मन इंद्रियों को भूखा मारना नहीं होता बल्कि गलत अभ्यास के कारण विषयों के प्रति इनकी अत्यधिक संलिप्तता एवं आसक्ति पर अंकुश लगाना होता है। जो गलत आदतों के रूप में किसी की तरफ व्यक्ति के जीवन को भीतर से खोखला कर रही होती हैं। अपने विवेक के आधार पर साधक वह एक मुखी इंद्रियों और मन को अनुशासित करता है और अपना नियंत्रण स्थापित करता है।

  ‌ संचार क्रांति के युग में जब भोग बाद की आंधी में व्यक्ति तिनके की भारत और रहा हो विषय भूगोल में आकंठ सन लिप्त हो ऐसे में प्रत्याहार का महत्व बढ़ जाता है। स्मार्टफोन अपनी तरफ की उपयोगिता के बावजूद अपने मायावी स्वरूप के कारण एक बहुत बड़ी चुनौती एवं समस्या के रूप में सामने खड़े हो गए। बच्चा हो या बुरा युवा हो या किशोर स्त्री हो या पुरुष सभी इसकी जकड़न में है और धड़ल्ले से इसका उपयोग कर रहे हैं। स्थिति यह आ गई है कि अधिकार व्यक्ति अपने इसके बिना नहीं रह पाते हैं।इसके अत्यधिक उपयोग के साथ इसका दुरुपयोग जीवन में सुख शांति एवं संतुलन को छीन रहा है तथा व्यक्ति कई तरह की विकृतियों का शिकार हो रहा है।

   अत्यधिक उपयोग के चलते व्यक्ति के स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। लगातार टकटकी लगाकर फोन की स्क्रीन देखते रहने से आंखें शुष्क होने लगती हैं। इससे एक बात तो आंखों से कमजोर होती है साथ ही साथ स्मरण शक्ति एवं एकाग्रता छाए होने लगती है मन की स्थिरता एवं चंचलता बढ़ जाती है जीवन के दैनिक कार्य एवं कर्तव्य भी तब सही ढंग से नहीं निभा पाते हैं। आपसी संबंधों में कई तरह की विसंगति का भी कारण बनता है। कौन किस बात के लिए क्यों खड़ा हुआ रूठा हुआ इसका भी अनुमान लगाना कठिन हो जाता है और व्यक्ति अनावश्यक तनाव चिंता दुविधा की अवस्था में रहता है।

  ‌ आज स्मार्टफोन की गिरफ्त में आ चुके लोगों को इससे बाहर निकालने के लिए डिजिटल डिटॉक्स की बातें हो रही है और इसके कई केंद्र खुल चुके हैं। इनमें चल रहे उपचारों को योग की भाषा में प्रत्याहार की प्रक्रिया का सकते हैं। आप चाहे तो अपने घर पर अपनी फोन पर कुछ सप्ताह तक इंटरनेट सुविधा को बंद कर या इसका सीमित उपयोग कर इस तरह का प्रयोग कर सकते हैं। यदि कोई संवाद करना हो तो मोबाइल के मैसेंजर के माध्यम से कर सकते हैं या मेल के माध्यम से आवश्यक कार्य निपटा सकते हैं।

  स्मार्टफोन पर बिखराव एवं तनाव का कारण बनने वाली सोशल मीडिया एप्स को सामाजिक रूप से निष्क्रिय भी कर सकते हैं। अधिक आवश्यक हो तो कंप्यूटर सिस्टम पर महत्वपूर्ण कारण कार्यों को निपटा सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर इन एप्स को अस्थाई रूप से चालू कर सकते हैं और हर पल अनावश्यक सूचनाओं की बाढ़ के दबाव से बच सकते हैं।

‌‌। प्रत्याहार का एक प्रयोग आप के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत उपयोगी साबित होगा तो 4 सप्ताह भी यदि इसे आजमाया गया तो मन की खोई हुई लय पुनः वापस आ जाएगी। एकाग्रता एवं ईश्वर शक्ति में भी वृद्धि होगी आपके पास काम करने के लिए अधिक समय बचेगा जिसमें आप कई तरह के आवश्यक कार्य निपटा सकेंगे। इसके साथ आपको कार्यक्षमता में वृद्धि होगी प्रतिभा का निखार होगा। इसके ऊपर आप एक स्वामी की तरह मोबाइल का उपयोग कर रहे होंगे ना कि इसके गुलाम की तरह और प्रत्याहार के ऐसे प्रयोग आपके योग पद के उच्चतर आयाम की ओर आगे बढ़ रहा होगा।
  


  

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