स्वस्थ जीवन शैली के साथ समग्र चिकित्सकिय दृष्टिकोण भी जरूरी है
Health department in hindi
Corona virus जनित कोविड -19 महामारी के खिलाफ आज पूरी दुनिया संघर्ष कर रही है। इसमें हमारी ने विकासशील और विकसित देशों के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय परिदृश्य को बदल कर रख दिया है। इस महामारी ने मानो पूरी दुनिया में एक आपातकालीन स्थिति पैदा कर दी है तभी तो लोगों को अपनी जीवनशैली बदलने को मजबूर होना पड़ा है इस महामारी की चपेट में आकर दुनिया भर में अब तक लाखों लोग काल कल वित्त हो चुके हैं और लाखों लोग अभी भी जिंदा है मगर जिंदगी की मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
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कोविड -19 के पूर्ण निदान के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक निकले शोध करने में जुटे हैं। एलोपैथी ,होम्योपैथी ,सिद्ध ,यूनानी एवं अन्य चिकित्सा पद्धतियों के अंतर्गत इसके निदान ढुंढे जा रहे हैं। पर वैज्ञानिकों को भी अब तक कोई वांछित व आशातीत सफलता नहीं मिल सकी है। हालांकि अपने देश में और विदेशों में भी वैक्सीनेशन की प्रक्रिया बहुत तेजी से चल रही है और भारत में तो वैक्सीनेशन की दर में काफी इजाफा हुआ है। पर जब तक कोशिश -19 के पूर्व निदान हेतु कोई कारगर औषधि नहीं आ जाती तब तक विविध चिकित्सा पद्धतियों के अंतर्गत नित नए शोध भी जारी रहेंगे।
दुनिया भर में चिकित्सा पद्धतियां प्रचलित है हर चिकित्सा पद्धति की अपनी विशेषताएं भी है और सीमाएं भी हैं। उदाहरण स्वरूप एलोपैथी रोक के तात्कालिक लक्षण के आधार पर रोग के प्रबंधन पर केंद्रित होती है एलोपैथी की औषधि रोगी को तुरंत राहत देती है। किसी रोग विशेष में दुर्घटना विशेष में किसी अन्य विशेष की तुरंत शैल्य चिकित्सा करनी हो तो इसमें एलोपैथी चिकित्सा सबसे जल्दी सहायता करती है। अब तक की नई Health department in hindiनई तकनीक के विकसित होने के कारण इसमें लेजर का प्रयोग हुआ और अणु तकनीक का भी इस्तेमाल होने लगा है। इस पद्धति में इंजेक्शन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके परिणाम शीघ्र सामने आ जाते हैं और इसके द्वारा मनुष्य को तत्काल राहत भी मिलती है।
इस प्रक्रिया से कई लोगों पर तुरंत अंकुश लगाने में सहायता मिलती है। नई-नई विकसित तकनीकों के माध्यम से अब हर अंग अववय की तुरंत स्कैनिंग की जाने लगी है। सिटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड एक्स-रे आदि तकनीकों के माध्यम से ही सहित चिकित्सा करने में मदद मिलती है पर इस चिकित्सा पद्धति की कुछ सीमाएं भी है। वह दवाइयों का प्रतिकूल प्रभाव या साइड इफेक्ट । एक तो दवाइयां रोग को दबा देती हैं इनसे रोग निर्मूल हो पाता है, साथी कालांतर में वह किसी अन्य रूप को जन्म दे दे देती है। इस चिकित्सा पद्धति के तहत शरीर का उपचार तो संभव है पर मन का नहीं। कई बीमारियों की जड़ शरीर में ना होकर मन में होती है। व्यक्ति के अचेतन मन में होती है अतः नानावधि मानसिक रोगों का पूर्ण निदान एलोपैथिक पद्धति में संभव नहीं है। मन का परिष्कार कर मानसिक और मनोकायिक रोगों का पूर्ण निदान संभव है।
चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद औषधी पर आधारित
वही प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति में एक प्रमुख चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद औषधि पौधों पर आधारित हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति रोग को दबाने या उसे शरीर में दफन कर तात्कालिक राहत देने के बजाय रोग को रोक थाम और रोग उत्पन्न करने वाले मूल कारण को निष्कासित करने में ध्यान केंद्रित करती है। चुकी आयुर्वेद वात ,पित्त, कफ के असंतुलन का रोग कारण मानता है इसीलिए वात ,पित्त, कफ को संतुलित कर रोग मुक्त होने या करने के सिद्धांत पर कार्य करता है।
प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति शरीर में टॉक्सिन के संग्रह को रोग का कारण मानती है। अतः शरीर में जमा टॉक्सिंस एवं अन्य विषैली विजाती तत्वों को निष्कासित करने पर ध्यान केंद्रित करती है। क्योंकि मानव शरीर पंच तत्वों से मिलकर बना है इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा मिट्टी, जल, वायु, अग्नि ,आकाश आदि प्राकृतिक तत्वों का प्रयोग व सेवन के द्वारा शरीर में विजातीय तत्व का निष्कासन करने के द्वारा रोग को रोकथाम उसकी चिकित्सा पर केंद्रित होती है।
आयुर्वेद व प्राकृतिक चिकित्सा चिकित्सा
आयुर्वेद व प्राकृतिक चिकित्सा एक ही चिकित्सा पद्धति की दो शाखाएं हैं इस पद्धति का आयुर्वेद में निकटतम संबंध है इसे बहुत औषधि विहीन उपचार पद्धति कहा जाता है इस पद्धति के उपचार से व्यक्ति के शरीर में कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। रोग का मूल कारण समाप्त हो जाने से रोग जड़ सहित दूर हो जाता है। साथी व्यक्ति की जीवन शक्ति व रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है जिससे वह तुरंत किसी रोग की चपेट पर नहीं आ पाता यदि आ भी जाए तो अपनी बड़ी चढ़ी जीवन शक्ति व रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण रोगी रोग मुक्त हो सकता है।
होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति
होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति समरूपता के सिद्धांत पर आधारित है जिसके अनुसार और सदियां उन लोगों से मिलते जुलते रोगों को दूर कर सकती हैं जिन्हें उत्पन्न करते हैं। औषधि को रोक कर सकती रोग के लक्षणों के समान किंतु उनसे प्रबल होनी चाहिए। अत: रोग अत्यंत निश्चय पूर्ण जड़ से अविलंब और सदा के लिए नष्ट और समाप्त उसी औषधि से हो सकता है। जो मानव शरीर में रोग के लक्षणों से प्रबल और लक्षणों से अत्यंत मिलते-जुलते सभी लक्षण उत्पन्न कर सकते हैं। इस उपचार पद्धति में रोग लक्षण और औषधि लक्षण में जितनी अधिक समानता होगी रोगी के स्वस्थ होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। सिद्धौर सदी प्रणाली आयुर्वेद से ही मिलती-जुलती उपचार पद्धति है। आकस्मिक मामलों को छोड़कर सभी प्रकार के रोगों का इलाज करने में सक्षम है
इस उपचार पद्धति का मानना है कि भोजन ही औषधि है और औषधि ही भोजन है। सिद्ध उपचार पद्धति के अनुसार सात तत्व अर्थात प्लाविका, रक्त, मांस पेशी, वसा, अस्थि ,स्नायु ,तथा शुक्र मानव शरीर के सारीरिक क्रिया एवं मनोवैज्ञानिक कार्यों के आधार हैं। यह सातों तत्व तीन तत्व अर्थात वायु, अग्नि , तथा जल द्वारा सक्रिय होते हैं। माना जाता है कि समानता यह तीनों तत्व हमारे शरीर में एक विशेष अनुपात में होते हैं। जब हमारे शरीर में इन तत्वों का संतुलन बिगड़ता है तब विभिन्न रोग उत्पन्न होते हैं। हमारे शरीर में इन तत्वों को प्रभावित करने वाले कारक है-पथ्य, आहार, शारीरिक गतिविधियां, पर्यावरण संबंधित तथ्य एवम तनाव।
उपचार पद्धति में धातु तथा खनिजों का उपयोग प्रमुख है। इस उपचार का ढेर शरीर में तीन तत्वों का संतुलन बनाए रखकर सात तत्वों को सामान्य स्थिति में रखना है। ताकि शरीर एवं मस्तिष्क स्वस्थ रख सके।
यूनानी चिकित्सा पद्धति
यूनानी चिकित्सा पद्धति को भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के करीब मानती है। इस उपचार पद्धति में वात, पित्त, कफ की प्रधानता के आधार पर रोग के लक्षणों का पता किया जाता है । मानव शरीर में अग्नि जल वायु और पृथ्वी की प्रधानता का मानव शरीर पर प्रभाव के आधार पर रोग की पहचान व उसका निदान किया जाता है। उसी प्रकार एक्यूप्रेशर व मर्म चिकित्सा भी आज एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में उभरे हैं जिनका लाभ जनमानस को मिल रहा है। यह शरीर के विभिन्न धर्म वही आज योग भी एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में उभर कर सामने आया है।
योगिक चिकित्सा पद्धति के रूप में
योग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित एक प्रमुख दार्शनिक दर्शन है। बोलता आत्मा एवं परमात्मा के मिलन की प्रक्रिया है। आत्म साक्षात्कार व ईश्वर साक्षात्कार का दर्शन है। विभिन्न वैज्ञानिक शोधों के उपरांत जब से इसके चिकित्सकीय लाभ सामने आए तभी से युग को एक समग्र स्वास्थ्य चिकित्सा पद्धति की प्रक्रिया में पूरी दुनिया में मान्यता मिलने लगी है। संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा वर्ष 2015 में हर वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाने की घोषणा वस्तुतः योग के चिकित्सकीय पक्ष का ही सम्मान है।
शरीर मन व आत्मा किस समय सम्मेलन से ही मनुष्य पूर्णता स्वस्थ रह सकता है। ह्यूमन शरीर में आत्मा के समेत सम्मेलन में सहायक है। यह शरीर मन व आत्मा तीनों स्तर पर कार्य करता है योग शरीर मन व आत्मा तीनों के परिष्कर पर केंद्रित है। एक समग्र जीवन पद्धति है इसमें यम -नियम -आसन- प्राणायाम- प्रत्याहार- धारणा- ध्यान और समाधि आदि अष्टांग योग के अभ्यास से व्यक्ति के सामाजिक तथा व्यक्तिगत आचरण में सुधार आता है। आसन योग प्राणायाम के सम्यक अभ्यास से शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त का भली-भांति संचार होने से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है इंद्रियां संयमित होती है तब मन को शांति मिलती है। प्राणायाम के अभ्यास से नारी शुद्धि होती है साथ ही मन की चंचलता भी मिटती है। कुंजल, धौति, लघु ,शंख ,प्रक्षालन आदि क्रियाएं शरीर में विजातीय तत्व के निष्कासन में सहायक है।
औषधियों के सेवन से भी व्यक्ति के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं होता दिखता। इसका कारण यह होता है कि व्यक्ति के रोग के कारण उसके शरीर में नहीं बल्कि उसके मन में निहित होता है। इलाज उसके शरीर का नहीं बल्कि मन का होना चाहिए। व्यक्ति के द्वारा पुनर्जन्म में या इस जन्म में किए गए बुरे कार्य अशुभ या पाप कर्मों के संस्कार उसके अचेतन मन में समाए रहते हैं। कहीं दमित इच्छाएं, वासना, अचेतन मन में दफन होती है जिसके कारण व्यक्ति के मन में आत्मग्लानि हीन भावना अपराध बोध भय ग्रेनाइट से अधिक नकारात्मक भावनाएं भरी होती है।
नकारात्मक भावनाओं के कारण उनमें कुंठा, चिंता, अवसाद तनाव आदि मानसिक व्याधियों उत्पन्न होने लगती है। फिर मानसिक व्याधियों मन से शुरू होकर काया में प्रकट होने लगती है जिन्हें हम मनो दैहिक अथवा मनोकायिक रोग कहते हैं। ध्यान में भक्ति के निरंतर अभ्यास से व्यक्ति के अचेतन का परिष्कार होने लगता है, जिससे वह शारीरिक मानसिक तथा आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ होने लगता है।
करुणा प्रेम संवेदना आदि उच्चतर भावनाएं विकसित होने लगती है जिनसे वह मानसिक व आध्यात्मिक रूप से प्रफुल्लित होने लगता है। परिणाम स्वरूप उसमें आसावा उत्साह का संचार होने लगता है। उसे एक नूतन जीवन दृष्टि मिल जाती है जिससे वह कठिन से कठिन परिस्थितियों और चुनौतियों का बहादुरी पूर्वक सामना कर पाता है। उसके जीवन शक्ति स्वरूप प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
आधुनिक जीवनशैली
विकृत जीवन शैली के कारण ही नानावती व्याधियों से पीड़ित है। इसका एक ही निदान है और वह है आयुर्वेदिक जीवनशैली, प्राकृतिक जीवन शैली ,योगिक जीवनशैली, आध्यात्मिक जीवन शैली ,अर्थात समग्र जीवन शैली। इस प्रकार हम देखते हैं कि हर चिकित्सा पद्धति की अपनी विशेषताएं भी है और सीमाएं भी है किसी एक चिकित्सा पद्धति के भरोसे रहने और अन्य चिकित्सा पद्धतियों के सन्निहित विशेषताओं की उपेक्षा करने के बजाय हमें सभी चिकित्सा पद्धतियों में सन्निहित विशेषताओं का लाभ उठाना चाहिए जिससे हम समग्र स्वास्थ्य की प्राप्ति कर सकें।
बुखार से तपता हुआ व्यक्ति भला आसन प्राणायाम ध्यान भजन आदि कैसे कर सकता है? यदि किसी दुर्घटना में किसी व्यक्ति का हाथ कट गया हो उसके शरीर से रक्त बह रहा हो तो उसकी अविलंब शल्यक्रिया कराने के लिए एलोपैथी ही सर्वोत्तम है। अवस्था में व्यक्ति आसन प्राणायाम ध्यान आदि का अभ्यास तो नहीं कर सकता है। एलोपैथी के उपचार के साथ-साथ उसे आयुर्वेद , चिकित्सा होम्योपैथी आदि उपचारों का सहारा अवश्य दिया जा सकता है जिससे उसकी जीवन शक्ति व रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे और वह शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सके और साथी एलोपैथिक औषधियों का प्रतिकूल प्रभाव समाप्त हो सके। यदि कोई आकस्मिक कारण नहीं है तो हम आयुर्वेदिक प्राकृतिक चिकित्सा योग आदि उपचार प्राणयों का सहारा ले सकते हैं।
कोविड-19 भी एक आकस्मिक महामारी है जिसके पूरे निदान के लिए होम्योपैथी के साथ-साथ अन्य उपचार पद्धतियों का सहारा ले जाने की आवश्यकता है कोविड 19 से मरने वालों लोगों में अधिकांश ऐसे लोग थे जो मधुमेह, रक्तचाप , यकृत एवं श्वसन संबंधी समस्याओं से पूर्व से पीड़ित है या जो अवसाद, तनाव ,कुंठा ,अनिद्रा, आदि व्याधियों से भी पीड़ित थे या फिर जिनके जीवन शक्ति व रोग प्रतिरोधक क्षमता कम से कमतर थी। ऐसे लोग शीघ्रता से करो ना वायरस की चपेट में आ गए पर जिनकी जीवन शक्ति व रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी थी ऐसे लोग या तो कोरोनावायरस की चपेट में आए नहीं और यदि आ भी गए तो बेहतर जीवन शक्ति व रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण शीघ्र स्वस्थ हो सके।
आज विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के आधार पर कोरोनावायरस के पूर्व निदान को लेकर शोधपत्र सामने आ रहे हैं। इस बीच एक ऐसा ही शोध पत्र देव संस्कृति विश्वविद्यालय के शोध वैज्ञानिकों के द्वारा भी लिखा गया है जिसकी चर्चा वैज्ञानिक अ जगत ने गंभीरता के साथ हो रही है।
अकादमी ऑफ प्लांट साइंसेज भारत के द्वारा प्रकाशित "एडवांसेज इन प्लांट साइंसेज" नामक अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका में "होलिस्टिक थैरेपीयूटिक यूजेस फॉर क्यूरिंग नोबेल कोरोनावायरस- एन ओवरव्यू" शीर्षक से प्रकाशित अपने शोध पत्र में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के औषधीय पादप विज्ञान के कार्यरत शोध वैज्ञानिक व सहायक प्राध्यापक का मानना है कि गोविंदा एवं अन्य बीमारियों के निदान हेतु आज एक समग्र चिकित्सकों को अपनाने की आवश्यकता है।
एक चिकित्सा पद्धति के भरोसे रह कराने चिकित्सा पद्धतियों की उपेक्षा की दृश्य देखने के बजाय उन में सन्निहित विशेषताओं से लाभ उठाए जाने की आवश्यकता है। महामारी के निदान हेतु एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेदिक, यूनानी ,सिद्धि योग ,आदि चिकित्सा पद्धतियों के उपयुक्त सम्मिलित तैयार किए जाएं ताकि किसी एक चिकित्सा पद्धति के द्वारा इसका तात्कालिक संपूर्ण व समुचित निदान संभव हो सके। शोध वैज्ञानिक का मानना है कि अनुसार,होता, गिलोय, लिसोड़ा, कुचला, सदाबहार आदि ऐसे औषधि पादप है जिनके फलों पत्तियों छिलकों रसों ऑर्डर आदि के विभिन्न रूप में प्रयोग सेवन से न सिर्फ कोविड-19 के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है बल्कि उसके प्रभावी निदान भी किया जा सकता है।
अडूसाअडूसा में एंटी बैक्टीरियल एंटी वायरल गुण है इस कारण संक्रमण को रोकने में कारगर है यह निमोनिया, बुखार ,खांसी आदि में भी लाभकारी है।
मोथामोथा में जीवन शक्ति बढ़ाने की क्षमता है यह कोविड-19 के शिकार उन रोगियों के लाभकारी है जो उच्च रक्तचाप मधुमेह व किडनी संबंधीत बीमारियों से भी पीड़ित है।
गिलोयगिलोय में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की अद्भुत क्षमता है यह रक्त शोधन होने के साथ-साथ थकान मिटाने में सहायक है। इसे कोविड-19 के शिकार उन रोगियों को दिया जा सकता है जो हृदय संबंधी रोगों अथवा मधुमेह आदि से भी पीड़ित है यह मनोकायिक औषधि के रूप में चर्चित है।
लिसोड़ालिसोड़ा सूखी खांसी निमोनिया आदि फेफड़ों से संबंधी बीमारियों के निदान में सहायक है।
कालमेघकालमेघ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली एक अदभुत औषधि के रूप में विख्यात है। गिलोय के साथ किया जाए तो लीवर को पुष्ट करने के साथ-साथ जीवन शक्ति वर्धक रक्त शोधक भी है। यह पाचन संबंधी विकारों को दूर करने के साथ-साथ मलेरिया बुखार में भी लाभकारी है। मधुमेह व हृदय संबंधी रोगों से पीड़ित को भी 19 के शिकार रोगियों के लिए सुरक्षित है।
कुचलाकुचला एक प्रभावी नर्व टॉनिक शक्ति वर्धक औषधि के रूप में कार्य करता है। यह सोशल संबंधित सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी हैं।
वही सदाबहारसदाबहार एक मधुमेह नाशक औषधि के रूप में प्रभावी इसके अतिरिक्त इसका प्रभाव यकृत पर भी पड़ता है।
इस प्रकार आज कोविड-19 के कारण निदान हेतु ही नहीं वरन समग्र स्वास्थ्य के लिए भी समग्र चिकित्सकीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। योग आयुर्वेद प्राकृतिक चिकित्सा आदि के समग्र स्वास्थ्य संबंधी सिद्धांतों को अपनाने जीवन शैली में समाहित करने की एक समग्र जीवन शैली अपनाने की आवश्यकता है।
खाना, पीना ,सोना ,जागना ,चिंतन, चरित्र ,व्यवहार आदि सभी क्रियाएं प्राकृतिक क्रियाओं के प्रतिकूल नहीं वरन अनुकूल हो तभी हम समग्र स्वास्थ्य को पाकर अपने जीवन की खुशियों व आनंद से भर सकते हैं सभी चिकित्सा पद्धतियां एक दूसरे की पूरक व सहयोगी के रूप में एक प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं और तभी इसका समुचित लाभ पूरी विश्व मानवता को मिल सकता है।
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