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25 Home Remedies Everyone Should Know in hindi

25 domestic remedies every person have to understand?in Hindi

     

तुलसी (basil)






भारत भूमि ऋषि और मुनियों की भूमि है जहां पर पेड़ पौधे पर्वत सभी की पूजा होती है उस पूजा का एक वैज्ञानिक महत्व भी होता है। उसी वनस्पतियों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण वनस्पति है जिसका नाम है तुलसी जिसकी पूजा भारत में हर घर में होती है। । तुलसी का वैज्ञानिक नाम..

 * ऑसीमम अमेरिकन (काली तुलसी) गम्भीरा या मामरी।

* ऑसीमम वेसिलिकम (मरुआ तुलसी) मुन्जरिकी या मुरसा।

*  ऑसीमम वेसिलिकम मिनिमम।

* आसीमम ग्रेटिसिकम (राम तुलसी / वन तुलसी / अरण्यतुलसी)।

* ऑसीमम किलिमण्डचेरिकम (कर्पूर तुलसी)।

* ऑसीमम सैक्टम तथा

* ऑसीमम विरिडी।

Ashimim gratiyas या रामा/ वन तुलसी/ अरण्यतुलसी को सबसे पवित्र और और सभी गुणों से भरपूर मानते हैं। आयुर्वेद बेबी रामा तुलसी, काली तुलसी और बन तुलसी का वृतांत मिलता है।

तुलसी में एक बहुत महत्वपूर्ण औषधीय गुण भी है जिनकी वजह से विवो जानी जाती हैआयुर्वेद में तुलसी के पौधे के हर भाग को स्वास्थ्य के लिहाज से फायदेमंद बताया गया है. तुलसी की जड़, उसकी शाखाएं, पत्ती और बीज सभी का अलग अलग महत्व है। पुरुष वर्ग में होने वाले यौन रोग की समस्याओं के लिए तुलसी के पत्तों का प्रयोग बहुत ही कारगर सिद्ध होता है। यौन दुर्बलता एवं नपुंसकता जैसी समस्याओं का तुलसी के पत्तों के सेवन से निराकरण होता है। यदि नियमित तुलसी के पत्तों का सेवन किया जाए तो पुरुष वर्ग में होने वाली मर्दाना कमजोरियों का निवारण तुलसी के पत्ते से होता है।

  महिलाओं के पीरियड्स में होने वाली समस्याओं के लिए भी तुलसी का प्रयोग बहुत ही लाभकारी होता है। मासिक धर्म की अनियमितता एवं उस में होने वाले दर्द सिर्फ तुलसी के पत्तों के सेवन से लाभ मिलता है। नियमित तुलसी के पत्तों का सेवन किया जाए तो महिलाओं के पीरियड्स में बहुत उपयोगी सिद्ध होता है।

 मुंह से आने वाली दुर्गंध के लिए भी तुलसी का पत्ता बहुत ही कारगर होता है । अगर आपके मुंह से दुर्गंध आती है तो नियमित सुबह के वक्त तुलसी के पत्तों को चबाया जाए तो मुंह से आने वाली दुर्गंध से छुटकारा मिल जाता है।

 अगर दस्त की समस्या हो जाए तो तुलसी के पत्तों को जीरे के साथ सेवन करने से दस्त में आराम मिलता है। सिर में जुएं और लीख पड़ जाने से भी तुलसी के पत्तों से सेवन तुलसी के पत्तों के इस्तेमाल से जुएं और लीख समाप्त हो जाती है। पत्तों को पीसकर उसमें नारियल तेल मिलाकर बालों की जड़ों में लगाने से जुएं और लीख की समस्या समाप्त हो जाती है।

  सर्दी जुकाम बुखार खांसी के लिए तो तुलसी के पत्ते रामबाण है अगर इन उस तुलसी के पत्तों को काली मिर्च और लौंग के साथ काढ़ा बनाकर उसका सुबह-शाम सेवन किया जाए तो खांसी जुकाम बुखार से जल्द राहत मिल जाता है। क्योंकि तुलसी के पत्तों में एंटीबैक्टीरियल तत्व पाए जाते हैं इसलिए इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता और खांसी जुकाम और बुखार में जल्दी राहत भी मिल जाती है।

  अधिकतर महिलाओं पुरुषों के चेहरे पर होने वाले पिंपल्स और एक्ने की समस्या को भी तुलसी से राहत मिलती है तुलसी के पत्तों को पीसकर उसके उस में गुलाब जल और संतरे के छिलके का पाउडर मिलाकर चेहरे पर पेस्ट की तरह लगाकर 15 मिनट तक छोड़ दें फिर उससे नॉर्मल पानी से धो लें ऐसा हफ्ते में दो से तीन बार करने से एक्ने और पिंपल्स की समस्या तो समाप्त होती ही होती है साथ ही साथ आपका चेहरा भी चमकदार और निखार युक्त हो जाता है। चेहरे पर झाइयों की समस्या है तो भी तुलसी के पत्तों का चेहरे पर पैक लगाने से झाइयों की समस्या काफी हद तक समाप्त हो जाती है।

  तुलसी के पत्तों से मानसिक तनाव भी दूर होता है । तुलसी के पत्तों के अंदर anti-stress होने के कारण यह हमारे मानसिक तनाव में भी फायदा करती है हमें अपनी चारों तरफ तुलसी के खूब सारे पौधे लगा देनी चाहिए और सुबह शाम इसको चाय की तरह सेवन करने से, कुछ पत्तों को पानी एक गिलास पानी में उबालकर इसमें थोड़ा सा शहद मिलाकर चाय की तरह पीने से हमारा स्ट्रेस दूर होता है।

तुलसी के पत्तों में कैंसर से भी लड़ने की क्षमता होती है। एक महत्वपूर्ण शोध के अनुसार तुलसी के पत्तों का लगातार सेवन करने वालों को कैंसर जैसी समस्याओं का कम सामना करना पड़ता है इसलिए तुलसी के पत्तों का नियमित सेवन करें और तुलसी के पत्तों को अपने अगल-बगल गमलों में आसानी से लगाया जा सकता है ।इसलिए तुलसी के पत्तों को अवश्य अपने घर में लगाना चाहिए।

 

तुलसी के बीजों में फ्लैवोनोइड्स और फेनोलिक शामिल होते हैं जो कि मानव के शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली को सुधारते हैं। तुलसी एंटी-ऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर होती है जो कि शरीर में फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाती है। अगर आप इसकी पत्तियां चबाते हैं या फिर इससे हर्बल-टी बनाकर पीते हैं तो उससे शरीर को लाभ होता है। अगर किसी भी इंसान का इम्युनिटी सिस्टम स्ट्रॉन्ग है तो उसे बीमारियां कम लगती हैं और वह उनका मुकाबला कर लेता है।

  मूलेठी (radish) 

ज्यादातर भारतीय किचन में मौजूद मुलेठी में औषधि के रूप में किसी चमत्कार से कम नहीं है। आप कई तरीके से कर सकते हैं मुख्य मुलेठी को आप चूस करके भी खा सकते हैं। मुलेठी में एंटीबायोटिक तत्व कूट-कूट कर भरे होते हैं। मुलेठी आयुर्वेद का एक आजमाया हुआ नुखसा है। जिसमे औषधीय गुण भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।असल में मुलेठी में कैल्शियम, ग्लिसराइजिक एसिड, एंटीऑक्सिडेंट, एंटीबायॉटिक और प्रोटीन अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो न सिर्फ सर्दी और खांसी बल्कि, वायरल फ्लू से भी बचाने में मदद कर सकता है. 

  खांसी आने पर मुलेठी के टुकड़े को मुंह में रखकर चूसने से खांसी में आराम मिलता है क्योंकि मुलेठी में एंटीबायोटिक की अच्छी मात्रा पाई जाती है इसलिए अगर लगातार खांसी आ रही है तो मुलेठी के टुकड़े को मुंह में रखकर कुछ देर चूसने से खांसी में आराम मिलता है।
   अगर मुंह में छाले निकल जाए तो मुलेठी को साहब लगाकर चूसने से मुंह के छाले आराम हो जाते हैं। मुंह के अंदर किसी तरह के सांसो में बदबू जैसी समस्या होती है तो मुलेठी के टुकड़ों को चबा चबा कर चूसने से भी छुटकारा मिलता है।
 
    अगर लगातार हिचकियां आने की समस्या से निजात नहीं मिल रही है और आप परेशान हो रहे हैं तो परेशान होने की कोई बात नहीं है आपके किचन में मुलेठी मौजूद है ना क्योंकि किचन में मुलेठी ज्यादातर लोग औषधि के रूप में मसाले के रूप में रखते हैं तो एक टुकड़ा मुलेठी का लेकर उसने हल्का सा शहर लगाकर उसको चूसने से या मुंह में बस रखने से हिचकी में आराम मिलता है। इसे कहते हैं भारतीय किचन का चमत्कार क्योंकि भारतीय किचन औषधीय। सभी गुणों का खजाना है।


आजकल बाहर के खान-पान के कारण अनियमित खान-पान के कारण पेट संबंधित तमाम समस्याएं हो जाती हैं जिसमें कब्ज एसिडिटी आजकल आम बीमारी सी हो गई है, तो घबराने की कोई खास बात नहीं है आपके रसोई में उपलब्ध मुलेठी कब्ज और एसिडिटी की रामबाण है । राहत पाने के लिए आप मुलेठी की चाय का सेवन कर सकते हैं. मुलेठी में मौजूद ग्लिसराइजिक एसिड गैस्टिक और अल्सर जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में मदद कर सकता है 
  
  इतना ही नहीं है मुलेठी का प्रयोग आप अपने बालों को सुंदर रखने के लिए और साथ ही साथ अपने चेहरे को सुंदर रखने के लिए भी प्रयोग कर सकते हैं ।अगर आपके बाल अत्यधिक झड़ रहे हैं और रूखे बेजान है तो मुलेठी के पाउडर को आंवले के पाउडर के साथ मिलाकर बालों में लगाने से बालों में फंगल जैसी समस्याओं का समाधान होता है और बालों की लंबाई भी बढ़ती है बाल सुंदर चमकदार दिखते हैं।

   अजवायन (Celery)

     अजवाइन भारतीय किचन में मिलने वाला है कैसा मसाला है जिसका औषधि के रूप में खासकर सर्दियों में ज्यादा प्रयोग किया जाता है क्योंकि सर्दियों में अजवाइन का प्रयोग करने से सर्दी से बचाती है। अक्सर लोग अजवाइन का अर्क सर्दी से बचने के लिए प्रयोग में लाते हैं। अजवाइन को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नाम से जानते हैं जैसे  कि जुआनी अजवायन, ओमम, ओनवा,ओमम,अयानौदकन, इथियोपियन जीरा, अजवाइन जीरा, अजवाइन, अजवान, अजवे के बीज,  ट्रेकिस्पर्मम अम्मी , दीपक, यमानी, बिशप की घास, यवनिका, यामनिका, जैन, यवन, यौवन, जावन, योयाना , यवनी, अजमा, जावैन, अजमो, ओमा, योम, जेवैन, वामू, आदि अलग-अलग नामों से जाना जाता है। अलग स्थानों के अलग अलग तरीके से उपयोग में लाया जाता है।
  अजवाइन के सेवन से अस्थमा की समस्या, पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द की समस्या, गैस और कब्ज की समस्या, सर्दी, फ्लू और वायरल इन्फेक्शन की समस्या, डायरिया की समस्या, गठिया की समस्या, जोड़ों में दर्द की समस्या, किडनी स्टोन की समस्या आदि की समस्या से राहत मिल सकती है.

  अजवाईन के बीज और उनके तेल में अलग-अलग बायोएक्टिव यौगिक होते हैं, मुख्य रूप से थाइमोल, टेरपेनोइड्स, पी-सीमेन, गामा-टेरपिनिन और आवश्यक तेल।

थाइमोल और कार्वैक्रोल महत्वपूर्ण घटक हैं जो कवक और बैक्टीरिया के विकास को रोकने के लिए जिम्मेदार हैं।
कान के दर्द से राहत पाने के लिए अजवायन के बीज के तेल की कुछ बूंदें काफी हैं। दांत दर्द से तुरंत राहत पाने के लिए अजवाईन और नमक का गुनगुने पानी का मिश्रण बहुत प्रभावी होता है। कभी-कभी जले हुए अजवाइन के बीज का धुंआ दर्द वाले दांत के लिए अधिक प्रभावी होता है। अजवायन के बीज में एक आवश्यक बायोएक्टिव घटक, यानी थाइमोल होता है जो एक मजबूत कवकनाशी और कीटाणुनाशक है। इसलिए, त्वचा के संक्रमण से राहत पाने के लिए अजवाईन के बीजों को पीसकर लगाया जाता है।
     अगर पेट से संबंधित कोई समस्या होती है तो जैसे कब्ज अपच एसिडिटी उल्टी या सर्दी लग जाने तो अजवाइन का सेवन तुरंत राहत दिलाता है इसका यह काढ़ा के रूप में या काला नमक के साथ गर्म पानी से सेवन करने से अपच एसिडिटी और कब से तुरंत राहत मिलता है सर्दी लगी हुई हो तो अजवाइन को एक गिलास पानी में तब तक पकाएं जब तक कि वह आधा नारा जाए इसके उपरांत उसे घुट घुट कर के पी ले ऐसा दिन में दो बार करने से सर्दी संबंधित समस्या का समाधान होता है। सर्दी में चाहिए कि अजवाइन का चूर्ण बनाकर आपके पास रख लेना चाहिए और उस रात को सोते समय एक चम्मच अवश्य खाना चाहिए जिससे शरीर का मेटाबॉलिज्म सिस्टम स्ट्रांग रहता है। सर्दी से राहत भी मिलती है

  अजवाइन का सेवन करने से मोटापा संबंधित समस्या का भी समाधान होता है दो चम्मच अजवाइन को रात में एक गिलास पानी में भीगा कर रख दें सुबह सब उसी पानी को उबालकर हल्का गुनगुना होने पर उसे छानकर शहद मिलाकर चाय की तरह पी लें इससे धीरे-धीरे वजन कम में सहायता मिलती है क्योंकि इससे मेटाबॉलिज् सिस्टम मजबूत होता है और पाचन तंत्र सही से काम करने लगता है और हमें भूख भी बहुत अधिक नहीं लगती है।

  । खांसी जुकाम बुखार आदि में तो अजवाइन का सेवन आप आंख बंद करके कर सकते हैं क्योंकि अजवाइन खांसी बखार और जुकाम के लिए एक बेहतरीन औषधि है । खांसी जुकाम होने पर अजवाइन का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से खांसी जुकाम बुखार में तुरंत राहत मिलता है।
 
 जोड़ों के दर्द और नींद ना आने जैसी समस्याओं में भी अजवाइन का सेवन किसी चमत्कार से कम नहीं है। जोड़ों के दर्द में भी अजवाइन का प्रयोग किया जा सकता है जिससे दोनों में आराम मिलता है। घुटने के दर्द के लिए रात को खाना खाने के बाद एक चम्मच अजवाइन को चबाकर खा ले उसके बाद गुनगुना पानी पीकर सो जाने से घुटने के दर्द में राहत मिलता है। अगर रात को नींद ना आने की समस्या है तो एक चम्मच अजवाइन को चबा चबा कर खा कर एक गिलास गुनगुना पानी पी ले तो दो-चार दिन में नींद की समस्या का भी समाधान हो जाता है।

सौफ (Fennel)

सदियों से सौंफ का प्रयोग हमारे देश में खासकर भारतीय रसोई में किया जाता है। जिसका प्रयोग आमतौर पर पेट जैसी समस्याएं , अपच एसिडिटी कब्ज आदि ने किया जाता है बस इतना ही नहीं सौंफ का प्रयोग हम बहुत रूपों में करते हैं जो कि एक औषधि के रूप में कारगर सिद्ध होता है । से पता चलता है कि सौंफ में एनेथोल, फेनचोन और एस्ट्रैगोल जैसे आवश्यक तत्व होते हैं जो एंटी-इंफ्लामेटरी और एंटीस्पास्मोडिक गुणों के लिए जाने जाते हैं। पाचन तंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए भोजन के बाद एक चुटकी सौंफ का प्रयोग करने से पाचन संबंधी समस्या नहीं होती है। यहां तक कि गर्मियों में भी पेट को ठीक करने के लिए सौंफ के बीजों ठंडाई के रूप में बनाकर इस्तेमाल किया जाता है जिससे पेट को ठंडक मिलती है।
  हाई ब्लड प्रेशर या उच्च रक्तचाप में भी सौंफ का प्रयोग लाभदायक होता है। एक शोध के अनुसार पता चला है कि सौंफ को चबाने से लार में नाइट्राइट का अस्तर मेंटेन रहता है । जिससे रक्तचाप को बढ़ाने वाले कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को संतुलित रखता है। सौंफ  में पोटेशियम की प्रॉपर्टीज भरपूर मात्रा में होती है।  कहने का तात्पर्य है कि सौंफ हृदय समस्त संबंधित समस्याओं का भी उपचार करने की प्रॉपर्टीज रखती है।
    यदि गर्मियों में चेहरे पर बहुत अधिक जलन और एक्ने की समस्या हो जाए तो सौंफ को पीसकर उस का पेस्ट बनाकर चेहरे पर लेप चित्र लगाने से चेहरे पर ठंडक भी रहती है और इतनी और मुहासे की समस्याओं से भी समाधान मिलता है।सौंफ का सेवन आपके रक्तप्रवाह में ऑक्सीजन के संतुलन को बनाए रखते हुए हार्मोन को संतुलित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। ये त्वचा पर एक ठंडा और सुखदायक प्रभाव डालकर, त्वचा को स्वस्थ और चमकदार बनाए रखने में भी सहायक है।

   सौंफ में गैलेक्टोजेनिक गुण पाए जाते हैं, जिसका अर्थ है कि यह दूध के स्राव को बढ़ाने में मदद करता है। शोध से पता चलता है कि सौंफ का सेवन रक्त में प्रोलैक्टिन के स्तर को बढ़ाने में सहायक है। यह हार्मोन शरीर को स्तन के दूध का उत्पादन करने का संकेत देता है। यही कारण है कि प्रसव के बाद अक्सर माताओं को सौंफ चबाने को दिया जाता रहा है।
       

  कपूर (Kapoor)

कपूर एक ऐसी औषधि है जो हमारी पूजा को तो पवित्र करती ही करती है साथ में हमारे औषधि के रूप में बहुत उपयोग में आती है। यदि आप के सर में डैंड्रफ बहुत ज्यादा हो जाए तो कपूर को नारियल या तिल के तेल में मिलाकर रात में सिर में मालिश करने के बाद सुबह गुनगुने पानी से सर को धो लेने से डैंड्रफ से छुटकारा मिलता है। यदि शरीर पर कहीं  खुजली बहुत ज्यादा हो तो नारियल या तिल के तेल में कपूर को मिलाकर मसाज करने से खुजली की समस्या से आराम मिलता है।कपूर वनस्पति से प्राप्त होने वाला सफेद रंग का एक खास पदार्थ है, जिससे तेज गंध आती है और यह स्वाद में भी काफी तीखा होता है। कपूर के पेड़ की लकड़ियों से तेल निकाला जाता है और फिर विशेष विधि के साथ कपूर बनाया जाता है। आयुर्वेद और सिद्ध जैसी कई प्राचीन चिकित्सा प्रणालियां हैं, जिनमें कपूर का इस्तेमाल अनेक प्रकार की दवाएं बनाने के लिए किया जाता है। कई स्वास्थ्य समस्याओं का घरेलू उपचार करने के लिए भी कपूर का उपयोग किया जाता है। कपूर आजकल बाजार में टिकिया, गोली व पाउडर के रूप में मिल जाता है।कपूर में डिकंजेस्टेन्ट प्रॉपर्टीज भी मौजूद होती हैं, जो साइनस, नाक व गले में जमा बलगम को पतला करने और श्वसन मार्गों को खोलने का काम करती हैं। आजकल मार्केट में कपूर से बने कई ओवर द काउंटर प्रोडक्ट मिल जाते हैं, जिनका इस्तेमाल बंद नाक, खांसी व अन्य लक्षणों का इलाज करने के लिए किया जा सकता है। 
  इतना ही नहीं कपूर का प्रयोग सिर दर्द में भी अत्यधिक रामबाण होता है ।कपूर के फायदे से सिरदर्द से आराम मिल सकता है। सोंठ ,लौंग कर्पूर, अर्जुन की छाल और सफेद चंदन को समान मात्रा में लेकर पीस लें। इसे सिर पर लेप करने से सिरदर्द जल्दी ठीक हो जाता है।
   
  चोट या मोच लगने पर या शरीर में कहीं सूजन होने पर कपूर का प्रयोग तिल का तेल या नारियल के तेल में मिलाकर मालिश करने से चोट के स्थान पर आराम मिलता है। बालों में खुजली होने पर या फंगल इंफेक्शन होने पर कपूर के तेल को बालों में लगाने से खुजली और फंगल इंफेक्शन से आराम मिलता है।
  
बरसों पहले दादी नानी काजल को कपूर मिलाकर एक औषधि के रूप में मनाती थी और आपको मै लगाती थी जिससे
 आंखें स्वस्थ और इंफेक्शन से मुक्त रहती थी। कपूर का प्रयोग आंखों की समस्या के समाधान के लिए भी किया जाता है।प्यूबर्टी के वक्त लड़कों और लड़कियों दोनों के चेहरे में बड़ी संख्या में मुंहासे हो जाते हैं. कुछ बच्चों के मुंहासे तो जल्दी ठीक हो जाते हैं लेकिन कुछ बच्चों को लंबे समय तक ये मुंहासे परेशान करते हैं. ऐसे में एंटी-बैक्टीरियल गुणों वाला कपूर का तेल काफी फायदेमंद साबित होता है. ये न सिर्फ मुंहासों को ठीक करता है बल्कि उनके दोबारा पनपने पर भी रोक लगाता है.
मुंहासों, फोड़े-फुन्सी से चेहरे पर होने वाले दाग कोई पसंद नहीं करता है. अगर किसी व्यक्ति के चेहरे पर ऐसे दाग हैं तो वे नारियल के तेल में कपूर मिलाकर इस्तेमाल कर सकते हैं. इस तरह के दाग पर नारियल तेल और कपूर का ये मिश्रण काफी लाभकारी है. इसके साथ ही ये चेहरे की त्वचा को भी स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाता है.
बढ़ते प्रदूषण और खराब पानी के इस्तेमाल से लोगों में बाल झड़ने की समस्या काफी बढ़ रही है. इसके अलावा आज के समय में काफी लोग रूसी की समस्या से भी परेशान हैं. ऐसे लोग नारियल के तेल में कपूर मिलाकर बालों में लगाएं तो उन्हें काफी लाभ मिलता है. ये न सिर्फ आपके सिर में रूसी को कंट्रोल करेगा बल्कि गिरते बालों के लिए काफी फायदमेंद रहेगा.
सर्दी-जुकाम होने पर गरम पानी में कपूर डालकर भाप लेने से काफी राहत मिलती है. इसके अलावा खांसी होने पर सरसों या तिल के तेल में कपूर मिलाकर रखने के बाद पीठ और छाती पर हल्के हाथों से की जाने वाली मालिश बहुत राहत पहुंचाती है।
प्यूबर्टी के वक्त लड़कों और लड़कियों दोनों के चेहरे में बड़ी संख्या में मुंहासे हो जाते हैं. कुछ बच्चों के मुंहासे तो जल्दी ठीक हो जाते हैं लेकिन कुछ बच्चों को लंबे समय तक ये मुंहासे परेशान करते हैं. ऐसे में एंटी-बैक्टीरियल गुणों वाला कपूर का तेल काफी फायदेमंद साबित होता है. ये न सिर्फ मुंहासों को ठीक करता है बल्कि उनके दोबारा पनपने पर भी रोक लगाता है.
मुंहासों, फोड़े-फुन्सी से चेहरे पर होने वाले दाग कोई पसंद नहीं करता है. अगर किसी व्यक्ति के चेहरे पर ऐसे दाग हैं तो वे नारियल के तेल में कपूर मिलाकर इस्तेमाल कर सकते हैं. इस तरह के दाग पर नारियल तेल और कपूर का ये मिश्रण काफी लाभकारी है. इसके साथ ही ये चेहरे की त्वचा को भी स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाता है.
बढ़ते प्रदूषण और खराब पानी के इस्तेमाल से लोगों में बाल झड़ने की समस्या काफी बढ़ रही है. इसके अलावा आज के समय में काफी लोग रूसी की समस्या से भी परेशान हैं. ऐसे लोग नारियल के तेल में कपूर मिलाकर बालों में लगाएं तो उन्हें काफी लाभ मिलता है. ये न सिर्फ आपके सिर में रूसी को कंट्रोल करेगा बल्कि गिरते बालों के लिए काफी फायदमेंद रहेगा.
सर्दी-जुकाम होने पर गरम पानी में कपूर डालकर भाप लेने से काफी राहत मिलती है. इसके अलावा खांसी होने पर सरसों या तिल के तेल में कपूर मिलाकर रखने के बाद पीठ और छाती पर हल्के हाथों से की जाने वाली मालिश बहुत राहत पहुंचाती है.

 इतना ही नहीं कपूर का प्रयोग बवासीर के असहनीय दर्द को भी दूर करने में सहायक है यदि कपूर के पेस्ट को तैयार करके गुदा में सूजन वाले स्थान पर इसका लेप लगाया जाए तो सूजन भी कम होती है और दर्द में भी आराम मिलता है। देखा जाए तो कपूर सिर्फ पूजा का ही विषय नहीं है बल्कि कपूर हमारे स्वास्थ्य के लिए एक उत्तम औषधि भी है।

   लौंग (clove)

लौंग सिर्फ हमारे भोजन को ही उत्तम नहीं बनाता बल्कि हमारे स्वास्थ्य को भी उत्तम बनाता है । लौंग का प्रयोग करके हम अपने दांत दर्द, खांसी जुकाम आदि समस्याओं से भी निजात मिलती है हमको। सुबह सुबह खाली पेट खाने से लौंग हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।  हमारी रोगों से लड़ने की शारीरिक क्षमता और मजबूत हो जाती है।लौंग में कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं जिनमें आयरन, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, कैल्शियम, फोलेट, फाइबर, विटामिन, जिंक, कॉपर, सेलेनियम, थियामिन, सोडियम, मैंगनीज, पोटैशियम, कार्बोहाइड्रेट, एंटीऑक्सीडेंट्स शामिल है।लौंग खाने से दांत का दर्द भी दूर होता है. क्योंकि इसमें यूजेनॉल नाम का दर्द निवारक तत्व पाया जाता है. इससे साइनस की भी समस्या से निजात मिलती है. इसके अलावा लौंग लिवर की भी परेशानी से निजात दिलाने का काम करता है ।

अदरक (Ginger )

अदरक का प्रयोग आमतौर पर हर घर में होता है ज्यादातर लोग इसका प्रयोग चाय बनाने के लिए और मसाले में प्रयोग करने के लिए करते हैं। अदरक का प्रयोग औषधि के रूप में भी एक बेहतरीन उपचार का काम करता है खासकर महिलाओं और पुरुषों के लिए अदरक रामबाण है। Sexual pleasure बढ़ाने की प्रॉपर्टी भरपूर मात्रा में होती है। एक टुकड़ी अदरक का सेवन यदि शहद के साथ किया जाए तो इससे सेक्सुअल परफारमेंस में इनक्रीस होता है। और शादीशुदा जिंदगी में एक सुखद अनुभव का काम करता है। मधुमेह रोगियों के लिए भी अदरक का प्रयोग निश्चित मात्रा में जरूर करना चाहिए क्योंकि इससे उनका मधुमेह नियंत्रित रहता है। सुबह सुबह खाली पेट अदरक का सेवन करने से इंसुलिन की आवश्यकता नहीं पड़ती ऐसा एक रिसर्च के दौरान पाया गया इसलिए मधुमेह रोगियों को अदरक का प्रयोग जरूर करना चाहिए।
   पाचन संबंधी समस्या का भी भरपूर इलाज है अदरक जिन लोगों को बदहजमी अपच पेट फूलने की शिकायत रहती है उनको अदरक का सेवन पुदीने की चटनी के साथ करना चाहिए जिससे उनकी अपच बदहजमी हो चयापचय की प्रक्रिया में बेहद लाभकारी सिद्ध होता है।
 महिलाओं के मासिक धर्म में होने वाली अनियमितता एवं पीड़ा में भी अदरक का प्रयोग रामबाण होता है कई रिसर्च में पाया गया है कि जिन महिलाओं को अदरक प्रयोग करने की आदत है उनको महावारी के समय होने वाली समस्याओं से ज्यादा दूसरा नहीं पड़ता बशर्ते उन महिलाओं को जो महिलाएं अदरक का प्रयोग नहीं करती।
     हृदय संबंधित समस्याओं के लिए भी अदरक का प्रयोग एक बेहतरीन विकल्प है। इसके प्रयोग से आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल मेंटेन रहता है जीससे उच्च रक्तचाप में होने वाले आघात से सुरक्षा का कवच प्रदान करती है अदरक। 
 

प्याज (Onion)

प्याज में अधिकतर प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के विशेष गुण होते हैं। इसमें फास्फोरस मैग्नीशियम और विटामिन सी की भरपूर मात्रा पाई जाती है। शरीर को रोगों से लड़ने के लिए तो तैयार करता ही है साथ में हमारी इम्यून सिस्टम को भी स्ट्रांग करता है। प्याज खाने वाले को भी ज्यादातर एंटी कैंसर से सुरक्षा मिलती है उनके अंदर कैंसर से लड़ने की क्षमता ज्यादा होती है। कई अध्ययनों में यह पाया गया है कि प्याज खाने वालों के लिए कैंसर से लड़ने की संभावना कई गुना प्रबल ज्यादा प्रबल होती है जबकि जो लोग प्याज नहीं खाते हैं उनमें कैंसर पनपने के ज्यादा गुण मौजूद होते हैं।
  हृदय रोगों के लिए भी प्याज का प्रयोग करने वालों के लिए संभावना कम रहती है बसरते जो लोग प्याज नहीं खाते उनकी तुलना में। प्याज का प्रयोग करने वाले को अत्यधिक कोलेस्ट्रोल की मात्रा का एक जगह जमा होने से सुरक्षा मिलती है जिससे हार्ट अटैक का खतरा कम रहता है।
  पाचन संबंधी समस्याओं के लिए भी प्याज का प्रयोग अत्यधिक रामबाण है हम कच्चा सलाद को के रूप में प्याज का प्रयोग अधिक करते हैं तो हमारी पाचन संबंधी समस्याएं कम परेशान करती है। एंटी एलर्जी को एंटीऑक्सीडेंट गुण मौजूद होते हैं जो हमारे शरीर को कई तरह के रोगों से लड़ने में सुरक्षा करते हैं हमारे शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं। शरीर में आयरन की कमी होने पर भी प्याज का प्रयोग उपयोगी से दो होता है प्याज के प्रयोग से शरीर में एनीमिया जैसे लक्षण कम पाए जाते हैं।

 काली मिर्च (Black pepper)

काली मिर्च पाचन संबंधी समस्याओं को ठीक करने में मदद कर सकता है। काली मिचर् में पाइपरिन होता है, जो पाचन क्षमता को बढ़ाने में मदद कर सकता है। साथ ही पाचन प्रक्रिया को भी बेहतर बनाता है। इससे पाचन से जुड़ी समस्याएं जैसे गैस, कब्ज और अपच से छुटकारा मिल सकता है।काली मिर्च में मौजूद पाइपरिन सर्दी, जुकाम और खांसी की समस्या से भी छुटकारा दिला सकता है। काली मिर्च शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। जब इम्यूनिटी तेज होती है, तो शरीर को बैक्टीरियल और वायरस से लड़ने में मदद मिलती है। अगर आपको खांसी या जुकाम है, तो काली मिर्च का सेवन जरूर करें।काली मिर्च में एंटीमाइक्रोबियल और एंटीइंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। ये सभी मुंह में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को मारते हैं। साथ ही सूजन आदि से भी राहत मिल सकती है। काली मिर्च खाने से दांत भी सुरक्षित रहते हैं। काली मिर्च ओरल हाइजीन को मेंटेन रखने में मदद कर सकता है।अगर आप वजन घटाना चाहते हैं, तो काली मिर्च का सेवन करना शुरू कर सकते हैं। काली मिर्च में पाइपरिन और एंटीओबेसिटी प्रभाव होते हैं, जो वेट लॉस करने में मदद कर सकते हैं। आप काली मिर्च को खाने में शामिल कर सकते हैं या फिर इसका काढ़ा बनाकर भी पी सकते हैं।
 

दालचीनी (cinnamon)

अपने दालचीनी का प्रयोग सिर्फ मसालों के रूप में सुना होगा जो हमारी भोजन बनाने में काम आता है। परंतु दालचीनी का प्रयोग हमारे ऋषि-मुनियों ने आयुर्वेद में चिकित्सा के रूप में प्रयोग किया था जिसके जिसके इतने प्रयोग है कि आप जानकी हैरान हो जाएंगे एक दालचनीऔर फायदे अनेक। दालचीनी (Cinnamon) एक मसाला है। दालचीनी की छाल तेजपात की वृक्ष छाल से अधिक पतली, पीली, और अधिक सुगन्धित होती है। यह भूरे रंग की मुलायम, और चिकनी होती है। फलों को तोड़ने पर भीतर से तारपीन जैसी गन्ध आती है। इसके फूल छोटे, हरे या सफेद रंग के होते हैं। अगर आप दालचीनी की पत्तियों को मलेंगे तो इससे तीखी गंध आती है। आयुर्वेद के अनुसार दालचीनी का प्रयोग, तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याओं के लिए, पाचन तंत्र ,सिर दर्द , चर्म रोग, मासिक धर्म की परेशानियां ठीक की जा सकती हैं। इसके साथ ही दस्त, और टीबी में भी इसके प्रयोग से लाभ मिलता है।

   अगर आपको बार बार हिचकी आती है उसकी बंद नहीं होती है  तो घबराने की कोई बात नहीं है, आप दालचीनी के टुकड़े को काढ़ा बनाकर पी लीजिए जिससे बार बार हिचकी आने की समस्या से निजात मिलती है।

   भूख को बढ़ाने के लिए भी दालचीनी का प्रयोग अत्यंत लाभदायक है यदि हमें भूख नहीं लगती अच्छे से तो हमें दालचीनी , इलायची और मिस्त्री को बराबर बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर सुबह-शाम खाने से भूख ना लगने की समस्या से निजात मिलती है।
    सर्दियों में अक्सर बड़े और बच्चों को उल्टी आने की संभावना बढ़ जाती है। और जब एक बार उल्टी आने की प्रक्रिया शुरू होती है तो यह बार-बार आने लगती है ऐसे में यदि दालचीनी का काढ़ा बनाकर 10 से 20 ग्राम सुबह-शाम पिलाया जाए तो उल्टी आने की समस्या से निजात मिलती है।
  आंखों की समस्या से भी निजात दिलाती है दालचीनी यदि आपके यहां बार-बार पकड़ आती रहती है लोग कहते हैं कि हमारी आंख फड़फड़ा रही है, और बार-बार फडफाडना आती है तो ऐसे में घबराने की जरूरत नहीं है दालचीनी के तेल को यदि आंखों की पलकों पर सुबह शाम लगाया जाए तो आंखों का फड़फड़ाना बंद हो जाता है।
  दांत को सुंदर और चमकदार बनाने में तथा उस में दर्द और सूजन आराम दिलाने में भी दालचीनी का विशेष योगदान है मेरी दालचीनी की पत्तियों को पीसकर उसका मंजन बनाकर दातों पर किया जाए तो दांतो की तमाम तरह की समस्याओं से निजात मिल जाती है।
  सिर दर्द की समस्या से भी दालचीनी से निजात मिलती है, आपको बार-बार सिर दर्द की शिकायत रहती है तो दालचीनी को पीसकर उसका पेस्ट बना करो माथे पर लगाने से सिर दर्द से आराम मिलता है और तंत्रिका  संबंधित समस्याओं से राहत मिलता है। दालचीनी से बनी तेल को यदि माथे पर और सिर में मालिश किया जाए तो भी सिर दर्द से आराम मिलता है।
दालचीनी, तेजपत्ता, तथा चीनी को बराबर-बराबर मात्रा में मिला लें। इसे चावल के धोने से जो पानी निकलता है उसके साथ  से पीस कर बारीक चूर्ण बना लें। इसे नाक के रास्ते लें। इसके बाद गाय के घी को भी नाक के रास्ते लें। इससे सिर से संबंधित विकारों में आराम मिलता है। 

    दालचीनी का प्रयोग खांसी जुकाम के लिए भी किया जाता है, यदि खांसी जुखाम ज्यादा हो तो दालचीनी का चूर्ण बनाकर इस को शहद के साथ सेवन करने से सर्दी, जुकाम, बुखार में जल्दी राहत मिलता है।एक चौथाई चम्मच दालचीनी के चूर्ण में 1 चम्मच मधु को मिला लें। इसे दिन में तीन बार सेवन करने से खांसी, और दस्त में फायदा होता है।

  नाक से होने वाली समस्याओं में भी दालचीनी का प्रयोग विशेष उपयोगी होता है। सोठ और दालचीनी को पानी में मिलाकर तब तक पकाएं जब तक एक एक चौथाई ना रह जाए इसके बाद ठंडा होने पर इसे नाक में 2,2 बूंद डालने से नाक संबंधित विकारों से आराम मिलता है।
  पेट फूलने ,कोलेस्ट्रोल बढ़ने आदि समस्याओं में भी दालचीनी का प्रयोग बहुत ही उपयोगी है ,बहुत ही फायदेमंद है। दालचीनी के चूर्ण को शहद के साथ सुबह खाली पेट लेने से पेट फूलने की समस्या से तथा कोलेस्ट्रॉल बढ़ने की समस्या से निजात मिलता है।
   साथी ही साथ दालचीनी का प्रयोग भोजन को कम करने के लिए भी बहुत ही कारगर सिद्ध होता । सुबह सुबह खाली पेट दालचीनी को को पानी में पकाकर उसको चाय की तरह पीने से वजन भी नियंत्रित रहता है आपकी पाचन संबंधी समस्याओं का भी निदान होता है।
   अत्यधिक दस्त होने और अमाशय संबंधी समस्याओं से भी दालचीनी का प्रयोग होता है। दालचीनी के चोरों को मिश्री के साथ खाने से दस्त भी बंद हो जाती है और अमाशय संबंधी विकार का भी निदान होता है।दालचीनी (सिनेमन), इलायची, और तेजपत्ता को बराबर-बराबर लेकर काढ़ा बना लें। इसके सेवन से आमाशय की ऐंठन ठीक होती है।दालचीनी के 5-10 मिली तेल को 10 ग्राम मिश्री के साथ खाने से आमाशय में होने वाला दर्द, और उल्टी में लाभ मिलता है।

   दालचीनी का प्रयोग गठीया वाली  असहनीय दर्द में भी बहुत ही फायदेमंद होता है ।इसका 10-20 ग्राम दालचीनी के चूर्ण को 20-30 ग्राम मधु में मिलाकर पेस्ट बना लें। इसे दर्द वाले स्थान पर धीरे-धीरे मालिश करें। इससे फायदा मिलेगा।इसके साथ-साथ एक कप गुनगुने पानी में 1 चम्मच मधु, एवं दालचीनी का 2 ग्राम चूर्ण मिला लें। इसे सुबह, दोपहर, तथा शाम सेवन करें। गठिया में लाभ देता है।दालचीनी के पत्ते के तेल को लगाने से भी गठिया में आराम मिलता है।

    प्रसव के बाद महिलाओं को जो दर्द और अत्यधिक रक्तस्राव होता है उसमें भी दालचीनी का प्रयोग उत्तम होता है।त्रिकटु, पीपरामूल, दालचीनी, इलायची, तेजपात, तथा अकरकरा लें। इनके 1-2 ग्राम चूर्ण को शहद के साथ चाटें। इससे मां बनने वाली महिलाओं के रोग ठीक हो जाते हैं। 
 
    आयुर्वेद की मानें तो दालचीनी का प्रयोग की भी जैसी भयंकर बीमारियों के लिए भी रामबाण का काम करती है यदि दालचीनी का प्रयोग नियमित किया जाए तो टीवी की समस्या से भी काफी हद तक निजात मिलता है।

   जायफल( nutmeg )

    भारतीय परंपरा में भोजन के स्वाद को बढ़ाने के लिए मसालों का विशेष ख्याल रखा जाता है, जो न कि भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं बल्कि आपके स्वास्थ्य के अनुकूल भी बनाए जाते हैं ऐसा आयुर्वेद की दृष्टि से हमारे भारतीय परंपरा रही है। हमारी भारतीय भोजन में सारे मसाले वैज्ञानिक  दृष्टि से स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं इसी तरह का मसालों की श्रृंखला में एक मसाला जायफल भी आता है, जायफल का वैज्ञानिक नाम जिससे  दुनिया में जाना जाता है वह है  (मिस्ट्रीका फ्रेगरेंस), आमतौर पर मसालों जो यह पेड़ है जायफल है इससे दो मसाले मिलते हैं एक सावित्री और दूसरा जायफल। मिरिस्तिका के बीज को ही जायफल कहा जाता है और इसके फूल को जावित्री ,जावित्री भी अनेक गुणों से भरपूर है परंतु हम यहां पर सिर्फ जायफल के गुणों की ही बात करेंगे।

    जायफल का प्रयोग नींद ना आने की स्थिति में भी किया जाता है जब किसी को अनिद्रा की समस्या परेशान करती है तो उसके लिए रात बहुत मुश्किल हो जाती है, ऐसे में यदि जायफल का चूर्ण का सेवन किया जाए तो अनिद्रा की समस्या का समाधान होता है।

   आयुर्वेद के अनुसार जायफल का प्रयोग पेट संबंधी समस्याओं में पाचन तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के रूप में भी किया जाता है। इसके के प्रयोग से , हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी वृद्धि होती है।

  जायफल का उपयोग दर्दनिवारक के रूप में किया जा सकता है। एक शोध के अनुसार  जायफल का प्रयोग दर्द निवारक के रूप में भी किया जाता है। शोध में पाया गया कि जायफल के अर्क में एनाल्जेसिक (analgesic) गुण यानी की दर्द को दूर करने वाला गुण पाया जाता है 
  
  आयुर्वेद के अनुसार जायफल का प्रयोग जोड़ों के दर्द में भी बहुत ही लाभकारी होता है, जाड़े के दिनों में विशेषकर माताओं बहनों को जोड़ों में बहुत ही भयंकर दर्द होता है जिसकी वजह से उन्हें असहनीय दर्द का सामना करना पड़ता है। ऐसे में जायफल का लेप बनाकर लगाने से जोड़ों के दर्द और गठिया में आराम मिलता है क्योंकि जायफल में(एनाल्जेसिक) और
(एंटीइन्फ्लेमेटरी) गुण पाए जाते हैं जिससे गठिया और जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है।

   आयुर्वेद की मानें तो जायफल का प्रयोग कैंसर के बचाव के रूप में भी होता है, इसमें में एंटी कैंसर के गुण विद्वान होते हैं जिससे जायफल का प्रयोग करने से कैंसर की संभावित समस्या कम हो जाती है। हालांकि यह कोई तथ्य नहीं है कि जायफल के प्रयोग से कैंसर में बचाव होता है परंतु आयुर्वेद के अनुसार जायफल में कैंसर से लड़ने की क्षमता अधिक हो जाती है।

   जायफल केयर का प्रयोग करके हम मधुमेह जैसी समस्याओं में कुछ हद तक निजात पा सकते हैं। क्योंकि जायफल जो है हमारे शरीर में एंटीबायोटिक का काम करता है की क्षमता को बढ़ने नहीं देता है इसलिए जायफल का प्रयोग करके हम शुगर को भी मेंटेन कर सकते हैं।
      दातों के समस्याओं के समाधान के लिए भी जायफल का प्रयोग बहुत ही गुणकारी है। जायफल में मौजूद मैक्लिग्नन नामक तत्व मैं एंटीकरोजनिक प्रभाव पाया जाता है जो दातों में
जो दांतों को स्ट्रेप्टोकोकस म्यूटन्स (Streptococcus Mutans) नामक ओरल बैक्टीरिया से सुरक्षा प्रदान कर सकता है ।

    आयुर्वेद के अनुसार जायफल का प्रयोग दिमाग की स्मरण शक्ति को बढ़ाने में तथा तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याओं का निवारण करने में उपयोग किया जाता है। जायफल के चूर्ण को नियमित सेवन करने से याददाश्त में इजाफा होता है और तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याओं का निवारण होता है हालांकि इसकी कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं मिली है परंतु जायफल का प्रयोग सदियों से याददाश्त बढ़ाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।

   एक शोध के अनुसार जायफल में एंटीएंजायटी गुण पाए जाते हैं जिसके कारण डिप्रेशन और अवसाद जैसी समस्याओं से भी जायफल निजात दिलाता है। जायफल के चूर्ण का सेवन करने से और अवसाद और डिप्रेशन की समस्या में भी काफी हद तक निजात मिलती है।  

    जायफल के प्रयोग से रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी निजात मिलती है, करो ना कॉल की सबसे बड़ी समस्या थी हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने की जिससे हमें बीमारी में लड़ने से मदद मिली तो ऐसे में जायफल का प्रयोग बहुत ही उपयोगी है क्योंकि जायफल के प्रयोग से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और हमें रोगों से लड़ने में सहायता मिलती है।

  शरीर में कोलेस्ट्रॉल का बढ़ता स्तर कई समस्याओं का कारण बन सकता है,। ऐसे में जायफल का सेवन बढ़ते कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। दरअसल, जायफल के अर्क में कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाली गतिविधि पाई जाती है। वहीं, इसी शोध में जिक्र मिलता है कि जायफल का सप्लीमेंट ब्लड लिपिड में सुधार का काम कर सकता है, जिससे बढ़ते कोलेस्ट्रॉल की समस्या को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है । 

    जायफल के नियमित प्रयोग से शरीर में पड़ने वाले अतिरिक्त फैट की मात्रा को भी नियंत्रित करता है जिससे हमारे वजन बढ़ने की समस्या से निजात मिलती है।
 
मुंहासों की समस्या से निजात दिलाने में भी जायफल का उपयोग लाभकारी हो सकता है। दरअसल, जायफल में एंटीबैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण मौजूद होते हैं । इसमें मौजूद एंटीबैक्टीरियल गुण बैक्टीरिया की वजह से होने वाले मुंहासों से लड़ने का काम कर सकते हैं और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण मुंहासों की सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं। 

  कहने का तात्पर्य है कि एक जायफल फायदे अनेक हालांकि इस पर कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं मिलती फिर भी जायफल का प्रयोग नियमित करने से कील मुंहासे, सर्दी, जुखाम, वजन बढ़ने की समस्या, मधुमेह ,हृदय, की समस्या आदि से निजात मिलता है।

नीलगिरी (eucalyptus) 

नीलगिरी के तेल में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-सेप्टिक गुण होते हैं. इसलिए अगर आपके गले में खरास होने पर इसका प्रयोग करे तो इसको जड़ से खत्म करने के लिए नीलगिरी का तेल बहुत ही ज्यादा फायदेमंद हो सकता है   क्योंकि इसमें सिनेओल, कैफिक एसिड, विटामिन ए, विटामिन सी जैसे महत्वपूर्ण विटामिन और मिनरल्स का हाई कंसन्ट्रेशन्स होता है. यह अपने एंटीबैक्टीरियल, एंटी इंफ्लामेटरी, एनाल्जेसिक प्रॉपर्टीज  के लिए जाना जाता है।नीलगिरी का तेल झड़ते बालों की समस्या से राहत देने के लिए बहुत ही फायदेमंद है और हजारों सालों से लोग इसका उपयोग अपने बालों को मजबूत बनाने के लिए कर रहे हैं।  नीलगिरी के तेल का प्रयोग त्वचा को खूबसूरत बनाने के लिए भी किया जाता है। 

   झड़ते बालों की समस्या के लिए रूसी के लिए तथा सिर में पड़े जुएं के लिए नीलगिरी के तेल के प्रयोग से, इन सब समस्याओं से छुटकारा मिलता है। बरसों से बालों को सुंदर बनाने के लिए हमारे आयुर्वेद में नीलगिरी के तेल की अत्यधिक प्रशंसा की गई है जिसके प्रयोग से बाल लंबे, मजबूत ,काले और चमकदार बन जाते हैं। नीलगिरी का तेल बालों के लिए विशेष लाभकारी है।

  नीलगिरी का तेल हमारी शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है।इससे आपकी खराब हुई  स्किन में चमक आ जाती है।यह एंटी एजिंग की समस्या को भी इससे छुटकारा मिलता है। इससे दाग-धब्बे, पिंपल्स और डार्क सर्कल्स का खात्मा हो जाता है। इसलिए अपने चेहरे को चमकाने के लिए आप अपने फेस पर नीलगिरी का तेल लगा सकते हैं

    शरीर में कहीं भी सूजन होने पर नीलगिरी के तेल का प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि इसमें एंटी इन्फ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं इसलिए सूजन को जल्दी कम करने में सहायता करता है। शरीर में सूजन वाले स्थान पर नीलगिरी के तेल को लगाने से दर्द और सूजन में जल्दी आराम मिलता है।
 

तेजपत्ता (Bay leaf)

  भारतीय रसोई को सिर्फ आप रसोई नहीं कर सकते एक तरह से वह छोटा मेडिकल स्टोर है जिसमें हर तरह की समस्याओं से जुड़ी हुई इलाज का औषधीय मौजूद है। जब देर रात में सारे मेडिकल स्टोर बंद पाए जाते हैं तब भी भारतीय रसोई का दरवाजा खुला रहता है जिसमें तमाम तरह के औषधीय गुणों से युक्त मसालों से सजा दवा खाना तैयार रहता है जिसमें तकरीबन हर समस्या का समाधान आराम से किया जा सकता है एक तरह से फर्स्ट कीट का काम करती है हमारी भारतीय रसोई। ऐसे में जानते हैं कि तेजपत्ता (Bay leaf) ऐसा मसाला है, जिसका इस्तेमाल व्यंजनों में जायका और खुशबू बढ़ाने के लिए किया जाता है। ये पत्तियां कुछ हद तक यूकेलिप्टस की पत्तियों जैसी नजर आती ह। आयुर्वेद में इस औषधीय पत्ते के प्रयोग के कई लाभ बताए गए हैं। 
   आइए जानते हैं भारतीय रसोई को छोटे मेडिकल स्टोर के साथी विज्ञान की दृष्टि से भी तेज पत्ते का वैज्ञानिक नाम लॉरस नोबिलिस (laurus nobilis) है। यह एक सुगंधित पत्ता है, जो लॉरस परिवार से संबंधित है। खाने और औषधि में इसका उपयोग 1 हज़ार वर्षों से किया जा रहा है। तेज पत्ते की 2400 से 2500 प्रजातियां हैं(सोर्स, विकिपीडिया) जिसमें से अधिकतर पूर्वी एशिया, दक्षिण व उत्तरी अमेरिका और एशिया में पाई जाती हैं। इस पत्ते में टैनिन, फ्लेवोन, फ्लेवोनोइड्स, एल्कलॉइड्स, यूजेनॉल, लिनालूल और एंथोसायनिन शामिल हैं। प्रजाति के अनुसार सभी के रासायनिक घटक अलग-अलग हो सकते हैं। आमतौर पर मसाले, एसेंशियल ऑयल व पारंपरिक चिकित्सा में प्रयोग होने वाले इस पत्ते की दो प्रजातियां प्रयोग की जाती हैं – लॉरस एजोरिका और एल नोबिलिस। तेजपत्ता का उपयोग इसके सूखने के बाद ही होता हैतेज पत्ते का प्रयोग शरीर में कहीं पर सूजन, colestrol बढ़ने की समस्या, मधुमेह , वजन को कम करने के लिए, चोट लग जाए तो उस जख्म को भरने के लिए, शरीर में होने वाले फंगल इंफेक्शन के लिए, शरीर में होने वाले सूजन की समस्या का समाधान करने के लिए, और तो और कैंसर जैसी भयंकर बीमारियों से लड़ने में भी सहायक है तेजपत्ता। दातों में होने वाली समस्याओं के लिए तेज पत्ते का प्रयोग बहुत ही चमत्कारिक परिणाम देता है । मुंह में होने वाले बैक्ट्रीरियल इंफेक्शन और मसूड़ों को मजबूती देने के लिए तेजपत्ते का प्रयोग किया जाता है।

मगरेल (magreel)

  जैसा कि हमने आपको बताया कि भारतीय किचन को छोटा मेडिकल स्टोर के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसमें तमाम तरह की हो सदियों का मसालों के रूप में अवस्थित मात्रा में हमारी भारतीय रसोई में पाई जाती है जिसको की लोग कलौंजी या मंगरैला या फिर प्‍याज के बीज के रूप में भी जानते हैं। यह लगभग सभी भारतीय घरों के किचन में कलौंजी पाई जाती है। काले रंग की छोटी-छोटी कलौंजी को इंग्लिश में निजेला सैटाइवा (Nigella Sativa) नाम से जाना जाता है। मंगरेल का प्रयोग मूलत,:भारतीय घरों में मसाले से लेकर औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।

आयुर्वेद में भी कलौंजी को एक बहुत ही उपयोगी जड़ी बूटी माना गया है। यह खांसी से लेकर डायबिटीज तक में फायदेमंद है। इसमें पाए जाने वाले कैल्शियम, पोटैशियम, लोहा, मैग्नीशियम व जिंक कई तरह की स्वास्थ्य समस्यों से लड़ने में कारगर हैं।  कलौंजी के बीजों साथ ही इसका तेल भी बहुत लाभकारी होता है। 

 मंगरेल का प्रयोग कई असाध्य बीमारियों में भी लाभकारी होता है जैसे यदि डायबिटीज की समस्या भयंकर हो तो काली चाय बनाकर उसमें एक चम्मच कलोंजी मिलाकर चाय के साथ सेवन करने से मधुमेह की समस्या में काफी हद तक लाभ मिलता है।

  इतनी खाने के लिए भी कलोंजी का उपयोग किया जा सकता है, कील, मुंहासे ,एक्ने ,पिंपल, झाइयां आदि की समस्याओं उसके लिए कलोंजी का प्रयोग अत्यधिक लाभकारी है । इसका प्रयोग आप विटामिन सी युक्त नींबू या फिर संतरे के रस के साथ मंगरेल का पाउडर बनाकर चेहरे पर पैक की तरह लगाने से चेहरे की तमाम समस्याओं का समाधान होता है और चेहरा चमकदार और निखार युक्त भी हो जाता है।

  खांसी जुकाम आदि भी मंगरैल का प्रयोग किया जाता है , खांसी जुकाम होने पर मंगल के तेल को थोड़ा सा पीने से अपने नाक में डालने से काफी आराम मिलता है। गर्म पानी में मंगरेल को डाल कर भाग लेने से भी सीने की जकड़न और खांसी जुकाम में आराम मिलता है।
जब भी कोई गर्म पेय लें, तो उसमें एक चम्मच मंगरैला का तेल मिला लें। तीन दिन में एक बार पूरे शरीर पर तेल की मालिश करके आधा घंटा धूप का सेवन करें। लगातार एक महीने तक ऐसा करने से आराम मिलता है।

  हृदय रोग के लिए भी मगरेल का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है। वजन को कम करने के लिए भी मंगरेल के तेल का प्रयोग किया जाता है। मंगरेल के तेल को शहद में मिलाकर पीने से वजन नियंत्रण आता है।
   
   धनिया (Coriander)
Protein ,Vasa, fiber ,carbohydrate, mineral, आदि से भरपूर धनिया भारतीय किचन की भारतीय किचन की रसोई को जितना स्वादिष्ट और सेहत बनाती है उतना ही यह हमारे औषधीय गुणों में भी उपयोग में आती है। इसके अलावा हरा धनिया में कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, कैरोटीन,  विटामिन सी,
Potasium,थीयामीन और आयरन पाया जाता है।
  हरा धनिया के प्रयोग से पाचन तंत्र मजबूत रहता है, हरा धनिया के प्रयोग से पेट संबंधित तमाम बीमारियों में आराम मिलता है, यदि पेट में दर्द हो तो दो चम्मच धनिया पाउडर को पानी में मिलाकर हल्का गर्म गुनगुना करके पीने से राहत मिलती है।
  मधुमेह रोगियों के लिए भी हरा धनिया का प्रयोग अत्यंत ही लाभकारी है, अगर नियमित रूप से हरे धनिया का प्रयोग करें तो उनका ब्लड शुगर मेंटेन रहता है और उन्हें इंसुलिन प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। हरे धनिया के प्रयोग से मधुमेह रोगियों के लिए विशेष लाभ मिलता है।
  जिसके शरीर में रक्त की कमी होती है उसके लिए भी धनिया रामबाण का काम करता है, धनिया के नियमित प्रयोग से रक्त की मात्रा शरीर में बनी रहती है और एनीमिया की शिकायत नहीं होती।
  
 हरी धनिया में विटामिन सी भरपूर मात्रा में होता है इसलिए यह आंखों की रोशनी के लिए भी बहुत ही लाभकारी और गुणकारी औषधि के रूप में जानी जाती है।
  
   हरे धनिया के प्रयोग से ब्लड में बढ़ता है कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को भी घटाने में मदद मिलती है। उच्च रक्तचाप वालों को हरे धनिया से औषधि के रूप में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को मेंटेन करने के लिए प्रयोग में लाना चाहिए जिसके नियमित प्रयोग से उनको कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में मदद मिलती है।
 
  वजन को कम करने के लिए भी धनिया  का  प्रयोग बेहद ही कारगर है, रात को एक गिलस पानी में दो चम्मच धनिया को भीगा दे( खड़ी धनिया )को सुबह इसको उबालकर इसमें शहद और नींबू मिलाकर चाय की तरफ पीने से वजन नियंत्रण रहता है और मूत्र विकार में भी बहुत ही आराम मिलता है।
      थायराइड की समस्या के लिए भी खड़ी धनिया का प्रयोग किया जाता है, रात को खड़ी धनिया को भीगा कर एक गिलास पानी में रख दें सुबह से मध्यम आंच पर तब तक उबालें जब तक की  आधा न रह जाए फिर इसमें थोड़ा सा नींबू और शहद मिलाकर पीने से थायराइड कंट्रोल रहता है।

   हल्दी (turmaric) हल्दी यानी हरिद्रा सब गुणों की खान हल्दी, जो भारतीय परंपरा में बेहद ही शुभ और लक्ष्मी का रूप माना जाता है हल्दी, हल्दी का प्रयोग भारत में पूजा पाठ शुभ कार्यों में भी किया जाता है, शादी विवाह में तो हल्दी का एक विशेष रस नहीं होता है माना जाता है कि हल्दी के प्रयोग से होने वाली नई दुल्हन की रंगत को निखारने में हल्दी बेहद ही गुणकारी साबित होती है ,तो हल्दी की तो बात ही निराली है जो होने वाले दुल्हन और दूल्हे की रंगत को पूरी तरह से बदल देती है ऐसी पवित्र और गुणकारी हल्दी के गुण के बखान को करते करते पूरा यह आर्टिकल पूरा हो जाएगा परंतु हल्दी के गुणों का व्याख्यान पूरा नहीं होगा।हल्दी एक मसाला है और जड़ीबूटी भी है। यह करकुमा लोंगा पौधे की जड़ से प्राप्त होता है, जो अदरक परिवार में एक बारहमासी है। हल्दी का सबसे प्रमुख सक्रिय अंश है करक्यूमिन। करक्यूमिन हल्दी को पीला रंग देता है।

आयुर्वेदिक चिकित्सा में हल्दी का उपयोग कई वर्षों से किया जा रहा है। आयुर्वेद में इसे हरिद्रा कहते है। हल्दी भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया का पौधा है। यह एक बारहमासी पौधा है इसके पौधे में फूल आते है।

इसे २० से ३० डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान चाहिए होता है और वार्षिक वर्षा की भी अच्छी मात्रा में आवश्यकता होती है। हल्दी पाउडर का स्वाद कड़वा, गर्म, काली मिर्च जैसा होता है और इसकी सुगंध मिट्टी, सरसों जैसी होती है।

इसका विशेष तौर पर मसाले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। खाने के साथ ही इसे सर्दी-जुकाम, त्वचा रोग व और भी तरह की बिमारियों में प्रयोग किया जाता है।  

  गले में किसी तरह का इन्फेक्शन खराश जुकाम आदि की समस्या अधिक हो जाए तो हल्दी के पानी से गरारे करने से और रात में दूध में हल्दी को मिलाकर सेवन करने से विशेष लाभ मिलता है।
   हल्दी के सेवन से ब्लड शुगर को कंट्रोल रहता है। दूध में हल्दी को मिलाकर सुबह-शाम पीने से वजन भी नियंत्रण रखता है।
  किसी स्थान पर  यदि चोट लग जाए या कट जाए तो उस स्थान पर हल्दी को लगा देने से ब्लड जल्दी रुक जाता है और घाव भरने में भी मदद मिलती है क्योंकि हल्दी में एंटीबायोटिक प्रॉपर्टीज होती है।
  
 सरसों के तेल में हल्दी को मिलाकर गर्म करके फिर उसको जोड़ों या गठिया के दर्द में मालिश करने से दर्द में राहत मिलता है।
  यदि दांत में पायरिया या मसूडे में सूजन हो जाए तो हल्दी को सेंधा नमक और सरसों के तेल के साथ मसूड़े और दातों पर हल्के हल्के लगाकर लगाकर छोड़ दे, और 5 मिनट बाद उससे थोड़ा सा मसाज करके मुंह साफ कर ले जिससे मसूड़ों से खून आना और पायरिया की समस्या का समाधान हो जाता है पूरी तरह से ।
    
 चेहरे की रंगत निकालने के लिए भी हल्दी का प्रयोग बहुत ही गुणकारी है, दो चम्मच बेसन में चुटकी भर हल्दी मिलाकर, उसमें थोड़ा सा कच्चा दूध मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की रंगत निखर जाती है और चेहरे में कसाव भी बना रहता है।

  मेथी(Fenugreek ) मेथी के दानों का प्रयोग सिर्फ सब्जी को स्वादिष्ट बनाने में ही नहीं किया जाता बल्कि भारतीय व्यंजन की एक महत्वपूर्ण सामग्री है मेथी। जिसका प्रयोग अधिकतर भारतीय घरों में किया जाता है मेथी के पराठे बच्चे बहुत-बहुत चाव से खाते हैं और यह बहुत ही स्वादिष्ट और हल्दी भी होता है। कहां जाता है कि मेथी का प्रयोग कमर दर्द और प्रसूता महिलाओं के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होता है मेथी का लड्डू बनाकर और मेथी का पाग बना कर दिखाया जाए तो , कमर दर्द और प्रसूता महिलाओं में प्रसव के दौरान होने वाली तमाम पीड़ा से शरीर को राहत मिलता है।  अर्थराइटिस के दर्द मेथी मेथी का प्रयोग रामबाण से दो होता है। पेट दर्द ठंड लग जाए तो गुनगुने पानी से एक चम्मच मेथी का सेवन करने से तुरंत आराम मिलता है यह कोई किताबी ज्ञान नहीं है बल्कि स्वयं अनुभव किया हुआ फार्मूला है। आयुर्वेद में तो मेथी के इतने सारे गुण बताए गए हैं कि जिनका विवरण करते-करते आदमी थक जाए लेकिन उनका विवरण खत्म नहीं होता क्योंकि मेथी में बहुत सारी दर्द निवारक प्रॉपर्टीज है।
   जिन लोगों को अपच व कब्ज की परेशानी है, उन्हें मेथी का पानी पीने की आदत डाल लेनी चाहिए। मेथी में मौजूद पाचक एंजाइम अग्नाशय को अधिक क्रियाशील बना देते हैं। इससे पाचन क्रिया अच्छी होती है।
इसमें फाइबर काफी मात्रा में होता है, संतुलित मात्रा में सेवन करने से पाचन संबंधी समस्या का निवारण होता है।
    मेथी दाना का पानी पीने से आपके शरीर में जो खराब कोलस्ट्रॉल है, वह बाहर निकल जाता है और अच्छा कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। मेथी दाना का पानी केवल एक महीने तक नियमित रूप से सेवन किया जाए तो शरीर में एच डी एल यानी अच्छा कोलेस्ट्रॉल बढ़ने लगता है और काफी फायदा पहुंचाता है।
   मेथी दाना में म्यूसिलेज नाम का एक तत्व पाया जाता है, वह आपको सर्दी खांसी होने पर आराम पहुंचाता है। इसके लिए आप एक चम्मच मेथी दाना को एक कप पानी में उबालें और जब पानी आधा रह जाए, तब उसे छानकर पी लें।
  सुबह-सुबह खाली पेट में अगर मेथी दाना का पानी पिया जाए तो इससे शुगर कंट्रोल करने में काफी मदद मिलती है। मेथी ब्लड में मौजूद ग्लूकोज लेवल को कम करता है।
    वजन कंट्रोल करने के लिए आपको हर सुबह मेथी दाने के पानी का सेवन करना चाहिए। इसके लिए रात में कुछ मेथी दाना को पानी में भिगोकर छोड़ देना है, फिर उस पानी को सुबह खाली पेट पी लें और साथ में मेथी दाना भी खा लें।  मेथी में भरपूर मात्रा में फाइबर होता है, जिसे खाने से पेट भरा-भरा लगता है और भूख कम लगती है।
    मेथी में डिओसजेनिन नामक तत्व होता है, जिसके कारण यह आंतों के कैंसर से बचाव करता है। मेथी दाने का पानी और साथ में मेथी दाने का सेवन यदि नियमित रूप से किया जाए तो आंतों के कैंसर की समस्या काभी नहीं होगी।  किडनी की समस्या से जूझ रहे मरीजों को डॉक्टर सलाह देते हैं कि वह एक महीना इसका पानी पिएं। इसमें जो एंटी ऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो किडनी के लिए फायदेमंद होते हैं।
     मेथी हृदय यानी हार्ट के लिए भी काफी अच्छा होता है, क्योंकि इसमें जो हाइपोकोलेस्ट्रॉलेमिक होता है, जो  कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल रहता है, जिससे हृदय मज़बूत बनता है। इसके सेवन से रक्त संचार भी अच्छा होता है।
मेथी स्किन के लिए काफी फायदेमंद होता है। इस पानी को पीने से स्किन एलर्जी की समस्या खत्म हो जाती है, साथ ही कील मुंहासों की भी समस्या दूर होती है। इसमें एंटीएजिंग गुण भी होते हैं, साथ ही यह स्किन की मॉइश्चराइजिंग करता है और स्किन के हीलिंग में भी मदद करता है।
मेथी से बालों का झड़ना रोका जा सकता है। इसके लिए 1-2 चम्मच मेथी के दानों को रात भर के लिए भिगो दें। इसे सुबह पीसकर बालों की जड़ों में लगाएं। एक घण्टे बाद बालों को धो लें। ऐसा हफ्ते में दो से तीन बार करें, बालों का गिरना बंद हो जाएगा, साथ ही वे चमकदार भी हो जाएंगे। 

  सौंफ( Fennel) भारतीय रसोई में सौंफ का प्रयोग ज्यादातर मसाले के रूप में तो किया ही जाता है इसका प्रयोग ज्यादातर मुंह से आने वाली दुर्गंध को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है अच्छा माउथ फ्रेशनर का काम करता है सौंफ। भोजन को पचाने में भी सौंफ का बहुत ही गुणकारी प्रयोग होता है। खाना खाने के बाद अधिक तो चम्मच सौंफ का प्रयोग किया जाए तो भोजन सुपाच्य रहता है और आसानी से पच जाता है। चौकी शौक की तासीर ठंडी होती है इसलिए गर्मियों में ज्यादातर इसका प्रयोग ठंडाई के रूप में किया जाता है जिससे पेट में ठंडक बनी रहती है और लू लगने की संभावना कम रहती है।सौंफ से शरीर में कहीं पर भी होने वाली सूजन मे मैं भी आराम मिलता है, मासिक धर्म की अनियमितता को भी सौंफ के सेवन से राहत मिलती है। हृदय रोगों के लिए भी शौक का प्रयोग एक बेहतरीन विकल्प के रूप में प्रयोग में आता है,। हड्डियों को भी मजबूती देती है सौंफ और कैंसर से लड़ने में भी कारगर होती है।यदि सौंफ को उचित मात्रा में भोजन में मिलाकर इसका सेवन किया जा रहा है, तो यह आमतौर पर सभी के लिए सुरक्षित होता है। हालांकि, यदि इसे अधिक मात्रा में या लगातार लंबे समय तक लिया जा रहा है, तो इसे कुछ स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हो सकती हैं जैसे उल्टी, मतली, पेट में दर्द व जलन आदि। यदि आप इन दवाओं के साथ-साथ अधिक मात्रा में सौंफ का सेवन कर रहे हैं, तो शरीर में पोटेशियम का स्तर अत्यधिक बढ़ सकता है। पोटेशियम का स्तर बढ़ने से गुर्दे संबंधी समस्याएं होने का खतरा बढ़ जाता है।
सौंफ वनस्पति से प्राप्त होने वाला एक खास सुगंध वाला पौधा है, जिसका इस्तेमाल विशेष रूप से चाय व अन्य कई मीठे पकवानों की सुगंध बढ़ाने के लिए किया जाता है। सौंफ में अनेक प्रकार के स्वास्थ्यवर्धक गुण भी पाए जाते हैं और इसलिए कई समस्याओं के इलाज के लिए इसे एक घरेलू उपचार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद में हजारों सालों से सौंफ का इस्तेमाल अलग-अलग दवाएं बनाने के लिए किया जाता है। यह दुनियाभर के सभी हिस्सों में एक मसाले के रूप में भी प्रचलित है। इसका अंग्रेजी नाम फेनल (Fennel) और वैज्ञानिक नाम फीनिक्युलम वल्गरे (Foeniculum vulgare) है। इसकी उत्पत्ति दक्षिणी यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में हुई थी और आजकल इसे दुनिया के कई हिस्सों में उगाया जाता है।
 
 हींग (Asafoetida)
    किसी भी भोजन में खासकर दाल में हींग से तड़का लगा दिया जाए, तो दाल का स्वाद तो बढ़ता ही है, दाल और भी ज्यादा पौष्टिक और हेल्दी हो जाता है। अक्सर कुछ लोगों को इसका स्वाद पसंद नहीं आता है। जो पुरुष हींग के नाम से मुंह-भौंह सिकोड़ते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए की हींग पुरुषों की सेक्सुअल हेल्थ को बूस्ट करने का काम करती है। सेक्सुअल समस्या जैसे शीघ्रपतन (Premature Ejaculation) और नपुंसकता (Impotence) को दूर करती है। हींग से पेट दर्द, गैस, अपच, उल्टी जैसी समस्याएं भी दूर होती हैं। हींग को भारत में मसाले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और साथ ही यह कई प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों का हिस्सा भी रहा है। हींग को अंग्रेजी में एस्फोटिडा (Asafoetida) कहते हैं। इसे फेरुला एस्टीफेडा (Ferula Asafetida) नामक पेड़ की जड़ से प्राप्त किया जाता है। 
(Kailamine )कलामाईन त्वचा संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए आमतौर पर सदियों से कई तरह के प्रोडक्ट का इस्तेमाल किया जाता है। कैलामाइन लोशन एक ऐसा ही उत्पाद है। इसे स्किन के लिए वरदान माना जाता है। कैलामाइन एक ऑयल बैलेंस लोशन है, जो अतिरिक्त ऑयल को कंट्रोल करता है और आपकी स्किन को कोमल बनाता है।

दरअसल, कैलामाइन लोशन, कायोलिन क्ले, जिंक ऑक्साइड, ग्लिसरीन, नीम और विटामिन ई को इनफ्यूज्ड करके बनाया जाता है। औषधीय लोशन से अलग,यह क्रीम की तरह होता है। यह स्किन को मॉश्चराइज करने के साथ ही मुंहासे की समस्या को दूर करता है। 

 फिटकरी (alum) बरसों से फिटकरी का प्रयोग हमारे किचन में औषधि के रूप में किया जाता है। फिटकरी को उपयोग पानी साफ करने के लिए किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका इस्तेमाल सेहत, खूबसूरती और अन्य फायदों के लिए भी किया जा सकता है। फिटकरी में एंटीबैक्टीरियल गुण मौजूद होते हैं, जो स्किन और बालों के लिए बहुत फायदेमंद माने जाते हैं और इसे रोजाना स्किन पर लगाने से चेहरे पर रंगत आती है. साथ ही चेहरे की झुर्रियों की परेशानी में भी राहत मिल सकती है. फिटकरी में अस्ट्रिन्जन्ट और हेमोस्टेटिक गुण पाए जाते हैं, जो घाव को भरने में मदद कर सकते हैं।
  दांतों में होने वाले भयंकर दर्द के लिए फिटकरी के प्रयोग से आराम मिलता है, जब दांत में तेज दर्द होता फिटकरी को उस स्थान पर पाउडर की तरह लगा लेने से या उसके पानी से गरारे करने से दांतों के दर्द से आराम मिलता है। ऐसा करने पर आपको दांत दर्द में आराम मिलेगा. चेहरे की झुर्रियों से निजात पाने के लिए फिटकरी के एक छोटे टुकड़े को गीला कर आहिस्ता-आहिस्ता अपने चेहरे पर रगड़ें. कुछ देर बाद चेहरे को गुलाब जल से धो लें. इसके बाद अपने चेहरे पर मॉइश्चराइजर का इस्तेमाल करें. इसके इस्तेमाल से कुछ दिनों में त्वचा की झुर्रियां गायब हो जाएंगी. अगर आपकी एड़ियां फट रही हैं, तो फिटकरी को खाली प्याली में इतना गर्म करें कि पिघलकर फोम की शक्ल में आ जाए. जब फिटकरी का फोम ठंडा हो जाए तो उसमें नारियल का तेल मिलाएं और फटी एड़ियों पर लगाएं. ये नुस्खा फटी एड़ियों को फौरन तुरंत आराम पहुंचाता है.

  तेखूर (Tekhur)  तीखुर की तासीर ठंडी होती है इसलिए इसे सर्दियों में ज्यादातर प्रयोग नहीं किया जाता गर्मियों में इसका प्रयोग किया जाता है इसका प्रयोग बच्चों के खाने के में भी किया जाता है बच्चों की बेबी फूड्स में भी तीखुर का पर्याप्त मात्रा में प्रयोग किया जाता है। तीखुर के पेड़ में तना नहीं होता , यह देखने में हल्दी के पेड़ जैसा लगता है बिल्कुल उसकी पत्तियों की तरह इसकी पत्तियां होती हैं कि झाड़ियों के रूप में होता है। इसके पत्ते तकरीबन 30 से 40 सेंटीमीटर तक लंबे होते हैं और बेहद नुकीलेदार लेदार होते हैं । तीखुर के पेड़ पर फूल भी होता है जो अंडे के आकार का होता है। तीखुर में पाए जाने वाला रायजोम  लंबा और  गुड़ेदार होता है इसमें फूल अधिकतर नवंबर के महीने में आते हैं।यह ज्यादातर देश के पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। यह उत्तराखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और साउथ इंडिया में मिलता है। यह ज्यादातर हिमालय की 1000-1300 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता।
  पेट फूलने ,गैस ,एसिडिटी, खांसी अस्थमा और पेशाब में जलन के लिए तीखुर का प्रयोग किसी चमत्कारिक औषधि से कम नहीं है। टिकुर को पाउडर बनाकर लड्डू बना कर के भी इस्तेमाल किया जा सकता है इसको लड्डू बनाने के लिए पहले तीखुर के पाउडर को अच्छे से कढ़ाई में हल्का ब्राउन होने तक घूम लिया जाता है फिर इसमें देसी घी, गोंड पीपल और शोथ, के साथ-सथ खूब सारे ड्राई फ्रूट्स को मिलाकर गोल गोल लड्डू की तरह बनाकर खाने से कमर दर्द और अन्य तरह की समस्याओं में भी बहुत लाभ मिलता है।
  तीसी (thirtieth )

 
  वैसे तो तीसी या अलसी के हजारों गुण पाए जाते हैं  । परंतु हमारे यहां दादी नानी को अधिकतर हमने देखा है कि वह उसका लड्डू के रूप में प्रयोग करती थी जिससे प्रसव के दौरान महिलाओं को प्रजनन में जो समस्याएं सामने आती है उनसे उनको निजात मिलती है और शरीर में मेटाबॉलिज्म सिस्टम स्ट्रांग रहता है। रक्त संचार में भी अलसी का प्रयोग बहुत ही गुणकारी होता है।
  और ही और एक बहुत ही महत्वपूर्ण तीसी का गुण है इसके प्रयोग से पुरुषों में होने वाली मर्दाना कमजोरी का भी बखूबी इलाज करती है तीसी।आयुर्वेद में अलसी को ‘बल्य’ कहा गया है मतलब जो शक्ति देता है। भारत में अलसी के औषधीय गुण का उपयोग आयुर्वेदिक उपचारों और खान-पान में पुराने समय से होता रहा है। अलसी के लड्डू खाना भी अलसी के फायदे पाने का तरीका है। अलसी के बीज से भी तेल निकलता है जोकि खाने व शरीर में लगाने में फायदेमंद होता है।
 निष्कर्ष
उपर्युक्त सभी घरेलू उपायों को ज्यादातर हमने अपनी रसोई में पाया है यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है परंतु फिर भी आज के दौर में कब किसको किस चीज से एलर्जी हो जाए कोई कह नहीं सकता इसलिए किसी भी चीज का प्रयोग करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लेकर तभी प्रयोग करना चाहिए। ज्यादातर चीजें इसमें स्वयं अनुभव की हुई हुई है।

नोट =किसी भी तथ्य का हम प्रमाण के साथ हम आपको उपयोग करने के लिए नहीं कर सकते जब तक कि आप इसको करने के लिए किसी विशेषज्ञ से राय लेकर उपयोग करें बाकी आप कोई यह हमारा आर्टिकल कैसा लगा कमेंट करके जरूर बताइएगा पढ़ने के लिए धन्यवाद।

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