Health मंत्र ,सबसे शक्तिशाली मंत्र कौन सा है?
मंत्र के अर्थ की अनंनता exclusivity of the meaning of the mantra
मंत्र शब्द का अर्थ
र्असीमित है।
वैदिक विचारों के प्रत्येक शब्द भी मंत्र कहे जाते हैं तथा देवी-देवताओं की स्तुतियों यज्ञ हवन में निश्चित किए गए शब्द समूह को भी मंत्र कहा जाता है। तंत्र शास्त्र में मंत्र का अर्थ भिन्न है। तंत्रशास्त्र मंत्र उसे कहते है, जो शब्द ,पद या पद समूह जिस देवता शक्ति को प्रकट करता है_ वह उस देवता या शक्ति का मंत्र कहा जाता है।
- धर्म-कर्म और मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रेरणा देने वाली शक्ति को मंत्र करते हैं।
- देवता के सूचना शरीर व इष्ट देव कृपा की प्राप्ति के मंत्र कहते हैं।
- दिव्य शक्तियों की कृपा को प्राप्त करने में उपयोगी शब्द शक्ति को मंत्र कहते हैं।
- अदृश्य गुप्त शक्ति को जागृत करके अपने अनुकूल बनाने वाली विद्या को मंत्र कहते हैं।
- इस प्रकार गुप्त शक्ति को विकसित करने वाली विद्या को मंत्र कहते हैं।
गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में ज्ञान विज्ञान का भंडार छिपा हुआ है गायत्री मंत्र के एक-एक अक्षर में इसका दार्शनिक तत्वज्ञान सन्निहित है। जिसकी पूरी तरह जान पाना मुश्किल है। आध्यात्मिक और भौतिक सभी प्रकार के ज्ञान विज्ञान उसके गर्भ में मौजूद है जिनका यदि ठीक-ठीक पता चल जाए तो मनुष्य उन सभी वस्तुओं को प्राप्त कर सकता है जो उसे अभीष्ट है।
गायत्री वेद माता है। गायत्री से ही चारों वेद और उनकी रिचा मिलती है। वेद समस्त विद्याओं का भंडार है। समस्त तत्वज्ञान और भौतिक विज्ञान वेदों के अंतर्गत मौजूद है। जो कुछ वेदों में है उसका सार गायत्री में है यदि कोई गायत्री को भली प्रकार समझ ले तो उसे वेद शास्त्र और
पुराण,
स्मृति ,
उपनिषद् आदि की सभी बातों का ज्ञान स्वयमेव हो जाता है।
गायत्री मंत्र के एक-एक शब्दों का अर्थ अंग्रेजी (Meaning of each word of Gayatri Mantras)
एक एक अक्षर का ,एक-एक पद का क्या अर्थ है भाव रहस्य संदेश है। उसको जानने के लिए मनुष्य का एक संपूर्ण जीवन भी अपर्याप्त है। गायत्री के 24 अक्षर ज्ञान विज्ञान के 24 समुंद्र है उनका पार पाना साधारण काम नहीं है। यहां गायत्री मंत्र के संक्षिप्त आवाज पर प्रकाश डाला जा रहा है। गायत्री महामंत्र है
सबसे पहले
ओम है। ओंकार को ब्रह्मा कहा गया है। वह परमात्मा का स्वयं सिद्ध नाम है। योग विद्या के आचार समाधि अवस्था में पहुंचकर जब ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं उन्हें प्रकृति के अंतराल में ध्वनि होती हुई परिलक्षित होती है।
जैसे घड़ियाल पर चोट मारने से बहुत देर तक छनछन आती रहती है इसी प्रकार बार-बार एक ही कंपनी में सुनाई देने लगता है। यह नाद ध्वनि "ओम "की ध्वनि से मिलती-जुलती होती है।
उसे ही रिसीव ने ईश्वर का स्वयंसिद्ध नाम बताया है और उसे ही "शब्द "कहा है।
ओम को प्रणव भी कहते हैं यह सब मंत्रों का ही तू है क्योंकि इसी से समस्त शब्द और मंत्र बनते हैं ओम के प्रभाव से व्यहृतिया है और वहृतिया उसे वेदों का आविर्भाव हुआ _y
सर्वेषामेव मत्रानाम कारणम प्रणव: स्मृत:।
तस्मान व्याहृतियोजातास्ताभ्यो वेद्त्रयम तथा।।
ओंकार बिंदु संक्युत्यम नितयम् धयन्ति योगिन्ह।
कामदम म मोक्षदम चैव ओमकाराय नमो नम:।।
अर्थात योगी पुरुष अनुस्वार युक्त ओंकार का सदा ध्यान करते हैं। अतः समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाले तथा मोक्ष दायक ओंकार को हम नमन करते हैं।
ओम इतेकाक्षर: ध्यानतम विष्णु विर्स्नुत्वमाप्तवान।
ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापत्र: शिवतामभवत: शिव:।।
ओम इस ओंकार अक्षर मंत्र के ध्यान से विष्णु विष्णु तत्व को ब्रह्मा ब्रह्मा तत्व को तथा शिव शिव तत्व को प्राप्त हुए है। गायत्री मंत्र में ओंकार के पश्चात भू: , भुवः 3 व्याह वृत्ति आती है। इन तीनों का त्रिक अनेकार्थी बोध होता है।
वे अनेक भावनाओं का और दिशाओं का संकेत करती है, अनेकों को की ओर ध्यान आकर्षित करती है। ब्रह्मा विष्णु महेश इन तीनों उत्पादक पोषक संहारक शक्तियों का नाम भू: भूर्व: स्व: है। भू :को ब्रह्मा भुव: को प्रकृति और स्व: को प्रकृति कहा गया है ।
अग्नि वायु और सूर्य इन प्रधान देवताओं का प्रतिनिधित्व तीन ब्ह वृत्तीय करती है। तीनों लोको का भी इनमें संकेत है। सत रज तम इन तीनों गुणों से संसार बना है। इन तीन सभाओं के प्राणी विश्व में रहते हैं इन तीनों पर विजय का अर्थ संसार पर विजय इसी तरह अग्नि वायु और जल की उपासना का अर्थ है_तेजस्विता गतिशीलता और शांतिप्रियता का मन से स्थापित होना।
इस पद्धति को अपना घर इस त्रिविध संपत्ति को अंदर धारण करके जीवन को सर्वांगी सुख शांति मय बनाया जा सकता हैं।
तत कहते हैं" उस"या "वह "को । तत् शब्द किसी की ओर संकेत करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। गायत्री में यह परमात्मा की ओर संकेत करता है। परमात्मा का वर्णन विवेचन नहीं हो सकता इसीलिए इस विषय में केवल संकेत किया गया।
सवितु सविता शब्द से साधारण तक सूर्य का अर्थ प्रकट होता है; क्योंकि अप्रत्यक्ष अतः तेजस्वी और प्रकाशवान हैं। परमात्मा की यह प्रत्यक्ष शक्ति ज्योतिष के रूप में हमारे स्कूल नेत्रों के सामने आती हैं वह सूर्य हैं
इसीलिए स्कूल अर्थों में सूर्य नमक ग्रह को सविता कहते हैं परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि यह चमकने वाला अग्निपिंड ही पूर्व सविता नहीं है। आध्यात्मिक भाषा में सरिता कहते हैं तेजस्वी को प्रकाश वान को उत्पन्न करने वाले को। परमात्मा की अनंत शक्तियां हैं उनके अनेक रूप हैं उनमें तेजस्वी शक्तियों को सविता कहा जाता है।
वरेणय वरेणय कहते हैं श्रेष्ठ को वरण करने ग्रहण करने धारण करने योग्य को। ईश्वरीय सत्ता में भी सभी तत्व है जो मनुष्य के लिए उपयोगी भी है, अनुपयोगी भी है । इनमें से जो गायत्री मंत्र के द्वारा हम उन तत्वों को ग्रहण करते हैं जो वरेणय श्रेष्ठ है, ग्रहण करने योग्य है। धर्म, कर्तव्य ,अध्यात्म ,सत ,चित, आनंद, सत्य, शिव, सुंदर ,आदि वरेणय तत्व है। गायत्री में वरेणय शब्द ऐसे ही तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाला है ।
भर्ग परमात्मा की वह शक्ति जो बुराई का अज्ञान अंधकार का नाश करने वाले है भर्ग कहलाती हैं। सविता का तेजो रोगों और पापों का सम्मान करता है भर्ग कहलाता है। गायत्री में ऐसी शक्ति का आवाहन धारण किया जाता है। गोपथ ब्राह्मण में कहा गया है "गायत्रव भर्ग: तेजौ वायै गायत्री" जावे गायत्री अर्थात गायत्री ही भर्ग है और भर्ग ही गायत्री है।
देवस्य कहते हैं दिव्य को, अलौकिक को, असाधारण को, देवता दिव्य होता है यह भी कहा जाता है कि जिन की इच्छा आकांक्षा भावनाएं दिव्य होवे देवता हैं । ईश्वरी शक्ति को देव करते हैं शंकर भाष्य में उल्लेख है_
सर्वे प्रकाशक अखंड चैतन्य करस देव के गुण है। शब्द कल्पद्रुम में कहा गया है कि जो समस्त प्राणियों को आत्म रूप से प्रकाशित करता है, स्रोतों से जिसकी स्तुति की जाती है ,वह सर्वत्र व्याप्त है, वह देव है।
सर्वभूतेषुवातमया धोतयते स्तूपतेस्तइंग सर्वत्र गच्छति तस्माद देव:
धीमहि धीमहि कहते हैं ध्यान करने को। ध्यान का चमत्कार प्रत्यक्ष है। जिस वस्तु का ध्यान करते हैं उस पर मन जमता है।
उससे रुचि और रुचि से सिद्धि की प्राप्ति की आकांक्षा उत्पन्न होती है। इस तरफ ध्यान बीज और सफलता उसका फल है। गायत्री मंत्र में सभी का ध्यान का अर्थ सविता प्राप्ति का प्रयत्न यह बहुत शुभ है।
य: य: का अर्थ है "जो" यह परमात्मा के लिए संकेत है पूर्व में जो सविता
वरेणय भर्ग देवस्य थोड़ा का वर्णन किया गया है उन गुणों वाला जो परमात्मा है। उसे दोहरा कर पृष्ठ पोषण करने की अपेक्षा यहां केवल य:का संकेत कर दिया गया है।
यह सविता का रूप हैं। य: सविता देव: यत्सतयज्ञानादि लक्षणम् और ज्ञान का स्वरूप है।
न: का अर्थ है हम लोगों का न: अस्मदिया ना अस्माकं।। न: बहुवचन के लिए प्रयोग करता है मैं अकेले के लिए और हम बहुतों का लिए प्रयोग होता है गायत्री मंत्र में शुभकामनाएं कल्याण के प्रार्थना सबके लिए करके हृदय की उदारता और विशालता का परिचय दिया गया। परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि सब को सद्बुद्धि का प्रकाश हो। न: शब्द इसी का घोतक है।
प्रचोदयात् इसका अर्थ है प्रेरणा करना जोड़ना और बढ़ाना
गायत्री मंत्र द्वारा उस सवितु
वरेणय भर्ग का ध्यान करते हैं।
किसी वस्तु की नहीं सद्बुद्धि की प्रार्थना है। परमात्मा से बुद्धि को प्रेरित करने की याचना की गई है। वीर हमारी बुद्धि को प्रेरणा दी जिससे उत्साहित होकर हम अपने अंतःकरण के निर्माण में जुट जाएं।
गायत्री मंत्र में प्रचोदयात शब्द बहुत ही मार्मिक है इसमें आत्मा के दौरे की पूरी तरह रक्षा की गई है आत्मा शक्तियों का भंडार है। इसमें वे सब शक्तियां मौजूद है जिनकी सहायता से हम मनचाहे स्थितियां तथा वस्तुएं प्राप्त कर सके बस यही मंत्र का प्राण है क्योंकि बुद्धि शुद्ध हुए बिना कुछ भी प्राप्त होता है तो उसका सदुपयोग नहीं होता और इसका सदुपयोग नहीं हुआ व्यर्थ है। जिसकी बुद्धि शुद्ध शुद्ध हो गई उसको उसकी गायत्री मंत्र सकते हो गया।
1* उत्तम माह
कार्तिक ,अश्वनी ,वैशाख, मार्गशीर्ष, आदि बाहों में साधना और श्रावण मास में साधना उत्तम है।
2* उत्तम तिथि
मंत्र जप सेतु पूर्णिमा, पंचमी ,दितीय, सप्तमी दशमी, एवं त्रयोदशी तिथि उत्तम होती है।
3* उत्तम दिवस
रविवार, शुक्रवार, बुधवार, या गुरुवार मंत्र साधना के लिए उत्तम दिवस होते हैं।
4* उत्तम नक्षत्र
पुनर्वसु ,हस्त, तीनों उत्तरा, रेवती ,अनुराधा एवं रोहिणी नक्षत्र मंत्र सिद्धि हेतु उत्तम होते हैं ।
मंत्र साधना में साधन
आसान
मंत्र जप के समय कुशासन बांधवर और उन से बने आसान उत्तम होते हैं।
माला
रुद्राक्ष, जयंती माला, तुलसी, स्फटिक, हाथी दांत, लाल मूंगा, चंदन एवं कमल की माला से भी जप सिद्ध होते हैं। रुद्राक्ष की माला सर्वश्रेष्ठ होती है। बुद्धि सृजन पोषण संवर्धन और कल्याण की प्रेरणा का गायत्री मंत्र वास्तव में सर्वश्रेष्ठ मंत्र है । इसका नियमित रूप से अच्छा ध्यान करने से सभी प्रकार की सुख सौभाग्य की प्राप्ति होने के साथ ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा हम नहीं देख शास्त्रों में कहा गया है साधक इस महामंत्र का जब करें और सुख सौभाग्य का लाभ उठाएं।
ज्ञान और पराक्रम की परंपरा
संसार में आध्यात्मिक बल और भौतिक बल के दो प्रमुख शक्तियां हैं। इनमें संबंध में और संतुलन बना रहे तभी सुख शांति और समृद्धि कायम रहती है। अगर हम ज्ञानवान हैं तो हमें पराक्रमी भी होना चाहिए। पराक्रम व आध्यात्मिक ज्ञान की परंपरा को हम जब अपने चारों देखते हैं तो पाते हैं कि यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
अध्यात्मिक तेज विकसित करती है गायत्री मंत्र
हमारे भीतर एक और मुद्दा होना चाहिए जिसका नाम है तेज
तीज अगर हमारे और आपके भीतर नहीं तो कोई बात नहीं बनेगी तेज का इस्तेमाल करके हम अपने अंतर्ज्ञान को जगा सकते हैं। ब्रह्मदेश हमेशा से हमारी भारतीय संस्कृति की परंपरा रही है और उससे आगे भविष्य में कभी भी धर्म का जीवन जिया जाए ,आध्यात्मिकओ जिया जाए, शालीनता को जिया जाए तो मनुष्य की भी समझाएं जिएंगे जिम भी नहीं जी सकती एक अकेला क्रोध जिएगा एक दिला दीजिएगा दोनों को मिलाकर हम कोई तरीके से चलना पड़ेगा।
उजास तेजस वर्चस्व का पराक्रम
ओजस तेजस और वर्चस्व यह तीनों शक्तियां है उनके बिना काम नहीं कर सकता इसीलिए हम आपसे यह कहते हैं कि भीतरी शत्रु का मुकाबला करने से लेकर जो हमारी गलत आदतें आ गई है उनसे भी मुकाबला करना है। हम तो ऐसा कर ही नहीं सकते। क्यों नहीं कर सकते ? जल्दी से, जल्दी उठो।
आदत क्या होती है? धैर्य और पराक्रम से आपके अंतरिक्ष जीवन में वही रंग जीवन में आलस्य और प्रमाद जैसे दुश्मन भाग जाएंगे। भीतर के छह दुश्मन बताए हैं और बाहर की यह दुश्मन इनसे आपकी सारी की सारी भौतिक उन्नति के दरवाजे बंद हो जाते हैं तब आप भौतिक उन्नति नहीं कर पाएंगे। आपका भविष्य अंधकार में पड़ा रहेगा और आप किसी काम के नहीं रहेंगे जो भी काम हाथ में लेंगे उठापटक कर देंगे।
आलस्य एक और प्रमाद दो ऐसे दुश्मन है जो जीवन को पंगु बना देते हैं। आलस एक तरह का मानसिक लकवा है। लकवा कैसा होता है? शरीर में लकवा हो जाता है तो हाथ यैठ जाते हैं
, पैर काम करना कम कर देते हैं। इसी तरह आगे से भी है अगर वह हमें पकड़ लिया तो हमारे शरीर में एक तरह का लकवा हो जाता है। बिना काम के हो जाते हैं क्योंकि जो दिखाई नहीं देता उसको आने से कहते हैं।
आलस्य अर्थात मानसिक शिथिलता
आलस लकवा है जो आदमी की हालत खराब कर देता है अगर आदमी चाहे तो यही समय जिसने हम और आप रहते हैं यही समय छोटी सी जिंदगी जो हमारे और आपके पास है इसी में दुनिया के महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने क्या से क्या कर डाला। जगद्गुरु शंकराचार्य 32 वर्ष तक जिए। कमाल कर गए। स्वामी विवेकानंद जी अल्पायु में ही दुनिया को इतनी बड़ी अलौकिक ज्ञान की छमता दी है। छोटी सी जिंदगी में भ समय का ठीक से उपयोग करने वाले स्फूर्ति वान आदमी ,परिश्रमी आदमी, पुरुषार्थी आदमी काम करने वाले जीवन सार्थक कर गए।
जैसे शरीर का लकवा होता है ऐसे ही दिमाग का एक लकवा होता है। आदमी को काम करना चाहिए लेकिन अधूरे मन से, आधे मन से , आदमी देख कुछ और रहा, चल कहीं और रहा, सोच कुछ और रहा ,बोल कुछ और रहा । ना कोई दिशा है ना धारा है। एक तरह की क्रिया हो जाए क्रिया विचार इस तरह मिल जाए जैसे बिजली के नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों ता मिल जाते हैं, तो उनमें से करंट निकलता है । चिंगारियां निकलती है बिजली के बल्ब जल जाते है।
आदमी का चिंतन आदमी की रूचि आदमी की इच्छा और आदमी की क्रिया उन सब को मिला दीजिए तो आदमी के अंदर गजब का जुनून पैदा हो जाता है। ऐसा बढ़िया काम होगा कि देखने वाले को तमाशा लगेगा और कहेगा कि कैसा बढ़िया काम किया गया है।
आदमी ने तन्मय होकर जो कार्य नही किया तो समाज उसको जिंदा मार डालेगा। आप अपना काम कीजिए अपना काम मन से दिमाग से दिल से कीजिए मुझे समझता है आपने अपने दिमाग को पैदा कर ली है उसे निकाल दे। समस्या शब्द की व्याख्या को समझने के लिए" सम: सा" इन दोनों को मिलाकर के समस्या बना है संभल के आगे जो विसर्ग लगे हैं संस्कृत के हिसाब से "स "हो गया है। आदमी आलसी और समाधि हो गया है अपने आप से लोहा लेना पड़ेगा भिड़ना पड़ेगा।
आंतरिक महाभारत से विजई बने
गायत्री मंत्र के जप की साधना से मन की शांति के लिए सूर्य की उपासना करनी पड़ेगी। क्योंकि ज्ञान भी हमको चाहिए और विज्ञान भी हमको चाहिए इन दोनों की उपासना का क्रम बहुत पुराने समय से चला आ रहा है। जिसे हम भूल गए हैं जिसने भौतिकता को ध्यान दिया आध्यात्मिकता को हम भूल गए। आध्यात्मिकता का ध्यान किया तो भौतिकता को भूल जाना है। जिसने शक्ति की उपासना की उसमें ज्ञान को तिलांजलि दी थी। जिसने ज्ञान की उपासना की उसने शक्ति की आवश्यकता नहीं समझी। इस अपूर्णता को हमे दूर करना है।
शक्तिशाली मंत्र से दूर होते हैं जीवन के संकट
जीवन मूल्य के गुण एवं विशेषताएं जो एक व्यक्ति के जीवन में बहुमूल्य होते हैं। परिवार और समाज को सुसंस्कृत तथा राष्ट्र को समुन्नत एवं श्रेष्ठ यह भी जीवन मूल्य बनाते हैं। पूरे विश्व में सुख शांति एवं सौहार्द काय ही सशक्त माध्यम है। मनुष्य के जीवन को जो श्रेष्ठ है मरने वालों कहा गया है उसका आधारित जीवन मूल्य है। और इन जीवन मूल्यों को अपने जीवन में चरम पर पहुंचाने का गायत्री मंत्र से अच्छा कोई साधन नहीं है।
क्योंकि इन मूल्यों के खत्म हते ही मनुष्य अपने जीवन की चमक को खो बैठता है अपने मूल उद्देश्य भटक जाता है और उसे सामान्य इंसान से पशु इस आज असुर राक्षस जैसे निम्न स्तर पर गिरने में देर नहीं लगती। इसी के साथ परिवार समाज राष्ट्रीय मानवता का विघटन भी प्रारंभ हो जाता है।
वर्तमान संक्रमण के ऐतिहासिक पलों में मानवीय सभ्यता जीवन मूल्यों के गंभीर संकट से होकर गुजर रही है। एक और जहां इसका चेहरा स्थापित ढांचा चरमरा रहा है तो वहीं दूसरी ओर उसके उभार का आशा भरा स्वरूप हमारे सामने दिख रहा है।
करो ना कॉल मी इसके दोनों पक्षों के दर्शन खुलकर हुए हैं। एक और करो 9 मोर्चे पर चिकित्सक, सफाई, व सुरक्षाकर्मी, नेता समाजसेवी ,स्वयंसेवी ,संगठ,न स्वयंसेवक, अपना निष्काम एवं निस्वार्थ योगदान देते नजर आए तो वहीं दूसरी ओर जीवन रक्षक दवाइयों से लेकर ऑक्सीजन सिलेंडर की कालाबाजारी एवं जीवन मरण के संघर्ष से जूझ रहे रोगियों के साथ खिलवाड़ करते कुछ अमानुष नकाबपोश भी दिखाई पड़े।
जीवन मूल्यों को बढ़ाने के लिए अपने अंदर के अहंकार एवं स्वास्थ्य केंद्र सांसारिक भोगियो अपने सुख या लाभ का मार्ग
को छोड़कर दूसरा मार्ग संयम सेवा त्याग से भरा फार्म आर्थिक जीवन एवं आत्म कल्याण की मार्ग है गायत्री साधना व्यक्ति की आस्था विश्वास के आधार पर ही दो व्यक्तियों के जीवन के विभिन्न दिशा धाराएं होती हैं।
भारतीय परंपरा में धर्म के रूप में मूल्यों की चर्चा शास्त्रों में पुरुषार्थ के अंतर्गत हुई है। धर्म अर्थ काम और मोक्ष में धर्म को ही जीवन की केंद्रीय दूरी माना जाता है।
सारांश
मंत्र शब्द का अर्थ असीमित है।
वैदिक विचारों के प्रत्येक शब्द भी मंत्र कहे जाते हैं तथा देवी-देवताओं की स्तुतियों यज्ञ हवन में निश्चित किए गए शब्द समूह को भी मंत्र कहा जाता है। तंत्र शास्त्र में मंत्र का अर्थ भिन्न है। तंत्रशास्त्र मंत्र उसे कहते है, जो शब्द ,पद या पद समूह जिस देवता शक्ति को प्रकट करता है_ वह उस देवता या शक्ति का मंत्र कहा गया है।
निष्कर्ष
जीवन मूल्य के गुण एवं विशेषताएं जो एक व्यक्ति के जीवन में बहुमूल्य होते हैं। परिवार और समाज को सुसंस्कृत तथा राष्ट्र को समुन्नत एवं श्रेष्ठ यह भी जीवन मूल्य बनाते हैं। पूरे विश्व में सुख शांति एवं सौहार्द काय ही सशक्त माध्यम है। मनुष्य के जीवन को जो श्रेष्ठ है मरने वालों कहा गया है उसका आधारित जीवन मूल्य है। और इन जीवन मूल्यों को अपने जीवन में चरम पर पहुंचाने का गायत्री मंत्र से अच्छा कोई साधन नहीं है।
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