भूमिका (introduction)
पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य सिर्फ आज तक ही नहीं है इसकी उपयोगिता और महत्व को बनाए रखने के लिए हमारी नितांत जिम्मेदारी इसलिए भी बनती है कि क्योंकि पर्यावरण का जितना अधिकार हमारा है उतना ही आने वाली पीढ़ियों का भी है जब हम इसका उपयोग मनमानी ढंग से करेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियां इससे अपरिचित रह जाएंगी और शायद पर्यावरण को सही तरीके से नहीं समझ पाए और उनके लिए जीवन दुर्लभ हो जाएगा पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है ।उसी तरह से जैसे की हम अपने जीवन का करते हैं ,जीवन भी तभी संभव है जब हम स्वस्थ और सुखद पर्यावरण के बीच में रहेंगे। हमारा पर्यावरण यदि दूषित रहा तो हम ही सुरक्षित और सुखी नहीं रहेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियां कैसे सुरक्षित और सुखी रहेंगे ।हम आने वाली पीढ़ियों को भले ही गाड़ी बंगला आदि संसाधन छोड़कर ना जाए परंतु हम उनके लिए एक सुखद और स्वच्छ पर्यावरण अवश्य छोड़कर जाए क्योंकि यही उनकी असली दौलत होगी।
पर्यावरण को संरक्षित और समर्थित करने के लिए कई तरह के अंतरराष्ट्रीय कानून बने हुए हैं ।हमारे भारतीय संविधान में भी मूल कर्तव्य के साथ-सथ
हमारे अधिकारों में भी पर्यावरण के संरक्षण समर्थन की बात कही गई है क्योंकि पर्यावरण के अंतर्गत जल वायु मृदा आदि आते हैं और जब हम स्वच्छ जल स्वच्छ वायु मैं सांस लेंगे तभी हमारा शरीर मस्तिष्क आदि सुरक्षित रहेगा भारतीय कानून में कई तरह के दंड का प्रावधान किया गया है इन को दूषित करने के परिणाम स्वरूप दंड का प्रावधान है
3.2 राष्ट्रीय कानून (NATIONAL LAWS)
भारतीय संविधान में संशोधनों के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर, पर्यावरण के सुधार एवं बेहतरी के लिये कड़े प्रयास किए गए हैं- आरम्भिक काल में हमारे संविधान में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिये कोई प्रावधान नहीं था। परन्तु 1972 में स्टॉकहोम में हुए संयुक्त राष्ट्र की मानवीय पर्यावरण से संबंधित कॉन्फ़्रेंस के पश्चात, भारतीय संविधान में संशोधन किया गया और उसमें पर्यावरण के संरक्षण को एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया।
हालाँकि भारत में 1879 में हाथियों के संरक्षण का कानून और सन 1929 में वन संरक्षण का कानून आया था, परन्तु पर्यावरण संबंधी कानून 1972 में ही आया। यह 1971 की वन्य जीवन संरक्षण एक्ट से प्रेरित था। जैसा कि हम सभी जानते हैं, भारत को विश्व के बाहर बहुत अधिक विविधता वाले देशों में गिना जाता है। अभी भी ऐसी कई जन्तु प्रजातियाँ हैं, जिनकी पहचान अभी तक नहीं हुई है। जैविक विविधता का कृषि, औषधि और उद्योग के साथ सीधे उपभोग का संबंध है। इसके अलावा वह देश की संपदा भी है। हमारे संविधान में जैवविविधता के संरक्षण का प्रावधान है। |
भारतीय संविधान के अनुच्छेद-51ए (51 A) में 42वां संशोधन, पर्यावरण के संरक्षण एवं उसमें सुधार को एक मूल कर्तव्य का रूप देता है।
‘‘यह भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक वातावरण जिसमें वनों, झीलों, नदियाँ और वन्य जीवन जैसी प्राकृतिक संपदा सम्मिलित है, का संरक्षण करे व जीवित प्राणियों के लिये मन में करुणा रखे।’’
पर्यावरण के संरक्षण व बेहतरी के लिये केन्द्र द्वारा प्रदेशों को एक निर्देश जारी किया गया है। जिसे राजकीय नीति निर्देश आधार का दर्जा प्राप्त है। अनुच्छेद 48-ए (48 A) स्पष्ट करता है-
‘‘यह राज्य का कर्तव्य है कि वह न केवल पर्यावरण का बचाव व सुधार करे बल्कि देश के वनों और वन्य जीवन का भी संरक्षण करे।’’भारत में सन 1980 में देश में स्वस्थ पर्यावरण के विकास के लिये पर्यावरण विभाग की स्थापना हुई थी। यही विभाग, आगे चलकर, सन 1985 में पर्यावरण और वन मंत्रालय कहलाया। इस मंत्रालय की मुख्य जिम्मेदारी पर्यावरण संबंधी कानूनों और नीतियों का संचालन व लागूकरण है।
हमारे संविधान के प्रावधान कई कानूनों का सहारा लेते हैं, जिन्हें हम एक्ट और नियमों के नाम से जानते हैं। हमारे अधिकांश पर्यावरण-संबंधी कानून व नियम विधानसभा व राज्य सभाओं द्वारा निर्मित कानून हैं। ये एक्ट प्रायः अपनी कार्य शक्ति को नियंत्रक एजेंसियों को प्रसारित करते हैं, जोकि उनके लागूकरण की तैयारी करती है। भोपाल गैस दुर्घटना के पश्चात पर्यावरण संरक्षण कानून (Environment Protection Act, EPA) सन 1986 में तैयार होकर सामने आया।
सतत विकास की आवश्यकता मानव जाति के भविष्य की कुंजी है। परंतु असंतुलित विकास बढ़ता औद्योगिकरण जनसंख्या वृद्धि वनों की कटाई ठोस अपशिष्ट निपटान निरंतर बढ़ता प्रदूषण दिन प्रतिदिन धरती के अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा है। इस कारण ग्लोबल वार्मिंग ओजोन परत की कमी और जैव विविधता के नुकसान में सभी को जागरूक किया है। अतः विश्व में पर्यावरण को समझने एवं उसके संरक्षण के लिए विशेषज्ञों को आवश्यकता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। वर्तमान समय में पर्यावरण विज्ञान एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक विषय के रूप में उभर रहा है। पर्यावरण विज्ञान एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें भौतिकी विज्ञान जीव विज्ञान रसायन विज्ञान वनस्पति विज्ञान विद्या विज्ञान विज्ञान वायुमंडल विज्ञान जैव प्रौद्योगिकी के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक एवं नैतिक विषयों का भी समावेश है। यह महत्वपूर्ण विषय पर्यावरण की समस्या एवं समाधान को जोड़ता है। विश्व में कई संस्थान तथा कालेज आजकल पर्यावरण विज्ञान में स्नातक एवं स्नातकोत्तर दोनों कार्यक्रम चला रहे हैं। कोई भी व्यक्ति पर्यावरण विज्ञान में बीएससी या बीए की डिग्री कर सकता है।
और अधिक पर्यावरण विदों की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि हमारा पर्यावरण जो बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है हमारे क्रियाकलापों से उसके संरक्षण के लिए अधिक से अधिक लोगों इसके प्रति जागरूकता होना नितांत आवश्यक है। हममें से ज्यादातर लोग भूल गए हैं कि हमारे संसाधन सीमित है और विकास की तीव्र और अनियोजित गति पर्यावरण को भारी छत पहुंचा रही है। सच है कि प्रदूषण बड़े उद्योगों के कारण होता है लेकिन क्या व्यक्ति के रूप में हम इसमें योगदान देने के अपराध बोध से पूरी तरह मुक्त है? ऐसा नहीं लगता स्तर पर शुरुआत करते हुए मैं सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में योगदान करना सुनिश्चित करना चाहिए। स्वच्छ भारत आंदोलन का ही उदाहरण है जिसमें सभी नागरिकों से अपने आसपास का क्षेत्र स्वच्छ रखने का आग्रह किया जा रहा है वास्तव में आंदोलन प्रदूषण रोकने की दिशा में हुई अन्य फलों की तुलना में अधिक प्रभावी है क्योंकि इसे समुदाय से जोड़ा गया है। जागरूकता पैदा की गई है और असंगठित अपशिष्ट निपटान ओं को रोकने के लिए कचरे के पृथक्करण और रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया को समाहित करने वाली व्यवस्था पैदा करने की संभावना बनाई गई है। इस अभियान के कारण प्लास्टिक अब जल निकायों तक नहीं पहुंचेगा और नमामि गंगे जैसी परियोजनाएं सुनिश्चित कर रही है। मटर मौजूद प्रदूषण को हटाया जाए प्रौद्योगिकी का प्रभाव सभी उद्यमों पर हुआ है चाहे कृषि हो बिट्टू खुदरा व्यापार हो या फिर उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स जनवरी 2016 में संयुक्त राष्ट्र ने सतत विकास लक्ष्यों की एक सूची जारी की थी जिसमें जलवायु परिवर्तन आर्थिक विषमता नवाचार सतत उपभोग एवं उत्पादन सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा जैसी बातों पर जोर दिया गया था। दुनिया भर में तकनीकी विशेषज्ञ इन लक्ष्यों को प्राप्ति के लिए तकनीकी शोध और विकास में जुटे हुए हैं। आज के दौर में कृत्रिम बुद्धिमता दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है। कृत्रिम बुद्धिमता का तब उपयोग होता है जब हम चाहते हैं कि हमारे उपकरण बिल्कुल नई परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने या सुधारने में सक्षम हो या किसी वर्तमान प्रक्रिया को ज्यादा दक्षता से पूरा कर सकें। यह संसाधनों का उपयोग सीमित करने और प्रक्रियाओं को ज्यादा दक्षता एवं कम ऊर्जा खपत के साथ पूरा करने में मददगार है। यह प्रौद्योगिकी उन संस्थाओं का समाधान करने में मदद कर सकती है जिससे दिककाल की बाधाओं के कारण मानव मस्तिक पर पानी में अक्षम है।
चौथी औद्योगिक क्रांति बड़ी तकनीकी सफलताओं के अलावा बेहतर कंप्यूटिंग क्षमताओं भी ले आई है। लाउड प्रौद्योगिकी के आगमन के साथ बड़े शक्तिशाली कंप्यूटरों का व्यक्तिगत स्वामित्व अनावश्यक हो गया है। सभी प्रमुख एप्लीकेशन क्लाउड सेवाओं के रूप में उपलब्ध है और किसी उपयोगकर्ता को अब सॉफ्टवेयर की सीडी डीवीडी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ रही है। करोड़ों के प्रबंधन के मामले में राहत मिली है और ज्यादातर संगठन अब अपने पास महंगे हार्डवेयर रखने के बजाय क्लाउड प्लेटफॉर्म पर निर्भर है। इससे सुनिश्चित हुआ है कि प्रत्येक संगठन अपने पास बहुत सारे महंगे हार्ड में रखने जिनकी क्षमता का 100% उपयोग भी नहीं हो पाता था के बजाय सामान्य प्लेटफार्म का उपयोग करते हुए ही कचरे का उत्पादन रोकने और बिजली का उपयोग सीमित करने में योगदान कर रहे हैं। बेहतर कंप्यूटर और दिशा में शोध के हालिया रुझान के कारण हाल के वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमता जैसे तकनीकों में अचानक वृद्धि हुई है। कृत्रिम बुद्धिमता समस्याओं को हल करने में सक्षम है । जैसे ड्रोन का उपयोग करके आपदा प्रभावित क्षेत्रों में फंसे लोगों का पता लगाना और कुंभ मेले जैसे बड़ी और दीर्घकाल तक चलने वाली परिघटना का प्रबंधन करना आदि। इन सभी समाधान ओं के परिणाम स्वरूप सतत विकास सुनिश्चित करने में मदद मिलती है पहलीऔधोगिक की क्रांति के दौरान अस्तित्व में आने के बाद से ही स्वचालन का हमारे जीवन पर प्रभाव पड़ा है।
फॉक्स के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत के विनिर्माण क्षेत्र में प्रत्येक 10000 कर्मचारियों पर तीन अवधोगिक रोबोट है अब यह संख्या बढ़ने की संभावना है क्योंकि इनके लिए दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता होती है तथा अब उद्योगों का आधुनिकीकरण सुनिश्चित करने के लिए हमारे पास एक स्थिर सरकार है। औद्योगिक रोबोटों की संख्या कार्य क्षमता ऊंची होती है और उनकी मदद से बेहतर उत्पादन होता है इनसे पूजी बचाई जा सकती और कर्म गानों को कम श्रम गहन कार्यों पर लगाया जा सकता है। रोबोट और परिस्थितियों में भी काम करने में सक्षम होते हैं जो मानव के लिए उपयुक्त नहीं है। उद्धरण परमाणु संयंत्र में बड़ी संख्या में रोबोट किए जाते है। ताकि मानवीय क्षति को रोका जा सके रोबोट मानव जैसे चुटिया नहीं करते इसलिए ऐसी महत्वपूर्ण प्रणालियां रोबोट की देखभाल में ज्यादा सुरक्षित रहती हैं लेकिन इस अभी तक नहीं किया प्रगति आई कचरा पैदा करती है।
इसीलिए जब भी इनका कोई घटक अनुपयोगी हो जाने के कारण बदला जाए तो पर्यावरण पर उसके बुरे प्रभाव को रोकने के लिए उचित उपचार किया जाना चाहिए व्यक्तिगत कंप्यूटरों और स्मार्टफोन का चलन आम होने के बाद यह कचरा का प्रबंधन एक प्रमुख चिंता का विषय रहा है। वर्तमान में भारत में लगभग 25 करोड पर्सनल कंप्यूटर है कोई तीसिया फोन जब बेकार हो जाता है तो इसे सीधे आम तौर पर अन अपशिष्ट पदार्थों के साथ फेंक दिया जाता है। भारत में हर साल लगभग 2000000 टन ई-कचरा उत्पन्न होता है। 2018 मैं भारत में उत्पन्न कुल ई कचरे में से केवल 1.8% का उपचार किया जा गया था इसी कचरे में कोबाल्ट सिल्वर जैसी धातुओं तथा सिलिकॉन और जर्मेनियम जैसे अन्य तत्व होते हैं। जिनका का उपयोग दूसरे कंप्यूटर के निर्माण के लिए किया जा सकता है। इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से घटकों या कम कीमती सामग्रियों को निकालने की लागत इससे होने वाले मुनाफे की तुलना में काफी महंगा माना जाता है। इसलिए लोगों को लगता है कि इन सामग्रियों को निकालकर व्यवहार में संभव नहीं है और आमतौर पर फेंक दिया जाता है हालांकि यह सच नहीं है कि कचरा रीसाइक्लिंग व्यवसाय बहुत ही लाभदायक है और भारतीय बाजार में इसकी बड़ी संभावना। प्रौद्योगिकी केवल हमारे जीवन को आसान बनाने का उपकरण है और इसी बिंदु तक यह हमारे लिए वास्तव में उपयोगी है लेकिन अगर हम अपने ग्रह का दोहन बंद नहीं करते तो कोई भी प्रौद्योगिकी हमें कयामत से नहीं बचा सकती। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम प्रौद्योगिकी का विकास और उपयोग इस हाइट तो पूर्ण तरीके से करें कि इससे हमारी आने वाली पीढ़ियों को नुकसान ना हो।
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