google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical चेतावनी वेदों की प्रकृति के संरक्षण की

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चेतावनी वेदों की प्रकृति के संरक्षण की

जिस जल भाई परिवर्तन की समस्या से आज पूरा विश्व जूझ रहा है उसकी तरफ सतर्कता हमें हमारी पुराणों में बहुत पहले ही कर दिया था। परंतु मनुष्य की प्रगति इस बात को समझने में बहुत ही समय गवा दी। गीता में भगवान कृष्ण धरती के पास चार के स्थान पर आठ तक तो स्थान दिया है ।

भूमिरापोनलो वायुः खं मनो बुद्धि रेवच। अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।’’ (श्रीमद्भागवद् गीता अ- 7/4)
हमारी सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद में भी पर्यावरण से संबंधित सुत्तों की व्याख्या उपलब्ध है अथर्व वेद में तो पंच भूतों की प्राकृतिक विशेषताओं और उनकी क्रियाशीलता का विशेष वर्णन किया गया है।
यजुर्वेद में पृथ्वी को ऊर्जा देने वाली शायरी तथा धनसपदा देने वाली ब्रिटानिका कर प्रार्थना की गई है कि वह हमें साधनहीनता दीनता की व्यथा और पीड़ा से बचाए।
प्तायनी मेसि वित्तायनी मेस्यनतान्मा नाथितादवतान्मा व्यथितात्।’ (यजुर्वेद 5/9)
अथर्ववेद में तो बेटी को जीवन तत्वों के साथ समायोजन कर के जीवन की शक्ति प्रदान करने वाली कहा गया है और विश्व के समस्त जिओ का भरण पोषण करने वाली कहा गया है।
‘विश्वम्भरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतों निवेशनी’ - (अथर्ववेद 12/16
जब पृथ्वी की संपदा (वनस्पति औषधि खनिज अन्नआदि ) प्राप्त करने हेतु प्रयास करें तो प्रार्थना की गई है कि हमें कई गुना फल प्राप्त है परंतु चेतावनी चेतावनी भी दी गई है कि हमारे अनुसंधान और पृथ्वी को क्षत-विक्षत करने के कारण पृथ्वी के मर्म स्थलों को चोट ना पहुंचाएं अथर्ववेद में भी पृथ्वी से प्रार्थना की गई है
‘वतते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदति रोहतु। मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम।।’ - (अथर्ववेद 12/1/35)
अथर्व वेद के अनुसार पृथ्वी का हृदय बिंदु आकाश को माना जाता है जहां से उसको शक्ति मिलती है। पृथ्वी को गगन चारों तरफ से अपने आलिंगन में लपेटे रहता है इसी कारण जब हम पृथ्वी को क्षति पहुंचाते हैं तो आकाश के ओजोन परत को क्षति पहुंचती है और उसके हृदय में आघात पहुंचता है।
 जल को जीवन बायको जीवनदायिनी कहा गया है जलवायु के सुरक्षित रहने से ही हमारा पूरा पंच तत्व से बना हुआ शरीर हिस्ट पुष्ट और स्वस्थ रहता है। जब हम जल और वायु को दूषित करते हैं तो एक तरह से हम अपने शरीर की इच्छा थी करते हैं क्योंकि जो दूषित जल और वायु हमारे शरीर के अंदर प्रवेश करेगा वैसे ही हमारी दूषित मना स्थिति, दूषित मने स्थिति में दूषित विचार ही जन्म लेंगे। जब विचार ही दूषित होंगे तो हम कैसे किसी भी अच्छे कार्य को करने योग्य बनेंगे।
    पर्यावरण का सीधा सरल अर्थ प्रकृति का आवरण कहा गया है गया है कि "परितःआवरणम परायरणम "प्राणी जगत को चारों ओर से ढकने वाला प्रतीति तत्व जिनका हम प्रत्यक्ष। अप्रत्यक्ष , जाने अनजाने वो करते हैं तथा जिनसे हमारी भौतिक अध्यात्मिक मानसिक चेतना प्रभावित प्रभावित होती है
यह पर्यावरण भौतिक ,अध्यात्मिक ,और सांस्कृतिक तीन प्रकार का कहां गया है। स्थलीय जलीय मृदा खनिज आदि भौतिक पौधे जंतु सूक्ष्मजीव एवं मानव आदि जैविक ,एवं आर्थिक, सामाजिक ,राजनीतिक, आदि सांस्कृतिक तत्वों को परस्पर क्रियाशीलता से समग्र व पर्यावरण की रचना और प्रयोग परिवर्तनशील ता निर्धारित होती है। प्रकृति के पंचमहभूत छिति, जल ,पावक, गगन ,समीरा, भौतिक एवं जैविक पर्यावरण का निर्माण करते हैं। वेदों में मूलता इन पंचमहाभूता क ही देवी शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है।
    मानव कृत संस्कृति का निर्माण मानव मन बुद्धि एवं अहं से होता है। I वेदों में पर्यावरण से संबंधित अधिकतम  ऋचाय आयुर्वेद  से प्राप्त होती है । ऋग्वेद  में भी पर्यावरण से संबंधित सूत्र की व्याख्या उपलब्ध है।  अथर्व वेद में भी सभी पंचमहाभूत की प्राकृतिक विशेषताओं और उनकी क्रियाशीलता का विशद वर्णन है। आधुनिक विज्ञान की प्रकृति में उन रहस्य तक बहुत बाद में पहुंच सका है जिसे वैदिक ऋषि यों ने हजारों वर्ष पूर्व प्राप्त कर लिया था इतना ही नहीं भेजो ने प्राकृतिक तत्वों से अनावश्यक और अमर्यादित छेड़छाड़ करने के दुष्परिणामों की ओर भी संकेत किया था कि पर्यावरण संतुलन को नष्ट करने के दुष्परिणाम समस्त सृष्टि के लिए हानिकारक होंगे।
    इसके गंभीर घातक परिणाम हो सकते हैं आधुनिक उत्पादन और उपभोग योग अधिकतम धन अर्जन की तकनीक ने पृथ्वी के वनों पर्वतों को नष्ट कर दिया है खनिज पदार्थों को प्राप्त करने हेतु अमर्यादित विच्छेदन कर पृथ्वी के मर्म स्लों पर चोट पहुंचाने के कारण
 पृथ्वी से जल प्लावन और अग्नि प्रज्वलन धरती के जगह-जगह फटने और दरारें पड़ने के समाचार हमें प्राप्त होते रहते हैं
खानू के खनन करते समय इसी प्रकार के दुर्घटनाओं ने ना जाने कितने लोगों की जान ही ले ली अपितु क्षेत्रों में के संपूर्ण पर्यावरण का विनाश भी कर उसे बंजर बना दिया है। हाल ही में मेघालय किस संकरी लगभग 12 फुट गहरी खदान में अचानक पानी आ जाने से घटित घटना इस प्रकार की तमाम त्रास दिया जो प्रकृति के अतिक्रमण की दिखाई देती है। अथर्व वेद के अनुसार पृथ्वी का हृदय केंद्र बिंदु आकाश को माना गया है जहां से उसकी शक्ति मिलती है।
    वेदों में अग्नि (पावक) तत्व को सर्वाधिक शक्तिशाली एवं सर्व व्यापक माना गया है। उसे समस्त जड़ चेतन में उर्जा चेतना तथा गति प्रदान करने वाला एवं नव सृजन का उत्प्रेरक माना गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि" यस्ते अप्तु महिमा, यो वनेशु अवसाधीशु पशुश्वपस्वंत: । अग्रे सर्वा सत्यनव: संर्भस्य तभिन्र यहिद्रविनोदा अजस्त्र:।। हे अग्निदेव आपक महत्ता जल में
 औषधियों में वनस्पतियों में पशुओं प्राणियों में योग अंतरिक्ष में मेघों में  विद्यमान है । आप सभी रूप में पधारें एवं अक्षय द्रव्य प्रदान करने वाले हैं। यजुर्वेद के अनुसार यही अपनी धूलोक (अंतरिक्ष में भी उपर परम प्रकाश लोक ) मैं आदित्य (सूर्य)
रूप में सर्वोच्च भाग पर विद्यमान होकर जीवन का संचार कर के धरती का पालन करते हुए जल में जीवन शक्ति का संचार करती है।" अग्निमुर्धा दिवकुकुत्पति: पृथिवया अ यम । अपायरेता सी जिन्यवती।"।
  पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति एवं समस्त ग्रह नक्षत्र मंडल सहित पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के जिस तथ्य आधुनिक विज्ञान आज केवल लगभग 200 वर्ष पूरी समझ पाया है।
    वेदों सभी ऋषियों ने संपूर्ण ब्रह्मांड में सूर्य की केंद्रीय सत्ता को वैज्ञानिकता प्रदान की है जिसे आधुनिक विज्ञान अब समझ सकने में सक्षम हो पा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है "सूर्य आत्मा जगत्स्तशुसच्य _"(ऋगवेद 1/1/15/1 ,) अर्थात सुरेश अवस्थी की आत्मा  जन्मदाता है । सूर्य से पदार्थों को पूर्णता तथा ज्योतिष विज्ञान के अनुसार मानव के जन्म के समय सूर्य तथा उसके  आश्रित ग्रह की स्थिति से मानव को समस्त गुणसूत्र प्राप्त होते हैं। अथर्ववेद में सूर्य देव को समस्त सृष्टि का प्रादुर्भाव करता आलंबन करता एवं स्वामी माना गया है। सवा अंतरिक्षादयायत tasmandarikash जायत "अजुर्वेद (13/7/3) अर्थात सूर्य अंतरिक्ष से उत्पन्न हुए अंतरित उनसे उत्पन्न हुआ है। "तस्याम सर्वनक्छत्रा बशे चंद्रमास सह "(यजुर्वेद13/7/7) अर्थात चंद्रमा सहित समस्त नक्षत्र  उनके ही बस में है। विश्व सूर्यदेव, दिन-रात ,अंतरिक्ष, वासुदेव, धुलोक, दिशाओं ,  पृथ्वी ,अग्नि ,जल ऋचा,  एवं अग्नि जल से प्रकट हुए हैं। सभी के अंश गुण और अणु विद्यमान रहे हैं और रहेंगे इसीलिए सूर्य में यह समस्त पदार्थ एवं पंच भूत उत्पन्न हुए हैं। सूर्य ही एक ऐसे देव है जिनसे आकाश (नक्षत्र लोक ) जल एवं ऊर्जा ओम प्रकाश तथा कीर्ति एवं यश समस्त उपयोग उपभोग सामग्री वनस्पति औषधि इत्यादि सृष्टि को प्राप्त हुआ है।
  रूप में संपूर्ण पर्यावरण प्रकृति आवरण ही है जो विलक्षण देव शक्तियों से व्याप्त है । जिससे सृष्टि के समस्त जंगम एवं स्थावर , वह वनस्पति को चेतना ऊर्जा एवं पुष्टि प्राप्त होती है। धोसच्य म इदम पृथ्वी चातरीक्ष चमेव्यच्य:।अग्नि: सूर्य आपो मेधा विश्वेदेवास्च्य स ददु:।( अथर्वेद, 12/1/53) अर्थात धूलोक पृथ्वी ,अंतरिक्ष, अग्नि सूर्य जल एवं विश्व के समस्त देव ने सृष्टि को व्याप्त किया है इसीलिए आयुर्वेद में कहा गया है कि इन समस्त शक्तियों को ग्रहण करें एवं इन सभी शक्तियों के लिए भी सदैव कल्याणकारक रहे । पृथ्वी पृथ्वी वासी इन देवी शक्तियों को प्रदूषित ना करें । उधरमुख कुंड की भारतीय पृथ्वी अपने हृदय को मातृवत प्राणशक्ति संचार वायु, जल एवं वनस्पतियों से पूर्ण करें। वायुदेव दिव्य प्राण ऊर्जा से से संचालित करें पृथ्वी से अपनी दूषित उच्छवास कार्बन डाइऑक्साइड से उन्हें दूषित न करें। वर्तमान में अन्यथा की स्थिति कारण ही वायु की प्राण पोषक शक्ति ऑक्सीजन दूषित होकर सिस्टर के जीवन को दुष् प्रभावित करेंगे। इस पर्यावरण के जनक पंचमहाभूते से ही प्राणी मात्र को 5 ज्ञानेंद्रियां प्रभावित एवं चेतन होती है।इन पंचमहाभूत ओं के गुण ही हमारी ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से ज्ञान ज्ञान बुद्धि कौशल अहम अर्थात भौतिक जैविक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण करते हैं।
  आकाश का गुण शब्द वायू ,का गुण शब्द और स्पर्श तेज का गुण शब्द, सपर्श का रुप, और रस, समस्त उपरोक्त चारों गुणों सहित सुगंध गुण भी अर्थात समस्त गुणों का धारण करती है।
इसी कारण पृथ्वी के प्राणी कंचना भूतों के 5 गुणों को स्थापित करते हैं एवं उनसे प्रभावित भी होते हैं।
 अति आवश्यक है कि पृथ्वी वासी पर्यावरण को दूषित ना करें करें अन्यथा हमें उनसे दूषित अवगुण ही प्राप्त होंगे। वैदिक ऋषि यों द्वारा प्राप्त एक ऐसा सत्य है जिसकी  वर्तमान में हम अवहेलना कर पर्यावरण संतुलन को समाप्त करते जा रहा है। ऋषियों ने केवल पर्यावरण को प्रदूषित करने के मानव जीवन एवं सृष्टि पर पढ़ने वाले हानिकारक विनाशक परिणामों की ओर संकेत किया है अपितु पर्यावरण की रक्षा एवं हम जो कुछ प्रकृत देवो से प्राप्त कर रहे हैं उसे उन्हें लौटा कर पर्यावरण को प्रदूषित करने की अपेक्षा उसे संरक्षित एवं संबोत करने का भी आदेश दिया है।
 रिशु ने संपूर्ण प्राकृतिक शक्तियों को शांत करने व लोक कल्याणकारी बनाए रखने की प्रार्थना की है अथर्ववेद में उल्लेखित शांति सूक्त पर्यावरण रक्षण से अपरिमित महत्त्व है।

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः
पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः ।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः
सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
— यजुर्वेद 36:17 
 अर्थात अर्थात सभी के सुख शांति योग कल्याण के लिए वेदों में प्रार्थना की गई है फूलों पृथ्वी विस्तृत अंतरिक्ष लोग समुंद्र जल औषधियां के सभी उत्पन्न होने वाले अनिष्ट का निवारण कर के हमारे लिए सुखशंतिदायक हो । दिन के अर्थ अधिष्ठाता देव सूर्य रात्रि के अभिमानी देव वरुण palankatta Vishnu Praja palak Prajapati Vaibhav ke Swami Indra brihaspati aadi sabhi Dev shant hun AVN hamen Shanti pradan karne wale ho.

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