प्रकृति वैदिक ऋचाओं में एक झलक में
शाश्वतम्, प्रकृति-मानव-सङ्गतम्,
सङ्गतं खलु शाश्वतम्।
तत्त्व-सर्वं धारकं
सत्त्व-पालन-कारकं
वारि-वायु-व्योम-वह्नि-ज्या-गतम्।
शाश्वतम्, प्रकृति-मानव-सङ्गतम्।।(ध्रुवम्)
भावार्थ:
प्रकृति और मनुष्य के बीच का संबंध शाश्वत है।
रिश्ता शाश्वत है।
जल, वायु, आकाश के सभी तत्व,
अग्नि और पृथ्वी वास्तव में धारक हैं
और जीवों के पालनहार।
वैदिक काल खंड में हम प्रकृति के सानिध्य में अपना जीवन यापन करते थे। प्राकृतिक संसाधनों को अपनी धरोहर के रूप में उसका प्रयोग करते थे। प्राकृतिक संसाधनों को छोड़ बनाए रखने के लिए उसके संवर्धन एवं संरक्षण की पूरी व्यवस्था की गई थी। वैदिक काल खंड में प्राकृतिक संसाधनो से मिलने वाले वस्तुओं को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से जितनी आवश्यकता होती थी उतना ही उपयोग में लाया जाता था। वैदिक काल खंड में प्रकृति की हर रूप की पूजा होती थी शायद इसीलिए महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने वेदों की ओर लौटो का नारा दिया था। वेद ही हमारे सच्चे मार्गदर्शक है जो प्राकृतिक और मानवीय मूल्यों को सही दिशा निर्देश हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। हमारे जीवन जीने के सही तरीकों को और व्यवस्थित बनाने के लिए वेदों में बड़ी ही कर और गुण बातें कही गई हैं जैसे।
दश कूप समा वापी, दशवापी समोह्नद्रः।
दशह्नद समः पुत्रों, दशपुत्रो समो द्रमुः।।
भावार्थ:
एक पेड़ दस कुओं के बराबर,एक तालाब दस सीढ़ी के कुएं के बराबर, एक बेटा दस तालाब के बराबर, एक पेड़ दस बेटों के बराबर।
एक वृक्ष लगाने की तुलना 10 पुत्रों के बराबर की है अर्थात यदि हम एक धरा पर लगा देते हैं तो हमारे जन्म लिए हुए 10 पुत्रों के समान होंगे। हम सिर्फ मानव जीवन को ही जन्म देकर ही नहीं अपने धरा पर कर्तव्य को पूरा करेंगे अपितु हम प्राकृतिक संरक्षण संबंधित करके भी मानवीय मूल्यों को अपने जीवन में उतार सकते हैं। यदि हम अपने यदि हम अपने मानवीय मूल्यों को पूरा करने में सफल होते हैं तभी हम प्रकृति के हर रंग को मेरी बात समझ पाएंगे क्योंकि प्रकृति हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ी मूल रूप से धरोहर है और इस धरोहर को संजोकर एवं समाज पर रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है हम अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हो सकते। यदि हमने ऐसा किया तो आने वाली पीढ़ियां हम कभी माफ नहीं करेंगे क्योंकि यदि हम पृथ्वी का सारा जल, हवा में प्रदूषण, एवं मृदा को दूषित करके जाएंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियां किस हवा में सांस लेंगे और कौन से स्वस्थ अनाज से अपने जीवन यापन को सफल बनाएंगे इसलिए यह हमारे ऊपर दायित्व है कि हम उनके उनको उपयोग के साथ-साथ उनका संरक्षण और संवर्धन भी करें जैसा कि कहा गया है कि
सन्ति निरतं जीव-जगतां प्राण-दाने,
तरु-लतानां विविध-वर्गाः शं दधाने।
वन-गिरि-नदी-पशु-विहङ्गाः
रात्रि-दिन-ऋतु-शशि-पतङ्गाः,
सर्वमास्ते जन-हितार्थं संहतम्।
रक्षति प्रकृतिः सती
सौख्य-राशिं तन्वती
वन्य-सम्पद् रक्षणीया सन्ततम्।
शाश्वतम्, प्रकृति-मानव-सङ्गतम्।।
रिश्ता शाश्वत है
भावार्थ:
विभिन्न प्रकार के पेड़ और लता
हमेशा जीवन देने में व्यस्त
और कल्याण की पेशकश करने वाले मामलों में
चेतन प्राणियों की दुनिया के लिए।
जंगल, पहाड़, नदियाँ,
पशु और पक्षी, अगला
रातें, दिन, ऋतुएँ, चाँद और सूरज,
सब एक साथ लगे
लोगों की भलाई के लिए।
प्रकृति अच्छी तरह से रक्षा करती है
और सभी प्रकार के सुखों को प्रदान करता है।
तो सभी प्राणी जो धन हैं
वन क्षेत्र होना चाहिए
हमेशा ठीक से संरक्षित।
रिश्ता शाश्वत है प्रकृति
इसलिए आप सभी से प्रकृति भी ऐसी आशा करती है कि आप सभी उसका और उसके आने वाली पीढ़ियों के लिए और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए उसको संरक्षित एवं सुरक्षित करेंगे ।
स्वस्थ हवा में स्वस्थ मन का जन्म होता है स्वस्थ भोजन लेने से स्वस्थ शरीर का जन्म होता है। जब हमारा अगल बगल आसपास हमारा पर्यावरण सुखद और सुरक्षित रहेगा तो हमको सकारात्मक सोचने के लिए और किसी संसाधन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी परंतु यदि वह प्रदूषण युक्त रहेगा तो चाहते हुए भी हम कोई अच्छा विचार अपने मन में ला नहीं सकते । जैसे वैदिक मंत्रों से उसकी ध्वनि पूरा वायुमंडल पवित्र हो जाता है उसी तरह स्वस्थ पर्यावरण से पूरा वातावरण प्रफुल्लित हो जाता है। जैसे स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का विकास होता है उसी तरह से स्वस्थ आवरण से ही हमारी स्वस्थ व्यक्तित्व का विकास होगा हमारा प्रयास इतना ही होना चाहिए कि हम प्रकृति का उतना ही ख्याल रखें जितना की प्रकृति हमारा रखती हैं। प्रकृति ने हमारी सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने आपको हमेशा समर्पित किया है उसी तरह से हमें भी प्रकृति को सुरक्षित रखने के लिए समर्पण दिखाना होगा।
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