google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical आओ चले सनातन की ओर, जहा जीवन है अनमोल।

Ads

आओ चले सनातन की ओर, जहा जीवन है अनमोल।

तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥

मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी न करना, इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले।

     जीवन का संरक्षण जीवन का सच्चा धर्म का संरक्षण है, जो धर्म का संरक्षण करते हैं वही मानव जीवन के हितैसी होते हैं। मानव जीवन प्रकृति के सभी रूपो से मिलकर बना है ।जब हमारे में प्रकृति,और प्रकृति में हम है तो उसको अनदेखा कैसे कर सकते है,ये तो वही बात हो गई जैसे" पानी में रहकर मगर से बैर "।

स जीवति गुणा यस्य धर्मो यस्य जीवति ।
गुणधर्मविहीनो यो निष्फलं तस्य जीवितम् ॥

जो गुणवान है, धार्मिक है वही जीते हैं (या “जीये” कहे जाते हैं) । जो गुण और धर्म से रहित है उसका जीवन निष्फल है ।

  जैसे धर्म के अंदर मानवता का गुण समाहित है वैसे ही प्रकृति भी मानव जीवन की गुणवत्ता से भरने के लिए तत्पर हैं। हम जैसे भूल सकते है कि हमारा जीवन प्रकृति से उधार स्वरूप मिला है हमें उसे पुनः वापस करना है ।जिस जीवन में सारे गुण इन वातावरण की देन हो उसके मालिक हम कैसे , अगर हम उन गुणों को अनदेखा करते है तो हम विपत्ति को खुला निमंत्रण देते है ।

धर्मः कल्पतरुः मणिः विषहरः रत्नं च चिन्तामणिः
#धर्मः कामदुधा सदा सुखकरी संजीवनी चौषधीः ।


धर्मः कामघटः च कल्पलतिका विद्याकलानां खनिः
प्रेम्णैनं परमेण पालय ह्रदा नो चेत् वृथा जीवनम् ॥

धर्म कल्पतरु, विषहर मणि, चिंतामणि रत्न है । धर्म सदा सुख देनेवाली कामधेनु है, और संजीवनी औषधि है । धर्म कामघट, कल्पलता, विद्या और कला का खजाना है । इस लिए, तूं उस धर्म का प्रेम और आनंद से पालन कर, वर्ना तेरा जीवन व्यर्थ है ।

      धर्म परायण व्यक्ति ही सच्चा मनुष्य होता है क्योंकि जब हम धर्म के संरक्षण में रहते है तो हमारी संस्कृति हमारी धरा सब खुशहाल रहते है ।जैसे ही, हम अपने जीवन को गलत दिशा में ले जाते है वैसे ही हमे धर्म के साथ साथ प्रकृति का भी कोप सहना पड़ सकता है। क्योंकी समाज में गुनाह करने पर मानवीय जेल की रचना हुई है तो क्या मानवीय मूल्यों की गलती की कोई सजा नही ,ये भ्रम है हमारे उनकी भी कीमत चुकानी ही पड़ती है ।

  श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्।

आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत् ॥

धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ