- मानव स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालते हैं। सामान्य अवस्था की सामंजस्यता टूटने से मनुष्य पर्यावरण के दुष्प्रभावों से प्रभावित हो जाता है।
- सारभौम में जैविक पर्यावरण बहुत बड़ा अवयव है, जो कि मानवों के इर्द-गिर्द रहता है। यहाँ तक कि एक मानव हेतु दूसरा मानव भी पर्यावरण का एक भाग है। जीव-जंतु तथा वनस्पति इस घटक के मुख्य सहयोगी हैं। सामान्यतया मनुष्य इन जैविक अवयवों के साथ अंतसंबंध तथा सामंजस्यता बनाने की कोशिश करता है। जैविक पर्यावरण की समुचित जानकारी बीमारियों के निवारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- मनो-सामाजिक पर्यावरण मानव के सामाजिक संबंधों से प्रकट होता है। इसके अंतर्गत हम सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में ‘मानव’ व्यक्तित्व के विकास का अध्ययन करते हैं। मानव एक सामाजिक प्राणी है, उसे परिवार में माता-पिता तथा भाई-बहन आदि से संबंध बनाये रखना पड़ता है तो उसे समाज के अन्य वर्ग, पास-पड़ोसी, समुदाय, प्रदेश तथा राष्ट्र से भी संबंध बनाये रखना पड़ता है। ये सभी सामाजिक पर्यावरण की सीमा में आते हैं। सांस्कृतिक मूल्य, आदतें, विश्वास, धैर्य, शिक्षा, व्यवसाय, जीवन मानक तथा राजनीतिक स्थितियाँ आदि सभी मानव पर्यावरण के स्रोत हैं। मनुष्य सामाजिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण का उत्पाद है,जिसके द्वारा मानव आकार तैयार होता है। रहन-सहन,खान-पान, पहनावा-ओढ़ावा, बोल-चाल,सामाजिक मान्यताएं,मानव व्यक्तित्व का ढाँचा बनाती हैं, जिसका मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य से सीधा संबंध है।
पर्यावरण की आवश्यकता मानव जीवन के लिए
मानव एक सामाजिक प्राणी है, अतः उसका परिवार तथा समाज से घनिष्ठ संबंध होता है। पर्यावरण का अर्थ है-वातावरण। जिसमें संपूर्ण प्रकृति (नदियाँ, जलाशय, वन-उपवन, वाटिका, झरने, पर्वत श्रृंखलाएं, चट्टान, खनिज, पेड़-पौधे, वायु तथा जल का संयोग) आती हैं। मनुष्य पर्यावरण में ही जी रहा है, इसलिए शुद्ध पर्यावरण की अत्यंत जरूरत है। कक्षा में छात्र को विस्तृत पर्यावरण के बारे में ज्ञान नहीं कराया जाता है । अवलोकन,प्रायोजना तथा पर्यटन विज्ञान शिक्षण की ऐसी विधियाँ हैं, जो उसे अपने चारों तरफ की प्रकृति के रहस्य के बारे में अवगत कराती हैं।
प्रकृति का क्षेत्र विस्तृत है, जो कि पर्यावरण के साथ जुड़ा हुआ है। वह प्राकृतिक घटनाओं की जानकारी एवं उसके कारण ढूँढ़ता है। प्राकृतिक वन संपदा प्राथमिक स्तर पर एक मनोहर रूप पेश करती है। खेत, बगीचे, झरने, नदी, वाटिकाएं तथा विभिन्न जीव-जंतु आदि सभी इस पर्यावरण को सुंदर और स्वच्छ बनाते हैं।
बालक प्रकृति की गोद में जाकर प्राकृतिक दृश्यों का बोध करता है तथा निरीक्षण कर उन्हें समझ लेता है। आजकल प्राथमिक स्तर पर यूनिसेफ ने एक योजना पर्यावरणीय शिक्षा विद्यालयों में शुरू कर दी है। इसके द्वारा छात्रों को शिक्षण दिया जाता है, वह अपव्ययी नहीं है। प्राथमिक स्तर पर ही छात्रों को प्रकृति के रहस्य का बोध एक अन्वेषणकर्ता के रूप में करना चाहिए।
- भी बहुत ध्यान रखना चाहिए।
- पेड़ों का महत्व समझ कर हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाना चाहिए। घने वृक्ष वातावरण को शुद्ध रखते हैं और हमें छाया प्रदान करते हैं। घने वृक्ष पशु पक्षी का भी निवास स्थान है। इसीलिए हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए।
- पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगानी चाहिए।
- वाहनों का इस्तेमाल बेहद जरूरत के समय ही किया जाना चाहिए।
- दूषित और जहरीले पदार्थों को निपटाने के लिए सख्त कानून बनाने चाहिए।
- लोगों को पर्यावरण के महत्व को समझने के लिए जागरूकता फैलाने चाहिए।
हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की। यह पर्यावरण संतुलन के लिए ही बनाया गया एक उपक्रम है।
इस तरह हमें अपने पर्यावरण को बचाना चाहिए। लोगों को पर्यावरण का महत्व समझाना चाहिए। स्वच्छ पर्यावरण एक शांतिपूर्ण और स्वास्थ्य जीवन जीने के लिए बहुत आवश्यक है।
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