किसान :अटुट हिस्सा प्रकृति के साथ
भारत मे किसानों को भी अपनी फसल को मनचाहे ढंग से और मनचाही जगह पर बेचने का पुरा पुरा अधिकार है और इस अधिकार का उपयोग सब करे तो आपत्ति किस बात की है ।गुमराह करके भ्रमित करके अफवाह फैलाकर किसानों की मासूमियत का नाजायज फायदा उठाने से किसी का भला नही होने वाला है बस नुकसान ही होगा और वो भी किसानों के महत्वपूर्ण समय और सेहत का ।इसलिये किसान भाईयों से इतनी प्रार्थना है कि हम तो सदैव आपके ऋणी है हम क्यों आपका बुरा चाहेंगे ।आप तो हमारे सबसे बडे देशभक्त और निश्वार्थ भाव से अमीर गरीब ,छोटे बडे सबके अन्नदाता हो हम आपके साथ छल करेंगे तो हम खूद के साथ छल करेंगे इसलिये अपना ख्याल रखिये और भरोसे के साथ अपनी फसल के साथ न्याय करिऐ ।
जब हमनें माँ की गोद भी नही जानी थी तब हम इस धरती की गोद मे स्थान प्राप्त किया था अर्थात धरती ही हमारी प्रथम माता है उसके उपरांत जन्म देनेवाले माँ और प्रथम माँ को अपने पसीने से सीचने वाला है किसान ।जिसने ना सिर्फ अनाज उगाया बल्कि धरती के हर रुप को भी अपनाया अगर सुखा आया तो उस खेत मे खुद को तपाया और बाढ के साथ अपने अरमान भी बहाऐ परंतु धरती से प्यार तनिक भी कम नही हुआ ।पुरे वर्ष तन मन धन लगाकर जब अनाज पैदा किया और उसको देखकर सावन की बुदो की तरह उसका मन प्रफुल्लित हुआ तो अपनी उपज को लाखो लोगो के क्षुधा को भरने के लिए तैयार किया ।अब बारी आती है उस उपज को सही जगह और सही माध्यम से मन के मुताबिक बेचने को ताकि दुबारा से लोगो की थालियों तक अनाज पहुचाया जा सके तो उसपर भी विना बात की आपत्ति ।
भारत मे किसानों को भी अपनी फसल को मनचाहे ढंग से और मनचाही जगह पर बेचने का पुरा पुरा अधिकार है और इस अधिकार का उपयोग सब करे तो आपत्ति किस बात की है ।गुमराह करके भ्रमित करके अफवाह फैलाकर किसानों की मासूमियत का नाजायज फायदा उठाने से किसी का भला नही होने वाला है बस नुकसान ही होगा और वो भी किसानों के महत्वपूर्ण समय और सेहत का ।इसलिये किसान भाईयों से इतनी प्रार्थना है कि हम तो सदैव आपके ऋणी है हम क्यों आपका बुरा चाहेंगे ।आप तो हमारे सबसे बडे देशभक्त और निश्वार्थ भाव से अमीर गरीब ,छोटे बडे सबके अन्नदाता हो हम आपके साथ छल करेंगे तो हम खूद के साथ छल करेंगे इसलिये अपना ख्याल रखिये और भरोसे के साथ अपनी फसल के साथ न्याय करिऐ ।
हाल ही में मोदी सरकार ने कृषि और कृषि व्यापार से संबंधित दो बिल संसद के पटल पर रखे।
1. विधेयक संख्या 113-सी- "कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य(संवर्धन और सरलीकरण)विधेयक 2020"
दोनों ही विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा ध्वनिमत से पारित किये गये। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद दोनों विधेयक लागू हो जायेंगे। कई राजनैतिक दल विशेषकर कांग्रेस, एनसीपी, अकाली दल और समाजवादी आदि एवं कुछ किसान संगठन, इन विधेयकों का विरोध भी कर रहे हैं। हकीकत ये भी है कि अध्यादेश के रूप में ये दोंनों ही बिल आज की तारीख में भी कार्य कर रहे हैं।
सत्तारूढ़ बीजेपी इन बिलों को क्रांतिकारी एवं ऐतिहासिक बिल बता रही है। दोनों विधेयकों का, कृषि एवं किसानों की दशा और दिशा पर भविष्य में क्या प्रभाव होगा यह आकलन भी इतिहास और वर्तमान की तुलना करने पर ही हो सकता है। अतः क्यों न भारत के कृषि और व्यापार के इतिहास पर संक्षेप में नजर दौड़ायी जाये?
भारत की कृषि और व्यापार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि-
वैसे तो लगभग दो अरब वर्ष पूर्व जीवंत हुई वर्तमान प्रकृति में सदानीरा भारत भूमि सदा से कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में भी सर्वक्षेष्ठ रही है। जिस काल को आधुनिक काल में प्रागैतिहासिक काल कहते हैं, उस इतिहास को छोड़ भी दें तो भी विगत हजारों वर्षों से भारत में गांवों के खेतों और वनों में उत्पादित अनगिनत प्राकृतिक उत्पादों के प्रसंस्करण की उत्कृष्ट विधियों का भी चलन रहा है। इन समस्त कृषि उपजों के उत्पादन और उनमुक्त व्यापार(free trade) की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था में हर एक के लिये अवसरों की भरमार होती थी। अधिकांशतया घरेलू उद्योग( किसान और उससे संबंधित) के उत्पादक और व्यापारी और राजा के मध्य परस्पर विश्वास और अध्यात्मिक कारणों से एक प्रगाढ संबंध हुआ करता था। इसी कारण किसान व व्यापारी स्वेच्छा से राज्य निर्धारित करों का भुगतान अन्न, घी, तेल, पशु या राज्य की मुद्रा आदि के रूप में किया करते थे। गांवों व नगरों के चौधरी और श्रेष्ठी करों का संकलन करते थे। करों का भुगतान न कर पाने वालों की परेशानियों का समाधान राजा, श्रेष्ठी और चौधरी आदि मिलकर किया करते थे। कभी भी कैसी भी परिस्थिति(युद्ध आदि में भी) में राजा आदि द्वारा किसान की फसल को नष्ट करने का प्रयास नहीं होता था। हर पुराने गांव व छोटे बड़े नगरों में मौजूद मन्दिर, धर्मशाला, कुऐं, तालाब, बावड़ी आदि के निर्माण, राजाओं, श्रेष्ठियों, चौधरीयों और समाज के जिम्मेदार लोगों द्वारा किये गये। ये निर्माण अधिकतर प्राकृतिक आपदाओं( सुखे, बाढ़, अकाल और महामारी) से ग्रस्त प्रजा की सहायता के लिये ही किये जाते थे। आपदाकाल में तथा आपदा ग्रस्त लोगों के भोजन-भंडार(भंडारे) चलाये जाते थे।( कुछ बदले रूप में आज भी चलते हैं) ऐसी सामाजिक व्यवस्था के कारण ही भारत का वैश्विक बाजार पर आधिपत्य था।
मध्यकाल-
उपरोक्त कृषि आधारित सामाजिक व्यापारिक व्यवस्था में सर्वाधिक सेंधमारी सल्तनत काल में की गयी। विशेषकर अलाउद्दीन-खिलजी ने किसानों और व्यापारियों से कर-वसूली के सल्तनत के कारिंदे(कर्मचारी) नियुक्त किये। साथ ही बाजार पर नियंत्रण के लिये किसानों और व्यापारियों को केंद्रीकृत बाजारों में अपने उत्पाद बेचने को विवश किया जाने लगा। ताकि एक सीमित क्षेत्र में थोड़ी शक्ति से ही राजस्व वसूल किया जा सके। कहने का तात्पर्य यही की किसानों और व्यापारियों दोनों के शोषण की शुरूआत का काल था। प्रतिबंधों के कारण व्यापारियों के एक वर्ग में सत्ता का संरक्षण पाने की प्रवृत्ति पनपने लगी थी। मुगल-काल में भी कमोवेश यही व्यवस्था जारी रही। सत्ता का व्यापार पर नियंत्रण और व्यापार का केंद्रीकरण बढ़ता रहा। सत्ता और सत्ता के समर्थक व्यापारी कृषि उपजों का मूल्यनिर्धारण करने लगे।
अंग्रेजी शासनकाल-
रही सही कसर अंग्रेजों ने पूरी कर दी। इस्ट इंडिया कंपनी जिस राजा पर नियंत्रण करती उस राजा से व्यापार और राजस्व के अधिकार भी ले लेती। थोड़े से अंग्रेज सम्पूर्ण भारत के किसानों से तो राजस्व एकत्र नहीं कर सकते थे। सो उन्होंने बिचौलियों का नया वर्ग तैयार किया। किसानों और सत्ता के बीच में सत्ता समर्थक जागीरदार, जमींदारों का प्रवेश हो गया। जमींदार आदि किसानों से कर वसूली के लिये उन्हें अपनी उपज केंद्रीकृत बाजारों (मंडीयों) में लाने को विवश करने लगे। जहां उनकी फसल को राजस्व के बकाये की वसूली के लिये, नीलाम किया जाने लगा। नीलामी का काम कमीशन एजेंट(कंपनी व जमींदारों के) करने लगे।
आजादी के बाद-
आजादी के बाद भारत की सत्ता जिन हाथों में रही वे थे भारतीय ही, परन्तु उनकी शिक्षा तो अंग्रेज़ी पद्धति से ही हुई थी। तत्कालीन सत्ता ने बाजार की व्यवस्था को न बदलकर, जो समाजवादी दृष्टिकोण अपनाया वह न तो अमेरिका आदि की तरह पूंजीवादी था और न ही रूस की साम्यवादी। उन्होंने पूंजीवाद को लाइसेंस-परमिट के नियमों से प्रतिबंधित कर किसान और व्यापार को और अधिक नियंत्रित करने का प्रयास किया।
धीरे-धीरे मंडी अधिनयमों के तहत संपूर्ण कृषि संबंधी व्यापार को मंडियों के अधीन कर दिया गया।
हालांकि मध्यकाल और अंग्रेजीराज तक तथा बाद में अभी तक भी एक समानांतर सीधी व्यापार व्यवस्था भी चलती रही। परन्तु वह सब या तो चोरी-छिपे होती या सत्ता के कर्मचारियों को रिश्वत देकर। इस प्रकार नरसिम्हाराव सरकार के काल में विश्व मुक्त व्यापार समझौते से जुड़कर भी भारत की कृषि व कृषि व्यापार नियंत्रण में ही रहा। नियंत्रण और संरक्षणवाद के कारण कुछ फसलों के मूल्य निर्धारण की परम्परा बनी रही। जिसने फसलों के विविधीकरण में भी बाधा डाली। अर्थात किसान उन फसलों को बोने में ही अपना हित समझने लगे जिन्हें बोने में बाजार में अपेक्षाकृत अधिक मूल्य मिलने की गारंटी हो। फलस्वरूप गेंहूं, धान, चीनी, आदि का देश में अंबार लगने लगा, वहीं दलहन, तिलहन जैसी आवश्यक फसलों का देश को आयात करने की जरूरत पड़ने लगी।
नियंत्रण नीति के देश की सम्पूर्ण व्यवस्था पर पड़ने वाले कुछ ऐसे ही कुप्रभाव आगे लिखे गये हैं-
1. सामाजिक समरसता का अभाव- भारत के कृषक और व्यापारी एक ही वर्ण(वैश्य) का एवं एक दूसरे कआ पूरक होते हुये भी दो विपरीत वर्ग हो गये। वो भी एक दूसरे से घृणा के स्तर तक भाव रखते हैं। कमीशन खोरी और स्वलाभ की प्रवृत्ति ने दोनों को ही अवसरवादी बना छोड़ा है, सामाजिक हित व प्रेम तिरोहित हो गये।
2. स्वतन्त्रता और समानता- कहने को तो देश 1947 में आजाद हो गया था। संविधान ने अवसर की समानता की घोषणा भी कर दी।
पर किस मामले में?
केवल एक दूसरे को गालीयां देने में?
या फिर केवल कुछ चुनींदा लोगों को शोषण का अवसर देने में?
कुछ लोग बड़े मगर मच्छों में परिवर्तित हो गये जो छोटी मछलियों को निगलने में लगे हैं।
जब स्वतन्त्रता और समानता से व्यापार करने का अवसर ही नहीं है। कृषि उपजों के सामान्य व्यापार में सरकारी नियमों के अनावश्यक हस्तक्षेप है। इन सबके कारण जब किसान अपनी कृषि उपज स्वतन्त्रता से बेच नहीं सकते, सामान्य व्यापारी खरीद नहीं पाते। व्यापार में लाभ ही नहीं तब कृषि, किसान, और साथ-साथ उपभोक्ता को भी शोषण का ही सामना करना पड़ रहा है। सारा लाभ बिचौलिये या बड़े मगरमच्छ हड़प रहे हैं जो किसान से बिना सौदा किये मनचाहे मूल्य पर कृषि उपज लेते हैं और उपभोक्ता को मनचाहे मूल्य पर बेचते आ रहे हैं। अतः केवल कुछ को छोड़कर, न तो कोई स्वतन्त्र है और ना ही समान होने का दावा करता है।
3.चोरी की प्रवृत्ति- व्यापार पर नियंत्रणों के कारण, कर आदि की चोरी करना, सरकारी कर्मचारीयों को काम निकलवाने के लिये रिश्वत देना आम बात हो गयी है। यह जानते हुये भी राज्य के कर, अंततः राज्य के हित में ही खर्च होते हैं फिर भी देश का लगभग हर व्यक्ति स्वभाव से कच्चे पर्चे अर्थात बिना टेक्स वाले बिलों से व्यवहार करने में सुख का अनुभव करता है। अंतर आप खुद ही देख लीजिये कहां तो भारत के किसान और व्यापारी स्वेच्छा से राज्य कर देना अपना धर्म समझते थे। आज टेक्स बचाने के तरीकों का प्रचार होता है।
4. अर्थव्यवस्था- जिस कृषि के कारण भारत विश्व के एक, चौथाई व्यापार पर अपना अधिकार रखता था। जिस कृषि में आज भी भारत की लगभग पचपन प्रतिशत जनता लगी हुई है। लगभग आधे व्यापारी जिस कृषि के उत्पादों का ही व्यापार किसी न किसी रूप में कर रहे हैं। जो कृषि क्षेत्र आज भी सबसे ज्यादा रोजगार है। उस कृषि क्षेत्र का भारत की अर्थव्यवस्था में मात्र सत्रह-अठारह प्रतिशत ही है। अजीब विड़म्बना है। जबकि कृषि क्षेत्र का भारत की अर्थव्यवस्था में कम से कम पचपन या साठ प्रतिशत भाग तो होना ही चाहिये। कारण स्पष्ट है कि जो व्यवसाय जीवन का आधारभूत है जो प्राकृतिक व स्थायी(प्रलय काल तक) है। वह कृषि इतनी कम महत्वपूर्ण कैसे हो सकती है। वैसे वर्तमान में यह इसलिये भी अर्थव्यवस्था में कम भाग रखता है कि भले ही कृषि व्यापार पर मंडी समितियां कर वसूल करती हों पर वहां भी कर चोरी (अनुमानतः आधे से अधिक) होने और मंड़ी समितियों के वास्तविक संज्ञान में(चोरी छिपे सीधा व्यापार) आये बिना जो व्यापार होता है। यदि वह सब भी अर्थव्यवस्था में वास्तविक रूप से जुड़ने लगे तो आज भी कृषि क्षेत्र, कुल अर्थव्यवस्था में लगभग चालीस प्रतिशत वास्तविक भाग रखता है।
कृषि क्षेत्र व व्यापार पर नियंत्रण और प्रतिबंधों के उपरोक्त चार कुप्रभावों में से पहले दोनों सामाजिक समरसता एवं स्वतंत्रता समानता को भी छोड़ दें तो बाद के दोनों कुप्रभावों से हर कोई परिचित है। राजनीतिक दलों से लेकर आम जनता तक सभी जानते हैं कि दो नम्बर के काम कितने बड़े पैमाने पर होते हैं। इस तथ्य को सार्वजनिक करने में वोट बैंक की मजबूरी, राजनीतिक दलों की हो सकती है हमारी नहीं। हां वर्तमान सरकार ने उपरोक्त सभी विषयों को ध्यान में रखते हुये उपरलिखित दोनों कृषि विधेयक पास किये हैं। उनके किसान और कृषि व्यापार सहित पूरे भारतीय समाज पर जो प्रभाव पड़ने वाला है मैंने उस पर अपना आकलन आगे लिखा है-
विधेयक संख्या 113सी-"कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य(संवर्धन और सरलीकरण)विधेयक 2020" का प्रभाव-
1. स्वतंत्रता और समानता का अनुभव-
बहुत लंबे समय( लगभग एक हजार वर्षों ) से धीरे-धीरे प्रतिबंधों में रहने और जीने के आदी हो चुके किसान और उसके उत्पादों के व्यापार से जुड़े हुये व्यापारी अब जाकर वास्तव में स्वतन्त्र हुये हैं। कृषि और व्यापार में आने वाले वाले समय में जुडने वाले किसान और व्यापारियों को तो शायद अहसास भी न हो कि देश की आजादी के बहत्तर वर्ष बाद इन वर्गों को खुले में सांस लेने और समान व्यवहार करने का अवसर मिला है।
2. चोरी की प्रवृति पर प्रभाव-
विधेयक सं.113 सी का स्पष्ट प्रभाव यह भी है कि एक झटके में सभी किसान और व्यापारी प्रतिबंधों से मुक्त होकर कर चोरी करने वाले समुदाय के लेबल से भी मुक्त हो गये हैं। प्रतिबंधों के काल में, सत्ता से चोरी छिपे व्यापार करने(किसान द्वारा अपना माल बेचने और व्यापारी द्वारा खरीदने) में भ्रष्टाचार करने के बाद भी जो मानसिक और शारिरिक पीड़ा झेलनी पडती आ रही है उसे भुक्तभोगी जानते हैं। इस पीड़ा से मुक्ति मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। इसमें कोई संदेह नहीं। सरकार को करन
3. आर्थिक प्रभाव-
चोरी छिपे किये गये व्यापार में, जाहिर है कि विक्रेता को कम कीमत पर संतोष करना पड़ता है। वहीं क्रेता को भी व्यापार करने में तिकड़मों का सहारा लेना पड़ता है। अतः प्रतिबंध रहित क्रय-विक्रय होने से किसान को भी आर्थिक लाभ होगा, और व्यापारी भी रिश्वत आदि के अवैध लेन-देन से बच जायेंगे। व्यापार में से बिचौलिये निकल जाने से बहुत संभव है कि किसान से उपज के खरीद मूल्य और उपभोक्ता के खरीद मूल्य में कई बार दोगुने से चार गुने तक अन्तर होता था वह अन्तर कम हो जायेगा। इसका लाभ भी किसान और उपभोक्ता दोनों को ही मिलने लगेगा। क्योंकि अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांत "मांग और आपूर्ति" के आधार पर कृषि उत्पादों के मूल्य स्वयं निर्धारित होते रहेंगे। भावों के अधिक उपर जाने को सरकार अपने आपात स्टाक से करती रहेंगी। क्योंकि फसलों की सरकारी खरीद जारी रहने वाली है।
थोक के भाव में होने वाली कर चोरी पर ब्रेक लगेगा। कृषि उपजों पर सरकार को मिलने वाले राजस्व में, मेरे विचार से पंद्रह से बीस प्रतिशत की वृद्धि होगी। इस वृद्धि में लगभग दस प्रतिशत भाग तो दस हजार किसान उत्पादक कंपनियां का होगा। यानि देश के कुल किसानों में से दस प्रतिशत। इन कंपनियों को सरकार की देखरेख में पूरे देश में बनाने की प्रक्रिया चल रही है। बाकी किसानों में पांच से दस प्रतिशत उन किसानों का जो खुले बाजार में अपनी फसल बेचने वालों में बढ़ेंगे।
वैसे तो सरकार की योजना कृषि आधारित सूक्ष्म और लघु उद्योंगों में उल्लेखनीय वृद्धि कराने की है। जिनको सरकार प्रोत्साहन देने पर कार्य कर रही है। परन्तु विधेयक संख्या 112, "कृषक(सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020" के प्रावधानों से भारत के कृषि क्षेत्र में, अंतरराष्ट्रीय बाजार के बड़े खिलाड़ियों के घुसने की संभावना भी बन रही है। यद्यपि भारतीय परिस्थितियों में कृषि क्षेत्र में किसी के एकाधिकार की गुंजाईश कम ही है। परन्तु जैसे भारत के टेलीकॉम सेक्टर में आज मुख्य रूप से तीन कंपनीयों का वर्चस्व है। यदि भविष्य में ऐसी स्थिति कृषि क्षेत्र में भी बनी तब पूरे भारत के उपर संकट भी होगा, इसमें भी संदेह नहीं।
ऐसी स्थितियों से बचने के लिये किसानों, भारत के व्यापारियों एवं उपभोक्ताओं, सभी को, "लोकल के लिये वोकल होना" की आदत ड़ाल लेना ही श्रेयस्कर होगा।
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