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ऋतुचार्या के अनुसार हमारा आहार

ऋतुचार्या के अनुसार हमारा आहार (Our diet according to Ritucharya  )

ऋतु के अनुसार भोजन करना ही ऋतुचार्य है। ऋतुचार्य से तात्पर्य या परिवर्तन के फल स्वरुप शरीर की वह आंतरिक कार्य प्रणाली में आए परिवर्तन के अनुसार अपने आहार बिहार में परिवर्तन लाना।  शारीरिक स्वास्थ्य की जिससे यह बहुत आवश्यक है। ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ हमारी शारीरिक स्थिति में ही नहीं मानसिक चिंतन में भी विचारों में भी बदलाव हो जाता है।जो लोग ऋतु के परिवर्तन के साथ-साथ अपने खान-पान और रहन-सहन में परिवर्तन नहीं लाते वे अनेकों रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। अतः ऋतु के साथ आहार बिहार का संतुलन बनाए रखना स्वस्थ और निरोग रहने के लिए आवश्यक हैं  ।
  
  आयुर्वेद के अनुसार वात पित्त और कफ यदि शांत अवस्था में हो तो धातु माने जाते हैं ।जब यह तीनों शांत स्वाभाविक अवस्था में होते हैं ।तब शरीर को धारण करने वाले होते हैं। जब यह कुपित अवस्था में होते हैं ।तब शरीर को दूषित करने वाले हो जाते हैं ।अतः दोष कहे जाते हैं ऋतुचार्य की महत्व व उपयोगिता यही है कि वह इन धातुओं को दूषित न होने दे यदि ऋतु प्रभाव और आहार बिहार के कारण दूषित हो जाए तो इसका शमन करने का उपाय करना चाहिए।

  ऋतु के अनुसार भोजन करने की एक सीधी-सादी विधि यह है कि जिस ऋतु में जो खाद्य पदार्थ उत्पन्न होते हैं यथाशक्ति उन्हीं का प्रयोग किया जाए मौसमी फल ,साक,अनाज उचित मात्रा में सदैव हितकर होते हैं जो लोग आदत से लाचार होकर खास तरह के भोजनों पर जोर देते हैं और ताज पदार्थ नहीं मिलता तो उसे आचार्य मुरब्बा आदि के रूप में खाते हैं या कृत्रिम रूप में ङब्बो में बंद भोज्य पदार्थों का सेवन करते हैं वह अवश्य अपने स्वास्थ्य को निर्बल बनाते हैं और सदैव डॉक्टरों तथा वेदों के आश्रित बने रहते 
हैं।

    विशेषताओं के अनुसार 6 ऋतुओं को दो कालों में बांटा गया है एक आदान काल दूसरा विसगृ कॉल आदान काल में शिशिर बसंत और ग्रीष्म ऋतु में सम्मिलित है जबकि: कल में वर्षा शरद और हेमंत ऋतु की संभावना की जाती है चारों ओर शुष्कता आदान काल में प्रकृति में तथा शरीर में रूखापन बढ़ जाता है ।

शिशिर ऋतु :-

 आहार इस ऋतु में कड़वे कसैले,चटपटे ,वात कुपित करने वाले रुखे और बासी पदार्थ का सेवन न करके मधुर चिकनाई युक्त पौष्टिक तत्वों वाले पदार्थ एवं मौसमी फल, साग ,सब्जी, आदि का सेवन करना चाहिए ।भोज्य पदार्थ में दूध ,घी, मक्खन, मिश्री ,शहद, सुखे मेवे,दूध ,चावल, या दूध उड़द की खीर, मूंगफली, चना, गुड़, केसर ,जावित्री, केले ,गाजर ,अंजीर, अखरोट,लाल पका लाल टमाटर ,शलजम, चुकंदर, लहसुन ,उड़द की छिलका सहित दाल ,चने की दाल ,हरी साग सब्जियां, अपने आहार में यथाशक्ति शामिल करना चाहिए। पौष्टिक एवं बलवीर वर्धन कच्ची औषधीय में अश्वगंधा, विधारा सफेद मूसली, कौंच के शुद्ध किए हुए बीज, मुलहटी ,शतावरी, ताल मखाना, अकरकर ,गोखरू ,आवाला ,आदि यथा विधि सेवन करना चाहिए ।रात को सोने से पहले एक गिलास मीठी और गुनगुने गर्म दूध में यथोचित मात्रा में शुद्ध घी डालकर घुट घुट कर पीना चाहिए ।शाम का भोजन सोने से दो-तीन घंटे पहले कर लेना चाहिए। गुड, मूंगफली की पट्टी ,तिल गुड़ के लड्डू या रात को पानी में भिगोए हुए चने प्रातःकालीन में खूब चबा-चबा कर खाना चाहिए चनों को तवे या पर लगी से थोड़ा सीख कर ले नमक जीरा बुराक ले तो यह स्वादिष्ट लगेंगे। 

शरीर की स्वास्थ्य के साथ फिटनेस पर भी विचार:-

इसके लिए नियमित रूप से व्यायाम ,मालिश और परिश्रम के कार्य आदि करने पूरे वर्ष में शीत ऋतु का समय सर्वाधिक अनुकूल होता है यूं तो पूरे वर्ष भर हल्के-फुल्के व्यायाम खेल को दौड़ या अन्य परिश्रम के काम करने ही चाहिए ताकि शरीर स्वस्थ बना रहे लेकिन शीतकाल में तो उनको करना ही चाहिए शीतकाल शुरू होते ही धीरे-धीरे इनकी मात्रा बढ़ा लेनी चाहिए और शीतकाल समाप्त होने से पहले धीरे-धीरे काम करके सामान्य मात्रा पर लौट आना चाहिए।

बसंत ऋतु:-

बसंत ऋतु में कफ कुपित करने वाले पदार्थ जैसे खटाई चिकनी और देर से बचने वाले भारी पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए आहार में छिलके वाली मूंग की दाल, हरी साग सब्जी ,मौसमी फल, ताजी, चपाती ,सूप, अदरक ,शहद, करेला, गाजर, परवल, वाला आदि का सेवन करना चाहिए चैत्र मास में जब नीम की नई कोपले उपलब्ध हो तब प्रतिदिन सुबह वाइस सेवन के लिए जाते समय 10:20 को प्ले और दो-तीन काली मिर्च खूब चबा चबाकर महीन करके निकाल लेना चाहिए प्रयोग 15 20 दिन तक लेना काफी है।

ग्रीष्म ऋतु:-

इस ऋतु में ऐसा आहार लेना चाहिए ।जो शरीर में खुशी और गर्मी बढ़ने वाला ना हो बल्कि तरावत और निकिता लाने वाला हो अर्थात इस ग्रीष्म काल में मधुर रस युक्त तथा ठंडा तासीर वाले द्रव्य तरल पदार्थ चिकनाई वाले द्रव्यों का सेवन नहीं करना चाहिए ।ताकि शरीर में ठंडक और तरावत बनी रहे ग्रीष्म काल में सख्त जरूरत होती है ।तरावट वाले फलों और दूसरों की दूध ,चावल, खीर, दूध की चावल का मीठा भात, सत्तू का घौल,आदि का सेवन हितकारी रहता है ।ग्रीष्म ऋतु में मीठे हल्के चिकनी शीतल और सुपाच्य का ही सेवन करना चाहिए। ऐसे आहार द्रव्यों में ताजी चपाती के साथ-साथ सब्जी में चने की भाजी,चौरई ,बथुआ, परवल ,पक्के लाल टमाटर ,छिलका सहित मूंग की दाल, और मसूर की दाल का सेवन करना चाहिए ।चने और अरहर की दाल खाएं तो चावल के साथ खाएं या एक दो चम्मच शुद्ध घी डालकर खाना चाहिए ताकि इन दलों की खुश्की दूर हो जाए। फलों में मौसम फलों का सेवन करें दही का सेवन पानी मिलाकर करें सिर्फ घर में जमाया हुए दही खाना चाहिए अच्छा होता है और निरापद रहता है अन्य पदार्थों में सिंघाड़ा ,प्याज, नींबू ,हरा धनिया ,पुदीना, कच्चे आम को भूलकर बनाया  पना, मीठा बना नींबू की मीठी शिकंजी ,ठंडाई, नमकीन पतला सत्तू ,गुलकंद ,आगरा का पेठा ,दूध ,पानी की मीठी लस्सी आदि सेवन योग्य है।


वर्षा ऋतु;-

अपनी पाचन शक्ति को ध्यान में रखकर हल्का और जल्दी बचाने वाला आहार लेना चाहिए इस ऋतु में सबसे ज्यादा जरूरी है शाम का भजन जितनी जल्दी कर लिया जाए पचने में उतने ही आसानी होती है वर्षा ऋतु में स्वास्थ्य की रक्षा करने और स्वस्थ रहने का एक ही मूल मंत्र है कि पेट और शरीर को स्वच्छ रखा जाए अर्थात पेट में अपच और कब्ज की स्थिति न बनने दी जाए तब और त्वचा साफ रखी जाए तो कई बीमारियों से बचा जा सकता है वर्षा.के दिनों में बात कुपित करने वाले खट्टे, तेज मिर्च मसाले वाले ,तले हुए ,बेसन से बने हुए और बासी पदार्थ का सेवन न करें ।क्योंकि के सेवन से यदि अपच हुआ तो बात और पित्त का प्रकोप होगा वर्षा काल में प्राकृतिक रूप से बात का प्रारूप रहता है इसलिए हमें आहार में ऐसे पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए जो वातऔर पित्त को बढ़ाते हो।
वर्षा ऋतु में खास तौर पर तीन मौसमी खाद्य पदार्थ उपलब्ध होते आम जामुन और मक्का इस ऋतु में उचित मात्रा और विधि के अनुसार इन तीनों का सेवन करना शरीर और स्वास्थ्य के लिए बहुत गुणकारी होता है। प्रतिदिन रस वाले मीठे चार-पांच आम भोजन के साथ कस कर खाना चाहिए। यदि आम का रस निकालकर पीना हो तो भोजन के साथ एक कप रस पीना पर्याप्त है ।आम रस मीठे आमों का ही होना चाहिए ।दूध पीने से आम जल्दी अजब हो जाता है मक्का बहुत पौष्टिक खदान है ।इसमें पाए जाने वाला वोट नामक तत्व गेहूं से भी श्रेष्ठ माना जाता है इसे कम मात्रा में ही खाना चाहिए पर पौष्टिक होने का के कारण खाना जरूरी चाहिए ।मक्का से कर खा जा सकते हैं या इनको कुटकर स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर भी खाया जा सकता है।
  छाछ पीने से भुट्टे जल्दी आजा मर जाते हैं जामुन कफ पित्त और रुधिर विकास तथा जलन का सामान करती है ।इसकी गुठली का चूर्ण मधुमेह के रोगियों के लिए कार्य होता है रुचि अनुसार मात्रा में वर्षा काल में जामुन खाना चाहिए।

   शीत ऋतु;-

हमारा आहार  मौसम के अनुसार होना चाहिए हमारा शरीर पांच तत्व अग्नि वायु जल पृथ्वी और आकाश से बना है अग्नि अन्य को बचाती है और हमारे शरीर को अपने तेज से तेजस्वी को गर्म रखती है शरीर की अग्नि का स्वभाव है कि वह पहले आहार रूपी ईंधन को जलाती है वह बचाती है जैसे चूल्हे पर चढ़े हुए पत्र में रखे पदार्थ को चूल्हे की अग्नि पकाती है आहार के स्वभाव में या आहार को पचाने के पक्ष या दोषो बचाती है और दोषो को पचाने या दौषोके अभाव में या शरीर की धातुओं को और धातुओं का भाव होने पर प्राणों को ही बचा जाती है इसीलिए जिन्हें उचित मात्रा महान नहीं मिलता अग्नि की भीषण तेजी से उनके शरीर की धातु में जल करती है और अंत में प्राणों का नाश होने पर भी मृत्यु के मुख में चले जाते हैं


  पता जब अच्छी शीत  पङने लगे हमें अपने आहार ऐसे पदार्थों को शामिल कर लेना चाहिए। जो चिकनाई वाले हो मधुर लवण और अमल कर पौष्टिक और शरीर को बल प्रदान करने वाले गुण रखते हो ।जैसे दूध, घी ,मक्खन, उड़द की दाल ,खीर ,मिश्री, रबड़ी ,माथा तिल ,हरी साग सब्जी ,मेथी, अदरक, सोठ, अंजीर ,लहसुन ,गाजर,  शहद, गुड़ आदि घरेलू पदार्थ रात को सोते समय भोजन के ढाई तीन घंटे बाद ठंडे किए दूध में शहर को उचित मात्रा में डालकर पूरे शीतकाल में पीना चाहिए लहसुन की चार-पांच कलियां चलकर यूं ही पानी के साथ खानी चाहिए या उन्हें दूध में उबाल कर सोते समय भी पीना चाहिए घी में तलकर भी खा सकते हैं दूध वह शहर जहां शरीर को मशाल वह सुडौल बनाते हैं वहां लहसुन वाट का सामान करता है बात व्यक्तियों को व्याधियों को दूर करता है और हृदय को बोल देता है यह दोनों प्रयोग इस शीतकाल में बहुत गुणकारी होते हैं


  

  अच्छा पौष्टिक और गुदकारी आहार लेना जितना जरूरी है उतना ही उचित श्रम एवं व्यायाम करना भी आवश्यक है ताकि शरीर फुर्तीला बलवान और निरोग बना रह सके ।






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