शरीर में ताकत लाने के लिए कौन कौन सी 7 जड़ी बूटियां?
दैनिक उपयोग में आने वाली चीजों में आने ऐसी चीजों का सेवन कर लेते हैं जो अनावश्यक होती है। health and fitness बस मन में विचार आता है कि आज के लिए कर लिए फिर दोबारा नहीं करना है परंतु वही आज का किया हुआ हमें कब उसका उल्टा पुल्टा मिलेगा यह हमें समझ नहीं आता। पुराने समय में अनेक ऐसे चमत्कारी जड़ी बूटियां हुआ करती थी दिन का प्रयोग करके ले अपने स्वास्थ्य में सुधार लाते थे। आयुर्वेद में आज भी उन जड़ी बूटियों का चलन है और उसका प्रयोग होता है। आइए जानते हैं कुछ ऐसी ही जड़ी बूटियों के बारे में।
1=अतीस (ACOUNITUMHATEROPHYLUM)
इसका प्रचलित नाम अतीस यह पौधे हिमाचल में कुमाऊं से हसोरा तक ,शिमला और उसके आसपास तथा चंबा में बहुत होते हैं। यह पहाड़ी जड़ी बूटी की श्रेणी में आता है तथा पहाड़ के लोग सरलता से इसकी पहचान कर लेते हैं।
इसका पौधा एक से 3 फुट तक ऊंचा होता है इसकी डंडी सीधी और पत्तेदार होती है इसके पत्ते 2 से 4 इंच तक चौड़ी और नुकीले होते हैं। यह पोस्ट एक या डेढ़ इंच लंबे चमकदार मिले या पीले कुछ हरे रंग के बैगनी धारी वाले होते हैं। इसके बीज चिकनी छाल वाले और नोकदार होते हैं। इसके नीचे डेढ़ 2 इंच लंबा और प्रायर आधा इंच मोटा कंद निकलता है। इसका आकार हाथी के सूर्य के समान होता है जो ऊपर से मोटा और नीचे की ओर से पतला होता चला जाता है।
आयुर्वेद में इसकी उपयोगिता
आतिश गर्म ,शर्करा, कड़वा ,पाचक, जठराग्नि को शांत करने वाला ,तथा कफ, अतिसार ,वात, विष, खांसी ,और कृमि रोग को नष्ट करने वाला है। पीत ज्वर आमातिसार झांसी जहर त्रिशा क्रीमी बवासीर पीने पित्तोदर व्याधियों को नष्ट करने वाला है।
आयुर्वेद में बुखार होने पर वैद स्कोर सेवन करने का सुझाव देते हैं।
यूनानी चिकित्सा पद्धति में:-
यह काबीज और अमाशय के लिए हानिकारक है। इसके अतिरिक्त एक कामोद्दीपक क्षुधा वर्धक ज्वर प्रतिरोधक कफ तथा पित्तजन विकारों को नाश करने वाला तथा बवासीर जलोदर बमन और अतिसार में लाभ करने वाला है।
इसके औषधीय गुण;-
- जोर आने से पहले इसकी दो मांसे की फंकी 4-4 घंटे के अंतर से देने से जोर उतर जाता है।
- विषम ज्वर जोड़ी बुखार पाली बुखार में इसके चूर्ण को छोटी इलायची और वंशलोचन के चूर्ण में मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है।
- इसके छोड़ो में बायडिंग का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से कृमि रोग दूर होता है।
- अकेली अतीश को पीसकर शीशी में भरकर रखना चाहिए। बालकों के तमाम रोगों के ऊपर इसका व्यवहार करना चाहिए। इससे बहुत लाभ होता है बालक की उम्र को देखकर 1:00 से 4:00 रत्ती तक शहद के साथ चटाना चाहिए।
- अजीब,काकडासिंगी , नागरमोथा,और बच्छ, चारों अशुद्धियों को छोड़ बनाकर 2:30 रत्ती से 10 रत्ती तक की खुराक में शहद के साथ चटाने से बालकों को खांसी बुखार उल्टी अतिसार जैसे रोग दूर हो जाते हैं।
- अजीब, नागरमोथा,पीपल,काकडसिंगी, ओर मुलेठी, सबको समान भाग लेकर चूर्ण करके 4:30 से 6:30 तक की मात्रा में शहद के साथ चटाने से बालकों को खांसी बुखार में अतिसार बंद होता है।
- अतीस और वायविडंग नागपुर साथ के साथ चटाने से बच्चों में कृमि नष्ट हो जाती है।
- अतीस ज्वर की सबसे अच्छी दवा आयुर्वेद में मानी जाती है।
2=अखरोटी जंगली (Alcurites moluceana)
इसका प्रचलित नाम अखरोट जंगली है यह एक अखरोट की जाति का बड़ा दुख होता है इसके झाड़ो की कर्नाटक में खेती की जाती है। इसके पत्ते गोल और बरछी के आकार के होते हैं।
इसका फल अखरोट की तरह ही लंबा गोल सख्त और मोटा होता है।
इसकी उपयोगिता और औषधीय गुण,
आयुर्वेदिक मत से इसका फल मीठा शीतल कामोद्दीपक और पौष्टिक होता है। यह भूख को बढ़ाता है वाद को नष्ट करता है हृदय रोग और जलन में उपयोगी है यह कब और पित्त को बढ़ाता है और कब्जियत पैदा करता है। इसके फल पौष्टिक तेल निरीक्षक और फलों की छाल स्तंभक होती है। औषधि रूप में इसका फल ही मुख्य रूप से सेवन किया जाता है। यह पौष्टिक कामोद्दीपक पेट के आफारे को दूर करने वाला और कफ निश्तारक है । मस्तिष्क हृदय और किडनी के लिए लाभदायक है। वायु नालियों में प्रदा बवासीर आंख से पानी निकलना पागल कुत्ते का जहर रगड़ अंततः दद में यह काफी फायदेमंद होता है। इसका तेल कामोद्दीपक तथा हृदय को पुष्ट करने वाला होता है। इसके बीजों से प्राप्त किया हुआ तेल 1 से 2 औस तक की मात्रा में निश्चित विरैचक है। इसके 3 से लेकर 6 घंटे के अंदर 10 शुरू हो जाती है यह प्रभाव से अरंडी के तेल से मिलता जुलता है किंतु यह अरंडी के तेल से कई गुना उत्तम है। यह दुर्गंध पूर्ण और बस जाए का नहीं होता इसके विरेचन में बवन की प्रवृत्ति नहीं होती।
3=आयापमान (Eupatorium Ayapan);-
आयापान इसका प्रचलित नाम है या बंगाल की एक प्रसिद्ध वनस्पति है इसके वृक्ष मझोली कद के होते हैं। इसके पौधे बंगाल में बाग बगीचों में चारों तरफ रुपए जाते हैं इसके पत्ते बड़े होते हैं और पत्तों के डंठल और उनकी नशे लाल रंग की होती है बगीचों के अलावा बंगाल के जंगल में भी है वनस्पति पैदा होती।
औषधीय उपयोगिता;-
ऐसा कहा जाता है कि जब लक्ष्मण को मिल्क नाथ की शक्ति ब्रह्म शक्ति लगी थी और वह मूर्छित हो गए थे तब हनुमान गंधमादन पर्वत के ऊपर से इस औषधि को लाए थे और इसके द्वारा सुषेण वैद्य ने उन्हें जीवित किया था। इस कथन में सत्य का कितना है उसे यह तो नहीं कहा जा सकता मगर अपने गांव पूर्वक और रक्त स्राव रोधक महान गुड़ के लिए औषधि अमोघ औषधि है। रखता विकार रक्त प्रदर खूनी बवासीर इत्यादि शरीर के किसी भी भाग में से खून देने के लिए इसके पत्तों का रस पीने से तुरंत लाभ मिलता है।
पहले से थोड़ा सा ज्यादा किसी भी रूप म खून बहता हूं पट्टी बांधने से भी खून का रुकना बनना हो तो इसके पत्तों को पीसकर लेप की पट्टी बांधने से खून बहना बंद हो जाता है वह घाव शीघ्र ही भर जाता है। जिस मनुष्य को शस्त्र का गहरा घाव लगा हो उसको आयापान के पत्तों का रस पिलाने से और घाव पर लगाने से खून का बहना बंद हो जाता है इसी प्रकार रस पीने से आमाशय में से गिरने वाला खून भी बंद हो जाता है। आया पान के पत्तों को पत्थर पर पीसकर पीसे हुए पत्तों को हथेलियों के बीच दबाकर रस निकालना होता है इस औषधि के संबंध में यह भी कहा जाता है कि यह एक उत्तेजक औषधि है कम मात्रा में पौष्टिक और अधिक मात्रा में विरेचक है। इसका गर्म काढ़ा बनाकर पीने से बुखार सही हो जाता है यह मलेरिया में भी इसका बहुत अधिक प्रभाव होता है इसको पीने से मलेरिया बुखार सही हो जाता है।
अरंड ककड़ी( Garica papaya) ््
Iska prachalit naam arand kharbuja papaya arand kakdi papita aadi hai यह भारतवर्ष में सर्वत्र पाया जाता है यह एक जाना माना पौधा है इसका पका हुआ फल सुस्वाद मधुर कब कारी हृदय के लिए हितकारी उन्माद को हरने वाला कामोद्दीपक अंतरिम को संकोचन करने वाला स्निग्ध व पित्त नाशक है। आयुर्वेद में इस फल की बहुत अधिक उपयोगिता है।
यूनानी औषधि के उपयोग के रूप में;-
इसका पका हुआ फल अग्नि दीपक भूख बढ़ाने वाला पाचक पेट के अफारे को दूर करने वाला और मूत्र निस्तारक है। के पेट की जलन और तिल्ली को दूर करता है। मूत्राशय की बीमारियों को मिटाता है। खासकर पथरी रोग में बहुत लाभ पहुंचाता है शरीर के मोटापे को मिटाता है कब के साथ खून जाने की बीमारी दूर करता है।
खूनी बवासीर में पेशाब की नदियों के घाव को दूर करने में फायदेमंद होता है। दाल इत्यादि चर्म रोगों में या लाभ पहुंचाता है। इसकी कच्चे फल का दूध कृमि रोग को नष्ट करने वाला माना गया है इसके बीच भी कृमि नाशक है और इनका उपयोग रितु स्राव को नियमित करने के लिए भी किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इन दिनों में गर्भपात करने की शक्ति भी इसीलिए गर्भवती स्त्रियों को औषधि रूप में इन्हें नहीं देना चाहिए।
इसके औषधीय गुण;-
- इसके कच्चे फल का दूध 3 ग्राम शक्कर 3 ग्राम दोनों को मिलाकर उसके तीन हिस्से कर लें यह खुराक सवेरे दोपहर और शाम के समय देने से कुछ दिनों में ही बढ़ी हुई तिल्ली में आराम मिलता है। इसी प्रकार इसके सूखे फल को चोर में नमक मिलाकर देने से भी लाभ होता है।
- पेट के कीड़े मारने के लिए इसका फल सवा ग्राम से 3:45 ग्राम तक दूध के साथ देना चाहिए इसका असर आंतों की लंब चपेटे गोल कीडो अधिक होता है।
- फंकी देने से पुराना अतिसार रोग दूर होता है।
- इसके दूध को लेप करने से गांट ठीक हो जाती है।
- इसका दूध लगाने से उपदंश के घाव सफेद चकते और चमड़ी के रोग दूर हो जाते हैं।
- इसकी कच्चे फल का साथ खिलाने से स्तनों के अंदर दूध की वृधि होती है।
- अजवाइन 15 तोला सांभर नमक 1-1 तोला इन सब औषधियों को खट्टी नींबू अदरक के रस में 1 माह तक पडा रहने देना चाहिए । उसके पश्चात इस औषधि को 3 ग्राम मात्रा में एक रद्दी अरंड ककड़ी का सत अथवा विपि डालकर खिलाने से भयंकर मंदाग्नि भी दूर हो जाती है।
- ककड़ी चर्म रोगों पर कारगर औषधि है चर्म रोगों पर इसका दूध अधिक गुणकारी है दाद खाज खुजली या अन्य प्रकार के चर्म रोग में इसका दूध दूषित अंग पर लगाने से थोड़े दिनों में रुक जाता रहता है।
4=अरारोवा (Grude Chrysarobn)
इसका प्रचलित नाम अ्रोरोवा यह ब्राजील में पैदा होती है एंजलिन अमोरोसो नामक एक वृक्ष के तनो के खोखले भावना उत्पन्न होती है। इसका चूर्ण गोवा पाउडर के नाम से जाना जाता है।
औषधि चर्म रोग के अंदर अपना खास प्रभाव रखती है चमड़े के ऊपर इसका अत्यंत सशक्त और शीघ्रता से प्रभाव होता है। दाद विचर्चिका एग्जिमा यौवनपीडिका इत्यादि लगों पर इसको वैसलीन के साथ मिलाकर प्रयोग करने से बहुत लाभ होता है। मगर इस लेप को दर्द की सीमा तक ही लगाना चाहिए उसके बाहर स्वस्थ चमड़ी पर स्पर्श ना होने देना चाहिए। विस्फोटक विवचर्चिका और दाद इत्यादि चर्म रोगों में शीघ्र और निश्चित रूप से फायदा पहुंचाने वाली औषधि गोवा पाउडर और नींबू का सिरका है। इस पाउडर को नींबू के रस में गाढ़ा गाढ़ा मिलाकर दर्द की जगह पर लेप करने से दो-तीन दिन में पूर्ण लाभ होता है। छाल का रस निकालकर विस्फोटक चर्म रोगों में सुबह दोपहर शाम लगाने से कष्ट से सीख छुटकारा मिलता है।
औषधि के भीतरी प्रयोग से भी विचर्चिका एग्जिमा और यौवन पीडिकायो में मैं लाभ पहुंचता है। इसकी छोटी से छोटी एक चावल से कम मात्रा भी पेट के अंदर ऐठन पैदा करके घबराहट व्यग्रता और वमन पैदा करती है। इसीलिए इसका भीतरी प्रयोग कभी भी नहीं करना चाहिए।
औषधीय गुण
छाल का काढ़ा बनाकर पीने से अतिसार में फायदा पहुंचता है। इसकी 7.5 ग्राम कोमल पत्तियों को पीसकर गोली बनाकर खिलाने से सुजाक में लाभ होता है। इसकी छाल के काढ़े से कुल्ला करने से दंत रोग और मसूड़ों में से खून आना बंद होता है। एरिया के रोग में भी इसके काढ़े से कुल्ला करने से कीटाणु को मारने की क्षमता होती है मुंह से आती दुर्गंध में भी है लाभकारी है।
5=असालू (LEPIDUM STIVUM)
इसका प्रचलित नाम होलो यह भारतवर्ष में सर्वत्र पाया जाता है इसका पौधा सरसों के पौधे की तरह होता है। इसके पत्ते कटे-फटे रहते हैं इसके फूल नीले रंग के होते हैं इसमें फलियां आती हैं उन फलियों पर कुछ रोमासा होता है इसके बीजों में बहुत चेफ होता है।
आयुर्वेद में इसकी उपयोगिता
यह उस अधिक गर्म कड़वी पौष्टिक दूध बढ़ाने वाली वाजीकरण और कामोद्दीपक है। यह बात कफ अतिसार और त्वचा के रोगों को नष्ट करने वाली है। दूध युक्त अशालु अभी घात रोग चर्म रोग और रुधिर विकार को दूर करने वाली है।
यूनानी परंपरा में इसकी उपयोगिता
इसके बीज और पत्ते गर्म शुष्क मूत्र निशा रक विरेचक और कामोद्दीपक है। किडनी के रोग हो वायु नालियों में प्रदाह छाती के दर्द गठिया और अमाशय की तकलीफों में यह लाभ जनक। यह मस्तिष्क को शक्ति देता है और बुद्धि का विकास करता है।
असालु के पत्तों या फूलों को उबाल कर ठंडा कर छानकर रख ले। दोपहर शाम इस रस को खाने से आधा घंटा पहले तीन-चार चम्मच के लिए ऐसा 1 सप्ताह तक करने से शरीर के रक्त विकार के सभी दोष दूर हो जाते हैं।
असालु के औषधीय गुण
- हिचकी अतिसार और रुधिर के विकार के रोग में है औषधि बहुत लाभकारी होती है। इसके सेवन से बढ़ी हुई तिल्ली अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ जाती है।
- तड़प पिलाने से अमाशय की पीड़ा मिलती है पेट दर्द से संबंधित शिकायत दूर होती है मुख खुलकर लगती है।
- इसके बीजों को कूटकर नींबू के रस में मिलाकर लेप करने से सूजन समाप्त हो जाती है।
- किसकी डालियों को उठाकर पिलाने से स्वास और सूखी खांसी मिटती है।
- इसका शरबत मिलाकर पिलाने से खूनी बवासीर में लाभ होता है।
- इसका काढ़ा बनाकर पिलाने से सारे शरीर में फैला हुआ सर्प दंश का विष शांत हो जाता है।
- इसकी जड़ के चूर्ण को धमकी देने से बार-बार दस्त की शंका दूर होती है तथा अतिसार मिटता है,।
- दाह और खुजली पैदा करने वाले पदार्थों के विष को उतारने के लिए इसका बीजों का रस निकालकर पिलाने से लाभ होता है।
6=आम्र गंधक (LIMNOPHILAGATIOLOIDES)
कुत्र इसका प्रचलित नाम है। यह पौधा प्रारंभ से ही बहुशाखी होता है। यह पौधा भारतवर्ष के सीट प्रांतों में तथा बलूचिस्तान में सीलोन और चीन में पाया जाता है यह छोटी जाति का पौधा होता है जिसमें तारपीन के समान तेज गंध आती है। अक्सर एयरपोर्ट प्रारंभ से ही बहुत साख होता है। उसकी जड़ी नीचे ज्यादा फैलती है।
औषधि सडान को रोकने वाली क्रीम विनाशक मानी जाती है।साघांतिक ज्वरो में शरीर पर मालिश करने के लिए इसका रस काम में लाया जाता है। सूट और जीरे के साथ इस औषधि को लेने से अतिसार और प्रवाहिका में लाभ होता है। इसके पौधे का नारियल के तेल के साथ मल्हन बनाकर लगाने से हाथी पाओं में लाभ होता है।
7=अरलू (OROXYLUM INDICUM)
इसका प्रचलित नाम अरलू है। यह एक 1 वृक्ष है यह भारतवर्ष में सर्वत्र पाया जाता है इसकी झाड़ नीम के बराबर ऊंचे होते हैं झाड़ व इसकी डालियां अक्सर सीधी होती है। झाल का रंग सफेद राख के समान होता है पत्ते 4 से 8 इंच तक लंबी उम्र 2 से 3 इंच तक जोड़े गहरी कटी हुई को रोके व कंगूरे दार होते हैं। डालिया 1 फुट से लेकर 3 फुट तक लंबी होती है इसके फूल कुछ पीलापन लिए हुए हरे रंग के होते हैं फलियां 2-2 फुट की लंबी तलवार के समान होती है।
आयुर्वेद में किस पौधे की उपयोगिता
आयुर्वेद में बताया गया है कि इसका स्वाद कसैला कड़वा चरपरा जठराग्नि को उद्दीपन करने वाला मल रोधक शीतल वीर्य वर्धक बलवान तथा वात पित्त सन्निपात ज्वर कब प्रदोष अरुचि आमवात क्रीमी उल्टी खांसी अतिशा तृषा और कोढ का नाश करने वाला होता है। कच्चा फल कसैला मधुर हल्का श्री देव को बलवान बनाने वाला रुचिकर कंठ के लिए हितकारी अग्नि पुत्र दीपक गरम कड़वा खारा तथा गुरुवार कब बवासीर और कृमि रोग को नष्ट करने वाला होता है। अरलू की एक लोक की छाल को लेकर स्वच्छ पानी से धोकर 1 लीटर पानी में धीमी आंच पर चढ़ा दें जब पानी आधा रह जाए तो ठंडा होने दें ठंडा हो जाने पर पानी छान लें इसने हुए रस्यूक्त पानी को सुबह-सुबह एक कब पीने से बुखार व तृष्णा में लाभ होता है।
इसकी छाल कड़वी और बुखार तथा तृषा में शांति पहुंचाने वाली सन को चक भूख बढ़ाने वाली क्रीम विनाशक और बुखार को नष्ट करने वाली होती है।
यह बच्चों को अतिसार पेचिश कान के दर्द चमड़ी के रोग और गुदाद्वार की तकलीफों में भी लाभ पहुंचाती है यह औषधि भी दश मूल का अंग है। इसकी छाल हो पत्ते बहुत पौष्टिक पाले जाते हैं तथा प्रसूत के पश्चात भी कमजोरी को दूर करने के लिए दिया जाता है। इसकी छाल का रस नारियल के रस के साथ में या शहद के साथ देने से प्रसूति के बाद होने वाली तकलीफों को दूर करता है।
आयुर्वेद के अनुसार इसके औषधीय गुण
- इसकी छाल पत्तों को बारीक पीसकर गोला बनाकर बड के पत्तों में लपेट कर गीली मिट्टी के बीच में रखकर भाड़ में डाल दे जब मिट्टी पक्का लाल हो जाए तब उसको निकाल कर ठंडा होने दें। सिर फोड़कर अंदर की लुगदी को निचोड़ लें इस रस में से 2 ग्राम रस सवेरे शाम पीने से बहुत दिनों का अतिसार खूनी दस्त इत्यादि रोग में आराम मिलता है।
- जिन स्त्रियों को प्रसूति होने के पश्चात 46 दिन तक भयंकर पीड़ा रहती है उनको इसकी छाल का 4 6 रत्ती चूर्ण लेकर लगभग सोंठ और गुड़ के साथ मिलाकर उनकी टीम गोलियां बनाकर सवेरे दोपहर और शाम को एक-एक गोली दशमूल क्वाथ के साथ देने से चमत्कारी ढंग से सब पीडाऐ दूर हो जाती है। 10 -15 दिन तक लगातार देते रहने से प्रसव के पश्चात आने वाली कमजोरी दूर होकर सूतिका रोग होने का भय जाता रहता है।
- इसकी छाल के चूर्ण को एक रत्ती से 1:30 रत्ती की मात्रा में नियमित रूप से लेते रहने से तथा इसके पत्तों को गरम करके संधियों पर बांधने से संधिवात में बहुत लाभ होता है।
- इसकी लकड़ी का छोटा प्याला बनाकर उस प्याली में रात भर पानी भरा रखकर सवेरे उस पानी को पीने से इकतरफा,तिजारी,चौथिया, सब प्रकार के मलेरिया बुखार नष्ट हो जाते हैं। यह प्याला कड़वा, चरपरा, जठराग्नि को बल पहुंचाने वाला मल को रोकने वाला शीतल तथा मलेरिया के असर को रोकने वाला होता है।
- इसके चूर्ण को अदरक के रस व शहद के साथ चाटने से श्वास में लाभ होता है।
- इसकी छाल को ठंडी या गर्म पानी में चार पहर भिगोकर मल ,छानकर दिन में दो बार पिलाने से मंदाग्नि मिटती है ।
- इसकी 3 ग्राम जल में 3 ग्राम सोंठ को हटाकर पिलाने से पेट की गैस समाप्त हो जाती है।
- इसके गोंद के चूर्ण को थोड़ा-थोड़ा दूध के साथ पिलाने से आम आती सार और खांसी मिटती है।
- इसकी जड़ की छाल लाकर बारीक बारीक पेस्ट बनाकर लुगदी को तिल के तेल के अंदर रखकर तेल से दुगने वजन का पानी डालकर आग पर पका देना चाहिए जब पानी जलकर शुद्ध तेल रह जाए तब उसको छानकर रख लेना चाहिए इस दिल को कानों के अंदर टपका ने से त्रिदोष से पैदा हुआ कणर्रशूल मिटता है।
- इसकी जड़ की छाल लाकर बारी करके सुखा देना चाहिए इसमें से आधा तोला छाल लेकर चार ,पांच तोले पानी के अंदर 4 घंटे तक भिगोना चाहिए। उसके पश्चात उछाल को बारीक पीसकर उसी पानी के अंदर छानकर उसमें मिश्री मिलाकर पीना चाहिए। इस प्रकार 7 दिन तक सवेरे, शाम पीना चाहिए। खाने में गेहूं की रोटी की शक्कर इत्यादि वस्तु खाना चाहिए चावल नहीं खाना चाहिए। 7 दिन तक स्नान नहीं करना चाहिए आठवें दिन नीम के पत्तों के उठाए हुए पानी से स्नान करके पथ्य छोड़ना चाहिए इससे उपदंश दो होता है।
- इसकी छाल को चित्र कमलू, इन्र्दौजी, करंज की छाल सेंधा नमक सूट इन सब औषधियों को समान भाग लेकर को पीसकर चूर्ण बनाकर 1:30 ग्राम से 3 ग्राम तक मट्ठी के साथ लेने से बवासीर नष्ट हो जाता है।
- इसकी छाल का काढ़ा बनाकर उसके कुल्ला करने से मुंह के छाले नष्ट हो जाते हैं।
- अरलू की छाल को चाहे सुखकर उबालकर इसके रस को पीने अथवा ताजी छाल को उबालकर इसका रस भी इसका लाभ दोनों अवस्था में समान रूप से होता है।
उपर्युक्त औषधियों को आयुर्वेद के आधार पर बताया गया है जिसका विवरण ऊपर दिया गया है इन औषधियों का सेवन करने से किसी तरह का साइड इफेक्ट नहीं होता है परंतु अधिकता किसी भी चीज की हानिकारक होती है इसलिए इन औषधियों का सेवन करते समय पूरी सावधानी और सतर्कता बरतनी चाहिए और मात्रा का विशेष ध्यान देना चाहिए। और किसी तरह की किसी को कोई एलर्जी की समस्या हो तो चिकित्सक से परामर्श करने के पश्चात ही इन औषधियों का सेवन करना चाहिए।
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